उत्तराखंड के चमोली में आई आपदा हिमस्खलन का नतीजा थी, शोध से हुआ खुलासा

जलवायु परिवर्तन और इंसानी हस्तक्षेप के चलते न केवल इस तरह की आपदाओं में इजाफा होगा साथ ही यह और रौद्र रूप धारण कर सकती हैं.

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हाल ही में ग्लेशियर पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि पिछले दो दशकों के दौरान ग्लेशियरों में जमा बर्फ रिकॉर्ड तेजी से पिघल रही है. ऐसा तापमान में हो रही वृद्धि का परिणाम है. उत्तराखंड के उच्च हिमालय में स्थित पर्वतों में आजकल दोपहर को तापमान सामान्य से पांच डिग्री ज्यादा हो रहा है. वहीं बेहद कम हिमपात होने से हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं.

वैज्ञानिकों की मानें तो हिमालय में सर्दियों के दौरान एवलांच आमतौर पर नहीं होता है. हिमालय क्षेत्र में एवलांच अक्सर गर्मियों में टूटते हैं. ग्लेशियर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पिछले 20 सालों में इस बार हिमालय सबसे ज्यादा गर्म है. जो तापमान मई या जून में होता है, वो इस बार जनवरी और फरवरी की दोपहर में हो रहा है, जिस कारण आगे भी ऐसी आपदायें हो सकती हैं.

भले ही वैज्ञानिकों ने इसके लिए हिमस्खलन को जिम्मेवार माना है, पर देखा जाए तो यह हमारी ही गलतियों का नतीजा है, जिन्हें हम बार-बार दोहरा रहे हैं।. हिमालय विश्व की सबसे नवीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो आज भी अस्थिर है. वहां भूगर्भिक बदलाव होते रहते हैं जिस वजह से भूकंप, क्षरण और भूस्खलन का खतरा सदैव बना रहता है.

बिना व्यापक अध्ययन किए जिस तरह से वहां एक के बाद एक बांध और जलविद्युत परियोजनाएं बनाई जा रही हैं उसने इस क्षेत्र को और अस्थिर कर दिया है. ऊपर से जलवायु में आ रहे बदलावों ने आग में घी डालने का काम किया है जिस वजह से हर दिन के साथ इन आपदाओं का खतरा बढ़ता जा रहा है.

इससे पहले 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ ने भी हिमालय में बन रही जलविधुत परियोजनाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया था, जिसमें 4,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. अब चमोली में आई इस बाढ़ ने इसपर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में बिना व्यापक अध्ययन के इन बड़ी परियोजनाओं का निर्माण कितना सही है.

इस मामले में जानी-मानी पर्यावरणविद और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने भी लिखा है कि, “यह भविष्य में होने वाली किसी भयावह दुर्घटना की चेतावनी हो सकती है.

यह साफ है कि जब तक हम पर्यावरण के प्रति अपने व्यवहार को नहीं बदलते, तब तक इस तरह की घटनाओं की संख्या में कमी नहीं आएगी, बल्कि इजाफा ही होगा. लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये दुर्घटनाएं तभी रुकेंगी, जब हम इन परियोजनाओं पर पूरे ध्यान से विचार करें और इनके प्रभावों की भी सतत समीक्षा हो."

यदि हम अब भी नहीं चेते तो ऐसा न हो कि भविष्य में हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़े. ऐसे में इससे पहले प्रकृति अपना बदला ले हमें अपने व्यवहार को बदलना होगा. हमें समझना होगा कि भले ही हमने विकास की कितनी भी सीढ़ियां चढ़ ली हों पर अभी भी हम प्रकृति के आगे बौने ही हैं.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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