प्रदीप भंडारी मार्का पत्रकारिता: पत्रकारीय पेशे में कितनी नैतिकता है और कितना पाखंड

पिछले दो वर्षों में अर्णब गोस्वामी, नविका कुमार और स्वघोषित पत्रकार प्रदीप भंडारी ने अपने पत्रकारीय कार्य की जैसी नुमाइश की है, उसकी नींव कब और कैसे पड़ी होगी यह ‘हंस’ के विशेषांक में छपी एक-एक कहानी, संस्मरण, विमर्श से समझ में आता है.

प्रदीप भंडारी मार्का पत्रकारिता: पत्रकारीय पेशे में कितनी नैतिकता है और कितना पाखंड
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पिछले दो वर्षों में अर्णब गोस्वामी, नविका कुमार और स्वघोषित पत्रकार प्रदीप भंडारी ने अपने पत्रकारीय कार्य की जैसी नुमाइश की है, उसकी नींव कब और कैसे पड़ी होगी यह ‘हंस’ के विशेषांक में छपी एक-एक कहानी, संस्मरण, विमर्श से समझ में आता है. पूरा विशेषांक बेहद सहज शब्दों में- इलेक्ट्रॉनिक चैनल के लेक्सिकान में बोलें तो बोलचाल की भाषा में- प्रस्तुत किया गया था. जाहिर है बोलचाल की भाषा में हम मां-बहन की गालियां तो ब्रेकिंग न्यूज से भी तेज बोलते हैं. ऐसी भाषा अब टीवी स्क्रीन पर भी सुनायी देने लगी है, जिसका ताज़ा उदाहरण प्रदीप भण्डारी हैं. इसके खिलाफ कुछ बोला तो संस्कार, संस्कृति और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले एक साथ पिल पड़ते हैं.

खैर, इस विशेषांक में प्रदीप भंडारी वाले न्यूज चैनल इंडिया न्यूज़ के वर्तमान प्रबंध संपादक राणा यशवंत की लिखी एक कहानी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ भी है. न्यूज़ चैनल में किस तरह से ख़बर को परोसा जाता है उसके पीछे की सारी मर्यादाओं को तार-तार कर विजुअल और ट्रीटमेंट में उलझी इस कहानी में समझाया गया है. जाहिर है 15 साल बाद उनके नेतृत्व में चल रहे न्यूज़ चैनल के न्यूज़रूम में सिंघु बॉर्डर पर हुई हृदयविदारक घटना का विजुअल ट्रीटमेंट कैसे हो और दर्शकों को ख़बर कैसे परोसी जाय, इस पर वैसा ही विमर्श हुआ होगा, जैसा उनकी लिखी कहानी से पता चलता है. उन्होंने जो भी फॉर्मूला लगाया हो, 15 साल बाद भी उनका ट्रीटमेंट सुपरहिट ही रहा.

इस विशेषांक में छपी सारी कहानियां न्यूज़रूम की गंदगी के इर्द-गिर्द बिखरी पड़ी हैं. हर दूसरी कहानी में महिला एंकरों को लेकर कहानी को बिकाऊ बनाने वाला मैटेरियल है. अब ये सब कैसे लाइनअप हुआ ये तो अजीत जी को ही पता होगा, लेकिन एक-दो लेखकों को छोड़ दें तो किसी ने ये बताने की कोशिश नहीं की है कि आने वाली पीढ़ी इनके अनुभवों से क्या सीखे.

‘हंस’ की स्थापना कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने की थी, इस वजह से पत्रकारिता औऱ साहित्य जगत में इसका बेहद सम्मान है लेकिन विजुअल और ट्रीटमेंट की भागमभाग कितनी खतरनाक है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि जब ये विशेषांक प्रकाशित हुआ तो इसका शीर्षक भी विशुद्ध इलेक्ट्रॉनिक चैनल की तरह लिखा गया- “टेलीविजन इतिहास में पहली बार”!

समझ सकते हैं कि भारत में टेलीविजन के इतिहास ने वही लिखा-गढ़ा है जो इस विशेषांक में छपा था. अजीत अंजुम का शुक्रिया जो उन्होंने राणा यशवंत से पूछा कि उनके चैनल की संपादकीय भाषा क्या है. अजीत अंजुम ने श्वेता सिंह से भी पूछा था कि दो हजार के नोट में चिप कब लगेंगे.

(साभार- जनपथ)

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