बढ़ती जनसंख्या का हमेशा मजाक बनाना भी ठीक नहीं

अगर सामुदायिक संपत्ति के अधिकार को सही ढंग से परिभाषित किया जाए तो बढ़ती आबादी, बेहतर तरीके से उसका प्रबंधन कर सकती है.

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बढ़ती जनसंख्या का हमेशा मजाक बनाना भी ठीक नहीं
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वन अधिकारियों ने सुखोमाजरी मॉडल (हरियाणा के अंबाला जिले के सुखोमाजरी गांव के लोगों ने 1980 के दशक में पानी और जंगलों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करने के तरीके अपनाकर ख्याति पाई थी) को अपनाकर ग्राम-समुदायों की मदद से चंडीगढ़ के नजदीक उप- हिमालयी वाटरशेड की रक्षा करना शुरू कर दिया है.

ऐसे ही वन-पुनर्जनन का पश्चिम बंगाल का अरबी मॉडल, भी कामयाब रहा है, जिसके तहत ग्रामीणों को वनों की संयुक्त रूप से रक्षा करने पर लकड़ी, घास और वन उपज के अन्य अधिकारों का आश्वासन दिया जाता है. पश्चिम बंगाल में अब 1,684 ग्राम स्तरीय वन संरक्षण समितियां हैं. अनुभव दर्शाते हैं कि ग्रामीणों द्वारा प्राकृतिक-संसाधन प्रबंधन जिन स्थितियों में सफल होता है, वे हैं-

क) जहां सामान्य संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं और इसलिए, वहां मौजूदा जरूरतों की तुलना में पारिस्थितिकी के उत्थान से पर्याप्त लाभ मिल सकते हैं.

ख) जहां सामान्य संसाधन तेजी से पुनः उत्पादित किए जा सकते हैं.

ग) जहां समुदाय अधिक सजातीय हैं और ज्यादा स्तर वाले नहीं हैं.

भारत में हमने पाया है कि क और ग में एक सहसंबंध है. पर्याप्त सामान्य संसाधनों वाले क्षेत्र आमतौर पर पहाड़ी, पर्वतीय क्षेत्र और असिंचित शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र होते हैं. नमी वाले मैदानों और सिंचाई वाले इलाकों में या अर्ध-सिंचाई वाले क्षेत्रों में ज्यादातर जमीनें निजी होती हैं.

पहले वाले इलाकों में ज्यादातर बस्तियां छोटी और समाज बिना स्तरों वाला होता है जबकि दूसरे वाले इलाकों में जमीनें अमीर लोगों के हाथ में होती हैं. साथ ही इसकी बस्तियां बड़ी और तुलनात्मक तौर पर कुछ स्तरों में बंटी होती हैं.

अगर ऐसे इलाकों में आबादी बढ़ती है तो उसका सहभागी संसाधनों यानी खेती लायक जमीन पर असर पड़ेगा. गरीब अपने जीवन-यापन के लिए पूरी तरह से अमीर पर निर्भर हो जाएगा, उसकी सामाजिक और आर्थिक हालत उसे हिंसा और दबाव झेलने के लिए मजबूर बनाएगी.

लेकिन ऐसे क्षेत्र जहां, प्राकृतिक संसाधन तुलनात्मक रूप से निजी हाथों में कम हैं, और जो संयोग से पारिस्थितिकी रूप से अधिक नाजुक और अपेक्षाकृत ज्यादा गरीबी से त्रस्त क्षेत्र हैं, वहां जनसंख्या घनत्व बढ़ने से इन संसाधनों का बेहतर प्रयोग हो सकता है, खासकर तब, जब अभी तक सामुदायिक अधिकारों को ठीक से परिभाषित नहीं किया गया हो.

