चीन में तीसरी संतान की अनुमति के मायने

चीन में तीसरी संतान की अनुमति के साथ परिवार की सहायता और बेहतरी के उपायों की घोषणा भी हुई है.

चीन में तीसरी संतान की अनुमति के मायने
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चीनी आबादी की समृद्धि का संज्ञान लेना भी आवश्यक है. साल 2010 के स्तर से आज व्यय करने योग्य प्रति व्यक्ति आय दुगुनी से भी अधिक (4961 डॉलर) हो चुकी है. यह मध्य आय देशों के औसत से अधिक है. ऐसे में जानकार यह संभावना जता रहे हैं कि आगामी दशक में वृद्धि दर कुछ अधिक हो सकती है. लेकिन दीर्घावधि में चुनौतियां भी हैं. विभिन्न क्षेत्रों में ख़र्च बढ़ने के साथ अमेरिका से प्रतिस्पर्धा का आयाम भी महत्वपूर्ण है. अनेक कारणों (मुख्यत: आप्रवासन) से अमेरिका को आगामी दशकों में जनसांख्यिकी लाभांश का बड़ा लाभ हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2050 में अमेरिका के पास 2019 की तुलना में पांच करोड़ लोग अधिक होंगे. यह वृद्धि 15 प्रतिशत होगी, जबकि चीन में 3.20 करोड़ यानी 2.2 प्रतिशत लोग कम हो जाएंगे. इन्हीं आधारों पर चीन के केंद्रीय बैंक ने परिवार नियोजन नीति बदलने की सलाह दी थी. उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि चीन ने जनसांख्यिकी लाभांश से अमेरिका के अंतर को बहुत कम किया था और अब उसे आगे के तीन दशक के लिए सोचना है.

जनसंख्या और विकास के मामले में अक्सर भारत की तुलना चीन से की जाती है. लेकिन यह विडंबना ही है कि हम जनसंख्या रोकने और जनसांख्यिकीय लाभांश की बात एक ही सांस में कर जाते हैं. हमारे देश में 2018 से 2030 के दशक के मध्य तक जनसांख्यिकी लाभांश की स्थिति रहेगी और 2050 के दशक में यह बदल जायेगी. उसके बाद आश्रित आबादी (बच्चे और वृद्ध) कामकाजी आबादी से अधिक हो जाएगी.

संयुक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार, 2019 में भारत की औसत आयु 28.4 है. यह एक बहुत आदर्श स्थिति हो सकती है, पर इसका फ़ायदा उठाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल और भागीदारी की भावना का विकास ज़रूरी है. और, दुर्भाग्य से हमारे यहां इन मामलों में भयावह पिछड़ापन है और आगामी दशकों में इसमें सुधार की कोई उम्मीद नहीं है. अच्छी बात यह भी है कि प्रजनन दर (2015-2020) भी 2.24 प्रतिशत है, जो 2.1 प्रतिशत रहनी चाहिए यानी जनसंख्या नियंत्रण के हमारे प्रयास कारगर सिद्ध हो रहे हैं. हालांकि उत्तर और पूर्व में यह अधिक है और दक्षिण में कम, पर उसे ठीक किया जा सकता है. ऐसे में जनसंख्या रोकने के लिए क़ानून बनाने की मूढ़ता का कोई अर्थ नहीं है.

औद्योगिक और तकनीकी रूप से हम चीन से बहुत पीछे हैं. इस दूरी को पाटने के लिए हमें स्वस्थ, शिक्षित और कौशलयुक्त आबादी तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए. सस्ते श्रम की वजह से हम कुछ उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं और अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं, लेकिन अगर श्रम शक्ति की गुणवत्ता नहीं बढ़ी, तो विकास की दौड़ बहुत आगे नहीं जा सकेगी और हमारा घरेलू बाज़ार क्रय शक्ति के कमी से टूट जाएगा. इंफ़्रास्ट्रक्चर के मामले में भी हम बहुत पीछे हैं. ग़रीबी दूर करने और सामाजिक विभेद मिटाने पर भी ध्यान देना होगा. इन मामलों में हम चीन से बहुत कुछ सीख सकते हैं.

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