पश्चिमी मीडिया पर आईआईएमसी में सेमिनार और सर्वे: मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू

विदेशी मीडिया संस्थानों द्वारा भारत में की गई रिपोर्टिंग पर आईआईएमसी ने एक सर्वे किया है. इसमें एकतरफा रिपोर्टिंग और भारत की छवि खराब करने जैसे निष्कर्ष सामने आए हैं.

पश्चिमी मीडिया पर आईआईएमसी में सेमिनार और सर्वे: मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू
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14 जुलाई को भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के ट्विटर हैंडल पर मध्य प्रदेश से छपने वाले अख़बार प्रजातंत्र की एक कटिंग साझा की गई. जिसका शीर्षक ‘पत्रकारिता के नैतिक मापदंडों पर पश्चिमी मीडिया का दागदार चेहरा’ है. यह लेख डॉक्टर अजय खेमरिया ने लिखा है. मध्य प्रदेश के शिवपुरी के रहने वाले खेमरिया का परिचय उनके ट्विटर हैंडल पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) कार्यकर्ता लिखा है.

खेमरिया ने यह लेख हाल ही में आईआईएमसी द्वारा किए गए एक सर्वे के आधार पर लिखा है. अपने इस लेख में खेमरिया लिखते हैं, ‘‘भारतीय जनसंचार संस्थान के एक ऑनलाइन सर्वेक्षण एवं शोध के नतीजे बताते हैं कि भारत में अधिसंख्य चेतन लोग इस बात को समझ रहे हैं कि यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों की मीडिया एजेंसियों ने कोरोना को लेकर अतिरंजित, गैर जिम्मेदाराना और दहशतमुल्क खबरें प्रकाशित कीं.’’

इसके अलावा खेमरिया ने इसी सर्वे के आधार पर अमर उजाला और पाञ्चजन्य में भी लेख लिखा है.

दरअसल 15 जुलाई को आईआईएमसी ने एक सर्वे प्रकाशित किया है. इसमें बताया गया है कि 82 प्रतिशत मीडियाकर्मियों की राय में पश्चिमी मीडिया द्वारा भारत में कोविड-19 महामारी की कवरेज पक्षपातपूर्ण रही.

सर्वे के आने के बाद दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा और स्वदेश अख़बार ने इसे अपने यहां छापा. वहीं, ज़ी न्यूज़, इंडिया.कॉम और अमर उजाला ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया. अख़बारों और वेबसाइट्स के अलावा कुछ टीवी चैनलों ने भी इस सर्वे पर रिपोर्ट कीं. इंडिया न्यूज़ (छत्तीसगढ़) ने इस पर रिपोर्ट करते हुए लिखा, ‘‘विदेशी मीडिया ने की छवि खराब करने की कोशिश.’’

इस कार्यक्रम में विदेशी मीडिया के दोहरे रवैये पर बात करते हुए आईआईएमसी के महानिदेशक संजय द्विवेदी कहते हैं, ‘‘अमेरिका के अंदर छह लाख लाशें अंतिम संस्कार के लिए पड़ी रही, बड़ी संख्या में लोग मृत्यु के शिकार हुए. लेकिन अंतिम संस्कार नहीं हुआ. ब्रिटेन में कितने भयावह हालत थे. यूरोप के तमाम देशों में कितने भयावह हालात थे. पर यह मीडिया अपने देश की जो आंतरिक समस्याएं है उसके बारे में चर्चा नहीं करता. उसको तीसरी दुनिया के देशों में जो अव्यवस्थाएं हैं, उनके बारे में बात करने में आनंद आता है.’’

द्विवेदी आगे कहते हैं, ‘‘मेरा मानना है कि कवरेज हो उसमें कहीं दो राय नहीं किंतु किसी देश की छवि बिगाड़ने के लिए, किसी देश की सरकार को विफल करने के लिए, किसी देश के अप्रबंधन की बातों को दुनिया के सामने उजागर करने के लिए विदेशी मीडिया ने जिस तरह का इस्तेमाल किया वो ठीक नहीं है.’’