अगर सामुदायिक संपत्ति के अधिकार को सही ढंग से परिभाषित किया जाए तो बढ़ती आबादी बेहतर तरीके से उसका प्रबंधन भी कर सकती है. वहीं, जमीन का इस्तेमाल सभी के लिए करने की स्थिति एक तरह की अनुशासनहीनता को जन्म देती है. देश के कई गांव ऐसे हैं, जहां इस तरह की जमीनें खराब हालत में हैं, जिनका उपयोग सभी के लिए है, हालांकि वे काफी उत्पादक जमीनें हैं.

यहां जैवभार (जीवित जीवों अथवा हाल ही में मरे हुए जीवों से प्राप्त पदार्थ जैव मात्रा को जैव संहति या जैवभार कहा जाता है) के पुनर्जनन की दर काफी ऊंची और तेज हो सकती है. उदाहरण के लिए, केवल कुछ महीनों में यहां घास का उत्पादन दोगुना या तीन गुना हो सकता है.

इस तरह पर्याप्त सामुदायिक अधिकार स्थापित करके और समुदायों को कार्रवाई के लिए लामबंद करके कुछ ही सालों में पर्याप्त आर्थिक लाभ हासिल किया जा सकता है. सिंचाई का पानी फसलों की एक बड़ी जमीन तक पहुंच सकता है और घास की बड़ी मात्रा, जानवरों के खाने की मांग को पूरा कर सकती है. प्राकृतिक-संसाधनों का सामुदायिक-प्रबंधन तुरंत ही ग्राम-स्वराज की अवधारणा को लागू कर देगा. इसमें हर समुदाय अपने पड़ोसी को सामुदायिक जगह का अनाधिकृत उपयोग करने से रोकेगा.

हमने कई अंतर-बस्तियों में सामुदायिक जगह को लेकर विवाद देखे हैं क्योंकि पहले उनका रखरखाव सबके लिए था. हर समुदाय के पास एक विशेष क्षेत्र का कानूनी अधिकार होना चाहिए. इससे हर समुदाय, अपनी सामुदायिक जगह की सुरक्षा स्वयं करने लगेगा. इस तरह दूसरी बस्तियों के लोग उस पर अपना हक नहीं जताएंगे, और फिर धीरे-धीरे एक जैसी जरूरतों के चलते यह बस्तियां सामुदायिक जगह की सुरक्षा के लिए उचित नियम-कानून बना लेंगी.

इस तरह से लोगों में यह सोच भी विकसित होना शुरू हो जाएगी कि जनसंख्या वृद्धि असीमित नहीं हो सकती. जब तक ऐसी सरकारी जमीनें ज्यादा हैं, जिन पर सभी का हक है, लोग उस पर अपना हक जताने और उसके ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल के लिए बड़े परिवार को प्राथमिकता देते हैं. वहीं, सामुदायिक-प्रबंधन की स्थिति में लोगों का जोर बेहतर प्रबंधन और निरंतर उत्पादकता बढ़ाने पर रहता है. इसीलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सुखोमाजरी के लोगों ने चारा बढ़ जाने के बावजूद जानवरों की आबादी नहीं बढ़ाई बल्कि उनके यहां बकरियों की आबादी घट गई है.

निश्चित तौर पर अगर आबादी बिना किसी लगाम के आगे बढ़ती है और जैवभार की मांग-क्षमता पर्यावरण को प्रभावित करने के स्तर पर पहुंच जाती है तो सामुदायिक-प्रबंधन का तंत्र ढहने लगेगा. लेकिन अगर आज सामुदायिक-प्रबंधन की प्रणाली को संस्था के तौर पर विकसित किया जाता है तो इससे पर्यावरण का पुनर्जनन होगा, महिलाओं पर काम का बोझ कम होगा और उनकी साक्षरता-दर में वृद्धि होगी. जिन जगहों पर ये प्रणाली लागू होगी, वहां आबादी बढ़ने की दर भी तेजी से घट सकती है.

बढ़ती जनसंख्या का हमेशा मजाक बनाना भी ठीक नहीं है. इसे वास्तविक मुद्दों के समाधान के लिए एक अवसर के तौर पर भी देखा जा सकता है, जिसमें अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि को खत्म करना भी शामिल है.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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