मीडिया के मौलाना: टेलीविज़न की जहरीली बहसों के खाद-पानी

जानिए टीवी डिबेट में नियमित तौर पर शामिल होने वाले मौलानाओं की कहानी, उन्हीं की जुबानी.

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मीडिया के मौलाना: टेलीविज़न की जहरीली बहसों के खाद-पानी
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अगर अभी भी आप टीवी न्यूज़ चैनल देखते हैं तो शर्तियां आपकी नजर कुछ मौलानाओं पर पड़ी होगी. ये मौलाना रोजाना टीवी की गर्मागर्म बहसों में शामिल होते हैं. इनकी टीवी पर मौजूदगी का कारण है अधिकतर टीवी चैनलों पर होने वाली धार्मिक बहसें. ज्यादातर खबरों का विषय धर्म, सांप्रदायिकता, इस्लामोफोबिया के इर्द-गिर्द ही होता है.

कभी ज्ञानवापी मस्जिद, कभी काशी, मथुरा, कभी लव-जिहाद, हिजाब घूम-घूम कर चैनलों पर जगह बनाते रहते हैं. इन बहसों की एक निर्धारित रूपरेखा होती है जिसमें एक मौलाना का होना जरूरी है. बहस को भड़काऊ बनाने के लिए एंकर हमेशा, अधकचरे, धर्मांध और छिछोरे सवाल पूछता है. मौलाना इस पर भड़क जाते हैं. मौलाना के भड़कने की प्रतिक्रिया में बाकी पैनलिस्ट भी भड़क जाते हैं, जो बहुधा भाजपा, आरएसएस या किसी हिंदूवादी संगठन की नुमाइंदगी कर रहे होते हैं. इसके बाद अक्सर मामला धमकी, गाली गलौज और हवा में मुट्ठियां लहराने तक पहुंच जाता है.

इन बहसों का मकसद आईबॉल खींचना होता है, सत्ता के इशारे पर ध्रुवीकरण करना होता है. ताकी टीआरपी भी आए और सत्ता में बैठे आका भी खुश रहें. चैनलों पर इन मौलानाओं को मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी, प्रतिनिधि और धर्मगुरु के तौर पर पेश किया जाता है. हमने यह जानने की कोशिश की है कि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी, प्रतिनिधि और धर्मगुरु के तौर पर पेश होने वाले ये मौलाना कौन हैं. क्या ये वास्तव में इस्लाम पर साधिकार बोलने, उसकी व्याख्या करने की योग्यता रखते हैं. इनकी योग्यता क्या है? इनके आय के स्रोत क्या हैं, और इनकी आजीविका के साधन क्या हैं?

हाफिज गुलाम सरवर उर्फ टीवी वाला मौलाना

हाफिज गुलाम सरवर अपने कमरे से ऑनलाइन डिबेट में शामिल होते हुए

हाफिज गुलाम सरवर अपने कमरे से ऑनलाइन डिबेट में शामिल होते हुए

हाफिज गुलाम सरवर अलग-अलग चैनलों पर अलग-अलग किरदार में होते हैं. जैसे वह एबीपी न्यूज़ पर ज्ञानवापी मस्जिद विवाद से जुड़ी डिबेट में मुस्लिम धर्मगुरु होते हैं, न्यूज़ नेशन के डिबेट शो “क्या कहता है इस्लाम?” में मुस्लिम स्कॉलर और आज तक के हल्ला बोल में ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता बन तक शामिल होते हैं.

इस बारे में मौलाना हाफिज गुलाम सरवर का कहना है, "मैं कोई मुस्लिम स्कॉलर या मुस्लिम धर्मगुरु नहीं हूं बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं." सरवर ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा नाम का संगठन चलाते हैं, जिसके वे स्वयंभू स्थापक सदस्य और राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं.

सरवर कहते हैं, “मैंने बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड से मौलवी की पढ़ाई की है, लेकिन कभी खुद को मौलाना या मुस्लिम धर्मगुरु नहीं बताया और न ही मैं प्रमाणित मौलाना हूं.”

