क्या भारत के कोविड डेटा पर विश्वास किया जा सकता है? देखिए यह आंकड़े

टेस्टिंग से लेकर पॉजिटिविटी की दर तक, राज्यों की प्रतिक्रियाओं से कई सबक सीखे जा सकते हैं. हम इसी को स्पष्ट कर रहे हैं.

क्या भारत के कोविड डेटा पर विश्वास किया जा सकता है? देखिए यह आंकड़े
Anish Daolagupu
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टेस्टिंग और पॉजिटिविटी की दर पर राज्यों का डेटा

इस समझ को लेकर, आइए अलग-अलग राज्यों के दैनिक टेस्ट और दैनिक पॉजिटिविटी के झुकावों को उनकी महामारी के प्रति तैयारी और प्रतिक्रिया को आंकने के लिए देखें. दूसरी लहर के आने से पहले भी, हर राज्य के टेस्टिंग का विस्तार इस बात का सूचक है कि राज्य का प्राधिकारी व प्रशासनिक वर्ग महामारी को लेकर कितना सजग था.

इसके दूसरी तरफ, किसी राज्य के द्वारा एक बार पॉजिटिव मामले बढ़ने शुरू होने के बाद तेजी से टेस्टिंग की दर को बढ़ाना, दूसरी लहर के प्रति उसकी तेजी से प्रतिक्रिया करने की क्षमता व संवेदनशीलता का सूचक है. पॉजिटिविटी की दर और टेस्टिंग के बीच की कड़ी को, समय के साथ इन प्रवृत्तियों पर ध्यान देकर समझा जा सकता है.

स्वाभाविक रूप से एक आदर्श प्रतिक्रिया वह है जहां दूसरी लहर के शुरू होने से पहले ही टेस्टिंग का स्तर अधिक था और बढ़ते हुए मामलों के सापेक्ष टेस्टिंग की दर भी बढ़ गई. जैसा कि हम देखेंगे, वे राज्य जहां पर जनवरी और फरवरी में अपेक्षाकृत ज्यादा टेस्टिंग हो रही थी और जिसकी वजह से वहां चौकसी का स्तर भी बढ़ा हुआ था, मामले बढ़ना शुरू होने पर वे सभी सबसे तेजी से प्रतिक्रिया करने वाले नहीं थे.

हम अगले दो भागो में अलग-अलग राज्यों को देखेंगे. इस विश्लेषण को हमने पांच-पांच राज्यों के तीन समूहों में बांटा है.

नीचे दिए गए चित्र क्रमांक 6 और 7, सबसे अधिक टेस्टिंग की दर रखने वाले पांच राज्यों, दिल्ली, केरल, उत्तराखंड, तेलंगाना और कर्नाटक के रोजाना कोविड के मामले और पॉजिटिविटी की दर दिखाते हैं. कृपया ध्यान रखें के सभी दैनिक डेटा ग्राफ, 7 दिन के बदलते हुए औसत हैं, जिनका उपयोग यहां दिन पर दिन होने वाली अस्थिरता को सरल बनाने के लिए किया गया है.

चित्र क्रमांक 6 और 7 को देखते हुए हम इन कुछ महत्वपूर्ण चीजों को समझ सकते हैं.

  1. दूसरी लहर की शुरुआत होने से पहले ही दिल्ली की रोजाना टेस्टिंग का आधारभूत स्तर बहुत अधिक था, जो पॉजिटिविटी की दर के बढ़ने पर थोड़ा सा और बढ़ा.

  2. तेलंगाना के अलावा, बाकी चारों राज्यों में पॉजिटिविटी की दर बहुत तेजी से बढ़ी और बहुत ऊंचे स्तर तक गई. इस चार्ट में तेलंगाना की पॉजिटिविटी की दर का शिखर बाकी राज्यों के मुकाबले काफी कम है. यह राष्ट्रीय आंकड़ों के मुकाबले भी कम है, जो हम सभी राज्यों की पॉजिटिविटी की दर के शिखर की तुलना करते हुए लेख में आगे देखेंगे.

  3. केरल और कर्नाटक ही केवल ऐसे राज्य हैं जहां पॉजिटिविटी की दर बढ़ना शुरू होते ही दैनिक टेस्टिंग भी बढ़ी. इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि कम से कम टेस्टिंग को बढ़ाने के मापदंड पर इन दोनों राज्यों ने दूसरी लहर में अच्छी प्रतिक्रिया दी. यह आश्चर्य का विषय नहीं है क्योंकि इन दोनों राज्यों में स्वास्थ्य व्यवस्था देश के दूसरे भागों की तुलना में कहीं बेहतर है.

