रिपोर्टर डायरी: चुनावों में धर्म बड़ा मुद्दा और अपना दुख छोटा

इस साल मैंने उत्तर प्रदेश और गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों को कवर किया. यह रिपोर्टर डायरी वहां देखे-सुने अनुभवों का लेखा-जोखा है.

WrittenBy:बसंत कुमार
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बिहार जहां से मैं ताल्लुक रखता हूं, वहां अगर कोई शानदार काम करता है तो कहते हैं, ‘गर्दा उड़ा दिए’. गुजरात चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ‘गर्दा उड़ा दिया’. भाजपा के चुनावी जीत के आगे न कांग्रेस के वादे टिके और न ‘आप’ का दिल्ली मॉडल. 

साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने गर्दा तो नहीं उड़ाया, लेकिन कोरोना के दौरान हुए पलायन और अस्पतालों में बदहाली से हुई मौतों के बावजूद, पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई. हालांकि गुजरात की तरह यूपी में विपक्ष हवा में नहीं उड़ा.

चुनाव के दौरान दोनों राज्यों में मैंने लगभग 20 दिनों तक रिपोर्टिंग की. यहां के चुनावों में कई समानताएं हैं. आगे हम इसी पर बात करेंगे.

यूपी में लंबे समय से मज़बूत रही बसपा और गुजरात में कांग्रेस, दोनों की चुनावी रणनीति एक ही थी. दोनों ही दलों के नेता जमीन पर सक्रिय नहीं दिख रहे थे. दोनों दलों ने ज़्यादा चुनावी सभाएं भी नहीं की. दलों के सुप्रीम नेताओं ने बस गिनी चुनी रैलियां ही कीं. इसके बावजूद दोनों दलों के नेता ये माहौल बनाते दिखे कि उनके पक्ष में ‘अंडरकरेंट’ है. रिपोर्टिंग करते हुए जमीनी हालत देखने और इन दलों के नेताओं से बात करने के बाद खुद पर शक होने लगता था कि जमीन पर आखिर ऐसा क्या चल रहा है, जिसे हमारी नजर देख नहीं पा रही.

पूर्वी सूरत के कांग्रेस कार्यालय में एक नेता ने मुझे अपना नंबर देते हुए कहा था कि, “जिस रोज नतीजे आएं, उस दिन आप मुझे फोन कर लीजिएगा. कांग्रेस सरकार बना रही है.” नतीजों के बाद मैंने उन्हें फोन नहीं किया. हालांकि इन नेताओं की ‘अंडरकरेंट’ वाली जुमलेबाज़ी से लेकर नतीजे सामने आने तक खुद पर शक रहा, लेकिन नतीजों ने बता दिया कि जमीन के माहौल को पहचाने में हमसे कोई भूल नहीं हुई.

अब तक की चुनावी रिपोर्टिंग के बाद मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भारतीय वोटर खुलकर अपनी बात रखते हैं. कोई चिल्ला कर तो कोई बातों-बातों में इशारा कर देता है कि इस बार वो किसे वोट देने वाले हैं. यहां स्पष्ट कर दूं कि मैं अब तक भारत के कुछ ही राज्यों में चुनाव के दौरान रिपोर्ट करने गया हूं. 

कांग्रेस और बसपा की कमजोर रणनीति के अलावा इन चुनावों में और कुछ भी दिखाई पड़ा; लोगों के लिए अपना दुःख, अपनी परेशानी से कहीं बड़ा मुद्दा ‘धर्म की रक्षा’ करना है. देश की एक बड़ी आबादी कथित ‘धर्म की रक्षा’ के लिए, ‘सब सह लेंगे’ की मनस्थिति में है.

मेरा यह कहना अतिरेक लग सकता है, इसलिए कुछ उदाहरणों से आपको यह बताने की कोशिश करता हूं. 