उनका कहना है कि टीवी की बहसों में उन्होंने खुद को मौलाना या मुस्लिम धर्मगुरु बताए जाने पर कई बार एतराज भी जताया है. यहां तक कि न्यूज़ नेशन के एक लाइव प्रोग्राम में हदीस से जुड़े सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि मैं कोई मौलाना नहीं हूं, मैं टीवी वाला मौलाना हूं.

बातचीत के दौरान सरवर ने हमें टेलीविज़न पर होने वाली उग्र बहसों की सच्चाई की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक बार लाइव डिबेट में उनके सामने ही एक एंकर ने एक अन्य तथाकथित मौलाना को उग्र होने का इशारा किया था, और वे मौलाना उग्र हो गए. हमने सरवर से चैनल और एंकर का नाम पूछा तो उन्होंने इनकार कर दिया. यह एक सच्चाई है टेलीविज़न पर आए दिन होने वाली खोखली बहसों की जिसमें तयशुदा पटकथा पर मुल्ला-पंडित अभिनय करते हैं.

सरवर ने कहा, “मेरी बेबाकी की वजह से मेरे संबंध वैसे ही खराब हो रहे हैं, अगर मैं लोगों के नाम बता दूंगा तो मेरे संबंध और खराब हो जाएंगे.”

बता दें कि ये वही हाफिज सरवर हैं जिनके ऊपर कोरोना लॉकडाउन के दौरान तबलीगी जमात के 15 लोगों को निजामुद्दीन मरकज से भगाने का आरोप लगा था. तब ज़ी न्यूज़ ने इस घटना पर ऑपरेशन वायरस नाम से 56 घंटे की लगातार कवरेज की थी. सुधीर चौधरी ने ज़ी न्यूज़ के प्राइम टाइम शो “डीएनए” में सरवर को समाज का दुश्मन घोषित कर दिया था.

सरवर मूल रूप से बिहार के बेगूसराय के रहने वाले हैं. 2005 में उन्होंने बेगूसराय के पेरिया बरियारपुर से विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. वह पूर्व सांसद उदित राज की इंडियन जस्टिस पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. 2006 में उदित राज ने उन्हें दिल्ली बुला लिया और 2009 तक उन्होंने उदित राज के साथ काम किया. चार साल लगातार काम करने के बाद संतोषजनक सम्मान न मिलने के कारण उन्होंने उदित राज का साथ छोड़ दिया. इसके बाद 2009 में वह बहुजन समाज पार्टी से जुड़ गए. उन्होंने पहले बसपा दिल्ली इकाई विधानसभा महासचिव और बाद में विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली. 2014 में उन्होंने बसपा भी छोड़ दी. इस दौरान वह परिवार चलाने के लिए पेंटर का काम करते रहे.

टीवी डिबेट में शामिल होने के बदले न्यूज़ चैनलों से मिलने वाली रकम के बारे में गुलाम सरवर कहते हैं, "कुछ पैनलिस्ट को चैनलों की तरफ से लिफाफा दिया जाता है जिसकी रकम दो से तीन हजार रुपए होती है, लेकिन मैंने यह रकम कभी नहीं ली. मैं ज्यादातर चैनलों में अपनी स्पलेंडर बाइक से ही जाता हूं. कभी-कभार चैनल वाले गाड़ी भेज देते हैं."

सरवर अपने परिवार के साथ दिल्ली के बाटला हाउस में रहते हैं. वह बताते हैं कि यह घर उनके एक शुभचिंतक ने उन्हें दिया है और वह इसका किराया भी नहीं देते हैं.

सरवर का दिल्ली के किराड़ी इलाके में पर्स और बेल्ट बनाने का एक छोटा सा कारखाना भी है. इसके अलावा हाफिज गुलाम सरवर “देश की सच्चाई” नाम से एक यूट्यूब चैनल भी चलाते हैं.

