एनएल टिप्पणी 84: आर्यावर्त में कैंसल कल्चर और ज़ी न्यूज़ का बैलेंसवाद

दिन ब दिन की इंटरनेट बहसों और खबरिया चैनलों के रंगमंच पर संक्षिप्त टिप्पणी.

WrittenBy:अतुल चौरसिया
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लंबे वक्त के बाद टिप्पणी में धृतराष्ट्र-संजय संवाद की वापसी हो रही है और साथ में आप लोगों के लिए यह खुशखबरी भी कि हमारा यूट्यूब चैनल फिर से शुरू हो चुका है. बीते हफ्ते प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को सौ करोड़ टीके की बधाई दी तो पिछलग्गू एंकर-एंकराओं को लगा कि लगे हाथ सरकार के पिछले सारे धतकरम भी मिट गए, उनकी सारी असफलताएं भी सफलता बन गईं, जो लोग बिना टीके, बिना दवा, बिना ऑक्सीजन के चल बसे वो लोग जिंदा हो गए, उन असंख्य परिवारों का दुख खत्म हो गया जिनके अपने असमय गुजर गए. प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित किया और उसकी आड़ में पिछलग्गू एंकर एंकराओं ने लोगों से माफी मांगना शुरू कर दिया.

माफी किस बात की, किससे और क्यों? अगर सरकार की नीतियां सही रही होती तो दूसरी लहर की त्रासदी कम की जा सकती थी, उससे बचा भी जा सकता था. अगर सरकार की नीतियां सही रही होती तो सौ करोड़ टीके का आंकड़ा आज से दो-तीन महीने पहले ही पूरा हो गया होता. अगर सरकार की नीतियां सही रही होती तो श्मशानों में दो दो दिन की वेटिंग लिस्ट नहीं होती, अगर सरकार की नीतियां सही रही होती तो गंगा में लाशें और गंगा किनारे कब्रे नहीं बनी होती.

खैर बीते हफ्ते सुधीर चौधरी ने एक और कारनामा किया. आप चाहें तो इसे बेशर्मी ऑफ द ईयर, थेथरई ऑफ द ईयर, पाखंड ऑफ द ईयर या चिरकुटई ऑफ द ईयर का अवार्ड दे सकते हैं. इन्होंने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच को न सिर्फ बढ़-चढ़ कर दिखाया बल्कि पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब अख्तर के साथ साझा शो भी किया. और दावा किया कि कुछ लोग भारत में नहीं चाहते कि भारत-पाक के बीच क्रिकेट मैच हों. कौन हैं ये लोग, रहते कहां हैं जो नहीं चाहते कि भारत पाक के बीच मैच हों. देखिए इस बार की टिप्पणी में.

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