कीर्तिगान: ‘न्यू इंडिया’ का अनभै सांचा, एक जीवंत उपन्यास

‘कीर्तिगान’ हकीकत की तस्वीर गढ़ता चन्दन पाण्डेय का उपन्यास.

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सुनंदा उसकी हरकतों से तंग तो है लेकिन उसे इतना भरोसा है कि वो आक्रमणकारी नहीं है बल्कि एक सहज प्रेम के लिए बेचैन भर है. अगर एक सहकर्मी के तौर पर इन सीमित और मर्यादित संबंधों को निभाया जाए तो यह निभ सकता है.

धीरे-धीरे सुनन्दा, सनोज के स्याह-सफेद पक्षों को समझने जानने लगती है और अंतत: एक गहरी मानवीय सहानुभूति इनके रिश्ते का हासिल हो जाता है. सनोज धीरे-धीरे पागलपन की तरफ बढ़ रहा है और यह पागलपन जैसे विराट खालीपन और निर्वात से पैदा हुआ है. सनोज अब जल्दी-जल्दी अपने दोनों बेटों को याद करने लगता है और यह महज संयोग नहीं है कि यह याद उन मजलूमों के परिजनों को याद करने की कड़ी में ही आती है जो मॉब लिंचिंग के शिकार हुए हैं.

यही वह मानक है जहां चन्दन परिवार नाम की पुरानी पड़ चुकी, लेकिन मनुष्य को गढ़ने की प्राथमिक संस्था के तौर पर और अब भी अपनी पूरी इयत्ता में बची रह गई संस्था को नए मायने देते हैं. सनोज इसी एक संस्था के दो विपरीत छोरों पर बंधी एक रस्सी के तनाव पर चल रहा है.

सुनंदा एक स्त्री के रूप में, सहकर्मी के रूप में और अंततः एक मित्र के रूप में कई बनी बनाई धारणाओं को तोड़ती है. वह सशक्त है, निडर है, कैरियरिस्ट भी है लेकिन उसमें सब्र है और सहानुभूति है. सुनन्दा माफ करना जानती है और माफ करके निभाना जानती है. रिश्तों के बनने और परिपक्व होने के बीच कितनी ही तरह की परिस्थितियों में सम बने रहने और अपनी तरफ से रिश्तों को परिपक्व होने देने का धैर्य भी है.

सनोज का अतीत और उसकी मन:स्थिति से पैदा हुई सहानुभूति धीरे-धीरे सुनंदा की तरफ से भी प्रकट होती है और किसी के नैराश्य, अवसाद और उसकी कमजोर स्थिति के मद्देनजर यह सहानुभूति उन दोनों के बीच के संबंधों की एक स्थायी परिणति भी हो जाती है लेकिन तब तक सनोज अपनी चेतना लगभग खो चुका होता है और अंत में यह महज एकतरफा संवेदना और सहानुभूति का रिश्ता ही बनकर रह जाता है. यह बराबरी पर आधारित प्रेम नहीं है. सुनंदा ऐसा कोई अवसर नहीं देती जहां लगे कि उसे अपने सहकर्मी से प्रेम जैसा कुछ हो गया है. यह एक तटस्थ लेकिन दूरस्थ सहयोग और सहानुभूति का रिश्ता भर लगता है.

सुनन्दा इस लिहाज से बदले और बदलते हुए समाज में एक अलग स्त्री छवि पेश करती है जिसे अब तक चले आ रहे मुहावरों में व्यक्त करना कठिन है लेकिन समझना आसान है.

कई जगहों पर उपन्यास इसलिए भी उपन्यास नहीं लगा क्योंकि इसमें दिए गए ब्यौरे बीते कुछ सालों में अखबारों में अलग-अलग शैली में दोहराए जाते रहे हैं. इसलिए जब भी लिंचिंग और उसके बाद के ब्यौरे सामने आते हैं तब-तब लगता है कि ये सब पढ़ा जा चुका है, लेकिन यही तो लिखा भी जा सकता था. अंधेरे को अंधेरा, काई को काई और रूई को रूई की ही तरह तो दिखाया जा सकता है. इसे किसी अन्य तरह से लिखना एक रचनात्मक होशियारी ही होती. चन्दन की खासियत यह है कि वह चालाकी से अपनी रचनात्मकता को नहीं निभाते बल्कि तीखे यथार्थ को तीखेपन से ही रखते हैं.

प्रामाणिकता इस उपन्यास की एक अलग विशिष्टता है. ऐसा लगता है कि चन्दन ने उन तमाम मजलूमों को इंसाफ के लिए दस्तावेज तैयार किया है. कभी जब निजाम बदले, अदालतें कानून के रक्षकों का रुतबा पुन: हासिल करें तो हो सकता है यह ‘कीर्तिगान’ उस इंसाफ का जरिया बने.

दो अलग-अलग लेकिन समानान्तर आख्यानों को एक साथ साधने के क्रम में शुरुआत में यह उपन्यास थोड़ा बोझिल हुआ है, लेकिन यह एक चुनौती है जिसे चन्दन ने भरसक साधने की कोशिश की है. एक बार कथासूत्र पकड़ में आने के बाद इसका प्रवाह और लय बहुत सहज और आकर्षक है.

चन्दन को इस महत्वपूर्ण दस्तावेजी और विशुद्ध राजनीतिक उपन्यास के लिए बहुत बहुत बधाई. ऐसे समय में जब हिन्दी जगत प्रायः चयनित चुप्पियों के सहारे किसी तरह वक्त बदलने का इंतजार कर रहा हो, तब ‘कीर्तिगान’ जैसा उपन्यास और चन्दन जैसे लेखक उस जगत को आईना दिखाते हैं, और होते हुए को व्यक्त करने की सलाहियत भी सिखाते हैं.

इस उपन्यास की आलोचना शायद इस बात पर भी होगी कि यह अखबारी है और सृजनात्मकता के लिए जरूरी अवकाश नहीं लिया गया है. लेकिन क्या यह वक्त वह अवकाश लेने का अवकाश भी देता है? अगर एक लेखक अपने आस-पास के लिए सजग है और वह एक पत्रकार नहीं है या रिपोर्टर नहीं है, तो क्या उसे अगले 10 सालों तक अपनी अभिव्यक्ति को केवल इसलिए दबा कर रखना चाहिए कि कहीं उसकी सृजनात्मकता और अवधि पर कोई प्रश्न न उठे?

‘कीर्तिगान’ जो एक पत्रकारिता (मीडिया नहीं) संस्थान है और वह यह बीड़ा उठाता है कि देश में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं को संकलित करना है, तो यह उस संस्थान का साहस कहा जाएगा. ऐसे में एक संवेदनशील पत्रकार जो इस उद्यम में लगा है खुद एक उपन्यास की विषय वस्तु नहीं हो सकता? एक लेखक एक साथ पत्रकार और रिपोर्टर नहीं हो सकता? खैर, इन संभावित आलोचनाओं से परे यह देखना सुखद है कि हिन्दी उस दौर की हिन्दी के रूप में वापसी कर रही है जहां अमूमन एक लेखक पत्रकार भी था.

(साभार- समालोचन)

(सत्यम श्रीवास्तव मूलतः साहित्य के छात्र रहे हैं. दिल्ली में रहते हैं और ’श्रुति’ ऑर्गनाइजेशन से जुड़े हैं.)

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