जंगलों पर हमला बकस्वाहा में ही नहीं पूरे देश में हो रहा है

वनों को सिर्फ पर्यावरण के लिहाज से बचाना ज़रूरी नहीं है बल्कि इसलिये भी क्योंकि ज़ूनोटिक महामारियां तेज़ी से फैल रही हैं जो अर्थव्यवस्था को पंगु कर सकती हैं.

जंगलों पर हमला बकस्वाहा में ही नहीं पूरे देश में हो रहा है
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हिमालय के आधुनिक इतिहास पर कई दशकों से लिखने, बोलने और शोध करने वालों में एक प्रोफेसर शेखर पाठक ने कुछ दिन पहले मुझे एक वीडियो क्लिप व्हाट्सएप पर भेजी. साथ में उनका संदेश था– वॉच एंड शेयर यानी देखो और दूसरों को भेजो. यह वीडियो मध्य प्रदेश के बकस्वाहा जंगलों के बारे में था जहां हीरों के खनन के लिये कोई दो लाख पेड़ धराशायी किये जा रहे हैं. अमूमन लिखे शब्दों के मुकाबले वीडियो को देखना और समझना आसान होता है और किसी को भी वह संदेश ग्रहण करने में अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता इसलिये मैंने उस वीडियो को कुछ संवेदनशील साथियों को भेजा.

बकस्वाहा तक सीमित नहीं है जंगलों पर हमला

बकस्वाहा के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या मध्यप्रदेश के छतरपुर ज़िले में ये जंगल बचेंगे या नहीं. करीब 2500 करोड़ रुपये का ये प्रोजेक्ट 350 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जंगलों को प्रभावित करेगा. इसके अलावा कुल 18 हेक्टेयर ज़मीन वाहनों की आवाजाही और बांध बनाने के लिये ली जा रही है. ज़ाहिर है हीरा खनन से इन जंगलों में वन्य जीव और जैव विविधता नष्ट होगी. चूंकि इन जंगलों को किसी कोयला, पावर, बांध या सड़क जैसे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिये नहीं काटा जा रहा बल्कि हीरों के लिये उज़ाड़ा जा रहा है इसलिये आलोचकों का यह सवाल जायज़ है कि पर्यावरण की कीमत पर यह क्यों हो रहा है.

लेकिन जंगल पर हमला बकस्वाहा में ही नहीं और जगह भी हो रहा है. चाहे वह छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कोरबा ज़िले हों या फिर रायगढ़ या दंतेवाड़ा जैसे इलाके, जहां कोयला और लौह अयस्क माइनिंग के प्रोजेक्ट हैं, या फिर बोधघाट जैसी बांध परियोजनायें आ रही हैं जिसमें हज़ारों हेक्टेयर जंगल काटे और डुबाये जायेंगे. हिमालयी राज्यों में बांधों, सुरंगों और सड़कों के लिये जमकर जंगल काटे जा रहे हैं.

पाम ऑयल: जंगलों के लिये नया संकट

केंद्र सरकार ने पाम ऑइल यानी ताड़ के तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिये पिछले हफ्ते 11,040 करोड़ रुपये की कार्ययोजना को मंज़ूरी दी है. भारत अभी ज़्यादातर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से मंगाता है. कैबिनेट ने पिछले हफ्ते इस कार्ययोजना के प्रस्ताव को पास किया. अब नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स ऑयल पाम (NMEO-OP) अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों समेत उत्तर-पूर्व के राज्यों में इसके उत्पादन पर ज़ोर देगा. खाने के तेल (सरसों, मूंगफली और सोयाबीन आदि के तेल में) पाम आइल मिक्स किया जाता है और कुछ खाद्य तेलों में इसका हिस्सा 60% से अधिक है.

