अगर बाल विवाह रोकने में नाकाम तो नये कानून से उम्मीद कैसे?

लड़कियों के विवाह की उम्र बढ़ाकर 21 साल करने का प्रस्ताव एक बेमतलब की कसरत और आम लोगों के उत्पीड़न का एक और औजार भर हो सकता है.

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अगर बाल विवाह रोकने में नाकाम तो नये कानून से उम्मीद कैसे?
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इन सभी आंकड़ों को देखते हुए कहा जा सकता है कि न्यूनतम आयु बढ़ाने से बाल विवाह नहीं रोका जा सकता है. हमें उन उपायों पर ध्यान देना चाहिए, जो हमारे देश में और अन्य देशों में ऐसी शादियों को रोकने में कारगर साबित हुए हैं. यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि जिन भारतीय राज्यों में यह प्रथा चली आ रही है, वहां जनसंख्या वृद्धि की दर भी अधिक है और वे पिछड़े राज्य भी हैं. उनके विकास पर जोर देने की जरूरत है क्योंकि इस विषमता से कई अन्य समस्याएं भी पैदा हो रही हैं, जो आगे विकराल रूप ले सकती हैं.

यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि जीवन के हर क्षेत्र में जब महिलाएं आगे आ रही हैं, तो हमारे देश में उनकी श्रम भागीदारी इतनी कम क्यों है और उसमें कमी क्यों आ रही है. एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई से सितंबर, 2020 के बीच महिलाओं की श्रम भागीदारी घटकर 16.1 फीसदी हो गयी थी, जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम थी. इसके लिए केवल महामारी को दोष देना समझदारी नहीं है. विश्व बैंक के आकलन में इस मामले में भारत सबसे पिछड़े देशों में है, जहां 15 साल या इससे अधिक आयु की एक-तिहाई से भी कम महिलाएं काम कर रही हैं या काम की तलाश में हैं. वर्ष 2005 में महिलाओं की भागीदारी 26 फीसदी से अधिक थी, जो 2019 में घटकर 20.3 फीसदी रह गयी थी. लगातार घटते रोजगार से हालत और खराब होगी.

साल 2019-20 की एक शैक्षणिक रिपोर्ट के अनुसार, सेकेंडरी शिक्षा के स्तर से देशभर में लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने का आंकड़ा 15 फीसदी से अधिक था. देश के 14 राज्यों में यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर से अधिक था, जिनमें से 12 राज्य पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के हैं. इनके अलावा मध्य प्रदेश और गुजरात में आंकड़ा अधिक रहा था. साल 2013-14 में छह करोड़ से अधिक लड़कियां प्राथमिक शिक्षा में नामांकित थीं, लेकिन 2019-20 में अपर प्राइमरी स्तर में उनकी संख्या केवल 35 लाख रह गयी थी. भारत सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि 2018-19 में लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने का आंकड़ा सेकेंडरी स्तर पर 17.3 फीसदी और इलेमेंटरी स्तर पर 4.74 फीसदी था. कोरोना काल में हालात और अधिक बिगड़े हैं.

करीब 30 फीसदी लड़कियां घरेलू जिम्मेदारियों और 15 लड़कियां आर्थिक कारणों से पढ़ाई छोड़ देती हैं. इसमें बाल विवाह भी एक कारण है और वही कई मामलों में परिणाम भी. इससे स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है. साल 2019 की संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि पांच से 19 साल की करीब 28 लाख लड़कियां किसी प्रकार की विकलांगता से जूझ रही हैं. साल 2020 में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के 3.71 लाख से अधिक मामले सामने आए. उस साल बच्चों के विरुद्ध हर दिन 350 से अधिक आपराधिक घटनाएं हुईं. कोरोना महामारी ने 23 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी की ओर धकेल दिया है. लड़कियों और महिलाओं के कल्याण के लिए हमें इन मामलों की ओर देखना चाहिए, न कि कानूनी प्रावधान कर अपनी पीठ थपथपानी चाहिए.

जैसा कि बहुत से लोगों ने इंगित किया है, शादी की उम्र की सीमा 21 साल करने से अवैध शादियों की तादाद बढ़ेगी और इससे वंचित समूहों के लोगों को एक आपराधिक कृत्य करने के लिए विवश किया जाएगा. सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समस्याओं के समाधान की ओर केंद्र और राज्य सरकारों को ध्यान देना चाहिए, जिससे बदलाव के लिए ठोस आधार बन सके.

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