साहिर लुधियानवी: “वह उधार बाकी रह गया”

साहिर लुधियानवी को अपनी नज़्मों से देश-दुनिया में खूब पहचान मिली, आज उनका जन्मदिन है.

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साहिर को एक जुनून था या इसे इनका ऑब्सेशन समझिए कि वह शायरों के दर्जे को फिल्मी दुनिया के तिजारती माहौल में बेहतर और बरतर बनाना चाहते थे. उनसे पहले फिल्मी शायर कितना भी बड़ा हो उसका नाम न तो पब्लिसिटी में आता था न रेडियो पर, जब उसके गाने बजते थे तो उसके साथ उसका नाम भी नहीं लिया जाता था. गीतों की कीमत भी माकूल नहीं मिलती थी, बल्कि अक्सर हालात में मिलती ही नहीं थी.

साहिर ने देखा सुना कि म्यूजिक डायरेक्टरों और प्लेबैक सिंगरों का हर कोई जिक्र करता है लेकिन जिसने गीत के अल्फाज लिखे उसका कोई नाम नहीं लेता, और न ही दर्शक उसके नाम से वाकिफ हैं. यह बात साहिर को न सिर्फ खलती थी बल्कि वह इसको शायरों और शायरी की अवमानना समझते थे. इसलिए जब फिल्म राइटर्स एसोसिएशन का उसको वाइस प्रेसिडेंट चुना गया मैं उस साल प्रेसिडेंट था तो उसने शर्त रखी कि हम दोनों मिलकर शायरों को उनका हक दिलवाने की जद्दोजहद करेंगे. सबसे पहले इस जद्दोजहद के लिए हमने रेडियो का मैदान चुना.

रेडियो के डायरेक्टर जनरल से मैं और साहिर मिलने के लिए दिल्ली गए. वहां जाकर उनसे कहा कि आप हर गाने के साथ उसके प्लेबैक सिंगर का नाम अनाउंस करते हैं, मौसीकार का नाम अनाउंस होता है लेकिन शायर को ही क्यों नजरअंदाज किया जाता है? वे बोले कि बात यह है कि हमारे पास वक्त कम होता है इसलिए शायर का नाम नहीं दे सकते. इस पर साहिर ने उनसे कहा कि हर रिकॉर्ड के साथ फरमाइश करने वालों के नाम कई मिनट तक सुनाए जाते हैं तो उसमें वक्त जाया नहीं होता?

यहां पर डायरेक्टर जनरल भी कायल हो गए और चंद रोज बाद उन्होंने हिदायत दे दी कि हर गीत के साथ उसके शायर का नाम भी ब्रॉडकास्ट होना चाहिए. यह काम इतना बड़ा था कि साहिर को अगले साल ही फिल्म राइटर एसोसिएशन का प्रेसिडेंट चुन लिया गया. अब हर गाने के साथ शायर का नाम आता है. यह कोई कम कामयाबी नहीं है. मगर साहिर तो हमेशा शायरों और अदीबों के अधिकारों की हिफाजत के लिए जद्दोजहद करते रहे, चाहे जंग सरकार से हो या प्रोड्यूसरों से.

साहिर की निजी कामयाबी इतनी बढ़ी कि उसे हर चीज खुद अपने लिए हासिल हो सकती थी. अगर वो चाहता तो अपना नाम रेडियो पर भी ले आता. फिल्म पब्लिसिटी में भी उसका नाम प्रोड्यूसर खुद देना चाहते थे. लेकिन साहिर की सामाजिक चेतना इस निजी सफलता को कोई सफलता नहीं समझती थी. उसे वर्ग संघर्ष की मार्क्सवादी समझ थी और इसी लिहाज से वह दिमाग भी काम करने वालों (ब्रेन वर्कर्स) के हुकूक चाहता था और जब तक सब शायरों और अदीबों के हुकूक की गारंटी न मिल जाए वह चैन से बैठने वाला नहीं था. वैसे साहिर हर मायने में एक इंसान था जो इंसान से मोहब्बत करता था. इंसान की इज्जत करता था और इंसान की सब अच्छाइयां और कमजोरियां उसके अंदर मौजूद थीं.