जैसा प्रोफेसर संजय द्विवेदी का मानना है, आईआईएमसी के सर्वे का नतीजा भी कमोबेश वैसा ही आया है. यह सर्वे आईआईएमसी के आउटरीच विभाग द्वारा जून 2021 में कराया गया. रिपोर्ट के मुताबिक 82 फीसदी भारतीय मीडियाकर्मियों की राय में पश्चिमी देशों के मीडिया द्वारा भारत में जारी कोविड-19 महामारी की रिपोर्टिंग ‘अप्रमाणिक’ रही है. सर्वेक्षण के प्रतिभागियों ने पश्चिमी मीडिया की कवरेज को ‘पूरी तरह से पक्षपाती’, ‘आंशिक रूप से प्रामाणिक’ और फिर पूरी तरह से अप्रमाणिक बताया है.

इसके अलावा 69 प्रतिशत मीडियाकर्मियों का मानना है कि इस अप्रमाणिक कवरेज से विश्व स्तर पर भारत की छवि धूमिल हुई, जबकि 56 प्रतिशत का कहना है कि इस तरह की कवरेज से विदेशों में बसे भारतीयों की भारत के प्रति राय नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई है.

‘पश्चिमी मीडिया द्वारा भारत में कोविड-19 महामारी की कवरेज का एक अध्ययन’ शीर्षक से कराये गए इस सर्वे में 529 लोग शामिल हुए. जिसमें 215 मीडिया स्कॉलर, 210 पत्रकार और 104 मीडिया शिक्षक शामिल थे. सर्वे में 18-30 साल के 46 प्रतिशत, 31 से 40 वर्ष के बीच के 24 प्रतिशत और 41 से ज़्यादा आयुवर्ग के 30 प्रतिशत लोग शामिल हुए. इसमें 64 प्रतिशत पुरुष और 36 प्रतिशत महिलाएं थीं.

आईआईएमसी का दावा है कि सर्वे में हिंदी मीडिया के 149, अंग्रेजी के 31, दोनों भाषाओँ में काम करने वाले 17 और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं के समाचार संगठनों से 11 पत्रकार शामिल हुए.

पश्चिमी मीडिया के कवरेज से क्या भारत की छवि खराब हुई. इसका जवाब 69 प्रतिशत लोगों ने हां में दिया. जबकि 11 प्रतिशत लोग ऐसा नहीं मानते है.

सर्वे में एक सवाल यह भी था कि पश्चिमी मीडिया के कवरेज से विदेश में रह रहे लोगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा. इसके जवाब में 56 प्रतिशत लोगों ने हां कहा, वहीं 12 प्रतिशत ने ना और 32 प्रतिशत कोई भी जवाब देने की स्थिति में नहीं थे.

सर्वे में ‘पश्चिमी मीडिया में भारत से संबंधित कोविड-19 महमारी की कवरेज एजेंडा आधारित थी और अंतररष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को खराब करने के लिए की जा रही थी’ पर लोगों की सहमति मांगी गई. लोगों को सहमत, पूरी तरह सहमत, कुछ नहीं कह सकते, बिलकुल असहमत और असहमत ऑप्शन दिए गए. जवाब में 24 प्रतिशत लोगों ने पूरी तरह सहमत, 36 प्रतिशत ने सहमत, 25 प्रतिशत लोगों ने कोई राय नहीं दी. वहीं 10 प्रतिशत लोगों ने असहमति दर्ज कराई.

पश्चिमी मीडिया का कवरेज संतुलित था या नहीं. इस सवाल के जवाब में 29 प्रतिशत लोगों ने सतुलित, 35 प्रतिशत ने असंतुलित और वहीं 35 प्रतिशत का कहना था कि आंशिक रूप से संतुलित रहा.

