पुस्तक समीक्षा: बड़बोलेपन से बचते हुए व्यक्ति के आंतरिक जगत में झांकती 'दुखांतिका'

कहानी 'दुखांतिका' इतिहास और वर्तमान की समानंतर यात्रा के साथ राजशाही और सत्ता का विद्रुप चेहरा दिखाती है.

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'राम झरोखे बैठ के' समाज के उस व्यक्ति का रेखांकन है, जो जिंदगी के हर मोर्चे पर खुद को थका हारा तथा पराजित महसूस करता है. उसके बारे में कभी भी कुछ भी कहा जा सकता है. कोई भी तोहमत लगाई जा सकती है. वहीं, 'मृतक भोज' के माध्यम से ब्राह्मणवाद के मर्म पर चोट करती कहानी है 'अंगेया'. ब्राह्मणवाद नियम तो बनाता है, किन्तु अपने लाभ-हानि के हिसाब से नियमों को आगे-पीछे सुविधानुसार खिसकाता रहता है. इसके समस्त पात्रों में पाठक स्वयं को या स्वयं के आस-पास के लोगों को देख सकता है, पहचान सकता है, अपने घर या पड़ोस में घटित मान सकता है.

संग्रह की शीर्षक कहानी 'दुखांतिका' इतिहास और वर्तमान की समानंतर यात्रा के साथ राजशाही और सत्ता का विद्रुप चेहरा दिखाती है, जहां अंतिम मनुष्य एक मुहरे से अधिक कुछ भी नहीं है. समाज और अंतर्निहित राजनीति की सिमटी सीमाओं की जो अहर्निश परीक्षा नवनीत अपनी कहानियों में लेते हैं, वह दंग करता है. कुछ इस कदर कि जैसे नए कायदों वाली दुनिया बनाई जा रही हो. 'दुखांतिका' इसकी एक मिसाल है.

छोटी कहानियों में 'अनकही' सबसे प्रभावशाली कहानी बन पड़ी है. एक शिक्षक जो एक रंगमंच का कलाकार भी है, कैसे वह कला तथा पद की जिम्मेदारियों के बीच फंसा हुआ है. उसकी विडंबना कहानी की एक पंक्ति से ही स्पष्ट है कि अपना समाज किसी कलाकार को नहीं पाल सकता!

नवनीत नीरव का यह पहला संग्रह है, लेकिन यह सामयिकता और लोकरंग से जुड़े विषयों से पगी कहानियों से समृद्ध है. जीवन और गल्प के बीच कहीं अपने को प्रक्षेपित करती यह कहानी इतनी खूबसूरती से लिखी गई है कि पढ़ने के बहुत समय बाद तक ‘ट्रांस’ में रखती है. इसे पढ़ने से पहले यह हिदायत ध्यान में रखें कि यह आपको कहीं भी और कभी भी याद आ सकती है.

पुस्तक का नाम : दुखांतिका

लेखक: नवनीत नीरव

मूल्य : 300 रुपए

पृष्ठ: 128 (हार्डकवर)

प्रकाशन वर्ष: 2021

प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन

(समीक्षक आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहतेहैं. पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं.)

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