एलजी बनाम दिल्ली सरकार: अंतहीन टकराव के बीच चुनी हुई सरकार का मुद्दा

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से एलजी और चुनी हुई सरकार के बीच रिश्ते डगमगाते ही रहे हैं, लेकिन विनय सक्सेना के एलजी बनने के बाद से दोनों के रिश्ते रसातल में चले गए हैं.

WrittenBy:बसंत कुमार
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17 जनवरी, 2023 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा था. दिल्ली की विधानसभा में केजरीवाल दिल्ली के उपराज्यपाल विनय सक्सेना के ऊपर जमकर बरस रहे थे- “कौन एलजी, कहां का एलजी, कैसे हमारे सर पर चढ़कर बैठ गया. बेगानी शादी में कैसे अब्दुल्ला दीवाना बन गया है. हम दिल्ली की जनता के टैक्स के पैसे से उनके बच्चों को शिक्षा देना चाहते हैं. इसमें गलत क्या है?’’

इस बयान के एक दिन पहले 16 जनवरी को जब दिल्ली का तापमान 1.4 डिग्री था, तब अरविंद केजरीवाल अपने विधायकों के साथ सड़कों पर तख्ती लिए उतर गए थे. तख्ती पर लिखा था, ‘‘एलजी साहब, शिक्षकों को फिनलैंड जाने दो.’’ केजरीवाल लंबे समय बाद सड़क पर उतरे थे.

मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में शिक्षकों को फिनलैंड भेजने समेत कई कार्यक्रमों को जानबूझकर रोकने का आरोप एलजी पर लगाया. 

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से एलजी और चुनी हुई सरकार के बीच रिश्ते कामचलाऊ ही रहे हैं, लेकिन विनय सक्सेना के एलजी बनने के बाद एलजी और सत्ताधारी दल के रिश्ते रसातल में चले गए हैं. तू-तू मैं-मैं रोजाना की बात हो चुकी है. दोनो पक्ष लगातार एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं. 

‘आप’ नेताओं का सीधा आरोप है कि एलजी दिल्ली सरकार के अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव डालकर उसकी योजनाओं को रोक रहे हैं. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कई बार कह चुके हैं कि अधिकारी उनकी मीटिंग में शामिल नहीं हो रहे हैं. उन पर एलजी का दबाव है.

हाल के दिनों में ‘आप’ नेताओं ने एलजी पर योगशाला, मोहल्ला क्लीनिक की दवाइयां रोकने, डॉक्टरों का वेतन, दिल्ली की दिवाली, रेड लाइट ऑन गाड़ी ऑफ, केजरीवाल का प्रस्तावित सिंगापुर दौरा, शिक्षकों की विदेश में ट्रेनिंग समेत कई अन्य योजनाओं को रोकने का आरोप लगाया है. 

टकराव के कई और मुद्दे इसी दौरान सामने आए. एलजी सक्सेना ने दिल्ली सरकार की आबकारी नीति, फ्री बिजली और स्कूलों के पुनर्निर्माण को लेकर जांच बिठा दी है. इसी दौरान 12 जनवरी को सूचना एवं प्रचार निदेशालय (डीआईपी) के जरिए सरकारी विज्ञापन की आड़ में राजनीतिक विज्ञापन प्रकाशित करने के मामले में 163 करोड़ का जुर्माना भी ‘आप’ पर लगा. एलजी ने मुख्य सचिव को यह जुर्माना वसूलने का आदेश दिया है. 

इस दौरान एक के बाद एक, टकराव के नए मोर्चे खुलते रहे. एलजी ने दिल्ली डायलॉग एंड डेवलपमेंट कमीशन के वाइस चेयरमैन जैस्मीन शाह के कार्यालय पर ताला जड़वा दिया. लगे हाथ एलजी ने दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों बीएसईएस राजधानी और बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के बोर्ड में दिल्ली सरकार की ओर से नॉमिनेट आप के राज्यसभा सांसद एनडी गुप्ता, जैस्मीन शाह, उमेश त्यागी और जेएस देसवाल को भी हटा दिया.