जैसा कि हमने पहले ज़िक्र किया, दिल्ली में पॉजिटिविटी में बड़ा उछाल आने पर भी टेस्टिंग थोड़ी ही बढ़ी. दिल्ली में मामलों की संख्या बढ़ने पर टेस्टिंग उस अनुपात में न बढ़ाने के लिए हमें दिल्ली की अधिक आलोचना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि देश के और भागों के मुकाबले वहां टेस्टिंग पहले से ही काफी ज्यादा थी.

  1. उत्तराखंड में 1 अप्रैल को रोजाना होने वाले टेस्टों की संख्या में बड़ा उछाल आया हालांकि पॉजिटिविटी में यह उछाल एक महीने से अधिक के बाद देखा गया. इसका कारण हरिद्वार में आयोजित हुआ कुंभ मेला हो सकता है जो 1 अप्रैल को शुरू हुआ था. आयोजन में शामिल होने के लिए निगेटिव आरटीपीसीआर टेस्ट आवश्यक था, जिससे टेस्टिंग में होने वाली बढ़ोतरी समझ आती है. यह बढ़े हुए टेस्ट असली थे या झूठे अब इस बात की जांच चल रही है. हाल ही में आई एक रिपोर्ट यह दावा करती है कि कुंभ मेले के दौरान रिपोर्ट किए गए करीब एक लाख टेस्ट जाली थे. कथित तौर पर, कुंभ मेले के दौरान कोविड टेस्ट के लिए जिम्मेदार एक प्राइवेट कंपनी ने अपने टेस्ट करने के रोज़ के कोटे को पूरा करने के लिए टेस्टों के झूठे नतीजे बनाए.

आइए अब सबसे कम टेस्टिंग की दर रखने वाले पांच राज्यों, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और झारखंड के रोजाना टेस्टिंग और पॉजिटिविटी की दर को देखते हैं.

चित्र क्रमांक 8 और 9 को देखकर इन महत्वपूर्ण बातें को समझा जा सकता है.

  1. इससे पहले वाले समूह के मुकाबले इन सभी पांचों राज्यों में दैनिक टेस्टिंग की दर बहुत कम थी, जिनमें से थोड़ा अव्यवस्थित प्रतीत होते हुए भी झारखंड सबसे बेहतर था.

  2. ध्यान देने वाली बात है कि पांचों राज्यों में टेस्टिंग का बढ़ना, बढ़ती हुए पॉजिटिविटी की दर से मेल खाता है. इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि हालांकि ये राज्य टेस्ट करने की मात्रा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे थे, लेकिन इन्होंने समय रहते टेस्टिंग को बढ़ा दिया.

आखिर में, इन दोनों मापदंडों पर पांच सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को देखते हैं जो पहले के दोनों ही समूहों में नहीं आए, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश.

चित्र क्रमांक 10 और 11 को देखकर इन कुछ मुख्य निष्कर्षों पर पहुंचा जा सकता है.

  1. गुजरात में टेस्टिंग की दर अधिक थी, जहां दैनिक टेस्टिंग दर की तुलना कर्नाटक से हो सकती थी. लेकिन टेस्टों की कुल संख्या पहले समूह में पांच सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों से कम थी. राज्य की पॉजिटिविटी की दर भी सबसे कम में से एक थी जहां पर पॉजिटिविटी की दर का शिखर 10 प्रतिशत से भी कम 9.71 था. इसके विपरीत पड़ोसी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पॉजिटिविटी की दर 25 प्रतिशत के पास पहुंच गई थी. यह कुछ आशंकाएं खड़ी करता है. गुजरात में कोविड संबंधित डेटा में हेर-फेर की कई घटनाओं को लेकर कई अखबारों ने खबरें प्रकाशित कीं. हालांकि उन कई रिपोर्टों का मुख्य उद्देश्य कोविड-19 से होने वाली मौतों को कम आंकना था, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है की संक्रमण के मामलों की संख्या से भी छेड़खानी हुई.

उदाहरण के लिए, 5 जून को अहमदाबाद के एक बड़े अस्पताल के सीईओ के कथन का हवाला दिया गया, "सभी आंकड़े, दैनिक मामलों की संख्या से लेकर दैनिक टेस्ट, अस्पताल में भर्ती होने के मामलों से मृत्यु तक, सभी असली संख्या से कम थे. इससे हमारा काम और कठिन हो गया क्योंकि आंकड़ों को जबरदस्ती कम रखा गया, लेकिन सच्चाई यह है कि शहर में कहीं भी बिस्तर उपलब्ध नहीं थे."

