तनाव, ड्रॉपआउट्स, आत्महत्याएं: आईआईटी में जातिगत भेदभाव की समस्या का खुलासा

'आरक्षण के बच्चे आ गए’, हर साल, हाशिए पर रहने वाले छात्र आईआईटी परिसरों में जातिगत भेदभाव से जूझते हैं.

WrittenBy:सुमेधा मित्तल
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दर्शन सोलंकी (बाएं) और अनिकेत अंभोरे. दोनों की मौत आईआईटी में पढ़ाई के दौरान आत्महत्या की वजह से हुई.

"चार दिन सपना है, जिसे जीने आए हो, बाकी सारी दुनिया को तुम पीछे छोड़ो"

यह 2012 के दिसंबर महीने के आखिरी दिनों की एक रात थी जब आईआईटी बॉम्बे के सिग्नेचर फेस्टिवल मूड इंडिगो के संगीत समारोह में ऊपर उद्धरण चिन्हों में लिखी लाइनें (जिन्हें इस फेस्टिवल के एंथम के तौर पर चुना गया था) गुनगुनाई गईं तो श्रोता भी इन लाइनों पर खुशी से चीखने लगे.

स्टेज पर कोई सामान्य ए-सूची वाला कलाकार नहीं था बल्कि इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष का 18 वर्षीय छात्र अनिकेत अंभोरे था. ये गीत उसने खुद ही लिखा और कंपोज किया था. इस घटना के दो साल बाद उसने कैंपस में आत्महत्या कर ली.

उसके पिता संजय अंभोरे ने कहा, "अपने स्कूल के दिनों में उसने कभी भी 90 प्रतिशत से कम अंक हासिल नहीं किए. लेकिन आईआईटी में आने के बाद उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. वह कुछ एक विषयों में फेल होने लगा."

उसके पिता ने यह भी कहा कि इंजीनियरिंग द्वितीय वर्ष के अंत में उसने अपने माता-पिता से कहा कि वह दोबारा से आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा देना चाहता है. संजय ने बताया, "उसने कहा कि वह सामान्य वर्ग से आईआईटी में दाखिला लेना चाहता है. वह इस बात को लेकर ग्लानि से भरा हुआ था कि वह कॉलेज की मेरिट संबंधी योग्यताओं को पूरा नहीं करता."

अनिकेत की मौत के दो महीने बाद आईआईटी की एक अंदरूनी समिति ने उसकी मौत से जुड़ी जांच संबंधी एक रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया था कि "ऐसा नहीं लगता कि आईआईटी-बॉम्बे में जातिगत भेदभाव या आरक्षण के खिलाफ खुले तौर पर कोई माहौल है.’’

इसके 10 साल बाद 2 मार्च, 2023 को फिर से ऐसी ही एक रिपोर्ट तब सामने आई जब आईआईटी बॉम्बे के ही केमिकल इंजीनियरिंग के एक प्रथम वर्ष के छात्र दर्शन सोलंकी ने आत्महत्या कर ली. आईआईटी बॉम्बे की रिपोर्ट में दोबारा यहीं निष्कर्ष निकाला गया कि "सीधे तौर पर जातिगत भेदभाव से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला है."

हालांकि इस पर आईआईटी दिल्ली, बॉम्बे, मद्रास, कानपुर और खरगपुर के वर्तमान और पूर्व छात्रों का कहना है कि इस तरह के मामलों को अक्सर इसी तरह दबा दिया जाता है.

न्यूज़लॉन्ड्री ने देश के सभी आईआईटी संस्थानों को इससे संबंधित एक प्रश्नावली भेजी है; अगर उनका जवाब आता है तो इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

आत्महत्या की घटनाओं की असल संख्या इससे "कहीं ज्यादा" होने की संभावना

भारत में वर्तमान में 23 आईआईटी हैं; पहला 1951 में खड़गपुर में और नवीनतम 2016 में गोवा में स्थापित किया गया था. इन संस्थानों को शिक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा मिलता है - इस साल इन्हें कुल शिक्षा बजट का लगभग आठ प्रतिशत मिला है, जो कि करीब 9,600 करोड़ रुपए है. सभी पाठ्यक्रमों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के लिए 52 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं.