'दोस्त' इंसान का बेहतरीन रूप होता है. साहिर वाकई 'दोस्त' था. दोस्तों का दोस्त. जब एक टैक्सी एक्सीडेंट में मेरी पसलियां टूट गईं, बाद में प्लास्टर चढ़ाया गया. मगर मैं यह नहीं भूल सकता कि साहिर ने इस चोट और बीमारी में बराबर मेरा साथ दिया. बात कार में ले जाने की नहीं है. टैक्सी में भी जा सकता था. लेकिन बात ये है कि 'दोस्ती आं बाशद के गिरद दस्ते-दोस्त दर परीशां हाली-ओ-दरमांदगी'. दर्जनों ऐसे वाकियात साहिर का हर दोस्त बयान कर सकता है. हमने बिहार यूपी के दौरे के सिलसिले में कोई 2000 किलोमीटर एक ही कार में सफर किया. कार साहिर की थी मगर मजाल है कि किसी मौके पर साहिर ने यह जाहिर किया हो कि कार उसकी है. ड्राइवर उसका है. पेट्रोल भी उसका है और हम सिर्फ उसके हमसफर हैं.

साहिर से एक ही शिकायत थी मुझे. जब कभी वह अपने घर खाने को बुलाता तो सबको खाना खिला कर आखिर मैं खुद खाता. मुझे एक बार उस पर बड़ा गुस्सा आया. मैं खाना खाए बगैर वहां से चला आया. क्योंकि मेरा ख्याल था कि साहिर साहब सबसे आखिर में खाना खाएंगे. अगले दिन साहिर साहब खुद मेरे यहां आए. दोपहर के खाने से कुछ पहले. कहा, “आप रात को बिना खाए चले आए मगर शिकायत न की.” मैंने कहा- सच है, हम तो आपके साथ खाना खाने गए थे. जब आप ही दस्तख़्वान पर नहीं थे तो हम वहां खाना क्यों खाते? कहने लगे 'आपने जो किया अच्छा किया, “मैंने भी रात से खाना नहीं खाया.”

क्यों? मैंने अचरज से पूछा, “आपने खाना क्यों नहीं खाया?”

मैं कैसे खा सकता हूं? “जब मेरा एक दोस्त अजीज साथी भूखा उठ आया हो. खैर मकसद तो मिलकर साथ खाना खाने गए थे. मेरे यहां नहीं तो आपके यहां ही सही.”

मतलब?

“मतलब यह कि अब आपके यहां खाना खाने आया हूं, बगैर इत्तला के खाना खिलाएंगे आप?”

जरूर खिलाऊंगा.

मैंने खाना मंगवाया जो भी रूखी-सूखी दाल-रोटी हाजिर थी, उसको हम दोनों भूखों ने निहायत इश्तिहा से खाया.

रात को आपके यहां दो किस्म का पुलाव और बिरयानी थी. कोफ्ते थे. शामी कबाब थे. मुर्ग- मुसल्लम था. पराठे थे, शीरीनी और दो किस्म के हलवे थे. इस वक्त मेज पर आपके सामने उबली हुई गोभी और मसूर की दाल रखी हुई है.

खाना सिर्फ खाना होता है. वह सब दिखावटी था कि लोग यह न शिकायत करें कि एक शायर खाना नहीं खिला सकता. खाना तो इसी को कहते हैं. तीन रोटियां, गोभी और दाल साहिर ने खाई. तीन रोटियां मैंने खा लीं. बाद में साहिर साहब ने उठकर हाथ धोए, फिर मुझसे रुखसत होते हुए बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया. मैंने कहा, “क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं मुझे.”

शर्मिंदगी मिटाने तो मैं आया था आपके यहां.

शर्मिंदगी तो मुझे है कि आपको कुछ मीठा नहीं खिलाया. मीठा आप पर उधार रहा.

मगर जाने वाला चला गया. अब वह उधार कैसे अदा किया जाएगा.

(अनुवाद:मोहम्मद नौशाद)

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