आईआईएमसी की तरफ से सर्वे में शामिल लोगों से पूछा गया कि भारत के विरोध में नकारात्मक अभियान पश्चिमी मीडिया ने कब शुरू किया. इसके लिए चार ऑप्शन दिए गए. कोरोना की पहली लहर के दौरान, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान, भारत द्वारा वैक्सीन के परीक्षण के बाद और आखिरी भारत द्वारा वैक्सीन मैत्री शुरू करने के बाद. इसके जवाब में सर्वे में शामिल लोगों ने क्रमशः 25 प्रतिशत, 38 प्रतिशत, 21 प्रतिशत और 16 प्रतिशत जवाब दिया.

ठीक ऐसे ही चार ऑप्शन पक्षपातपूर्ण कवरेज के पीछे के कारण जानने के लिए दिए गए. इसमें ऑप्शन था, अंतराष्ट्रीय राजनीति, भारत की आंतरिक राजनीति, फार्मा कंपनियों के निजी स्वार्थ और एशिया की क्षेत्रीय राजनीति. इसके जवाब में क्रमशः 51 प्रतिशत, 47 प्रतिशत, 34 प्रतिशत और 21 प्रतिशत रहा. सर्वे में शामिल 63 प्रतिशत लोगों ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर विदेशी खबरों को साझा नहीं किया. वहीं 37 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्होंने साझा किया है.

सर्वे में एक सवाल यह भी था कि पाठक विदेशी मीडिया की खबरें कैसे पढ़ते हैं.

इस सर्वे में शामिल लोगों के नाम की जानकारी आईआईएमसी प्रशासन ने देने से मना कर दिया. संजय द्विवेदी ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, ‘‘सर्वे की एक मर्यादा होती है. यह हस्तक्षार नहीं है. लोग राय देते हैं, ज़रूरी नहीं कि सब अपने नाम उजागर करवाना चाहें.’’

आखिर इस सर्वे में लोगों को कैसे शामिल किया गया. वे कौन लोग थे. यह सवाल पूछने पर आउटरिच विभाग के प्रमुख प्रोफेसर प्रमोद कुमार कहते हैं, ‘‘हमारे पास सर्वे में शामिल हर एक व्यक्ति की पूरी जानकारी है लेकिन हम उसे साझा नहीं कर सकते हैं. क्योंकि सर्वे के समय हमने यह नहीं कहा था कि आपका नाम सार्वजनिक किया जाएगा. सर्वे की नैतिकता भी यही कहती है. जहां तक रही कौन लोग शामिल रहे इसकी बात तो हमने गूगल सीट बनाकर अलग-अलग ग्रुप में साझा की थी. अब एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप में गया ही होगा. साझा करने से कोई किसी को कैसे रोक सकता है. हमने किसी को टारगेट करके नहीं भेजा. इस सर्वे में आईआईएमसी के छात्र और अलग-अलग सेंटर के शिक्षक शामिल नहीं थे.’’

कोरोना महामारी के दौरान निशाने पर विदेशी मीडिया

कोरोना महमारी के दौरान भारत के अस्पतालों में जगह की कमी, ऑक्सीजन के आभाव में मरते लोगों और अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में लगी लाइनों की कवरेज को लेकर विदेशी मीडिया लगातार निशाने पर रहा.

आरएसएस की पत्रिका पाञ्चजन्य ने 18 मई को ‘पश्चिमी मीडिया के दोहरे मानदंड’ से एक लेख प्रकाशित हुआ है. इसके अलावा 4 जून को एक और लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक ‘कोविड के दौरान विदेशी मीडिया ने डर फैलाने में कसर नहीं छोड़ी, बीबीसी इसमें पहले नंबर पर रहा' था. 11 मई को एक और लेख पांचजन्य में प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक ' आंकड़ों की बाजीगरी और पश्चिमी मीडिया की द्वेष-दृष्टि' था.

एक तरफ जहां पाञ्चजन्य विदेशी मीडिया के कवरेज पर सवाल उठा रहा था उसी दौरान ज़ी न्यूज़ के मशहूर शो डीएनए में एंकर सुधीर चौधरी भी सवाल खड़े कर रहे थे. इसको लेकर 11 मई को एक शो भी किया गया. ज़ी न्यूज़ पर 'कोरोना पर विदेशी मीडिया का दोहरा चरित्र क्यों, भारत को बदनाम करने की है साजिश?' शो किया गया. इसमें सुधीर चौधरी विदेशी मीडिया के ‘डबल स्टैंड’ के बारे में बताने की कोशिश करते हैं.