2. महाराष्ट्र का पॉजिटिविटी की दर का चार्ट विलक्षण है. बाकी सभी राज्य (जिनमें पिछले दोनों समूहों के राज्य में शामिल हैं) अपनी पॉजिटिविटी में मार्च के अंत और अप्रैल के शुरुआत में तेज बढ़ोतरी दिखाते हैं. इसके विपरीत महाराष्ट्र फरवरी के मध्य से शुरुआत कर एक सतत बढ़ोतरी दिखाता है, जो मार्च के अंत में अपने अधिकतम स्तर पर पहुंच जाती है. वहां से बाकी राज्यों की तरह पॉजिटिविटी में तेज बढ़ोतरी दिखाने के बजाय, महाराष्ट्र में यह आंकड़ा करीब 6 हफ्ते के लिए स्थिर रहा और मई महीने के मध्य में गिरना शुरू हो गया.

3. उत्तर प्रदेश इस बात में विलक्षण है कि अप्रैल के अंत में, पॉजिटिविटी की दर अपने शिखर पर पहुंचने के बाद कितनी तेजी से नीचे आई. इतना ही नहीं अर्थशास्त्री ओमकार गोस्वामी के द्वारा लिखे गए इस लेख में, उत्तर प्रदेश की उच्चतम पॉजिटिविटी की दर की महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों की दर से तुलना, उत्तर प्रदेश के अधिकारियों द्वारा डेटा में गड़बड़ी की तरफ इशारा करने के लिए की गई है.

हमारे विश्लेषण के दौरान सभी राज्यों की उच्चतम पॉजिटिविटी की दरों की तुलना में, उत्तर प्रदेश की शीर्ष दर 16 प्रतिशत, कई बड़े राज्यों जैसे महाराष्ट्र (24 प्रतिशत), राजस्थान (25 प्रतिशत), कर्नाटक (35 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (30 प्रतिशत) से कम है, लेकिन कम पॉजिटिविटी की दर रखने वाले भी कई राज्य हैं जैसे बिहार (15 प्रतिशत), गुजरात (10 प्रतिशत) और पंजाब (14 प्रतिशत). इसीलिए, केवल पॉजिटिविटी की उच्चतम दर के आधार पर उत्तर प्रदेश को अकेले संदिग्ध अपवाद की श्रेणी में रखना डेटा से सिद्ध नहीं होता. यह संभव है कि काफी कम पॉजिटिविटी की दर रखने वाले सभी राज्य, डेटा में गड़बड़ी कर रहे हों.

इसके अलावा पॉजिटिविटी के शिखर से दर का बहुत तेजी से कम होना (चित्र क्रमांक 11 में नीला वक्र) विलक्षण है, और उत्तर प्रदेश में डेटा से संभावित छेड़खानी का शायद ज्यादा बड़ा सूचक है. राज्य में पॉजिटिविटी की दरों में विलक्षण गिरावट देश में कहीं और नहीं देखी गई. उत्तर प्रदेश में टेस्टिंग के नतीजों का डेटा एक सामान्य जांच पर खरा नहीं उतरता.

उच्चतम पॉजिटिविटी

एक मापदंड जिसे हमने ऊपर दिए ग्राफों को समझते हुए कई बार देखा है, उसकी देशभर में राज्यों के अनुसार तुलना मूल्यवान है. पॉजिटिविटी की उच्चतम दर नीचे दिए हुए चित्र में एक करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले सभी राज्यों में पॉजिटिविटी की उच्चतम दर और वह जिस तारीख को अपने शिखर पर पहुंची, दिखाई गई है.

उपरोक्त चार्ट से मिलने वाले कुछ बिंदु.

  1. देश के उत्तरी राज्यों में पॉजिटिविटी की दर अपने उच्चतम स्तर पर दक्षिण के राज्यों से पहले पहुंची, जहां तेलंगाना के अलावा सभी दक्षिणी राज्य 15 मई से 30 मई के बीच के दो हफ्ते के अंतराल में उच्चतम दर पर पहुंचे.