गुजरात  

गुजरात की राजनीति में हिंदुत्व सबसे बड़ा मुद्दा रहा. 15 साल का किशोर हो या 60 साल के बुजुर्ग, महिला हो या पुरुष - इनके लिए महंगाई या रोजगार से बड़ा मुद्दा हिंदुत्व है. दीव से लगा उना का पालड़ी गांव, स्वघोषित हिंदू राष्ट्र गांवों वाली मेरी वीडियो रिपोर्ट का एक हिस्सा था. 

इस गांव के बाहर लिखा है, ‘हिंदू राष्ट्र के गांव में आपका स्वागत है’. बाकि दो गांवों में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोगों ने ऐसा बोर्ड लगाया है, जबकि इस गांव में यहां के युवाओं की एक टीम ने ही इस काम को अंजाम दिया है. इन्होंने अपने ग्रुप का नाम जेम्स बॉन्ड की फिल्मों से प्रभावित होकर 007 रखा है. यहां जगह-जगह 007 लिखा नजर आता है. इन युवकों ने जो व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है, उसका नाम भी 007 ही है.

19 नवंबर के दिन मैं इसी गांव में था. पालड़ी गांव से दीव दो-तीन किलोमीटर दूर है. यहां के ज्यादातर लोग समुद्र में मछली पकड़ने का काम करते हैं. अक्सर यहां के लोग मछली पकड़ते हुए पाकिस्तान के समुद्री क्षेत्र में चले जाते हैं, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है. कोई चार साल तो कोई पांच साल जेल में रहकर वापस आता है. इस बीच परिजनों को अपने परिवार के व्यक्ति की कोई खोज खबर तक नहीं होती. कभी कभार कोई पत्र आ भी जाए तो वो सूखे में उमड़ते एक बादल जैसा होता है.

अक्टूबर महीने में पालड़ी गांव के एक ही परिवार के चार लोगों को पाकिस्तानी नेवी ने पकड़ लिया था. इनमें से दो 20 साल से कम उम्र के हैं. परिवार के एक अन्य सदस्य भावेश भीमाभाई बताते हैं, “27 अक्टूबर को मेरे चाचा 40 वर्षीय राजू भाई, मेरा अपना भाई 19 वर्षीय मनीष, एक दूसरा चचेरा भाई 19 वर्षीय अशोक और एक दूसरे चाचा मंगेश पकड़े गए. मंगेश को तो कुछ महीने पहले ही एक बच्चा हुआ है.’’ 

राजू भाई दूसरी बार जेल में हैं. वे इससे पहले भी पाकिस्तान की जेल में चार साल काटकर वापस लौटे थे. 

ऐसा माना जाता है कि चुनावी मौसम में नेता ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं. हालांकि इन पीड़ित परिजनों से तब तक कोई नेता मिलने नहीं आया था. 

जब मैं यहां के युवाओं से हिंदू राष्ट्र के बोर्ड को लेकर बात कर रहा था. उसी बीच मैंने नीलेश सोलंकी, जो 007 ग्रुप का सक्रिय सदस्य हैं, उनसे पूछा कि इन दोनों में आपके लिए ज़रूरी मुद्दा कौन सा है? पहला यह कि पाकिस्तान की जेल में बंद आपके पड़ोसी जल्दी छूट जाएं और दूसरा कथित हिंदू राष्ट्र की मांग. बिना वक़्त गवाएं नीलेश कहते हैं, ‘‘हिंदू राष्ट्र. अगर देश हिंदू राष्ट्र बन गया तो हमारे मछुआरों को पाकिस्तान की सेना हाथ नहीं लगाएगी.’’ 

मैंने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों और कैसे होगा.

इस क्यों का नीलेश के पास चुप्पी के अलावा कोई जवाब नहीं था. बस थी तो एक निर्लज्ज चुप्पी.

इन्हीं गांवों में से एक के निवासी प्रशांत अर्थशास्त्र से बीए की पढ़ाई कर रहे हैं. महंगाई के सवाल पर वो कहते हैं, “जब शेर पाले हैं तो खर्च करने में हर्ज कैसा? पहले तो सब गधे थे.’’

