उत्तर प्रदेश की एनकाउंटर संस्कृति और न्यायेतर हत्याएं

मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश में पुलिस फायरिंग की लगभग 8,472 घटनाएं हुई हैं. इसमें 146 लोग मारे गए हैं और 3,302 लोग घायल हुए हैं. यूथ फॉर ह्यूमन राइट्स डॉक्युमेंटेशन (YHRD) की रिपोर्ट.

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5. विश्लेषण किए गए 17 मामलों में से 16 में जांच-अधिकारी ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करके जांच को बंद कर दिया. सबूतों से उभरने वाले तथ्यात्मक विरोधाभासों को देखते हुए, सभी 16 मामलों में क्लोज़र-रिपोर्ट पुलिस के कथनों की पुष्टि करती है कि फायरिंग आत्मरक्षा में की गई थी. सभी मामलों को इस आधार पर बंद कर दिया गया कि पीड़ित– जिन्हें “आरोपी” के रूप में नामित किया गया था– मर चुके थे, और पुलिस को उस साथी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली जो अपराध स्थल से भाग गया था. इस प्रक्रिया को अन्य मामलों में उच्च न्यायालयों और एनएचआरसी द्वारा असंवैधानिक ठहराया गया है.

6. 16 में से 11 मामलों में जहां पुलिस द्वारा क्लोजर रिपोर्ट दर्ज की गई थी, ऐसा प्रतीत होता है कि मजिस्ट्रेट ने इन मामलों में मृतक को “आरोपी” के रूप में नामित करके, मामले को बंद करने से पहले पीड़ित परिवार को नोटिस जारी करने की न्यायालय की इस आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया. मजिस्ट्रेट ने प्राथमिकी में शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी को नोटिस जारी किया, जो जांच को बंद करने के लिए “अनापत्ति” पत्र देता है. इस प्रक्रिया के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट जांच को बंद कर देते हैं.

7. कानून (सीआरपीसी की धारा 176 (1-ए)) के मुताबिक मौत के कारणों की जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए, हालांकि कम से कम आठ मामलों में, यह जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा की गई थी जो सीआरपीसी के प्रावधानों का उल्लंघन है. यह उल्लंघन यह भी दर्शाता है कि जवाबदेही से बचने के लिए पीयूसीएल दिशानिर्देशों में स्पष्टता की कमी का फायदा उठाया जा रहा है. कार्यकारी मजिस्ट्रेटों ने पुलिस हत्याओं को “वास्तविक” माना, जो उनकी शक्तियों और अधिकार क्षेत्र से परे है. उनका काम केवल मृत्यु के कारण को निर्धारित करना है ना कि यह तय करना है कि कोई अपराध किया गया है या नहीं. कार्यकारी मजिस्ट्रेट के निष्कर्ष और रिपोर्ट पुलिस कथनों पर आधारित हैं, और अधिकांश रिपोर्ट फॉरेंसिक या बैलिस्टिक साक्ष्य पर विचार तक नहीं करती. परिवार के सदस्यों के बयान या तो दर्ज नहीं किए गए हैं और यदि किए हैं तो सही तरीके से नहीं.

8. एनएचआरसी द्वारा इस रिपोर्ट में विस्तृत 17 मामलों की जांच के निर्देश के तीन साल बाद, 14 मामलों का फैसला किया गया है, जिस में दो मामले अब भी लंबित हैं और एक मामले की स्थिति सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है. एनएचआरसी द्वारा तय किए गए 14 मामलों में से 12 मामलों को बंद कर दिया गया, पुलिस की ओर से कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई, और एक मामला उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग को स्थानांतरित कर दिया गया. केवल एक मामले में, एनएचआरसी ने माना कि मृतक पुलिस द्वारा ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारा गया था. सिर्फ यही नहीं एनएचआरसी द्वारा की गई अन्य पूछताछ में पुलिस की कहानी में तथ्यात्मक विरोधाभासों और विसंगतियों की अनदेखी की गई है. यह प्रक्रियात्मक और मूल रूप से कानून के उल्लंघन पर भी आंखें मूंद लेता है, उदाहरण के लिए, मृतक पीड़ितों के खिलाफ सभी प्राथमिकी दर्ज करना और पुलिस के खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं करना; आत्मरक्षा के पुलिस के कथन के आधार पर जांच को बंद करना, आत्मरक्षा के औचित्य का कोई न्यायिक निर्धारण न होना, अपराध की जगह से सबूत इकट्ठा करने और उसे सहेजने में उल्लंघन करना, अक्सर उसी पुलिस स्टेशन से सम्बंधित पुलिस अधिकारियों द्वारा जांच करना जहां कि पुलिस हत्याओं में शामिल थी.

9. जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने का भार पूरी तरह पीड़ित परिवारों पर पड़ता है. परिवारों को झूठे और मनगढ़ंत आपराधिक मामलों के जरिए डराया धमकाया जाता है और उनका उत्पीड़न किया जाता है. राज्य और गैर-राज्य अभिकर्ता द्वारा पीड़ित परिवारों और कानूनी-सहायता प्रदान करने वाले मानवाधिकार रक्षकों के उत्पीड़न के बारे में एनएचआरसी को कम से कम 13 पत्र दिए गए. एनएचआरसी ने पीड़ितों के परिवारों के उत्पीड़न से संबंधित पत्रों का न तो कोई जवाब दिया और न ही रिकॉर्ड में लिया. मानवाधिकार रक्षकों के उत्पीड़न के मामलों में जांच का निर्देश दिया लेकिन उन पूछताछों को भी बंद कर दिया.

10. यह रिपोर्ट पुलिस हत्याओं के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने में आपराधिक न्याय प्रणाली की घोर विफलता को उजागर करती है. यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे न्याय-प्रणाली मौत का कारण बनने वाले, बल के उपयोग के लिए पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने में असमर्थ है. यह पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों में अस्पष्टता और अंतर को उजागर करती है जो प्रभावी रूप से हत्याओं के लिए दण्ड मुक्ति की बात करते हैं. इनमें पुलिस के खिलाफ दर्ज की जाने वाली प्राथमिकी पर अनिश्चितता और अस्पष्टता का परिचय देना शामिल है ताकि जांच के स्तर पर ही आत्मरक्षा की दलील का दुरुपयोग किया जा सके. इनमें पुलिस हत्याओं में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अनिवार्य जांच के सम्बंध में अस्पष्टता भी शामिल है. अंततः यह भी असंभव है कि राज्य पुलिस विभाग द्वारा अपने ही सहयोगियों द्वारा किए गए अपराधों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जाए.

(साभार- जनपथ)

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