आप नेताओं ने आरोप लगाया कि एलजी भाजपा के नेता की तरह व्यवहार कर रहे हैं. बीते दिनों विधानसभा में बोलते हुए केजरीवाल ने यहां तक कह दिया, ‘‘जब मैं एलजी साहब से मिलने गया तो उन्होंने कहा कि मेरी वजह से भाजपा की 104 (एमसीडी में) सीटें आई हैं. लोकसभा में सातों सीटें भाजपा की आएंगी. अगला चुनाव तुम्हें नहीं जीतने देंगे. एलजी साहब एक मुख्यमंत्री को चुनाव नहीं जीतने की धमकी दे रहे थे.’’

एमसीडी के मेयर के चुनाव और एल्डरमैन के चयन ने दिल्ली सरकार और एलजी के रिश्ते को अभूतपूर्व स्तर तक गिरा दिया. एल्डरमैन (नामित पार्षद) इसको लेकर पहले जिन दस नामों की घोषणा हुई उसमें दो अयोग्य थे. आनन-फानन में इनको बदल दिया गया. ये सारे लोग भाजपा से जुड़े हैं. ‘आप’ ने इसका ये कहकर विरोध किया कि नामित पार्षद उसकी सलाह से तय होने चाहिए लेकिन एलजी ऑफिस ने कोई सुनवाई नहीं की. 24 जनवरी को इन नामित पार्षदों को पहले शपथ दिलाई गई जिसके बाद उन्होंने जय श्री राम के नारे लगाए.

एलजी द्वारा भाजपा के लोगों को एल्डरमैन नामित करने का फायदा भाजपा को स्थायी समिति के चयन में हो सकता है, जहां उन्हें मतदान का अधिकार है. आप को इसी बात का डर है कि अगर भाजपा स्थायी समिति में जगह बनाती है तो वह एमसीडी में खुलकर काम नहीं कर पाएंगे. 

‘एलजी के दबाव में काम कर रहे अधिकारी’

आप का एक बड़ा आरोप है कि दिल्ली सरकार के अधीनस्थ अधिकारी, मंत्रियों और विधायकों की बात नहीं सुन रहे. उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नवंबर, 2022 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें उन्होंने अधिकारियों द्वारा मीटिंग में नहीं शामिल होने और इस कारण दिल्ली सरकार की योजनाओं के अटकने के बारे में विस्तार से बताया था.

सिसोदिया लिखते हैं, ‘‘दिल्ली सरकार के अधिकारी मंत्रियों द्वारा बुलाई गई मीटिंग में शामिल नहीं हो रहे हैं.’’ वे आगे लिखते हैं, ‘‘इसके अलावा अधिकारी मंत्रियों का फोन नहीं उठाते, फाइल्स संबंधित मंत्रियों तक भेजने में देरी करते हैं या भेजते ही नहीं. इतना ही नहीं मंत्रियों के आदेश को जिसमें लिखित आदेश भी होते है, उसका पालन नहीं करते हैं.’’

आगे सिसोदिया ने अधिकारियों द्वारा मीटिंग में शामिल नहीं होने की विभागवार जानकारी दी है. मसलन, पर्यावरण मंत्रालय ने 5 मई 2022 से 13 अक्टूबर 2022 के बीच 20 मीटिंग बुलाईं. विभाग के एडिशनल चीफ सेकेट्री सिर्फ एक बार मीटिंग में शामिल हुए. ये बैठकें सर्दियों में प्रदूषण और स्मॉग की समस्या, पटाखे फोड़े जाने, सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल आदि को लेकर थे. ऐसे ही पीडब्ल्यूडी विभाग ने 4 सितंबर 2022 से 28 सितंबर के बीच चार मीटिंग बुलाईं. इसमें से सिर्फ एक मीटिंग में पीडब्ल्यूडी के प्रिंसिपल सेकेट्री शामिल हुए.

अधिकारियों द्वारा मीटिंग में शामिल नहीं होने के सवाल पर दिल्ली सरकार के कुछ अधिकारियों से न्यूज़लॉन्ड्री ने बात की. अधिकारी सामने आकर इस बारे में बात नहीं कर रहे हैं. एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘यह सच है कि आजकल फाइल मंत्रियों के पास जाने से पहले एलजी दफ्तर भेजी जाती है. इसके आगे मैं आपको कुछ नहीं बता सकता हूं.’’