आजकल रिपोर्टिंग में एक नया ट्रेंड आया है. वायरल कंटेंट निकालने का. बतौर रिपोर्टर वायरल कंटेंट निकालना मेरा कभी ध्येय नहीं रहा. हां, ये लालसा ज़रूर रही कि मेरा काम ज़्यादा लोगों तक पहुंचे. हालांकि गुजरात चुनाव के दौरान मेरे वीडियो का एक क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ. उस पर मीम्स भी बने. शायद आपकी नजर से भी वो वीडियो गुजरा हो.

वाकया था कि सूरत में योगी आदित्यनाथ का आठ किलोमीटर का रोड शो था. वहां मिले एक युवक ने बताया कि वो प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाई करता है क्योंकि सरकारी कॉलेज में बेहतर इंतज़ाम नहीं है. जब हमने उससे बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार के बारे में पूछा, तो उसने आम आदमी पार्टी की सरकार को जिम्मेदार बता दिया. हमने बताया कि 27 साल से यहां भाजपा की सरकार है, तो आप सरकार कैसे जिम्मेदार है? इस सवाल का जवाब दिए बिना ही वो लड़का हवा की तरह भाग गया.

इस लड़के की उम्र 20 साल से कम थी. रोड शो के दौरान हमारी एक शख्स से मुलाक़ात हुई. जब हमने महंगाई को लेकर सवाल किया तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि महंगाई है ही नहीं. हमने पलटकर उनकी मासिक आय पूछी जो उन्होंने 75 हज़ार रुपए बताई. हमने इनसे कहा कि आपने कभी अपने दफ्तर के सिक्योरिटी गार्ड, सफाईकर्मी या दूसरे कम सैलरी कमाने वालों से पूछा है कि वो आठ से बारह हज़ार रुपए में महीने भर परिवार कैसे चलाते हैं? उनके पास भी इसका कोई जवाब नहीं था. थी तो मात्र निर्लज्ज चुप्पी.

अहमदाबाद में मैं एक शख्स से मिला जो खुद बेरोजगार था. काम नहीं मिलने की स्थिति में किराये पर बाइक लेकर उबर में चला रहा था. बातों-बातों में उसने कहा कि बेरोजगारी तो लोगों के दिमाग में है. बेरोजगारी की बात करने वाले मोदी जी को बदनाम करते हैं. वैसे भी हमने मोदी जी को विकास के लिए नहीं, हिंदुत्व की रक्षा के लिए भेजा है. चाय वाला कुछ ठीक कर दिया. अब गाय वाला तो एकदम टाइट कर देगा.

यहां गाय वाले उसका मतलब उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ से था और ‘टाइट’ मुसलमानों को करना था.

गुजरात में राजनीति किस हद तक एंटी मुस्लिम हो चुकी है, इसका अंदाजा आप महज़ इस बात से लगा सकते हैं कि भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाली 2002 दंगे के एक दोषी की बेटी पायल की नरोदा पाटिया में बड़ी जीत हुई है. पायल कुकरानी को कुल 71 प्रतिशत वोट मिले. उन्होंने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को 80 हज़ार से ज़्यादा मतों से हराया है. पायल के पिता मनोज कुकरानी बचते-बचाते अपनी बेटी के प्रचार में शामिल हो रहे थे. इस पर हमने एक रिपोर्ट भी की है. वहीं गुजरात भाजपा को नजदीक से जानने वाले एक पत्रकार ने मुझे बताया, ‘‘मनोज भले ही बच-बचकर प्रचार कर रहे थे, लेकिन पार्टी चाहती थी वो खुलकर बोलें. टिकट इसीलिए दिया गया था कि वो खुलकर सामने आये. इससे भाजपा को ही फायदा होता.’’