मौलाना साजिद रशीदी

मौलाना साजिद रशीदी फोन पर डिबेट में शामिल हुए

मौलाना साजिद रशीदी फोन पर डिबेट में शामिल हुए

मौलाना साजिद रशीदी टीवी चैनलों का सबसे चर्चित चेहरा हैं. जितने पुराने उतने ही विवादित. रशीदी 2012 से टीवी डिबेट में नियमित तौर पर शामिल हो रहे हैं. हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मदरसों के सर्वे के फैसले पर अपनी राय रखते हुए रशीदी ने बेहद भड़काऊ बयान दिया. उन्होंने कहा, “जब मदरसों के सर्वे के लिए सर्वे की टीम किसी मदरसे पर पहुंचे तो उसका जूते-चप्पलों से स्वागत किया जाए.”

इसके अलावा मौलाना साजिद रशीदी टीवी की बहसों में ऊल जलूल बातें करने, प्रधानमंत्री मोदी का विरोध के लिए मशहूर हैं. अपने इन्हीं गुणों के चलते मौलाना साजिद रशीदी लगभग 10 वर्षों से टीवी चैनलों के चहेते मौलाना बने हुए हैं. रशीदी को टीवी पर एक मुस्लिम धर्मगुरु और इंडियन इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर दिखाया जाता है.

साजिद रशीदी बताते हैं, "पहले टीवी चैनल डिबेट में भाग लेने के लिए पैसे देते थे लेकिन अब नहीं देते, क्योंकि अब मार्केट में कंपटीशन बढ़ गया है. पहले टीवी चैनलों के पास ज्यादा विकल्प नहीं होते थे इसलिए हमें बुलाया जाता था और पेमेंट भी दिया जाता था, लेकिन अब टीवी चैनल वालों ने बहुत से मौलाना पैदा कर लिए हैं. दाढ़ी टोपी वाले ऐसे-ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जिन्हें सवाल भी समझ में नहीं आता. केवल मुंडी हिलाते रहते हैं और बोलते भी हैं तो उल्टा बोलते हैं. अब केवल डीडी न्यूज़ वाले पैसा देते हैं, प्राइवेट चैनल नहीं देते."

डिबेट में होने वाली गर्मा-गर्मी, गाली-गलौज और नोकझोंक के सवाल पर साजिद रशीदी बताते हैं, "डिबेट के दौरान आक्रामक होने के लिए एक कोड वर्ड का इस्तेमाल किया जाता है. एक बार एक डिबेट के दौरान एंकर ने मेरे बगल में बैठे मौलाना साहब को इशारा किया और इशारा मिलते ही मौलाना साहब आपे से बाहर हो गए. इतना कि कुर्सी से खड़े हो गए, गला फाड़कर चिल्लाने लगे और जैसे ही ब्रेक हुआ, मौलाना साहब मेरे सामने ही एंकर से पूछ रहे हैं सही हुआ न?"

टीवी डिबेट में दर्शकों द्वारा पूछे जाने वाले सवालों का जिक्र करते हुए साजिद कहते हैं, "चैनल द्वारा पहले ही ऑडियंस को पर्चे पर लिखकर सवाल दे दिया जाता है. सवाल के साथ यह भी बताया जाता है कि यह सवाल किससे पूछना है. कई बार भड़काऊ सवाल पूछवाया जाता है. अगर कोई सवाल का सही जवाब देने लगता है तो ऑडियंस से हूटिंग करा दी जाती है."

मौलाना साजिद रशीदी दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में स्थित मस्जिद के इमाम हैं. वह ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के राष्ट्रीय भी अध्यक्ष और संस्थापक हैं. इसके अलावा मौलाना साजिद, हुजैफा हज जियारत टूर्स नाम से हज यात्रा कराने का बिजनेस भी चलाते हैं. वे मस्जिद के ऊपरी हिस्से के एक कमरे में रहते हैं और यहीं से वो टीवी की बहसों में शामिल होते हैं. जब भी उनको स्टूडियो में जाना होता है तो चैनल की तरफ से गाड़ी आ जाती है.

मौलाना साजिद रशीदी मूलतः उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले हैं. उनकी शुरुआती पढाई सहारनपुर जिले में गंगो के अशरफो उलुल्लुम मदरसे से हुई. उन्होंने मौलाना की पढ़ाई भी यहीं से पूरी की. दो साल तक उसी मदरसे में पढ़ाने के बाद साल 1993 में वह दिल्ली आ गए और दिल्ली के नंदनगरी इलाके में स्थित एक मस्जिद में इमाम का काम करने लगे. 1994 में रशीदी ने दिल्ली से ‘आलमी इंकलाब’ नाम से एक उर्दू अखबार निकाला, हालांकि वह जल्द ही बंद हो गया. इसके बाद उन्होंने ‘इमामत’ नाम से एक और अखबार निकाला, ये अख़बार भी जल्दी ही बंद हो गया.