हालांकि आईआईटी मद्रास में एक स्वतंत्र छात्र निकाय चिंताबार द्वारा दायर एक आरटीआई पर शिक्षा मंत्रालय की प्रतिक्रिया से ऐसे संकेत मिलते हैं कि 2021 में, आईआईटी संस्थानों में एसटी छात्रों के लिए कुल पीएचडी सीटों में से 3,000 पात्र आवेदकों के बावजूद केवल 2.5 प्रतिशत ही भरे गए थे. अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए आरक्षित पीएचडी की 10 फीसदी से भी कम सीटें ही भर पायी.

पिछले कुछ वर्षों में आईआईटी के छात्रों द्वारा आत्महत्या एक गंभीर मुद्दा बन गया है. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का अनुमान है कि आईआईटी में 2014 से 2023 तक एक वर्ष में कम से कम चार आत्महत्याएं हुईं - वहीं 2021 तक कुल 34 आत्महत्याएं हुई थीं जिनमें आधे से अधिक आत्महत्या करने वाले एससी और ओबीसी छात्र थे. लेकिन आईआईटी बॉम्बे, दिल्ली, कानपुर और मद्रास के छात्र समूहों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि असल संख्या इससे "कहीं ज्यादा" है.

मसलन, शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि अब तक ऐसी कोई घटना रिपोर्ट नहीं हुई है जिसमें कि एक एसटी या अल्पसंख्यक आईआईटी छात्र ने "कोई आत्महत्या" की हो. हालांकि 2019 में आईआईटी मद्रास की एक मुस्लिम छात्रा फातिमा लतीफ ने कैंपस में आत्महत्या कर ली थी. उसका मामला मंत्रालय के आंकड़ों में शामिल नहीं है.

आईआईटी मद्रास के तीसरे वर्ष के एक छात्र ने कहा, "हर बार जब कोई आत्महत्या या किसी छात्र की मौत होती है, तो संस्थान एक सामान्य ईमेल भेजता है कि एक दुर्घटना हुई है - छात्र का नाम छिपाकर." “संस्थान खुद स्वीकार नहीं करता है कि जातिगत भेदभाव की वजहों से आत्महत्याएं होती हैं. इससे स्टूडेंट एक्टिविस्ट्स के लिए पीड़ितों और उन्हें परेशान करने वाले असल हालातों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है.”

छात्र ने आगे बताया, “आधिकारिक ईमेल हमेशा नहीं भेजे जाते हैं. एक साल पहले आईआईटी मद्रास कैंपस में एक छात्र का आंशिक रूप से जला हुआ शरीर मिला था. यह मामला पूरे मीडिया में छा गया था. लेकिन संस्थान ने इस पर बिल्कुल भी चर्चा नहीं की और न ही कोई ईमेल भेजा. इस मामले में आईआईटी मद्रास ने प्रेस के लिए एक बयान जारी किया था जबकि छात्रों का आरोप है कि आंतरिक रूप से उन्हें कोई विवरण नहीं दिया गया था.”

आईआईटी बॉम्बे के निदेशक सुभाशीष चौधरी ने दर्शन के मामले में 12 फरवरी को सभी छात्रों और संकाय सदस्यों को एक ईमेल भेजा, जिसमें कहा गया था, "हमें आपको खेद के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि आज दोपहर एक दुखद घटना में प्रथम वर्ष के एक छात्र की मौत हो गई."

जांच समिति से क्लीन चिट मिलने के बावजूद, दर्शन के परिवार ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया था कि उसकी मृत्यु से पहले उसे उत्पीड़न झेलना पड़ा था. उसकी मौत की जांच कर रही मुंबई पुलिस की एसआईटी ने मीडिया को बताया कि दर्शन के कमरे से एक "सुसाइड नोट" बरामद हुआ है. नोट में उसे परेशान करने के आरोप के साथ एक छात्र का नाम है.

एक पुलिस अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “शुरुआत में, हमारा मानना ​​था कि सेमेस्टर परीक्षा में खराब प्रदर्शन के चलते सोलंकी ने आत्महत्या की. हालांकि, सुसाइड नोट, जिसके बारे में हमारा शक है कि उसने अपनी जान लेने से कुछ मिनट पहले ही लिखा था, इस ओर इशारा करता है कि उसे परेशान किया गया था."

