बड़े धोखे हैं इस राह में…

नरेंद्र मोदी ने आज प्रकाश पर्व के अवसर पर उन तीन कृषि कानूनों को रद्द किए जाने की घोषणा की जिनके खिलाफ आजाद भारत में सबसे लंबा अहिंसक और शांतिमय आंदोलन अपने एक साल पूरे करने जा रहा है.

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कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए आगामी सत्र का इंतजार करना?

इस घोषणा में रद्द किए जाने की घोषणा भी की जा सकती थी. एक अध्यादेश लाकर इन्हें तत्काल रद्द किया जाना इतना मुश्किल काम नहीं था. यहां कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ठीक ही कहा है कि अगर प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई के निदेशकों की कार्यावधि बनाने के लिए अध्यादेश लाये जा सकते हैं और जिसके लिए संसद के आगामी सत्र का इंतजार नहीं किया जा सकता तो कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए क्यों संसद के सत्र का इंतजार किया जा रहा है. जब भूमि अधिग्रहण कानून 2013 को बदलने के लिए अध्यादेश लाये जा सकते हैं तो इन कानूनों के लिए भी क्या आज ही अध्यादेश नहीं लाया जा सकता? महज 14 दिनों बाद संसद का सत्र प्रस्तावित है.

यह पूछना यहां भी उतना ही मौंजूं है जितना ऐसी अन्य घोषणाओं मसलन नोटबंदी, लॉकडाउन आदि के दौरान था कि प्रधानमंत्री जब इस निर्णय तक पहुंचे तो उसकी संवैधानिक प्रक्रिया क्या रही? यानी क्या इस फैसले से पहले कैबिनेट की कोई बैठक हुई? क्या कैबिनेट ने इस पर मुहर लगाई? अन्यथा जहां एक तरफ किसान आंदोलन और सत्य की जीत का जश्न होगा वहीं इस बात की स्वीकार्यता भी होती कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में निर्णय प्रक्रिया इस तरह एकांगी और एक व्यक्ति के अधीन हो चुकी है.

संसद से पारित और देश की सर्वोच्च संस्था राष्ट्रपति से अनुमोदित कानूनों को एक व्यक्ति महज अपनी छवि बनाने के लिए और आगामी चुनावों में उनका फायदा उठाने के लिए एक घोषणा मात्र से इन संवैधानिक संस्थाओं को धता बता सकता है तो यह तात्कालिक जीत के जश्न में दीर्घकालीन संवैधानिक व्यवस्था के लिए कितना ठीक होगा?

निस्संदेह, किसान आंदोलन ने इसका स्वागत करते हुए भी इस घोषणा की समीक्षा और आगे की रणनीति बनाने पर जोर दिया है और पूरे देश को इस बात पर यकीन है कि ये तात्कालिक जीत एक आगाज भर है अभी देश के प्रधानमंत्री को ऐसा बहुत कुछ करना होगा जिसे असल अर्थों में प्राश्यचित्त कहा जा सकता हो.

अंधाधुंध प्रचार से बदलेगी हवा?

इस घोषणा में अगर एक बात जिस पर सभी लोग एकमत होंगे वो है कि यह पांच राज्यों के आगामी चुनावों के मद्देनजर की गयी है. विशेष रूप से पंजाब और उत्तर प्रदेश. भाजपा के आंतरिक सर्वे में कई बार यह बात सामने आ चुकी है कि किसान आंदोलन उसे भारी नुकसान पहुंचाने जा रहा है. इसके अलावा हाल ही में सम्पन्न हुए उप-चुनावों ने भी इस आंकलन पर मुहर लगाई.

इसलिए आज की घोषणा के लिए प्रकाश पर्व का दिन चुना गया और इस घोषणा के बाद नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में चार दिनों के लंबे प्रवास पर जा रहे हैं. आज से लेकर आगामी संसद सत्र तक देश के ‘उन कुछ लोगों’ के खिलाफ पर्याप्त माहौल बनाया जा सकेगा जिनके चलते किसानों के हित में लाये गए इन कानूनों को रद्द करना पड़ा.

भाजपा एनआईआईटी कॉर्पोरेट मीडिया आज सुबह से ही मुजफ्फनगर और अंबाला और नोएडा से दूर ऐसी कई जगहों पर अपने स्टार प्रस्तोताओं के साथ पहुंच चुकी थी, जिसमें यह संदेह बाकी नहीं रह जाता कि इन्हें पहले से बता दिया गया था कि फील्डिंग कहां करनी है.

अब यह फील्डिंग स्टूडियो से लेकर जमीनी स्तर पर सजी रहेगी और और ‘उन कुछ लोगों के खिलाफ’ धारणा का जबरदस्त निर्माण होगा जिसके लपेटे में मौजूदा विपक्ष भी आयेगा. क्योंकि यह विपक्ष का आंदोलन साबित किया जाएगा.

अब देखना है कि किसान आंदोलन का नेतृत्व इसे किस रूप में देखता है और कितना एतबार इस घोषणा पर करता है. हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा ने परिस्थितियों को भांपने और उनका सामना करने में जिस तरह से विवेक से काम लिया है इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि वो इस नयी परिस्थिति में भी व्यापक राजनैतिक बदलाव की आधारशिला ही रखेंगे.

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