  2. ऐसे बहुत से राज्य हैं जिन्होंने पॉजिटिविटी की दर 25 प्रतिशत से अधिक दर्ज कराई, जिनमें से कर्नाटका की दर सबसे अधिक थी. जैसा कि पहले उल्लेखित किया गया, गुजरात में पॉजिटिविटी की उच्चतम दर सबसे कम 9.71 प्रतिशत दर्ज की गई, जोकि इस विश्लेषण में शामिल राज्यों के औसत पॉजिटिविटी रेट 21.39 प्रतिशत की तुलना में काफी कम है. आसपास के राज्यों जैसे महाराष्ट्र और राजस्थान में उच्चतम दर का आंकड़ा कहीं ज्यादा देखते हुए यह आंकड़ा भी शायद कुछ शंका पैदा करे, लेकिन गुजरात में दैनिक टेस्टिंग एक राज्यों से कहीं ज्यादा थी जो पॉजिटिविटी की दर को एक हद तक कम कर सकती है, जैसा कि हमने लेख में पहले बताया.

गुजरात की तरह ही तेलंगाना की पॉजिटिविटी दर भी औसत दर के मुकाबले काफी कम 10.42 प्रतिशत थी, जो डेटा के सही होने पर सवाल खड़ा करती है. अन्य लोगों ने भी राज्य के कुछ जिलों से रिपोर्ट करे गए डेटा को देखते हुए इसी प्रकार के सवाल उठाएं हैं. उदाहरण के तौर पर, ट्रेन में स्थानीय डेटा सूत्रों से मिले आंकड़ों को अधिकारिक कोविड के मामलों की संख्या से तुलना करके, द न्यूज़ मिनट इस निष्कर्ष पर पहुंचा, "तेलंगाना सरकार 'आधिकारिक' तौर पर कोविड-19 के मामलों की संख्या को कुछ नहीं तो 70 प्रतिशत से ज्यादा कम करके रिपोर्ट कर रही है.

  1. यह चार्ट पहले बताए गए एक बिंदु को फिर से दिखाता है, कि भले ही उत्तर प्रदेश में पॉजिटिविटी की उच्चतम दर दूसरे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य में जैसे महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से कम हो, लेकिन यह आंकड़ा अपवाद नहीं है. क्योंकि कई दूसरे राज्य, जैसे बिहार, पंजाब और गुजरात का आंकड़ा भी इसी प्रकार कम है.

निष्कर्ष

आखिरकार इस लेख में किए गए इतने विश्लेषण का अर्थ क्या है?

उद्देश्य अलग-अलग राज्यों को श्रेणियां देना या एक दूसरों के खिलाफ खड़े करना नहीं है. लेकिन यह जानना आवश्यक है कि अलग-अलग राज्यों ने कोविड की दूसरी लहर के प्रति टेस्टिंग और संक्रमण के संदर्भ में प्रतिक्रिया कैसे दी. इस प्रकार के विश्लेषण उन कमियों को पहचानने में मदद कर सकते हैं जिस में सुधार की आवश्यकता है, और यह राज्यों के बीच आपस में उपयोगी विचारों के आदान-प्रदान का अवसर देते हैं. विश्लेषण कई बार डेटा से संभावित छेड़खानी का उजागर होना, एक गौण बात होते हुए भी अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि संदेहास्पद आंकड़ों पर सवाल उठाना डेटा से बेधड़क छेड़खानी को हतोत्साहित कर सकता है.

ऐसी परिस्थिति में, जब हम कई और महीनों तक सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर सकने के लिए पर्याप्त लोगों को वैक्सीनेट नहीं कर पाएंगे और जब तीसरी लहर का खतरा भी सर पर मंडरा रहा है, टेस्टिंग सरकार के लिए महामारी के प्रतिरोध का एक बड़ा हिस्सा बनी रहेगी. सरकारें चाहें वह राज्य की हों या केंद्र की उनके लिए अब तक इकट्ठे किए गए डेटा में मौजूद सबक सीख लेना ही बेहतर होगा. लेकिन ऐसा हो पाए, इसके लिए, किसी को जो डेटा एकत्रित हो रहा है उसकी अच्छे से छान-बीन करनी होगी.

यह एक ऐसा ही प्रयास है.

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यह रिपोर्ट एनएल सेना सीरीज का हिस्सा है जिसमें हमारे कई पाठकों ने योगदान दिया है. इसे निर्विक डे, अनुपम दास, सूरज कौल, सोमोक गुप्ता रॉय, आदित्य देउस्कर, सुमीत एम मोघे, अभिषेक कुमार, स्वर्ण सरकार, कार्तिकेय मुचिंथया, केवी राधाकृष्णन, राजकुमार जिंदल, राजदीप अधिकारी और एनएल सेना के अन्य सदस्यों की मदद से संभव हो पाया है.

हमारी अगली एनएल सेना सीरीज, अरावली की लूट में योगदान दें, और समाचारों को स्वतंत्र रखने में मदद करें.

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