आईपीसीसी की रिपोर्ट धरती को बचाने की अंतिम चेतावनी है

आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है कि अब हम बातों में वक्त नहीं गंवा सकते या काम न करने के नए बहाने नहीं तलाश सकते.

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आईपीसीसी की रिपोर्ट धरती को बचाने की अंतिम चेतावनी है
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दूसरी तरफ विज्ञान की चेतावनी अपने आप में स्पष्ट है. ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 45-50 फीसद कम करके साल 2030 तक साल 2010 के नीचे के स्तर लाने और साल 2050 तक शून्य उत्सर्जन करने की जरूरत है. यानी कि हमें किसी किंतु- परंतु के बजाय तुरंत कदम उठाने होंगे. 2030 तक पेट्रोल की जगह ई- वाहन या कोयला की जगह प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल जैसी चीजों से काम नहीं चलेगा, क्योंकि प्राकृतिक गैस भी एक जीवाश्म ईंधन ही है. हमें कहीं अधिक कठोर कदम उठाने होंगे.

हालांकि इन कदमों के बारे में हमारे वैज्ञानिक पूरा सच सामने नहीं रख सकते, क्योंकि इसमें कुछ असुविधाजनक तथ्य होंगे. यह कौन नहीं जानता कि जलवायु परिवर्तन में बड़ा हिस्सा कुछ मुटठी भर देशों का है. अमेरिका और चीन मिलकर दुनिया के कुल सालाना उत्जर्सन का आधा हिस्सा वहन करते हैं. अगर हम 1870 से 2019 के बीच उत्सर्जन को देखें तो इसमें अमेरिका और यूरोपीय संघ का योगदान 27 फीसद और ब्रिटेन, जापान और चीन का योगदान 60 फीसदी मिलता है. दूसरी ओर कार्बन डाइ ऑक्साइड को नियंत्रित करने के लिए इन देशों का बजट उस सीमा तक नहीं है, जितना उनका उत्सर्जन है. इसलिए इस बड़े अंतर को समझना जरूरी है, तभी हम यह जान पाएंगे कि वास्तव में हमें करना क्या है.

अगर हम पेरिस समझौते को ही देखें तो राष्ट्रीय निर्धारित योगदान यानी एनडीसी के हिसाब से इन देशों को 2030 तक कार्बन डाइ ऑक्साइड को नियंत्रित करने के लिए अपना बजट 68 फीसदी बढ़ाना होगा. लेकिन इसके बजाय वे अपना बजट कम कर रहे हैं और बाकी दुनिया से इसे बढ़ाने के लिए कह रहे हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इन देशों का जो लक्ष्य है, वह निकृष्ट और अनुपात के हिसाब से गलत है. आने वाले दशक में चीन अपने कार्बन डाइ ऑक्साइड के मौजूदा 10 गीगाटन उत्सर्जन को बढ़ाकर 12 गीगाटन तक पहुंचा सकता है.

इस स्थिति में हमें भारत की भूमिका पर बात करनी चाहिए. भारत सालाना कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन के मामले में तीसरे नंबर है, अगर हम यूरोपीय संघ को एक ही समूह मान लें तो उसका नंबर चौथा हो जाता है. हालांकि यह उत्सर्जन कम करने के लिए आनुपातिक तौर पर हमें जितना योगदान करना चाहिए, वह हम बिल्कुल नहीं कर रहे. 1870 से 2019 के बीच वैश्विक कार्बन डाइ ऑक्साइड के लिए हमारा बजट तीन फीसद के करीब रहा.

चीन जहां, सालाना 10 गीगाटन और अमेरिका 5 गीगाटन कार्बन डाइ ऑक्सइड का उत्सर्जन करता है, वहीं भारत 2.6 गीगाटन का उत्सर्जन करता है. और अगर हम देश के मौजूदा बिजनेस माहौल के आधार पर देखें तो 2030 तक भी हम चीन के एक तिहाई और अमेरिका के आज के उत्सर्जन से कम कार्बन डाइऑक्सइड उत्सर्जित कर रहे होंगे. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत को कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए. बल्कि अपने हित के लिए हमें जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए बड़े स्तर पर और तेजी से कदम उठाने होंगे. देश में होने वाली भारी बारिश, बादल फटने, बाढ़ और तापमान बढ़ने जैसी घटनाओं का हम अपने लोगों पर असर पहले से देख ही रहे हैं.

दूसरे, हमारे पास इस दिशा में काम करने के लिए मौका उपलब्ध है. हमें इस दिशा में अपनी चीजों को फिर से खोजने की जरूरत है. हमारे शहरों की ओर पलायन जारी है, हमें लोगों के लिए ऐसे घर बनाने हैं, जो उन्हें गर्मी से बचा सकें और गरीब देश के रूप में हमें ऐसी उर्जा की तलाश करनी है, जो लोगों की पहुंच में हो. हमारे लिए जलवायु परिवर्तन पर काम करना हमारे अपने हित में और कई तरह से फायदेमंद है. इससे हमें स्थानीय वायु प्रदूषण कम करने और इस तरह ग्रीनहाउस गैसों का उर्त्सजन कम करने में मदद मिलेगी.

हालांकि मैं साफ कहना चाहूंगी कि हम इस विषय पर बात नहीं कर रहे हैं. भारत सरकार कार्बन डाइ ऑक्सइड उत्सर्जन कम करने के मामले में दुनिया के बाकी देशों से ज्यादा प्रयास करने की बजाय खुशमिजाज बनी हुई है. हकीकत यह है कि हम उत्सर्जन कम करने के लिए कोई निर्धारित लक्ष्य बनाकर नहीं चल रहे और यही वह वजह है, जिसके चलते हम इस दिशा में बेहतर काम नहीं कर रहे. हमारा राष्ट्रीय निर्धारित योगदान, उर्त्सजन का पूरी तरह कम करने की बजाय उसकी तीव्रता को कम करने का है. इस तरह सरकार अपना योगदान नहीं कर सकती और न ही उसे जलवायु परिवर्तन पर अपनी कोशिशों को लेकर शेखी बघारनी चाहिए.

हम केवल यह कह सकते हैं कि हम उतना भर कर रहे हैं, जिससे काम चल सके. ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन इतनी गंभीर चुनौती बन चुका है और विज्ञान हमें इससे निपटने के लिए स्पष्ट संदेश दे रहा है, हमारे प्रयास नाकाफी हैं. दरअसल जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक नेतृत्व की जरूरत है और वैक्सीन उपलब्ध कराने के दिशा में किए जा रहे प्रयासों को देखकर हम कह सकते हैं कि मानव- इतिहास में या कम से कम अपने जीवन काल में हम वैश्विक नेतृत्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन भी कोरोना की तरह ही एक वैश्विक समस्या है और पूरी दुनिया को इससे निपटना है. हम अकेले इससे नहीं निपट सकते और न ही हर व्यक्ति को बेहतर वातावरण में रहने का अधिकार दिला सकते हैं. हालांकि जिस तरह से हम कोरोना वायरस और इसके वैरिएंटस की लड़ाई में पिछड़ रहे हैं, वैसे ही जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी. जबकि आज न केवल गरीब इससे प्रभावित हो रहा है, बल्कि अमीरों पर भी इसका असर पड़ रहा है. इसलिए हमें इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है. हमें साथ में और तेजी से काम करना होगा. विज्ञान ने चेतावनी दे दी है. अब हमें ठोस कार्रवाई की जरूरत है.

(साभार- डाउन टू अर्थ)

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