'इंसाफ मिलने की कोई गुंजाइश नहीं'

अनिकेत ने कभी गायक या कंपोजर बनने की ट्रेनिंग नहीं ली. अपनी किशोरावस्था के दौरान गिटार सीखते समय उसने यूं ही इन कौशलों को अपनाया. उसके पिता संजय ने हमें बताया, “वह पढ़ाई में भी मेधावी था. स्कूल के दिनों में, उसने कभी भी 90% से कम अंक हासिल नहीं किए.’’

अनिकेत भी जेईई के शीर्ष एक प्रतिशत छात्रों में से एक था, लेकिन वह भी ग्लानि से दबा रहता था.

संजय ने कहा, "मुझे अनिकेत के साथ उसके प्रोफेसर एच नारायण से मिलना याद है." "उन्होंने हमसे कहा, 'आप जानते हैं कि आप आईआईटी में कैसे पहुंचे. कोई भी छात्र जो टॉप 0.3 प्रतिशत रैंक में नहीं है, बेकार है.’’ उन्होंने हमारे मुंह पर ये कहा. मेरे पास उनका जवाब देने का साहस नहीं था. न्यूज़लॉन्ड्री ने नारायण को इस पर टिप्पणी करने के लिए एक ईमेल भेजा है.

खास तौर पर, दर्शन के समकालीनों ने कुछ इसी तरह की कहानियां सुनाईं - कथित तौर पर कैसे उसके रूममेट ने  दर्शन से जेईई में उनकी रैंक पूछने के बाद उनसे बातचीत कम कर दी.

फरवरी 2011 में, आईआईटी रुड़की में तृतीय वर्ष के दलित छात्र मनीष कुमार ने कैंपस में आत्महत्या कर ली. तीन साल पहले, आईआईटी कानपुर में अंतिम वर्ष के छात्र प्रशांत कुमार कुरील अपने कमरे में मृत मिला. उसकी कहानियां इनसाइट फाउंडेशन द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री डेथ ऑफ मेरिट के निर्माताओं द्वारा तैयार किए गए डेटाबेस का हिस्सा हैं.

डॉक्यूमेंट्री में मनीष के चाचा के हवाले से कहा गया है कि छात्र "उस पर जातिसूचक फब्तियां कसते थे" और उसे "बहुत प्रताड़ित किया गया." "कभी-कभी, वह बहुत भावुक हो जाता था," चाचा ने आगे कहा, "और पूछता था कि अगर वह इस जाति में पैदा हुआ तो इसमें उसकी क्या गलती थी." मनीष के माता-पिता ने कथित तौर पर उन छात्रों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिन्होंने उसे प्रताड़ित किया था, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माताओं में से एक शख्स, जो अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहता था, का प्रशांत को लेकर कहना है कि उसके परिवार को "एक प्रतिशत भी संदेह" नहीं था कि यह "जातिगत भेदभाव की वजह से की गई आत्महत्या" थी.

"वे निश्चित थे," उन्होंने कहा. “लेकिन इन मामलों में इंसाफ मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है. एफआईआर नहीं लिखी जाती. आईआईटी को ऊंची जाति के लोग चलाते हैं. एक छात्र के बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य के पीछे जातिगत भेदभाव को स्वीकार न करने में उनका अपना लाभ है.”

मनीष और प्रशांत की मौत की जांच उनके संबंधित संस्थानों की आंतरिक समितियों द्वारा नहीं की गई थी. आईआईटी बॉम्बे में एक छात्र निकाय, अंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्किल के एक सदस्य,  ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि कुछ समितियों द्वारा अनिकेत और दर्शन की मौत की जांच केवल इसलिए की गई थी क्योंकि "छात्रों द्वारा विरोध किया गया था और जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए गए थे."

छात्र ने आगे कहा, "इसीलिए, वे इन आरोपों को झूठा साबित करने के लिए एक रिपोर्ट लेकर आए." "लेकिन वे उन मामलों में ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं बनाते जहां कोई आक्रोश नहीं है."

इन आंतरिक समितियों को नियंत्रित करने के लिए कोई मानक दिशानिर्देश या नियम नहीं हैं जिनके आधार पर इनका गठन किया गया है. दर्शन के मामले में, आईआईटी बॉम्बे की आंतरिक समिति में संकाय सदस्य, वार्डन और परिसर में काम करने वाले डॉक्टर शामिल थे. इसमें कोई बाहरी सदस्य या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल नहीं था.                                                                                                            

मामले और परिणाम

अप्रैल 2021 में, कोविड लॉकडाउन के दौरान, वीडियोज की एक श्रृंखला सोशल मीडिया पर वायरल हुई. उनमें आईआईटी खड़गपुर में अंग्रेजी की एक सहायक प्रोफेसर सीमा सिंह को ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों पर जातिवादी टिप्पणी करते हुए दिखाया गया था.

