अतीक-अशरफ हत्याकांड: पुलिस रिमांड में देरी और डीवीआर जब्ती से जांच पर गहराया शक

जहां पुलिस ने कथित रूप से आसपास की दुकानों से डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर जब्त किए, वहीं अपराध के चार दिन बाद तक तीनों आरोपियों की रिमांड की मांग नहीं करने के कारण, जांच संदेह के घेरे में है.

WrittenBy:प्रतीक गोयल
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पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की टीवी कैमरों के सामने हुई हत्या के बाद से घटनास्थल के आसपास के इलाकों धोंडीपुर और मिन्हाजपुर में पुलिसिया कार्रवाई से बेचैनी बढ़ रही है.

जहां एक ओर पुलिस कथित रूप से आसपास की दुकानों से डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर जब्त कर रही है, वहीं अपराध के चार दिन बाद तक तीनों आरोपियों के रिमांड की मांग नहीं करने के कारण, जांच संदेह के घेरे में है. उन रिपोर्ट्स के कारण भी अविश्वास बढ़ रहा है जिनमें आरोप लगाए जा रहे हैं कि शूटर प्रेस कार्ड पहनकर पुलिस वाहन में आए थे.

घटना की एफआईआर शाहगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी, जो कॉल्विन अस्पताल से 50 मीटर दूर है. अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या मेडिकल जांच के लिए ले जाते समय अस्पताल के सामने ही हुई थी. लेकिन घटना के दो दिन बाद जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित दो विशेष जांच दलों (एसआईटी) को सौंप दी गई.

'उन्हें डीवीआर क्यों चाहिए?' 

“घटना रात के करीब 10.40 बजे हुई और दो घंटे बाद ही पुलिस ने दुकानों से डीवीआर जब्त करना शुरू कर दिया. आमतौर पर पुलिस सीसीटीवी फुटेज की कॉपी लेती है. उन्हें डीवीआर क्यों लेना पड़ रहा है? कुछ लोगों ने यह भी बताया कि उन्होंने शूटरों को पुलिस की गाड़ी से उतरते देखा था. अगर ऐसा कुछ है तो क्या वह सबूत मिटाना चाहते हैं?” अस्पताल से सटे धोंडीपुर के एक स्थानीय निवासी ने कहा.

डीवीआर जब्त किए जाने के बारे में पूछे जाने पर शाहगंज थाने के एसएचओ अश्विनी कुमार सिंह ने कहा, “मुझे इस प्रक्रिया की जानकारी नहीं है. केवल एक इंजीनियर ही आपको इसके बारे में बता सकता है." क्या नियमित रूप से डीवीआर जब्त किए जाते हैं, इस सवाल पर भी उन्होंने कहा, "मैं आपको नहीं बता सकता. इस बारे में कोई इंजीनियर ही बता सकता है."

एसएचओ सिंह उन पांच पुलिस अधिकारियों में से हैं जिन्हें मंगलवार को एसआईटी की पूछताछ के बाद निलंबित कर दिया गया है. चार अन्य पुलिसवालों में दो इंस्पेक्टर और दो कॉन्स्टेबल शामिल हैं.

इस बीच न्यूज़लॉन्ड्री को पता चला है कि पुलिस ने काटजू रोड स्थित दुकानों से सभी 24 रिकॉर्डर जब्त कर लिए हैं. यहीं से अस्पताल का रास्ता शुरू होता है और यह सड़क आगे जाकर शाहगंज थाने पर समाप्त होती है.

कानून के जानकारों ने कहा कि डीवीआर को एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही जब्त किया जा सकता है, स्थानीय लोगों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि प्रयागराज के अस्पताल के पास की दुकानों से रिकॉर्डर जब्त करते समय ऐसी किसी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.

एक होटल मैनेजर ने बताया, "वह सुबह करीब 4 बजे आए और डीवीआर मांगा. हमने उनसे अनुरोध किया कि फुटेज ले लें, लेकिन उन्होंने कहा कि हमें पूरे डीवीआर की जरूरत है."

एक दूसरी दुकान पर एक कर्मचारी ने बताया, "हमारे पास अभी डीवीआर सेट नहीं है. यहां सिर्फ कैमरा चल रहा है. अगर कुछ अनहोनी होती है तो हम क्या करेंगे?"

पुलिस रिमांड की मांग में देरी?

हत्याकांड के आरोपी 22 वर्षीय लवलेश तिवारी, 18 वर्षीय अरुण मौर्य और 23 वर्षीय मोहित सिंह उर्फ ​​शनि प्रतापगढ़ जेल में बंद हैं.