संकीर्ण आर्थिक नज़रिये से देखें तो पाम ऑयल एक मुनाफे वाली फसल है वहीं इसकी खेती पर्यावरण के लिये एक चुनौती है. इसके लिये बहुत बड़े इलाके के जंगल काटे जाते हैं और अगर सस्टेनेबल तरीके से इसे न उगाया गया तो यह पारिस्थितिकी यानी इकोलॉजी के लिये बड़ा ख़तरा है. इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में पाम की खेती ने जंगलों को काफी नुकसान पहुंचाया है. भारत अगले पांच सालों में कुल 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में (अभी यह रकबा करीब 3.5 लाख हेक्टेयर है) ताड़ की खेती करना चाहता है. जानकारों को डर है कि इससे जैव विविधता से भरे जंगल कटेंगे और ताड़ की मोनोकल्चर खेती को सरकार जंगलों में गिनेगी. यानी जिस पाम ऑयल को आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम बताया जा रहा है उसकी छुपी पर्यावरणीय कीमत को अनदेखा किया जा रहा है जो अर्थव्यवस्था पर चोट करेगी.

वन्य जीवों का सिकुड़ता आशियाना

जंगलों के कटने के साथ वन्य जीवों (पक्षियों और जानवरों) का बसेरा तो खत्म होता ही है एक जटिल पारिस्थितिक तन्त्र भी प्रभावित होता है. पिछले साल उत्तराखंड राज्य वन्य जीव बोर्ड (स्टेट बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ) ने करीब 5500 वर्ग किलोमीटर में फैले शिवालिक एलीफैण्ट रिज़र्व को डिनोटिफाइ करने का फैसला किया जो 2000 हाथियों का बसेरा है. इससे न केवल यहां तितलियों का बसेरा (बटरफ्लाइ ज़ोन) खत्म होगा जो कई वनस्पतियों और पादप प्रजातियों के लिये ज़रूरी हैं वहीं सरकार और नीति नियंता ये भी भूल गये कि हाथी – जिसे जंगल का इंजीनियर कहा जाता है – वह पूरे इकोसिस्टम के लिये क्यों ज़रूरी है.

ज़ूनोटिक बीमारियों का बढ़ता ख़तरा

केरल में एक बार फिर निपाह वायरस फैल रहा है और देश में कोरोना की तीसरी लहर की आशंका भी जताई जा रही है. वैज्ञानिक और शोधकर्ता कहते हैं कि जहां प्राणियों की कई प्रजातियां लुप्त हो रही हैं वहीं चूहे और चमगादड़ समेत कुछ प्रजातियां ऐसे वायरसों का घर हैं जो इन जानवरों से इंसानों में आ रहे हैं. जानवरों से आने वाली इन बीमारियों को ज़ूनोटिक बीमारियां कहा जाता है. ज़ीका, सार्स और निपाह जैसी बीमारियां इस श्रेणी में हैं.

पिछले साल विज्ञान पत्रिका नेचर में एक शोध प्रकाशित हुआ जिसमें छह महाद्वीपों के करीब 6,800 जंतु प्रजातियों का विश्लेषण किया गया. पता चलता है कि जब बड़े क्षेत्र में जंगलों को किसी परियोजना, आवास या खेती के लिये काटा जाता है तो बड़ी संख्या में विशाल प्रजातियां वहां से लुप्त हो जाती हैं लेकिन मानव तक बीमारियां संक्रमित करने वाले छोटे प्राणी खुद को कठिन हालात में ढाल लेते हैं.

शोध में पाया गया कि जिन जगहों पर पर्यावरण का क्षरण अधिक है (पेड़ काटे गये हैं और पारिस्थितिकी कमज़ोर है) वहां ज़ूनोटिक बीमारियों के वाहक जंतु या प्राणियों की संख्या 2.5 गुना अधिक है. यह भी कि ऐसी बीमारियां फैलाने वाली प्रजातियों का अनुपात स्वस्थ इकोसिस्टम के बजाय कमज़ोर पारिस्थितिकी में 70% तक अधिक बढ़ा. यानी इन विषाणुओं या पैथोजॉन के इंसानी बस्तियों से दूर रहने के लिये जंगलों का बचा रहना ज़रूरी है. सार्स (फेफड़ों पर हमला करने वाली बीमारियां) के नये-नये रूप जो महामारियां लेकर आ रहे हैं वह अर्थव्यवस्था को कितना पंगु कर सकते हैं यह कोरोना ने पिछले डेढ़ साल में दिखा दिया है.

(साभार- कार्बन कॉपी)

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