इंसानियत के लिए डरावनी है यूएन की ताजा जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र की जारी ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अगले 20 साल में दुनिया के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्शियस इजाफा तय है, ग्लोबल वार्मिंग की इस रफ्तार पर भारत में चरम गर्म मौसम की आवृत्ति में वृद्धि की उम्मीद.

Byजनपथ
इंसानियत के लिए डरावनी है यूएन की ताजा जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट
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इस रिपोर्ट के निष्कर्षों का महत्त्व समझते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और COP26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने वैश्विक उत्सर्जन में कटौती के लिए तत्काल कार्रवाई का आह्वान किया है. ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का इस रिपोर्ट पर कहना है, “मुझे उम्मीद है कि महत्वपूर्ण COP26 शिखर सम्मेलन के लिए नवंबर में ग्लासगो में मिलने से पहले IPCC रिपोर्ट दुनिया के लिए अभी कार्रवाई करने के लिए एक वेक-अप कॉल होगी.”

डॉ रॉक्सी मैथ्यू कोल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान और प्रमुख लेखक, IPCC SROCC, बताते हैं, "पिछली IPCC रिपोर्टों ने पहले ही प्रदर्शित कर दिया है कि मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण जलवायु बदल रही है. IPCC AR6 रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि पेरिस समझौते के माध्यम से राष्ट्रों द्वारा प्रस्तुत मिटिगेशन और एडाप्टेशन रणनीतियां (जो राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान या NDCs के रूप में जानी जाती हैं) वैश्विक सतह के तापमान में वृद्धि को 1.5°C या 2°C की भी सीमा के भीतर रखने के लिए अपर्याप्त हैं. वैश्विक औसत तापमान वृद्धि के अब 1 डिग्री सेल्शियस से ऊपर जाते हुए, भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है जहां हम पहले से ही चक्रवात, बाढ़, सूखा और गर्मी की लहर जैसी चरम मौसम की घटनाओं का सामना कर रहे हैं. जलवायु अनुमान सर्वसम्मति से दिखाते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ ये सभी गंभीर मौसम की स्थितियां अधिक लगातार और तीव्र हो जाएगी क्योंकि हम उत्सर्जन पर पर्याप्त रूप से अंकुश नहीं लगा रहे हैं. हमें इन अनुमानित परिवर्तनों के आधार पर जोखिमों का तत्काल मानचित्रण करने की आवश्यकता है, लेकिन भारत में हमारे पास देखे गए परिवर्तनों के आधार पर देशव्यापी जोखिम आकलन भी नहीं है. हमें अपने शहरों को रीडिज़ाइन करना पड़ सकता है. किसी भी तरह के विकास की योजना इन जोखिमों के आकलन के आधार पर बनाई जानी चाहिए— चाहे वह एक्सप्रेसवे हो, सार्वजनिक बुनियादी ढांचा या यहां तक कि खेत या घर."

उल्का केलकर, निदेशक, जलवायु कार्यक्रम, विश्व संसाधन संस्थान भारत (WRI) का कहना है, ”हमें ऐसी टेक्नोलॉजी की ज़रूरत है जो हरित हाइड्रोजन और पुनर्चक्रण के साथ हमारे उत्पादन के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव लाये और हमें आजीविका का समर्थन करने के लिए अपनी भूमि और प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करने की आवश्यकता है.”

यह सिर्फ तापमान से जुड़ा मामला नहीं है

वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्शियस की बढ़ोतरी होने पर तपिश बढ़ेगी और गर्मी के मौसम लंबे होंगे तथा सर्दियों की अवधि घट जाएगी. ग्लोबल वार्मिंग में 2 डिग्री सेल्शियस की बढ़ोतरी होने पर गर्मी कृषि और सेहत के लिहाज से असहनीय स्तर तक बढ़ जाएगी. उदाहरण के तौर पर निम्‍न बदलाव देखे जा सकते हैं-

•जलवायु परिवर्तन की वजह से जल चक्र का सघनीकरण हो रहा है. इसकी वजह से बेतहाशा बारिश बाढ़ के साथ-साथ अनेक क्षेत्रों में भीषण सूखा भी पड़ रहा है.

•जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश की तर्ज पर भी असर पड़ रहा है. ऊंचाई वाले इलाकों में वर्षा में वृद्धि होने की संभावना है.

•21वीं सदी की संपूर्ण अवधि के दौरान तटीय क्षेत्रों में समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ेगा, जिसकी वजह से निचले इलाकों में भीषण तटीय बाढ़ आएगी. समुद्र के जलस्तर से जुड़ी चरम घटनाएं जो पहले 100 साल में कहीं एक बार हुआ करती थीं वह इस सदी के अंत तक हर साल हो सकती हैं.

•भविष्य में तापमान और बढ़ने से परमाफ्रास्ट के पिघलने, ग्लेशियरों और आर्कटिक समुद्री बर्फ कम हो रही है.

• समुद्री हीटवेव, महासागरों के अम्लीकरण और ऑक्सीजन के स्तरों में कमी के रूप में महासागर में होने वाले बदलाव का सीधा संबंध मानवीय प्रभाव से जुड़ा है.

जारी हुई पूरी रिपोर्ट नीचे पढ़ी जा सकती है:

Climate Change 2021: The Physical Science Basis

(साभार- जनपथ)

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