डिजिटल नफरत के नए ठिकाने

चाहे वह सुल्ली डील्स या बुली बाई और क्लब हाउस जैसे एप हों अथवा टेकफॉग के आपराधिक षड्यंत्र हों या ट्रैड्स की गतिविधियां हों- सरकारी एजेंसियां इनकी पहचान करने एवं इनके विरुद्ध कार्रवाई करने में अपेक्षित तत्परता दिखाने में नाकाम रही हैं.

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डिजिटल नफरत के नए ठिकाने
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अल्पसंख्यकों एवं दलितों के विरुद्ध जघन्यतम अपराध और बर्बरता करने वाले खलपुरुष तथा इनके विरुद्ध खुली हिंसा की वकालत करने वाले धर्मोन्मादी ट्रैड्स के आदर्श हैं जिनसे वे प्रेरणा प्राप्त करते हैं. ट्रैड्स के नायकों की सूची बहुत लंबी है और इसमें नाथूराम गोडसे, शंभू लाल रैगर, बाबू बजरंगी, दारा सिंह, जामिया में गोलीबारी करने वाले अवयस्क अपराधी तथा यति नरसिंहानन्द जैसे नाम शामिल हैं. ट्रैड्स भाजपा की इस बात के लिए आलोचना भी करते हैं कि उसने इन “नायकों” से दूरी बनाई हुई है और इस कायरता के लिए भाजपा की आलोचना करते हैं.

ट्रैड्स के विषय में अनुसंधान करने वाले पत्रकार इस बात को रेखांकित करते हैं कि मुख्यधारा के दक्षिणपंथियों को ट्रैड्स नापसंद करते हैं और इन्हें नरम, अवसरवादी तथा समझौतापरस्त मानते हैं और इन्हें “रायता” का संबोधन देते हैं. ट्रैड्स सती प्रथा के समर्थक हैं एवं खुले में मल त्याग को पर्यावरण हितकारी समझते हैं. जाति भेद को दास प्रथा के रूप में विकसित करना इनका सपना है. दलितों को लेकर मुख्यधारा के दक्षिणपंथी और ट्रैड्स अलग अलग राय रखते हैं.

ट्रेड्स का कहना है कि दलितों के प्रति उनकी घृणा दरअसल सवर्णों के प्रति दलितों की नफरत और अत्याचारों का प्रतिकार है. जबकि मुख्यधारा के दक्षिणपंथियों का शीर्ष नेतृत्व जो कि सामान्यतया ट्रैड्स के संबंध में कुछ भी कहने से परहेज करता है यदा कदा शायद दुर्घटनावश ही यह कहता पाया गया है कि ट्रैड्स जातिवाद को बढ़ावा देते हैं और विरोधियों के उस षड्यंत्र का हिस्सा हैं जो हिन्दू एकता में बाधा डालने के लिए रचा गया है. हां इतना अवश्य है कि सोशल मीडिया पर ट्रैड्स और मुख्यधारा के दक्षिणपंथियों के बीच मुठभेड़ चलती रहती है किंतु इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर यह प्यादों की लड़ाई ही रहती है और दोनों पक्षों के बड़े नाम इसमें शामिल नहीं होते.

लेकिन कई बार दोनों में आपसी संवाद और तालमेल देखने में आता है जब ऑपइंडिया के पूर्व संपादक अजीत भारती सुल्ली डील्स की जमकर तारीफ करते हैं और कहते हैं कि उनका उद्देश्य मुसलमानों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना है तब लिबरल डोज उत्तर देता है कि हम आपके साथ हैं.

ट्रैड्स और मुख्यधारा के दक्षिणपंथियों के एजेंडे में समानताएं भी हैं- दोनों संविधान को मनुस्मृति द्वारा प्रतिस्थापित करना चाहते हैं, अंतर केवल क्रियान्वयन की पद्धति में है. “रायता” संविधान की हत्या चरणबद्ध रूप से एक सुनियोजित एवं धीमी प्रक्रिया के माध्यम से करना चाहते हैं जबकि ट्रैड्स के पास इतना धैर्य नहीं है.