उन्होंने वीडियो में कहा, "तुम महिला और बाल मंत्रालय जा सकते हो." “एससी, एसटी और अल्पसंख्यक मंत्रालय में जाओ. लेकिन मुझे वो करने से कोई नहीं रोक सकता जो मुझे तुम्हारे साथ करना है.”

सिंह को आठ महीने बाद अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया. जांच के लिए आईआईटी खड़गपुर ने 2021 में एक समिति बनाई लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी उसने अपनी रिपोर्ट अभी तक दाखिल नहीं की है. जब बाबासाहेब अंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंजीनियर्स - पिछड़े वर्गों के इंजीनियरों के एक संगठन - के अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने जांच के परिणाम के बारे में आईआईटी खड़गपुर के निदेशक वीके तिवारी से संपर्क किया, तो उन्हें एक ईमेल मिला जिसमें कहा गया था कि मामले में "अभी भी पूछताछ चल रही है."

नागसेन ने न्यूज़लॉन्ड्री से सवाल किया, "वे अभी तक क्या जांच कर रहे हैं?" "तीन साल बीत चुके हैं. सीमा सिंह छात्रों को सरेआम गाली देते हुए देखी गई थीं. ये उस तरह की गालियां हैं जो उत्पीड़ित वर्गों से आने वाले छात्रों का दमन करती हैं. क्या यह सीबीआई या इंटरपोल की जांच है?

इसी तरह की घटना 20 साल पहले आईआईटी कानपुर में हुई थी, जब एक मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर ने "बॉर्न बैक लॉगर्स" - उत्पीड़ित जातियों के छात्रों का जिक्र करते हुए एक नोटिस लगाया था. एक आंतरिक जांच समिति ने निष्कर्ष निकाला कि प्रोफेसर बीपी सिंह ने छात्रों की "भावनाओं को तो ठेस पहुंचाई" लेकिन वे जातिगत भेदभाव के दोषी नहीं है.

धीरज सिंह, जो उस समिति में छात्र प्रतिनिधि थे, ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि प्रोफेसर के "जातिवादी" व्यवहार के बारे में छात्रों ने गवाहियां दी थी. “वह छात्रों को उनकी जातियों के आधार पर अलग-अलग कतारों में खड़े होने के लिए कहते थे. हमने पाया कि वह उत्पीड़ित छात्रों के लिए खुलेआम अपमानजनक टिप्पणी करते थें. धीरज ने कहा कि इन गवाहियों के बावजूद जांच समिति को बीपी सिंह का व्यवहार जातिवादी नहीं लगा. सिंह अंततः सेवानिवृत्त हो गए.

पूर्व छात्रों का कहना है कि आज कैंपस में जातिवाद "अधिक परिष्कृत रूप में" मौजूद है और इसे साबित करना भी पहले से ज्यादा कठिन है. उदाहरण के लिए, दर्शन से उसकी जेईई रैंक के बारे में पूछा गया था, इसका मतलब यह था कि उसकी रैंक "बहुत कम" थी और इसलिए वह आरक्षण के जरिए आईआईटी बॉम्बे में आया.

2022 में आईआईटी कानपुर से स्नातक करने वाले एक छात्र द्वारा भी इस वाकये को दोहराया गया था.

नाम न छापने की शर्त पर एक पूर्व छात्र ने कहा, "छात्रों से पहली बातचीत के दौरान, वे उसकी जेईई रैंक पूछते हैं." “इससे वे आपकी जाति के बारे में जान जाते हैं और आपसे घृणा करने लगते हैं. जब मैंने प्रथम वर्ष में दोस्त बनाए और उन्हें मेरी जाति के बारे में पता चला तो उन्होंने मेरे साथ अलग व्यवहार करना शुरू कर दिया. एक प्रश्नोत्तरी या अकादमिक चर्चा के दौरान, वे इस तरह की टिप्पणियां करेंगे, ''तुम इस विषय के बारे में क्या जानोगे? तुम आरक्षण से आए हो.”