दिल्ली की चुनी हुई सरकार और एलजी का टकराव सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है. पिछली 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मनीष सिसोदिया के आरोपों का जवाब देते हुए बताया, ‘‘किसी नौकरशाह के लिए एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट खास होती है. दिल्ली में मुख्यमंत्री ही चीफ सेक्रेटरी और अलग-अलग विभागों के प्रिंसिपल सेक्रेटरीज का एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट लिखते हैं. वे मुख्यमंत्री के आदेश का पालन नहीं कर अपना एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट खराब नहीं करवाना चाहेंगे. बीते तीन सालों में मुख्यमंत्री ने दिल्ली सरकार में तैनात अधिकारियों के वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में कुल 10 अंकों में से 9 या साढ़े 9 देते आए हैं. यह क्या बताता है?’’ 

एक तरफ जहां ‘आप’ द्वारा एलजी पर फाइल रोकने का आरोप लगता रहता है. वहीं सुप्रीम कोर्ट में तुषार मेहता ने बताया कि 2018 में केंद्र-दिल्ली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के पहले फैसले के बाद से एलजी ने 18 हज़ार से ज्यादा सरकारी फाइलों को मंजूरी दी है. 

‘मोहल्ला क्लीनिक में रोकी गईं दवाइयां’

एलजी के ऊपर एक बड़ा आरोप है कि एमसीडी चुनाव से ठीक पहले उन्होंने मोहल्ला क्लीनिक का बजट रोक दिया. इस कारण न तो डॉक्टरों को वेतन मिला और न दवाइयां खरीदी गईं. चुनाव के नतीजे आने के बाद ही बजट जारी किया गया. आप का आरोप है कि एलजी ने ऐसा भाजपा के इशारे पर किया ताकि एमसीडी चुनाव में आप के प्रति नफरत पैदा हो सके. इसका खामियाजा दिल्ली की जनता को भुगतना पड़ा. 

मनीष सिसोदिया ने एलजी को पत्र लिखकर कहा, ‘‘अधिकारियों ने मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टरों को सैलरी नहीं दी और क्लीनिक में होने वाले सभी टेस्ट रोक दिए. एलजी से इस साजिश के पीछे के अधिकारियों को चिन्हित करते हुए सस्पेंड करने की मांग है.’’

हालांकि एलजी दफ्तर इस आरोप से इंकार करता है. एलजी हाउस के पीआरओ राकेश रंजन इसको लेकर कहते हैं, ‘‘मोहल्ला क्लिनिक से जुड़ी फाइल वे (सरकार) रोककर बैठे थे. एलजी साहब फाइल रोकते नहीं उस पर सरकार से सवाल करते हैं. जवाब देने के बजाय आम आदमी पार्टी राजनीतिक बयानबाजी करने लगती है. अब उनके हर आरोप का जवाब तो नहीं दिया जा सकता है.’’

सीएम का सिंगापुर दौरा…

एक विवाद तब सामने आया जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सिंगापुर जाना था. विवादों के बीच  केजरीवाल सिंगापुर नहीं गए. तब दिल्ली सरकार ने बयान जारी कर कहा कि मुख्यमंत्री की यात्रा की अनुमति संबंधी फाइल एलजी को सात जून को ही भेज दी गई थी. एलजी करीब डेढ़ महीने तक चुप बैठे रहे और 21 जुलाई को फाइल वापस लौटा दी. तब तक काफी देर हो चुकी थी. इस यात्रा से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी करने की 20 जुलाई की समय सीमा ख़त्म हो चुकी थी.’’ 

इस पर एलजी दफ्तर से सफाई आई कि केजरीवाल जिस बैठक का हिस्सा बनना चाहते हैं, वो मेयरों की है, वहां पर किसी भी मुख्यमंत्री की जरूरत नहीं है. इसी वजह से सीएम अरविंद केजरीवाल को सिंगापुर दौरे की मंजूरी नहीं दी गई है.

हालांकि जब हमने उनके पीआरओ राकेश रंजन से पूछा तो वे कहते हैं, ‘‘अरे ये तो बहुत पुरानी बात हो गई. खुद सिंगापुर सरकार ने ही केजरीवाल का इंविटेशन रद्द कर दिया था. एलजी ने नहीं रोका किसी को.’’