अपने शो में चौधरी कहते हैं, ‘‘कई अंतरराष्ट्रीय चैनल के रिपोर्टर्स इस समय भारत के अस्पतालों में आईसीयू वॉर्ड्स की स्थितियां दिखा रहे हैं. वहां जाकर रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं लेकिन हमारा सवाल है कि जब इसी तरह के हालात अमेरिका में थे, ब्रिटेन में थे और यूरोप के देशों में सैकड़ों लोग कोरोना वायरस से मर रहे थे तब इन चैनलों की रिपोर्टिंग टीम वहां के अस्पतालों में क्यों नहीं गई और क्यों तब इन्होंने अपने देश के आईसीयू वॉर्ड्स का हाल लोगों को नहीं बताया?’’

विदेशी मीडिया ने सिर्फ भारत में श्मशान घाट और अस्पतालों की स्थिति को दिखाया?

यह दावा कि विदेशी मीडिया ने अपने मुल्क या दूसरे देशों में कोरोना की बदहाली पर भारत की तरह रिपोर्टिंग नहीं की इसका जवाब यूट्यूब और गूगल पर एकाध सर्च के बाद ही पता चला जाता है.

न्यूज़लॉन्ड्री ने सिर्फ 10 मिनट के सर्च में कई ऐसी रिपोर्ट देखीं जो विदेशी मीडिया ने अपने या बाहर के देशों में की थीं. बीबीसी ने अमेरिका के न्यूयार्क शहर में कोरोना से मरे लोगों की सामूहिक दफन का ड्रोन फुटेज दिखाया. यही नहीं लांस एंजेलिस टाइम्स ने इसी साल 8 अप्रैल को एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें ब्राजील के श्मशान घाट की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया. कब्रिस्तान में लोग अपनों को दफनाने नजर आते हैं तो कई गड्डे खोदे गए हैं ताकि शवों को दफनाया जा सके.

अल जजीरा ने 29 मार्च 2020 को इटली में कोरोना महामारी की भयावह स्थिति को लेकर रिपोर्ट की. यह खबर तक की गई थी जब इटली में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 10 हज़ार से ऊपर चली गई थी. अल जजीरा ने अपनी रिपोर्ट में वहां के अस्पतालों के साथ-साथ ताबूत की भी तस्वीर दिखाई. 3.30 मिनट के वीडियो में अस्पतालों में नर्स मरीजों का इलाज करते नजर आ रहे हैं तो दूसरी तरफ नए ताबूत बनाकर लाए जा रहे हैं.

अल जजीरा ने इंडोनेशिया से भी ऐसी ही रिपोर्ट की हैं. इस वीडियो में भारत में श्मशान घाटों की दिखाई गई तस्वीरों और वीडियो की तरह कब्रिस्तान का ड्रोन फुटेज भी दिखाया गया है. इसमें लोग अपनों को दफनाते नजर आते हैं.

वहीं कनाडा के ग्लोबल न्यूज़ ने 13 नवंबर 2020 को एक वीडियो रिपोर्ट प्रकाशित की. इटली में कोरोना बदहाली की स्थिति को बताने वाली इस रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘‘अस्पताल के शौचालय में मृत व्यक्ति का वीडियो इटली के कोरोनावायरस संकट को कर रहा उजागर.’’

विदेशी मीडिया की आलोचना इस बात पर भी की जाती है कि उसने भारत के अस्पतालों के अंदर जाकर रिपोर्टिंग की. जिससे भारत की छवि खराब हुई. हालांकि अमेरिकी मीडिया संस्थान ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने इसी साल 25 फरवरी को एक वीडियो स्टोरी प्रकाशित की, जिसमें अमेरिका के एक कोविड अस्पताल की स्थिति दिखाई गई है. इस वीडियो रिपोर्ट में अस्पताल में काम करने वाली दो नर्सों के शरीर में कैमरा लगाया गया और उसके जरिए अस्पताल के अंदर की स्थिति दिखाई गई.

