बार-बार क्यों फेल हो जाता है सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध?

प्लास्टिक की ऐसी चीजें, जिन्हें इकट्ठा करना मुश्किल है, या जिन्हें रीसाइकिल नहीं किया जा सकता, उनका इस्तेमाल बंद किया जाना चाहिए. मौजूदा प्रतिबंध से यही हासिल किया जा सकता है.

WrittenBy:सुनीता नारायण
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इसका मतलब यह है कि किसी कंपनी के लिए तय किए गए लक्ष्य का कोई मतलब नहीं है. इसका कोई पैमाना नहीं है, जिसके आधार पर इसे सटीक कहा जा सके. उससे भी खराब यह है कि ईपीआर के तहत कंपनियों को केवल उसी प्लास्टिक पदार्थ को रीसाइकिल या रीप्रोसेस करना है, जो वे 2024 तक इकट्ठा करती हैं.

सवाल यह है कि उस प्लास्टिक कचरे का क्या किया जा रहा है, जिसे अभी तक इकट्ठा किया जा रहा है - क्या उसे स्टोर किया जा रहा है या फिर कचरे के मैदान में फेंका जा रहा है.

मैंने यह प्रक्रिया तब देखी, जब मैंने एक अधिकृत निर्माता उत्तरदायित्व संगठन (पीआरओ) का दौरा किया. पीआरओ, एक ऐसी एजेंसी होती है, जिसे कंपनियों द्वारा ईपीआर लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उनकी ओर से कचरा इकट्ठा करने के लिए अनुबंधित किया जाता है. यह एजेंसी नगर-निगम निकायों से कचरा ले रही थी.

यहां कचरे को बड़े कन्वेयर बेल्ट पर रखा जाता था, जहां एजेंसी के कर्मचारी, एल्यूमीनियम टिन से लेकर पाउच जैसी चीजों को अलग-अलग बंडलों में छांटकर रखने के लिए उठाते हैं.

समस्या यह थी कि छांटकर रखी गई चीजों का क्या किया जाए. पीआरओ इनमें से उन चीजों को बेच देगा, जिनकी कोई कीमत है लेकिन ऐसी चीजें जो रीसाइकिल नहीं होंगी, वे तो उसी गोदाम में पड़ी रहेंगी.

मैंने सफाई से छांटे गए और बहुस्तरीय पैकेजों व पाउच के बंडलों के ढेर देखे. पीआरओ का कहना था कि उसके पास जगह की कमी होने के चलते केवल यही रास्ता है कि वह इस सामग्री को नष्ट करने के लिए सीमेंट कंपनियों को भेज दें, लेकिन गाड़ी से उसे ले जाने के ज्यादा खर्चे के चलते वह ऐसा नहीं कर पा रहा था.

अब पहले बिंदु पर लौटें, यहां पर कचरे को कूड़ें में फेंका नहीं जा रहा था बल्कि उसे पैक किया जा रहा था, लेकिन यह नहीं पता था कि उसे कहां ले जाना है, शायद किसी कचरे के मैदान में.

यही वजह है कि सबसे विवादास्पद यह मुद्दा है कि हम रीसाइकिलिंग से क्या समझते हैं. हम अपने दोष को यह मानकर हल्का करने की कोशिश करेंगे कि जो कचरा हम फेंकते हैं, वह रीप्रोसेस हो जाता है.

हालांकि हमें यह समझना चाहिए कि या तो ऐसा हो ही नहीं रहा है और अगर हो भी रहा है तो उन लाखों असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की वजह से हो रहा है, जो हमारे कूड़ा- करकट से काम की चीज निकाल लेते हैं. हमारे कचरे का प्रबंधन करने वाले असली योद्धा वहीं हैं.

यह समय यह समझने का है ताकि हम अपने कचरे के लिए खुद जिम्मेदार बनें और उन चीजों का इस्तेमाल न करें जो आज प्रतिबंधित हैं, साथ ही कल के लिए और चीजों पर प्रतिबंध लगाने को कहें क्योंकि हमें उनके बिना जीना चाहिए और हम उनके बिना जी सकते हैं.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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