हालांकि ऐसी कोई जानकारी या मीडिया रिपोर्ट सामने नहीं आई है कि सिंगापुर सरकार ने अरविंद केजरीवाल का इन्विटेशन रद्द किया हो.

शिक्षकों का फिनलैंड ट्रेनिंग के लिए जाना 

शिक्षकों के फिनलैंड ट्रेनिंग के लिए भेजे जाने की फाइल जब एलजी दफ्तर ने रोक ली तब आम आदमी पार्टी सड़कों पर आ गई. खुद केजरीवाल हाथ में तख्ती लिए प्रदर्शन करने उतर गए. प्रदर्शन के बाद केजरीवाल ने विधानसभा में बताया कि एलजी कॉस्ट बेनिफिट जानना चाह रहे हैं. 

मनीष सिसोदिया ने तो यहां तक कह दिया, ‘‘अगर एलजी ऑफिस का भी कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस करा लिया जाए, तो ऑफिस बंद करना पड़ जाएगा. प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का भी कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस करा लिया जाए, तो उसका क्या मतलब होगा.’’

इसके बाद विवाद बढ़ गया. केजरीवाल ने अपने तमाम विधायकों के साथ एलजी से मीटिंग की मांग की, लेकिन एलजी ऑफिस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. 

यहां से दोनों पक्षों के बीच पत्राचार का वार शुरू हो गया. 20 जनवरी को वीके सक्सेना ने केजरीवाल को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने सरकार से कई सवाल पूछे. उन्होंने कहा कि दिल्ली की जनता के हक में मैंने पूर्व में आपके सामने कई सवाल उठाए हैं. 

शिक्षकों को फिनलैंड नहीं जाने देने के बारे में एलजी ने लिखा, ‘‘शिक्षकों को पांच दिन के लिए फिनलैंड भेजने के पीछे कोई ठोस उद्देश्य भी है या मीडिया इवेंट के लिए था. मैंने इसको लेकर फाइल वापस नहीं की. मैंने कुछ पूछा था. मैंने जानने की कोशिश की थी कि इससे पहले शिक्षकों की जो यात्राएं हुई हैं उसका फायदा क्या हुआ, साथ ही कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस करने की मांग की. मैंने विभाग से पूछा कि इससे कम खर्च में बढ़िया तरीके से हमारे अपने संस्थानों, जैसे आईआईएम में ट्रेनिंग दी जा सकती है.’’

अपने पत्र में उन्होंने बताया कि मैंने 55 प्रिंसिपल और वाईस प्रिंसिपल के दो बैच को 10-10 दिनों के लिए कैम्ब्रिज ट्रेनिंग जाने वाले प्रोपोजल को साइन किया.

‘एलजी खबरों में रहना चाहते हैं.’

अरविंद केजरीवाल की सरकार विज्ञापन के मामले में बहुत आक्रामक रही है. दिल्ली सरकार को कवर करने वाले एक पत्रकार बताते हैं, ‘‘अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की राजनीति को बदल दिया. काम से ज्यादा विज्ञापन. जितना विज्ञापन इन्होंने किया है उतना दिल्ली के किसी और मुख्यमंत्री ने नहीं किया. सब मानते हैं कि शीला दीक्षित के समय में दिल्ली का सबसे ज्यादा विकास हुआ लेकिन उन्होंने कभी भी नेशनल टेलीविजन को विज्ञापन नहीं दिया. ज्यादा से ज्यादा दिल्ली आज तक और टोटल टीवी जैसे चैनलों पर दिल्ली सरकार का विज्ञापन आता था.’’

एलजी सक्सेना ने दिल्ली सरकार के विज्ञापनों पर सीधा नियंत्रण किया. एलजी नियुक्त होने के कुछ महीने बाद ही सूचना और प्रचार निदेशालय (डीआईपी) के अधिकारियों का उन्होंने तबादला कर दिया. उसके बाद दिल्ली सरकार के विज्ञापनों में भारी गिरावट आई. ‘आप’ नेता इसके पीछे एलजी को जिम्मेदार बताते हैं लेकिन अब उनके लिए यह चिंता की बात नहीं है, क्योंकि इसकी भरपाई पंजाब सरकार के विज्ञापनों से हो जाती है. 