इस तरह की टिप्पणियों का स्थायी प्रभाव पड़ता है. पूर्व छात्र ने आगे कहा, “मैंने खुद से सवाल करना शुरू कर दिया कि मैं आईआईटी में जाने के लायक हूं या नहीं. प्रथम वर्ष में इसने मुझ पर बहुत बुरा असर डाला. मेरे अकादमिक स्कोर में भी गिरावट आयी. नतीजतन, मैंने अपने विंग के बाहर, अपनी पहचान के बारे में झूठ बोलना शुरू कर दिया ताकि लोगों को मुझसे दूर होने से रोक सकूं."

आईआईटी मद्रास के एक दलित छात्र ने बताया कि कैंपस में जातिगत भेदभाव के बारे में "सबसे बड़ी समस्या" यह है कि यह "व्यवस्थित" है.

उसने कहा, "यह तो साफ ही है कि शुरुआत में, पिछड़े समुदायों के छात्र सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं होंगे क्योंकि वे उनके जैसे कोचिंग संस्थान में नहीं गए हैं या फिर ज्यादातर उनमें जाने का खर्च भी नहीं उठा सकते हैं." “अन्य विश्वविद्यालयों के विपरीत, आईआईटी ज्वाइनिंग के पहले महीने से ही परीक्षाएं लेना शुरू कर देती है. ऐसे में, हाशिए के समुदायों के छात्र 20 में से 2 अंक प्राप्त करेंगे क्योंकि वे उतने तैयार नहीं हैं.”

आईआईटी के पूर्व और वर्तमान के कम से कम 14 छात्रों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि शोषित जातियों के आईआईटी छात्र अक्सर कोचिंग कक्षाओं में जाने का खर्च नहीं उठा सकते. लेखिका याशिका दत्त ने अपनी किताब 'कमिंग आउट एस दलित' में इस बारे में लिखा है, जिसमें कहा गया है कि एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के पास "दूसरी सहायक संरचनाओं की भी कमी है."

आईआईटी दिल्ली में पीएचडी के छात्र और उसके एससी/एसटी सेल के छात्र प्रतिनिधि शाइनल ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि वंचित छात्रों को "आरक्षण के बच्चे आ गए, भीम आर्मी आ गई" जैसी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है.

आईआईटी में विशेष पद भी होते हैं जिन्हें "जिम्मेदारी के पद" कहा जाता है. इसमें एक बीटेक छात्र को इच्छुक छात्रों के लिए सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों को आयोजित करने के लिए चुना जाता है. 

शाइनल ने कहा, "हमेशा, एक सामान्य श्रेणी के छात्र को ही इसके लिए चुना जाता है. यह हर बार कैसे संभव है? इसके अलावा, हमारे लिए अपनी पहचान का दावा करना आसान नहीं है, वह भी एक उच्च शिक्षण संस्थान के भीतर जो कि इस कदर ब्राह्मणवादी है. लेकिन वे यह नहीं समझते हैं कि हमारे लिए अपनी पहचान पर जोर देना महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहर के छात्रों में ड्रॉपआउट और आत्महत्या की दर सबसे अधिक है.”

फैकल्टी मेंबर भी निशाने पर हैं. 2021 में, आईआईटी मद्रास के एक सहायक प्रोफेसर ने कैंपस में "जातिगत भेदभाव" झेलने का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया. उन्होंने द वायर को विस्तार से अपने अनुभव बताए. 2019 में, आईआईटी कानपुर के एक एसोसिएट प्रोफेसर ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्हें अपने कुछ सहयोगियों द्वारा भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था जिनका कहना था कि उनकी नियुक्ति "गलत" थी.

छात्रों के लिए कोई सुरक्षात्मक उपाय नहीं

"उच्चतम ड्रॉपआउट" दरों पर शाइनल की टिप्पणी तथ्यों में निहित है. साल 2021 में, शिक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा को बताया कि शीर्ष सात आईआईटी से ड्रॉप आउट होने वाले स्नातक छात्रों में से 63 प्रतिशत आरक्षित वर्गों से थे. इनमें से कुछ संस्थानों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों का ड्रॉपआउट दर 72 प्रतिशत तक था. आईआईटी गुवाहाटी का रिकॉर्ड सबसे खराब था, जिसमें 88 प्रतिशत ड्रॉपआउट आरक्षित वर्गों से थे.