यही नहीं डीडब्ल्यू मीडिया वेबसाइट ने 28 मार्च 2020 को एक वीडियो रिपोर्ट प्रकाशित की. इस वीडियो रिपोर्ट में स्पेन में कोरोना की बदहाली की तस्वीरें अस्पताल के जरिए दिखाई गईं.

गूगल करने पर कई और खबरें सामने आती हैं जिससे पता चला है कि विदेशी मीडिया ने अपने यहां की बदहाली को भी दिखाया.

क्या आईआईएमसी ने इससे पहले भी कोई सर्वे किया?

आईआईएमसी का यह सर्वे सामने आया तो मीडिया पर नजर रखने वालों के साथ-साथ पत्रकारों ने हैरानी जाहिर की. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आईआईएमसी पूर्व में भी इस तरह के सर्वे कराता रहा है.

इस सवाल के जवाब में प्रमोद कुमार कहते हैं, ‘‘जब से आईआईएमसी बना है तब से यहां रिसर्च का काम होता है. मुझे यहां आए एक साल हुए हैं लेकिन मुझे बताया गया कि हज़ारों रिसर्च हो चुकी हैं. हम अलग-अलग एजेंसी के लिए रिसर्च करते हैं और वे हमें इसके लिए भुगतान करते हैं.’’

कुमार आगे कहते हैं, ‘‘पहले और आज के आईआईएमसी में काफी अंतर है और आने वाले समय में ये अंतर ज़्यादा होगा. पहले आईआईएमसी में फेकेल्टी कम थी. अब फेकेल्टी बढ़ गई है. अब सात नए प्रोफेसर ने ज्वाइन किया है. और जब नए प्रोफेसर आएंगे तो अलग-अलग नजरिये से काम शुरू होगा. किसी को रिसर्च में दिलचस्पी है तो किसी को किताब लिखने में. तो उनका अनुभव अलग-अलग प्रकार से आगे आएगा. ये आखिरी सर्वे नहीं है. हम विदेश के नौ अख़बारों पर रिसर्च कर रहे हैं. हम उनके एक साल के डेटा का अध्यनन कर रहे हैं. ये पहले आ गया तो लोगों को लग रहा है कि हमने किसी के दबाव में या किसी के इशारे पर किया है. ऐसा नहीं है.’’

हमने प्रमोद कुमार से पूछा कि कोरोना महामारी के दौरान विदेशी मीडिया ने ज़्यादातर रिपोर्ट्स वीडियो और फोटो के जरिए की गईं. वीडियो और तस्वीरों में तो जो दिखेगा वहीं कोई दिखाएगा न. ऐसे में क्या यह कहना कि भारत की छवि खराब करने की कोशिश की गई कितना जायज है?

इस सवाल के जवाब में कुमार कहते हैं, ‘‘हम विदेशी मीडिया की बात कर रहे हैं. आप श्मशान घाट की तस्वीरें दिखा रहे हैं. शव की तस्वीरें दिखा रहे हैं. कोरोना का असर तो हर जगह था. क्या अमेरिका और पश्चिमी देशों में स्थिति खराब नहीं हुई. उसी पश्चिमी मीडिया ने वहां की ऐसी तस्वीरें क्यों नहीं दिखाईं? वहां के शव क्यों नहीं दिखाए? वो इंडिया की ही क्यों दिखते हैं? दूसरी बात पत्रकारिता के कुछ नैतिकता है, उसमें कुछ चीजे नहीं दिखानी चाहिएं. जैसे, बहुत खून खराबा या इस तरह की चीजें नहीं दिखानी चाहिएं. अगर वो स्तर पश्चिमी मीडिया अपने यहां पालन करता है तो दूसरे देशों के लिए ऐसा ही करना चाहिए.’’

