2019 में भारत की जीडीपी से भी है ज्यादा थी प्लास्टिक उत्पादन की सामाजिक लागत

अनुमान है कि 2040 तक यह लागत बढ़कर 520.2 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच जाएगी, जो 2018 में वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य पर किए गए कुल खर्च का करीब 85 फीसदी है.

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क्या है समाधान

इसमें कोई शक नहीं की प्लास्टिक ने हमारी कई तरीकों से मदद की है. प्लास्टिक एक सस्ता विकल्प है, यही वजह है कि इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. पर इस प्लास्टिक के साथ समस्याएं भी कम नहीं हैं. आज जिस तेजी से इस प्लास्टिक के कारण उत्पन्न हुआ कचरा बढ़ता जा रहा है, वो अपने आप में एक बड़ी समस्या है जिसने न केवल धरती बल्कि समुद्रों को भी अपने आगोश में ले लिया है.

ऐसे में इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. कई प्रमुख संगठनों ने इससे निपटने के लिए सर्कुलर इकोनॉमी को अपनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक को पर्यावरण में पहुंचने से रोकना है. अनुमान है कि इसकी मदद से हम महासागरों में प्रवेश करने वाले प्लास्टिक की मात्रा को 80 फीसदी तक कम कर सकते हैं. साथ ही इससे होने वाले जीएचजी उत्सर्जन को 25 फीसदी तक कम किया जा सकता है.

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने भी संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों से एक वैश्विक संधि पर बातचीत शुरू करने का आग्रह किया है, जो प्लास्टिक के जीवनचक्र के सभी चरणों से निपटने के लिए आवश्यक है, जिससे 2030 तक महासागरों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को रोका जा सके.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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