आगे चलकर 2016 के मामले में एलजी ने जांच के आदेश दिए और सरकारी विज्ञापनों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के मामले में डीआईपी ने आम आदमी पार्टी को 163 करोड़ चुकाने का नोटिस दे दिया. इस पर न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं.

एलजी के पीआरओ, विज्ञापन रोकने के आरोपों से इनकार करते हैं. यहां हमारे सामने एक दिलचस्प जानकारी आई. डीआईपी के एक अधिकारी न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘एलजी दफ्तर से डीआईपी पर खुद की कवरेज कराने को लेकर दबाव आ रहा है. उनके दफ्तर के अधिकारी कहते हैं कि जब केजरीवाल किसी इवेंट में जाते हैं तो उसे अख़बार और टीवी सब कवर करते हैं. एलजी साहब भी रोज जाते हैं, उनके कार्यक्रम की कवरेज क्यों नहीं होती है. आप लोग एलजी की कवरेज बढ़ाइए.’’

केजरीवाल ने एलजी द्वारा लगातार लिखे जा रहे पत्रों पर चुटकी लेते हुए कहा था, ‘‘इतने पत्र तो मुझे मेरी पत्नी ने भी कभी नहीं लिखे.’’

‘क्या इससे पहले कभी इस स्तर पर तनातनी हुई’ 

आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से एलजी बनाम सरकार होता रहता है, लेकिन इस तरह का टकराव पहले कभी नहीं देखने को मिला. दिल्ली में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे सिद्धार्थ मिश्रा कहते हैं, ‘‘इस तरह से कभी केंद्र सरकार, एलजी और राज्य सरकार आमने सामने नहीं आए हैं. दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र में भी. उसके बाद भी एलजी कई बार कुछ फाइल लौटा देते थे. वे कुछ सुधार का सुझाव देते थे. सरकार उस सुझाव पर अपना पक्ष रखती थी और काम हो जाता था.’’

मिश्रा दो उदाहरण देते हैं. एक जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे और दिल्ली में भाजपा की सरकार थी और यहां वित्त विभाग जगदीश मुखी के पास था. तब दिल्ली में टैक्स केंद्र सरकार लेती थी. मुखी ने कहा कि राज्य सरकार को यह शक्ति दे दी जाए. तब मनमोहन सिंह ने कहा कि आप भी अर्थशास्त्री हैं और मैं भी. आप मुझे संतुष्ट करें कि यह पॉवर आपको क्यों दी जाए. तीन-चार बार इसको लेकर बैठक हुई. इसके बाद दिल्ली में टैक्स वसूलने का अधिकार राज्य सरकार को दे दिया गया.’’

मिश्रा आगे बताते हैं, ‘‘ऐसे ही दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित थीं. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. दिल्ली में मेट्रो का काम चल रहा था, लेकिन केंद्र के कई मंत्रालय और विभाग फाइल्स पर स्वीकृति नहीं दे रहे थे. इसको लेकर दीक्षित, वाजपेयी के पास पहुंचीं. दोनों ने बात की, इसके बाद वाजपेयी ने मंत्रियों की एक कमेटी बनाई जो फाइल्स देखती और फटाफट स्वीकृति मिल जाती. इस तरह से काम होता है.’’

जाहिर है अरविंद केजरीवाल उस राजनीतिक संस्कृति से नहीं आए हैं जहां कामकाजी रिश्ते पार्टी की वैचारिक सीमाओं के पार जाकर भी निभाए जाते हैं. व्यक्तिगत संबंधों का इस्तेमाल रोड़े हटाने के लिए होता है. यही बात केंद्र की सरकार और एलजी के बारे में भी कही जा सकती है कि वो अपनी नाक के नीचे एक ऐसे व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे जो उन्हें चुनौती देकर वहां तक पहुंचा है. सिर्फ पहुंचा नहीं है बल्कि बार-बार खुद को साबित कर रहा है. 

आज की सियासत में न तो मनमोहन सिंह सक्रिय हैं न अटल बिहारी वाजपेई, और न ही शीला दीक्षित.

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