इसके बाद 1994 में उन्होंने ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन का गठन किया. फिलहाल वह इसी संगठन को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.

शोएब जमेई

शोएब जमेई अपने कैफे से डिबेट में शामिल होते हुए

शोएब जमेई अपने कैफे से डिबेट में शामिल होते हुए

33 वर्षीय शोएब जमेई 2018 से नियमित तौर पर टीवी की बहसों में शामिल हो रहे हैं. इनके नाम पर गाली गलौज, भड़काऊ बयानबाजी और मोदी विरोध आदि दर्ज है. शोएब जमेई कई न्यूज़ चैनलों के पसंदीदा पैनलिस्ट हैं.

न्यूज़18, आज तक, रिपब्लिक भारत, न्यूज़ नेशन, एबीपी न्यूज़, टाइम्स नाउ नवभारत जैसे चैनलों के प्राइम टाइम डिबेट शो में शोएब जमेई को मुस्लिम स्कालर या मुस्लिम चिंतक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. कभी-कभी उनको आईएमएफ के अध्यक्ष के तौर पर भी प्रस्तुत किया जाता है, जबकि शोएब किसी भी स्तर पर इस्लामिक अध्ययन के विशेषज्ञ नहीं हैं. उनकी पूरी पढ़ाई बायो टेक्नोलॉजी में हुई है.

शोएब जमेई रियल स्टेट और कैफे का बिजनेस करते हैं. उनके मुताबिक न तो वो मौलाना हैं और न ही हाफिज. शोएब मूल रूप से झारखंड के गिरिडीह के रहने वाले हैं. उनकी स्कूली शिक्षा गिरिडीह के डीएवी पब्लिक स्कूल में हुई. उनका कहना है कि वह स्कूली शिक्षा के दौरान मदरसे में भी जाते थे.

वह कहते हैं, “मेरे पिता तबलीगी जमात से जुड़े थे, इसलिए मैं भी तबलीगी जमात से जुड़ गया. बंगलौर विश्वविद्यालय से बायो टेक्नोलॉजी में स्नातक करने के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय आ गया. यहां से पीएचडी के दौरान मैंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 2016 में इंडियाज मुस्लिम फाउंडेशन बनाया. इसके बाद मैं 2017 में राष्ट्रीय जनता दल का दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष बना.”

जमेई बताते हैं, "आरजेडी में रहते हुए ही इंडिया इस्लामिक सेंटर में एक प्रोग्राम हुआ, जिसमें मेरे भाषण के बाद मुस्लिम समाज के लोग मेरे पास आए और उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं टीवी डिबेट में जाऊं. चूंकि टीवी डिबेट में मुस्लिम समाज से जो लोग जाते हैं वह मुस्लिम समाज का पक्ष सही से रख नहीं पाते, जिसकी वजह से मुस्लिम समाज को बदनामी झेलनी पड़ती है."

शोएब टीवी पर आरजेडी की तरफ से नहीं बल्कि अपनी संस्था इंडियाज मुस्लिम फाउंडेशन की तरफ से जाते हैं. जमेई बड़े गर्व से बताते हैं, "टीवी डिबेट में शामिल होने के शुरुआती तीन से चार महीनों के भीतर ही उन्होंने प्राइम टाइम पैनल में जगह बना ली, और तमाम मेनस्ट्रीम चैनलों के प्राइम टाइम शो में उन्हें बुलाया जाने लगा."

इस दौरान वो सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन से भी जुड़े. 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले शोएब की मुलाकात बिहार से सांसद पप्पू यादव से हुई. इसके बाद जमेई आरजेडी छोड़ पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) में शामिल हो गए, जहां उन्हें सीमांचल की जिम्मेदारी दी गई. लगभग दो साल तक पार्टी से जुड़े रहने के बाद कुछ महीने पहले शोएब ने इस पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया.