सर्वे जारी होने से पहले वेबिनार

इस सर्वे को जारी करने से पहले आईआईएमसी में 6 जुलाई को ‘पश्चिमी मीडिया द्वारा भारत में कोविड-19 महामारी की कवरेज’ विषय पर विमर्श का आयोजन किया गया.

दो सत्र में हुए इस कार्यक्रम के पहले हिस्से में वक्ता के रूप में आलोक मेहता, उमेश उपाध्याय, एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश, एनके सिंह, सीएनएन न्यूज 18 के कार्यकारी संपादक आनंद नरसिम्हन, केए बद्रीनाथ और पटकथा लेखक अद्वैता काला ने अपना पक्ष रखा.

दूसरे सत्र में जवाहरलाल कौल, अमर उजाला (डिजिटल) के संपादक जयदीप कर्णिक, दैनिक पूर्वोदय (गुवाहाटी) के संपादक रविशंकर रवि, लेखिका शेफाली वैद्य, आलमी सहारा (उर्दू) के संपादक लईक रिजवी, न्यूज 18 उर्दू के वरिष्ठ संपादक तहसीन मुनव्वर और विवेक अग्रवाल शामिल हुए.

इस वेबिनार में आईआईएमसी के छात्रों को शामिल नहीं किया और ना ही यह वीडियो देखने के लिए उपलब्ध है. हालांकि कार्यक्रम के बाद आईआईएमसी ने प्रेस रिलीज जारी की.

प्रेस रिलीज में दी गई जानकारी के मुताबिक कार्यक्रम में एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश ने कहा, ‘‘कोविड की कवरेज के दौरान विदेशी मीडिया ने पत्रकारिता के मानदंडों का पालन नहीं किया. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने अपने एजेंडे के अनुसार भारत में मौजूदा कोरोना संकट को कवर किया है.’’

हैरानी की बात है कि पत्रकारिता के मानदंडों की बात स्मिता प्रकाश ने की. प्रकाश के संस्थान एनएनआई ने पहली लहर के दौरान नोएडा के सेक्टर पांच में कोरोना के चपेट में आए लोगों का संबंध तब्लीगी जमात से बताया था. एनएनआई ने गौतम बुद्ध नगर के डीसीपी संकल्प शर्मा के हवाले से लिखा, ‘‘नोएडा के सेक्टर 5 हरौला में तब्लीगी जमात के सदस्यों के संपर्क में आने वाले लोगों को क्वारंटाइन किया गया.’’

एएनआई के ट्वीट करने के बाद स्मिता प्रकाश ने रीट्वीट किया और लिखा ‘Be safe Noida’. यह वो समय था जब मीडिया तब्लीगी जमात के लोगों के लेकर बेसिर-पैर की खबरें कर रहा था. थोड़ी देर बाद ही नोएडा डीसीपी दफ्तर ने एएनआई के ट्वीट के जवाब में ट्वीट करके बताया, “जो लोग पॉजिटिव लोगों के संपर्क में आए हैं उन्हें क्वारंटाइन किया गया है. इनका तब्लीगी जमात से संबंध नहीं है. आप भ्रम पैदा करके फेक न्यूज़ फैला रहे हैं.’’

कार्यक्रम के दूसरे दौर में केए बद्रीनाथ ने कहा, ‘‘उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और यूरोप के कई देशों में कोरोना की कहर थी. विदेशी मीडिया ने इन देशों में मरते लोगों की तस्वीर प्रकाशित नहीं की, लेकिन भारत के संदर्भ में ऐसा करने से उन्हें कोई परहेज नहीं है.’’ बद्रीनाथ आरएसएस की पत्रिका पाञ्चजन्य में पश्चिमी मीडिया के दोहरे मानदंड शीर्षक से मार्च में लेख लिखा था.

प्रोफेसर प्रमोद कुमार इस कार्यक्रम को लेकर कहते हैं, ‘‘विवेक अग्रवाल और एनके सिंह उनकी ओपिनियन बाकी के वक्ताओं से अलग थी. तो क्या हमने उन्हें कुछ कहा. आप उनसे पूछिए.’’