भाजपा की कोशिश का असर अन्य दलों द्वारा दिए गए टिकटों पर भी दिखा. 182 सीटों के लिए हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सिर्फ तीन मुस्लिम उम्मीदवार उतारे तो कांग्रेस ने सिर्फ छह, और भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं खड़ा किया. प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 11 प्रतिशत है, लेकिन सिर्फ एक मुसलमान विधायक की जीत हुई है. अहमदाबाद के जमालपुर खड़िया से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान खेड़ावाला राज्य के इकलौते मुस्लिम विधायक हैं.

उत्तर प्रदेश

गुजरात में धर्म की राजनीति, जाति की राजनीति से ऊपर नजर आती है. वहीं उत्तर प्रदेश में जातिगत राजनीति अभी भी अपनी पकड़ बनाए हुए है. हालांकि यहां भी हिंदुत्व की जड़ें समाज में तेजी से फैल रही हैं. 

उत्तर प्रदेश का चुनाव, देश के कोरोना की दूसरी लहर से उबरने के कुछ ही महीने बाद हुआ था. मैं बुंदेलखंड के बांदा जिले में पलायन पर रिपोर्ट करने गया. कोरोना के कारण हुई तालाबंदी में उत्तर प्रदेश के 20 लाख से ज़्यादा मज़दूर वापस अपने गांव लौटे थे. इसमें एक बड़ी आबादी बुंदेलखंड के मज़दूरों की थी. बुंदेलखंड लंबे समय से रोज़गार से जुड़े पलायन के लिए जाना जाता है.

बांदा शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर एक गांव है ब्रह्म डेरा. वहां हमारी मुलाकात तारकेश्वर निषाद से हुई. कोरोना की पहली लहर में वे गुजरात के सूरत से बांदा आए थे. 15 दिनों के इस सफर में वे ज्यादातर पैदल ही चले, थोड़ा बहुत सफर किसी ट्रक पर किया तो किसी वैन में.

हमने उनके इस सफर की कहानी जानने के बाद चुनाव में उनके झुकाव को लेकर सवाल किया. बिना वक़्त गवाए उन्होंने भाजपा का नाम लिया. इसकी वजह भाजपा द्वारा कथित तौर पर हिंदुओं की रक्षा, और साथ ही कोरोना के समय मुफ्त अनाज उपलब्ध कराना थी. इसके अलावा उनके पास एक और वजह थी, निषाद पार्टी का भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन.

एक तरफ केंद्र सरकार ने अचानक से तालाबंदी की घोषणा की. उसके बाद कहा कि जो जहां है वहीं रहे, सरकार लोगों की मदद करेगी. आप सूरत में थे. वहां भी भाजपा की सरकार है. आप ही नहीं सूरत और गुजरात से हजारों की संख्या में लोगों का पलायन हुआ, लोग मरते-मरते घर आये. कई रास्ते में ही मारे गए. हमने उनसे पूछा कि इसके लिए वे किसे जिम्मेदार मानते हैं? इस पर निषाद ने कहा था कि “हालात तो पूरी दुनिया में खराब हुए. भारत में तो फिर भी मोदी जी ने बचा लिया. दूसरे देशों में तो और बुरा हाल था.’’

आप पैदल चले इसके लिए कौन जिम्मेदार है? निषाद के चेहरे पर भी मुझे वही ‘निर्लल्ज चुप्पी’ नज़र आई.

ऐसे ही महोबा में एक चाय की दुकान पर लोगों से चुनाव को लेकर बात चल रही थी. वहां बैठे ज़्यादातर लोग कथित सवर्ण समाज से ताल्लुक रखते थे. कोरोना की पहली लहर के समय कोई दिल्ली से, तो कोई महाराष्ट्र से भागकर घर आया था. इनके कुछ साथी वापस लौट गए थे जबकि कुछ तब भी गांव में ही थे. इनके ही गांव के रहने वाले एक युवक ने आर्थिक संकट में आत्महत्या कर ली थी. उस समय मैं आर्थिक संकट के कारण आत्महत्या करने वालों पर ही एक स्टोरी कर रहा था.