गौरतलब बात है कि 2017 से लेकर 2022 तक शोएब ने दो अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े होने के बावजूद भी टीवी डिबेट के चैनलों ने उनके राजनीतिक संबंधों का जिक्र नहीं किया. उन्हें हमेशा मुस्लिम चिंतक या मुस्लिम स्कॉलर के तौर पर ही पेश किया गया. फिलहाल शोएब जमेई किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं. दिल्ली के जामिया इलाके में रहकर रियल स्टेट व कैफे का बिजनेस चला रहे हैं, साथ ही वे जामिया मिलिया इस्लामिया से पोस्ट डॉक्टरेट भी कर रहे हैं. इससे पहले उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से इस्लामिक अध्ययन में एक साल का डिप्लोमा कोर्स भी किया है.

मौलाना सुहैब कासमी

मौलाना सुहैब कासमी भाजपा का समर्थन करने वाले मौलानाओं में से हैं और भाजपा का विरोध करने वाले मौलानाओं को जवाब देते हैं. टीवी पर मौलाना सुहैब कासमी को जमात-ए-उलेमा हिंद के अध्यक्ष के तौर पर दिखाया जाता है. और उनके भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधों का जिक्र नहीं किया जाता. हकीकत यह है कि मौलाना सुहैब बचपन से आरएसएस से जुड़े रहे हैं. कासमी के दिल्ली स्थित फ्लैट के बाहर लगी पट्टी पर लिखा है, "मौलाना सुहैब कासमी, वरिष्ठ नेता, भारतीय जनता पार्टी.”

इसके अलावा कासमी भारतीय जनता पार्टी के असम मोर्चा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रह चुके हैं. कासमी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक भी हैं.

न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कासमी बताते हैं, "हम बाल स्वयंसेवक हैं. मेरे पिताजी जनसंघ में थे. मेरे पिताजी और मैं, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संस्थापक सदस्य रहे हैं. मैंने केरल, कश्मीर, असम और उत्तर प्रदेश में भाजपा संगठन के अंदर अहम भूमिका निभाई है."

कासमी के पिता डॉ अतीक अहमद खान आजीवन जनसंघ में रहे और बिजनौर से लोकसभा चुनाव भी लड़े. इसके बाद उन्होंने 2002 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बनने में अहम भूमिका निभाई. सुहैब कासमी दावा करते हैं कि उनके पिता ने दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेई के साथ भी काम किया. पिता के कदमों पर चलते हुए कासमी भी भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए. 2005 में कासमी ने जमात ए उलेमा हिंद नामक संगठन की स्थापना की.

इस संगठन के बारे में सुहैब कासमी कहते हैं, "यह राष्ट्रवादी मुसलमानों का संगठन है. इसका हर एक सदस्य भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस का सदस्य है. संगठन में कुल पांच लाख से ज्यादा सदस्य हैं. यह राष्ट्रवादी विचारों के उलेमाओं का संगठन है, जिसका मकसद राष्ट्रवाद और राष्ट्र के प्रति समर्पण है."

जमात ए उलमा हिंद का ऑफिस दिल्ली के दरियागंज में है. कासमी के सोशल मीडिया अकाउंट पर भारतीय जनता पार्टी के प्रचार और प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ से जुड़ी तमाम सामग्री मौजूद है.

हैरत की बात है कि मेनस्ट्रीम मीडिया में जब भी कासमी दिखाए जाते हैं, तो उनके राजनीतिक संबंधों को छुपा लिया जाता है. जबकि न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए वे खुद बताते हैं कि वो भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और आरएसएस के समर्पित कार्यकर्ता हैं. प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने वाले मुसलमानों को कासमी भटका हुआ मानते हैं. लव जिहाद, हिजाब विवाद, ज्ञानवापी विवाद, सीएए एनआरसी जैसे मुद्दों पर वह मुसलमानों को कोसते रहते हैं.

मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को शोएब कासमी छोटी-मोटी घटना मानते हैं और कहते हैं, "इतने बड़े देश में ऐसी इक्का-दुक्का घटनाएं होती रहती हैं."

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