पीयूडीआर और जेएनयू के प्रकाशनों की बुनियाद पर यूपी पुलिस ने सिद्दिकी कप्पन को सिमी से जोड़ा

क्या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शोध पत्रों का पास में होना राजद्रोह है?

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पीयूडीआर और जेएनयू के प्रकाशनों की बुनियाद पर यूपी पुलिस ने सिद्दिकी कप्पन को सिमी से जोड़ा
Shambhavi Thakur
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यह पुस्तिकाएं संदेहजनक क्यों हैं?

क्योंकि यूपी एसटीएफ ने कप्पन से बरामद हुई पुस्तिकाओं को चिन्हित किया है, उनके बारे में हमारे पास यह जानकारी उपलब्ध है.

26 पन्नों की Rehearsed truths: Eight successive bans on SIMI by UAPA tribunals, और 36 पन्नों की Banned and Damned: SIMI saga with UAPA tribunals पीयूडीआर के प्रकाशन हैं जो क्रमशः 2020 और 2015 में प्रकाशित हुए.

Rehearsed truths: Eight successive bans on SIMI by UAPA tribunals इस बात का विश्लेषण करती है कि केंद्र सरकार के द्वारा बनाए हुए विशेष ट्राईब्यूनलों ने किस प्रकार 2001 से सिमी पर लगे प्रतिबंध को बरकरार रखा है. रिपोर्ट सिमी के उन सदस्यों के दोषी होने पर सवाल उठाती है जिन पर पहले आतंकवाद का आरोप लग चुका है.

रिहर्सड् ट्रूथ्स में दिए गए उदाहरणों में से दो, अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर और एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी के हैं. कुरैशी को दिल्ली पुलिस के द्वारा जनवरी 2018 में गिरफ्तार किया गया और उन पर जुलाई 2006 के मुंबई बम धमाकों व 2008 में दिल्ली और गुजरात में हुए धमाकों में शामिल होने का शक है. कथित तौर पर, सिद्दीकी ने अपने खुलासे के बयान में तौकीर के सिमी से संबंधों की बात की.

2008 में डीएनए अखबार में छपी पत्रकार जोज़ी जोसेफ की खबर का हवाला देते हुए, रिहर्सड् ट्रूथ्स कहता है, "जोज़ी जोसेफ ने सवाल उठाया था कि तौकीर का सारा मामला जांच रिपोर्टों पर ही आधारित है, जिसकी अदालत में ही नहीं कई जांच करने वालों की नजर में भी कुछ खास विश्वसनीयता नहीं है."

रिहर्सड् ट्रूथ्स 2017 में इंडियन एक्सप्रेस में छपी प्रवीण स्वामी की एक खबर की तरफ भी इशारा है जिसमें स्वामी ने इस बात की पुष्टि की है, कि मुंबई बम धमाकों के मामले में 6 आरोपियों को दिए गए मृत्युदंड के मामले में, "फॉरेंसिक डाटा और आरोपियों के पूछताछ के दौरान बयानों में यह सबूत उपलब्ध हैं कि इन तीनों हमलों को असल में आरोपियों ने नहीं बल्कि इंडियन मुजाहिदीन ने अंजाम दिया था."

रिहर्सड् ट्रूथ्स सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है और पीयूडीआर की आधिकारिक वेबसाइट पर देखी जा सकती है. इस रिपोर्ट की कॉपी आरोप पत्र के साथ संलग्न है.

Banned and Damned: SIMI’s Saga with UAPA Tribunals पीयूडीआर की दूसरी पुस्तिका है जो आरोप पत्र का हिस्सा है. द हिंदू अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, "रिपोर्ट गिरफ्तार सिमी कार्यकर्ताओं की अदालतों में रिहाई के जारी ट्रेंड की तरफ इशारा करती है."

पीयूडीआर के सचिव विकास कुमार और राधिका चितकारा ने न्यूज़लॉन्ड्री को अपने संयुक्त वक्तव्य में बताया, "एक नागरिक स्वतंत्रता संगठन होने के नाते, पीयूडीआर नियमित तौर पर विशेष कानूनों जैसे यूएपीए, टाडा, पोटा, मकोका इत्यादि की कार्य पद्धति पर रिपोर्ट करता है. पुस्तकें अपने आप में सिमी पर लगे प्रतिबंध पर सवाल नहीं उठातीं, बल्कि उससे ज्यादा कानून (यूएपीए) में गैरकानूनी करार दी गई संस्थाओं के लिए, ट्रिब्यूनल के कामकाज का गहन विश्लेषण कर, उपलब्ध सुरक्षा उपायों की अपर्याप्तता की जांच करती हैं."

तथाकथित संदेहास्पद सामग्री में, जेएनयू के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस के द्वारा प्रकाशित 26 पन्नों का शोध पत्र Detrimental to the peace, integrity and secular fabric of India भी शामिल है. मयूर सुरेश और जवाहर राजा के द्वारा लिखा गया यह शोध विश्वसनीय इकबाले बयानों की समस्या का विश्लेषण करता है. इसमें सिमी के सदस्यों के वकीलों के तर्कों की तरफ इशारा किया गया है, जिनमें वे कहते हैं कि बयान साक्ष्य कानून के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत अदालत में अस्वीकार्य हैं.