आईआईटी बॉम्बे ने छात्रों के क्यूमुलेटिव परफॉर्मेंस इंडेक्स (सीपीआई) के आधार पर अनिकेत की मृत्यु के बाद अपना विश्लेषण किया, जो उनके अकादमिक स्कोर को मापता है. इसके आंकड़ों से पता चला है कि पांच से नीचे सीपीआई वाले 70 प्रतिशत छात्र एससी/एसटी पृष्ठभूमि से थे. अधिकांश सामान्य वर्ग और ओबीसी छात्रों का सीपीआई छह से नौ के बीच था.

अनुसूचित जाति के एमटेक छात्र मधुसूदन ने 2011 में आईआईटी रुड़की से पढ़ाई छोड़ दी थी. उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा कि अगर मैं लंबे समय तक वहां रुकता, तो "मैं दूसरा रोहित वेमिला या दर्शन सोलंकी होता."

उन्होंने कहा, “मैं कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाला छात्र हूं, आईआईटी में पढ़ना मेरे बचपन का सपना था. लेकिन मैं पहले महीने ही बाहर निकल आया.” “आईआईटी संस्थानों का जातिवादी माहौल बहुत निराशाजनक है. जिस पल आपको दाखिला मिलता है, प्रोफेसर इशारा करने लगते हैं कि आप आरक्षण के जरिए आए हैं. वे सामान्य वर्ग के छात्रों की तुलना में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए उतने सहज नहीं होते हैं.”

उन्होंने कहा कि अन्य छात्र भी "आरक्षण के लिए आपको चिढ़ाएंगे." “जब आप कैंटीन में प्रवेश करते हैं, तो आप उन्हें अंग्रेजी में बात करते हुए पाएंगे. और अगर आप उन जैसे नहीं हैं, तो आपके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाएगा.”

छात्रों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्हें मदद लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है. 23 आईआईटी में से केवल तीन - बॉम्बे, रुड़की और दिल्ली - में ही एससी/एसटी सेल है, और दिल्ली में यह इसी महीने शुरू हुआ है.

सेल के प्रतिनिधि शाइनल ने कहा, "छह महीने के श्रम और दर्शन की मौत के बाद यह सेल स्थापित हो पाया." “दर्शन की शोक सभा के बाद, निदेशक ने सभी एससी/एसटी छात्रों को बुलाया. डेढ़ सौ छात्र-छात्राएं पहुंचे. आखिरकार वह इसके लिए राजी हो गए. अब, उन्होंने हमारे अंबेडकर स्टूडेंट कलेक्टिव को मान्यता देने की हमारी मांग को भी स्वीकार करने का वादा किया है.”

काउंसिल ऑफ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजीज के मुताबिक, हर एक आईआईटी संस्थान में छात्रों की काउंसलिंग के लिए एक स्टूडेंट वैलनेस सेंटर होना चाहिए - कैंपस में आत्महत्याओं के मद्देनजर 2017 में लिया गया फैसला. दिल्ली, कानपुर, खड़गपुर और मद्रास में आईआईटी के कम से कम 10 एससी/एसटी छात्रों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि इन केंद्रों तक उनकी पहुंच नहीं है.

एक दलित छात्र ने कहा, "आईआईटी मद्रास का वैलनेस सेंटर ऊंची जाति के लोग चलाते हैं. उनमें से कोई भी हाशिए की पृष्ठभूमि से नहीं आता. इसलिए हम उनसे अपनी समस्या साझा करने में सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं. इसके अलावा, वेलनेस सेंटर डीन के कार्यालय या छात्रों के कार्यालय के अंदर है. अगर कोई वहां जाता है, तो सभी को पता चल जाता है कि कौन सा छात्र मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं पीड़ित है... इसलिए हम उनसे संपर्क करने में हिचकिचाते हैं.”

न्यूज़लॉन्ड्री ने आईआईटी दिल्ली और आईआईटी मद्रास के वेलनेस सेंटर्स को फोन किया लेकिन उन्हें बताया गया कि उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं है. ऐसे में हमने दोनों संस्थानों को एक प्रश्नावली ईमेल की है; यदि वे जवाब देते हैं तो इस रिपोर्ट अपडेट कर दिया जाएगा.

यदि आप या आपके किसी परिचित को आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, तो हम आपसे मदद लेने का आग्रह करते हैं. कृपया यहां सूचीबद्ध हेल्पलाइन नंबरों में से किसी एक पर कॉल करें या किसी मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पेशेवर व्यक्ति से संपर्क करें.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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