दम तोड़ चुकी एयर इंडिया को टाटा के मत्थे मढ़ दिया!

सवाल यह है कि खासी अच्छी कमाई करती और खासा अच्छा रुतबा रखने वाली एयर इंडिया सरकारी हाथों में आते ही ऐसी बुरी दशा को कैसे पहुंच गई कि उसे खरीदने वाले का में अहसान मानना पड़ रहा है?

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आंकड़े ही इस कहानी का दूसरा पक्ष हमारे सामने रखते हैं. टाटा ने 18 हजार करोड़ रुपयों में एयर इंडिया खरीदा है जिसमें से देश को मात्र 2,700 करोड़ रुपये नकद मिलेंगे. बाकी 15,300 करोड़ रुपये उस 60,000 करोड़ रुपयों के कर्ज के बदले दिए जाएंगे जो 31 अगस्त 2021 की तारीख में एयर इंडिया पर थे. तो देश को इस विनिवेश से मिला क्या? मात्र 2,700 करोड़ रुपए. इसके एवज में टाटा को मिला क्या? घरेलू हवाई अड्डों पर 1,800 अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के उतरने व ठहरने की सुविधा, विदेश में 900 तथा देश में 4,400 सुरक्षित हवाई स्थानों की सुविधा, 30 लाख से अधिक निश्चित यात्री, 141 विमानों का जत्था, 13,500 प्रशिक्षित व अनुभवी कर्मचारी तथा घरेलू आसमान में 13.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी. मानिए कि एक बनी-बनाई, जांची-परखी हवाई कंपनी भारत सरकार ने टाटा को उपहार में दे दी है. अब इस कंपनी को चाहिए तो बस एक कुशल, ईमानदार प्रबंध तथा व्यापार-बुद्धि जो दोनों टाटा के पास है. इसलिए तो सौदा पूरा होने के बाद रतन टाटा ने इतने विश्वास से कहा, “हम एयर इंडिया की खोई प्रतिष्ठा फिर से लौटा लाएंगे.” हम सब एयर इंडिया को और रतन टाटा को इसकी शुभकामना दें.

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हमारी गाढ़ी कमाई से बनाई गई वे राष्ट्रीय संपत्तियां हैं जिन्होंने लंबे औपनिवेशिक शोषण से बाहर निकले देश की आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाया है. अंतरराष्ट्रीय मंदी के लंबे दौर से हम खुद को जिस हद तक बचा सके, उसके पीछे हमारी इन आत्मनिर्भर परियोजनाओं की, लघु उद्योगों के जाल की बड़ी भूमिका रही है. सार्वजनिक क्षेत्र की हमारी कंपनियां देश की उन जरूरतों को पूरा करती हैं जिनकी तरफ मात्र मुनाफा व सुरक्षा को देखने वाले निजी व्यापारी व कॉरपोरेट देखते भी नहीं हैं.

सार्वजनिक क्षेत्र के पास दो सबसे बड़ी ताकत होती है: जनता से मिलने वाली बड़ी अकूत पूंजी और सत्ता से मिलने वाली सुविधाएं व संरक्षण. किसी भी व्यापारिक उपक्रम को सफल बनाने वाले ये दोनों तत्व, किसी कॉरपोरेट को नहीं मिलते हैं. उसे यह सब चोर दरवाजे से हासिल करना पड़ता है. फिर यह कैसे व क्यों होता जा रहा है कि विनिवेश के नाम पर हम सार्वजनिक क्षेत्रों को खोखला बनाते जा रहे हैं? कारण दो हैं: सरकारों ने सार्वजनिक उपक्रमों को, लोक कल्याण की अपनी प्रतिबद्धता की नजर से नहीं देखा बल्कि इससे मनमाना कमाई का रास्ता बनाया है. उसने सार्वजनिक क्षेत्र के नाम पर ऐसे उपक्रमों में हाथ डाला जो किसी भी तरह लोक कल्याण के उपक्रम नहीं थे. दूसरी तरफ सरकारी होने के कारण उनके प्रति किसी की निजी प्रतिबद्धता नहीं रही. तो नजर भी गलत रही और प्रतिबद्धता भी खोखली रही.

सार्वजनिक उपक्रमों की कठोर समीक्षा का सिलसिला न कभी बनाया गया, न चलाया गया. इसलिए ये उपक्रम निकम्मे मंत्रियों और चालाक नौकरशाहों का आरामगाह बन गए. अब विनिवेश के नाम पर वे ही लोग अपनी नंगी विफलता व बेईमानी को छुपाने में लगे हैं.

अत्यंत केंद्रित औद्योगिक क्रांति के साथ ही एक नया चलन सामने आया: पूंजी व सत्ता का गठजोड़! यह गठजोड़ हमेशा सार्वजनिक हित के खिलाफ काम करता रहा है. यहीं से उपनिवेशों का क्रूर शोषणकारी चलन बना. अब उसने नया रूप धरा है और विनिवेश व विकास के नाम पर पूंजी व प्राकृतिक संसाधन को कॉरपोरेटों के हवाले कर रहा है. इसलिए हमें सावधानीपूर्वक यह देखना चाहिए कि सार्वजनिक पूंजी और प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण न हो. इसमें से शोषण व गुलामी के सिवा दूसरा कुछ हमारे हाथ नहीं आएगा.

(लेखक गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं)

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