यहां बैठे रामभजन तिवारी, जो खुद कोरोना की पहली लहर में दिल्ली से गांव आए थे, कहते हैं, ‘‘अरे वो पत्नी से लड़ाई के कारण फांसी लगा लिया था. सरकार तो खाने को दे ही रही थी. सरकार ने कोई कमी नहीं छोड़ी.’’ तिवारी के समर्थन में वहां बैठे लोग हामी भरते नजर आए. मैंने उनसे कहा कि आर्थिक संकट के कारण भी घर में लड़ाइयां बढ़ती हैं. नौकरी नहीं होने की स्थिति में आर्थिक हालात तो बेहतर नहीं होंगे. वो कुटिल मुस्कान के साथ कहते हैं, ‘‘दूसरी वजह’’ थी.

तिवारी और उनके साथ के लोगों से हम फरवरी 2022 में मिले थे. उनके गांव और उत्तर प्रदेश की अन्य जगहों से मज़दूरों का दोबारा शहरों की तरफ पलायन शुरू हो गया था. जबकि मई 2020 में मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से खबर आई थी कि लॉकडाउन में लौटे प्रवासी मजदूरों के लिए योगी सरकार ने 20 लाख नौकरियों की योजना बनाई थी. जब हमने इसको लेकर सवाल किया तो तिवारी का जवाब हैरान करने वाला था, उन्होंने कहा कि, “सरकार किस-किस को नौकरी देगी? मैं तो न सरकार से राशन मांगता हूं और न काम.” मैंने चलते-चलते उनसे पूछ लिया था, आपके खेत कितने हैं? उन्होंने कहा, “10 बीघा (लगभग 10117 वर्ग मीटर).” 

क्यों कहता हूं ये कहानियां?

दोनों चुनावों को कवर करते हुए कई बार मेरा मन विचलित हुआ, गुस्सा भी आया. चुनाव में लोगों को जब अपनी परेशानी का ख्याल नहीं, तो हम उनकी परेशानियां क्यों दिखा रहे हैं? या हम उस पर क्यों बात कर रहे हैं? जिन गांवों में किसानों ने खाद की कमी के कारण आत्महत्या कर ली, सरकार उनकी आत्महत्या को खाद की कमी के कारण आत्महत्या मानती भी नहीं. अगर उसी गांव में वोटरों के लिए यह मुद्दा नहीं है, तो पत्रकार को क्यों उस पर रिपोर्ट करना चाहिए?

इस सवाल ने मुझे कई बार परेशान किया. एक रोज मैंने इसका जवाब ढूंढा, और खुशकिस्मती से मुझे जवाब मिल भी गया. दरअसल बतौर पत्रकार मेरा काम अपने समय को लिपिबद्ध करना है. मुझे उसे ईमानदारी से करना चाहिए. जनता किस मुद्दे पर वोट करती है या वोट देते हुए क्या सोचती है, यह जनता की जिम्मेदारी है. 

मैंने साल 2022 में वही किया. जो दिख रहा है, वो अपने पाठकों तो उसी रूप में पहुंचा दिया. अक्सर मेरे वीडियो पर कमेंट आते है कि मैं मूर्खताओं पर हंसने के बजाए गंभीर क्यों रहता हूं. मेरे लिए इसका जवाब यही है कि मैं चाहता हूं कि समाज में जो कुछ जैसा है, वो उसी रूप में आपके सामने आये. इसीलिए मेरी कोशिश रहती है कि मेरी प्रतिक्रिया, वीडियो में किसी भी बात या व्यक्ति का मज़ाक उड़ाने जैसी न लगे.

उम्मीद है 2023 में भी कुछ अच्छी ख़बरें और कहानियां अपने पाठकों के लिए ला सकूंगा, आप सभी को मेरी ओर से 2023 की शुभकामनाएं.

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