इस कायर्कम में आईआईएमसी के डीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंह ने, संजय द्विवेदी और प्रमोद कुमार की तरह ही विदेशी मीडिया पर निशाना साधा उन्होंने कहा, ‘‘सत्य एक है और लोग उसे अलग-अलग तरह से बोलते हैं, लेकिन पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के कारण विदेशी मीडिया खबरों को अपने हिसाब से प्रस्तुत करता है. उन्होंने कहा कि पूरब और पश्चिम के चिंतन में बहुत अंतर है. आपदा के समय धैर्य और गंभीरता का परिचय हर संस्थान की जिम्मेदारी है.’’

ऐसे में एक सवाल उठता है कि जब सर्वे करा रहे संस्थान के प्रमुख और उनके दूसरे सहयोगी पहले से ही विदेशी मीडिया के प्रति एक नजरिया रखते हैं तो उनका सर्वे उससे कैसे प्रभावित नहीं होगा?

सर्वे पर क्या कहते हैं जानकार

यह सर्वे कुल 529 लोगों पर किया गया. क्या इतनी कम संख्या पर सर्वे कर इस नतीजे पर पहुंचना की विदेशी मीडिया ने एजेंडे के तहत कवरेज किया, कितना जायज है?

इस सवाल के जवाब में मंडी में मीडिया किताब के लेखक और मीडिया शिक्षक विनीत कुमार कहते हैं, ‘‘आईआईएमसी देश का सबसे प्रतिष्ठित और विश्वसनीय संस्थान रहा है. पूरी दुनिया में यहां से शिक्षित लोग और संस्थाओं के साथ इनका अकादमिक संबंध रहा है. इस तरह के सर्वे, इतने कम सैम्पल साइज़ के साथ नतीजे के साथ बात करने से संस्थान की छवि बहुत संकुचित होगी. मुझे नहीं पता कि ऐसा करके संस्थान शोध और अकादमिक क्षेत्र में क्या ट्रेंड सेट करना चाहता है, लेकिन मीडिया शोध के लिहाज से ये बहुत ही संकुचित दायरे में चीज़ों को रखकर किया गया प्रयास जान पड़ता है.’’

विनीत कुमार आगे कहते हैं, ‘‘चूंकि उस सर्वे में मीडियाकर्मियों को भी शामिल किया गया है, ऐसे में सर्वे में ये बात प्रमुखता से शामिल होनी चाहिए कि उन्होंने अपनी तरफ से भारत और पत्रकारिता की मजबूत छवि बनाने के लिए क्या प्रयास किए? किस तरह की ख़बरों का प्रसारण किया जिनसे कि पत्रकारिता और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुईं?’’

बाहर की मीडिया या कोई सांसद भारत की या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करता है तो यहां के नेता और मीडिया का एक बड़ा तबका उसे प्रमुखता से प्रकाशित करता है. इसी साल जनवरी महीने में योगी सरकार ने कोरोना में किए अपने कामों को लेकर टाइम मैगज़ीन में विज्ञापन दिया था. इस विज्ञापन को खबर बताकर बीजेपी के नेताओं, ज़ी न्यूज़ और न्यूज़ 18 जैसे संस्थानों ने सीएम योगी की तारीफ में पुल बांधे थे.

बीते दिनों ऑस्ट्रेलिया के एक सांसद ने दूर बैठे उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की कोरोना प्रबंधन की तारीफ कर दी. उसके बाद ज़्यादातर भारतीय मीडिया ने उसपर खबर की. ‘आज तक’ ने लिखा, कोविड मैनेजमेंट पर यूपी की तारीफ, आस्ट्रेलियाई सांसद बोले- 'योगी आदित्यनाथ को हमें दे दीजिए'. दूसरे संस्थानों ने भी कुछ ऐसा ही लिखा.

इन तमाम परिस्थियों के देखकर लगता है कि भारत के लिए विदेशी मीडिया या विदेशी लोगों का बयान ‘मीठा मीठा गप गप, कड़वा कड़वा थू थू’ है.

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