ट्रैड्स पर शोध करने वाले पत्रकारों का मानना है कि यह नफरत और हिंसा फैलाने के लिए सुनियोजित रूप से कार्य करने वाली आई टी सेल अथवा ट्रोल समूहों से संबद्ध नहीं हैं. यह किसी संगठन का हिस्सा नहीं हैं किंतु ऐसा नहीं है कि ये असंगठित हैं- अल्पसंख्यकों और दलितों के प्रति घृणा एवं हिंसा इन्हें आपस में एक मजबूत बंधन में बांधती है. स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता के अभाव और किसी दल या संगठन से संबद्ध न होने के कारण इन्हें पहचानना कठिन है और इसी कारण यह अधिक खतरनाक हैं. इनकी तुलना हम सभ्य समाज में आम नागरिक की तरह विचरण कर रहे मानव बमों से कर सकते हैं.

संभव है कि हमारे आसपास का कोई सामान्य सा लगने वाला व्यक्ति सोशल मीडिया का नफरती ट्रेडिशनलिस्ट हो और वह अचानक फेसबुक लाइव करते हुए किसी हिंसात्मक कार्रवाई को अंजाम दे बैठे. हमने देखा है कि अमेरिका की कैपिटल बिल्डिंग पर हमले में ऑल्ट राइट मूवमेंट से जुड़े लोगों का हाथ था. 15 मार्च 2021 को क्राइस्टचर्च में दो मस्जिदों में नरसंहार करने वाले अपराधी ने स्वयं को फेसबुक लाइव किया था. इससे पहले उसने ट्विटर पर द ग्रेट रिप्लेसमेंट नामक एक मैनिफेस्टो भी पोस्ट किया था जिसमें नफरत, हिंसा और श्वेत वर्चस्व का जहर कूट कूट कर भरा था.

एलपासो, टेक्सास में 3 अगस्त 2019 को हुए हत्याकांड के बाद भी ऐसा ही नस्ली घृणा से लबरेज मैनिफेस्टो 8चान मैसेजिंग फोरम में देखा गया था. दिल्ली दंगों के दौरान चर्चा में आए अंकित तिवारी की फेसबुक प्रोफाइल भी अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा का बड़े गौरव से जिक्र करने वाली पोस्टों से भरपूर थी. जनवरी 2020 में जामिया मिल्लिया के सम्मुख प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलीबारी करने वाले अवयस्क अपराधी के लाइव वीडियो भी एक फेसबुक एकाउंट में देखे गए थे.

हाल ही में टेकफॉग के विषय में जो खुलासे हो रहे हैं उनका सार संक्षेप यह है कि लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में आपराधिक ढंग से सेंध लगाई जा सकती है और इनका उपयोग लोगों की सोच को हिंसा और घृणा फैलाने वाले मुद्दों पर केंद्रित रखने के लिए किया जा सकता है. इस तरह की आपराधिक गतिविधियों के सबूत मिटाए जा सकते हैं और अपराधी कम से कम साइबर क्राइम के किसी सामान्य अन्वेषणकर्ता से अपनी पहचान छिपा सकते हैं.

घृणा, हिंसा और अविवेक को जब आपराधिक तकनीकी कुशलता और शासकीय संरक्षण मिल जाता है तब इनका प्रसार अकल्पनीय गति से होने लगता है. सोशल मीडिया हमारे अवचेतन पर निरंतर प्रहार कर हमें हिंसा और घृणा का अभ्यस्त बना रहा है. हिंसा के विचार को आचरण में लाने की प्रवृत्ति बढ़ी है.

चाहे वह सुल्ली डील्स या बुली बाई और क्लब हाउस जैसे एप हों अथवा टेकफॉग के आपराधिक षड्यंत्र हों या ट्रैड्स की गतिविधियां हों- सरकारी एजेंसियां इनकी पहचान करने एवं इनके विरुद्ध कार्रवाई करने में अपेक्षित तत्परता दिखाने में नाकाम रही हैं. भाजपा हिंसक हिंदुत्व की डरावनी दुनिया का आकर्षक प्रवेश द्वार है जहां आगंतुकों को भ्रम में डालने वाले नारे लिखे हुए हैं- सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास आदि आदि. किंतु इस प्रवेश द्वार के अंदर के जगत का सच एकदम उल्टा है. पता नहीं यह सामान्य सा सच किसी की समझ में क्यों नहीं आ रहा कि हिंसा और नफरत की आग सब कुछ जला डालेगी, वह आग लगाने और भड़काने वालों के साथ कोई रियायत नहीं करेगी.

लेखक छत्तीसगढ़ के रायगढ़ स्थित स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

(साभार- जनपथ)

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