वे पहले न्यायिक हिरासत में थे क्योंकि पुलिस ने 16 अप्रैल की घटना के घंटों बाद भी पुलिस रिमांड की मांग नहीं की थी. जिला अदालत ने अपराध के चार दिन बाद बुधवार को तीनों आरोपियों को चार दिन का पुलिस रिमांड दिया. एसआईटी ने 14 दिन की हिरासत मांगी थी. आरोपियों को 23 अप्रैल को फिर से न्यायालय में पेश किया जाएगा.

तीनों आरोपियों को शुरू में नैनी जेल भेजा जाना था, लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें प्रतापगढ़ भेज दिया गया क्योंकि अतीक का बेटा अली और गिरोह के अन्य सदस्य नैनी जेल में बंद हैं.

कुछ शुरुआती न्यूज़ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि तीनों संदिग्ध मोटरसाइकिल पर अस्पताल आए थे, लेकिन बाद में यह पाया गया कि मौके पर दिख रहे दोपहिया वाहन अस्पताल में भर्ती मरीजों के रिश्तेदारों के थे. संदिग्ध कथित तौर पर 'एनसीआर न्यूज़' की माइक आईडी के साथ मीडियाकर्मी बनकर मौके पर आए थे.

डर के मारे जनाजे में नहीं पहुंचे लोग? 

जहां मीडिया के एक वर्ग ने दावा किया कि अहमद भाइयों के जनाजे में कम लोगों की उपस्थिति दर्शाती है कि अतीक का समर्थन करने वाले कम हैं, वहीं स्थानीय निवासियों ने कहा कि अधिकारियों के डर के कारण ज्यादा लोग नहीं पहुंचे.

"पुलिस वहां आने वाले लोगों का विवरण नोट कर रही थी. उनमें ज्यादातर रिश्तेदार थे. लोग वहां जाने से डर रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि पुलिस उनसे पूछताछ करेगी. अगर सब कुछ सामान्य होता तो कम से कम चार लाख लोग जनाजे में शामिल होते," अंतिम संस्कार की जानकारी रखने वाले प्रयागराज के एक निवासी ने कहा. 

इलाके की सभी दुकानें अब खुली हैं. लेकिन गोलीकांड के मद्देनजर मोबाइल इंटरनेट और लोगों के इकठ्ठा होने पर लगे प्रतिबंध हटने से पहले, धोंडीपुर और मिन्हाजपुर में दो दिनों तक बेचैनी का माहौल था. 'भय के माहौल' की ओर इशारा करते हुए, शूटआउट के दो दिन बाद अपनी आधी बंद दुकान में बैठे एक शख्स ने कहा, "घटना के बाद से हमने पूरी तरह से दुकान नहीं खोली है. लोगों ने खुद से ही अपनी दुकानें बंद रखीं हैं."

मामले की जांच कर रही पहली एसआईटी का नेतृत्व प्रयागराज के एडिशनल डीसीपी सतीश चंद्र कर रहे हैं. प्रयागराज के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता वाली दूसरी तीन-सदस्यीय टीम चंद्र की एसआईटी को मॉनिटर कर रही है.

चंद्र ने हमारे फोन कॉल्स का उत्तर नहीं दिया. उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर यह रिपोर्ट अपडेट की जाएगी.

न्यूज़लॉन्ड्री  ने एसआईटी में शामिल एसीपी सत्येंद्र तिवारी से भी संपर्क किया, लेकिन उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

क्या है डीवीआर जब्त करने की प्रक्रिया ?

वहीं नागपुर में हाई कोर्ट के वकील निहाल सिंह राठौड़ ने कहा कि पुलिस एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही डीवीआर जब्त कर सकती है. "ऐसा इलाके के दो सम्मानित व्यक्तियों की उपस्थिति में किया जाना चाहिए था. जब्ती का एक ज्ञापन तैयार करना होता है और उसकी एक प्रति उस व्यक्ति को देनी होती है जिसके पास से डीवीआर जब्त किया जा रहा है. जब्ती साइबर एक्सपर्ट के जरिए होनी चाहिए. डीवीआर के मालिक को 65बी प्रमाणपत्र भी देना होता है जिसमें वह बताते हैं कि उपकरण ठीक से काम कर रहा है और खराब नहीं है." 

"उन्हें यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जब्त की गई सामग्री की अखंडता बनी रहे. इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं होने पर साक्ष्य न केवल अपना मूल्य खो देता है, बल्कि इससे संदेह भी पैदा होता है."

हत्याकांड से कुछ दिन पहले, अतीक और उसके परिवार ने अदालत के समक्ष कई पत्रों और याचिकाओं द्वारा बार-बार जान का खतरा होने की बात कही थी. सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में हत्याकांड की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है, जिसकी सुनवाई 24 अप्रैल को होगी.

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