यह स्पष्ट नहीं है कि इस सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शोध पत्र से यूपी एसटीएफ ने कप्पन का सिमी से संबंध कैसे स्थापित किया.

पीएफआई और सिमी के बीच का संबंध

यूपी एसटीएफ के द्वारा 20 जनवरी 2021 को कप्पन के लैपटॉप से बरामद किये गए 45 पन्नों के दस्तावेज का शीर्षक सिमी पर रेनी नोट्स है. इसमें सिमी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सदस्यों के बयान हैं. इस दस्तावेज का अनुवाद भी आरोप पत्र के साथ संलग्न किया गया है लेकिन अधिकतर जगहों पर उसे समझना कठिन है.

एसटीएफ को कप्पन के घर से बरामद हुई मलयालम पुस्तिका का अनुवाद 10 दिसंबर 2020 को प्राप्त हुआ. एक दैनिक डायरी एंट्री इस तरफ इशारा करती है कि पुस्तिका में लिखी गई बातें सिमी सदस्यों से बातचीत पर आधारित हैं और प्रतिबंधित समूह की कामकाज और विचारधारा पर एक अवलोकन देती है. पन्ना दर पन्ना सारांश भी दिया गया है.

पहले 10 पन्ने सिमी की शुरुआत के बारे में हैं जिसकी स्थापना शेख मोहम्मद काराकुन्नू ने की थी जो 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति से प्रभावित था. छठे पन्ने पर "उन्हें बलिदान की तरह काट डालो कहते हुए एक नोटिस" और एक नारे "भारत की आजादी केवल इस्लाम से" का जिक्र है, जिसे यूपी एसटीएफ ने सिमी के द्वारा इस्लामिक आतंक को बढ़ाने का सबूत माना है. सिमी के नक्सल और दलित समूहों से अच्छे संबंधों का जिक्र करने वाले पृष्ठ 9 की तरफ भी एसटीएफ इशारा करती है.

एसटीएफ का ध्यान अपनी तरफ खींचने वाले कई और पन्ने हैं जैसे पृष्ठ 22 जहां "सेकुलरवाद को एक काल्पनिक चीज बताया गया है" और पृष्ठ 31 जिसमें "मोहम्मद गजनी का स्वागत" नारा लिखा है. पृष्ठ 42 कहता है कि 1991 में मुंबई में आयोजित की गई एक सभा में "स्वागत है गजनी, बाबरी मस्जिद इंतजार कर रही है" के पोस्टर लगाए गए, जिसमें फिलिस्तीनी आतंकवादी संगठन हमास के दो सदस्यों को कथित तौर पर आमंत्रित किया गया था. पृष्ठ 39 पर पुस्तिका कहती है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद सिमी का भारतीय संविधान, सेकुलरवाद और जनतंत्र से विश्वास उठ गया. पुस्तिका के अनुसार यूपी एसटीएफ किस्मत से इसने सिमी के परिपेक्ष में बदलाव को प्रेरित किया.

एसटीएफ के लिए कप्पन के पास इस पुस्तिका का होना इस तरफ इशारा करता है कि वह सिमी के साथ मिलकर काम कर रहे थे.

जांच अधिकारी आरोप पत्र में कहते हैं, "दस्तावेज में अलग-अलग जगहों पर पेन से लगे निशान बताते हैं कि कप्पन दस्तावेज तैयार कर रहे थे. पीएफआई थिंक टैंक के एक बुद्धिजीवी सदस्य के नाते वह सिमी और उसके आतंकी गतिविधियों में उनके लिप्त होने को कमतर दिखाने की कोशिश कर रहे थे."

पीएफआई और सीमी के बीच कथित संबंध, 4 दिसंबर 2020 को एक मुखबिर के द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है. आरोप पत्र में यूपी एसटीएफ कहती है कि अपने मुखबिर के द्वारा उन्हें पता चला कि पीएफआई के अधिकतर सदस्य सिमी के पूर्व सदस्य थे.

जांच अधिकारी अपने नोट में कहते हैं, "वे (पीएफआई सदस्य) सिमी के एजेंडे पर ही चल रहे हैं. इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ाने के लिए उन्हें केवल अंदर से ही नहीं बल्कि भारत के बाहर से भी फंड मिल रहे हैं."

न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए पीएफआई के जनरल सेक्रेटरी अनीस अहमद ने कहा, "हमारे संगठन में कई नेता हैं जो जवानी में सिमी से जुड़े थे, जब सिमी एक प्रतिबंधित संगठन नहीं था. इसी तरह हमारे अभियान में कई नेता और कार्यकर्ता हैं, जो कांग्रेस, मुस्लिम लीग, वामपंथी दलों और दूसरे सेकुलर दलों में सक्रिय थे. इससे हम उन संगठनों या उन दलों का दोबारा इकट्ठा हुआ समूह नहीं बन जाते."

पीएफआई सिमी का ही बदला हुआ रूप है इस बात को अहमद सिरे से नकार देते हैं. वे कहते हैं, "यह आरोप वाहियात है क्योंकि सिमी पर 2001 में प्रतिबंध लगा और एनडीएफ (नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट) जो पीएफआई का पूर्वज था, 1993 में गठित किया गया. किसी भी जांच एजेंसी के द्वारा इस प्रकार के कोई भी संबंध नहीं पाए गए हैं.

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