फिल्म लॉन्ड्री: 'कर्णन' प्रतिष्ठा और समान अधिकार का युद्ध

वीरा सेल्वाराज लिखित-निर्देशित ‘कर्णन’ तमिलनाडु में लगभग 25 साल पहले हुई एक सामाजिक घटना के आधार पर फिल्म की पटकथा तैयार की है.

फिल्म लॉन्ड्री: 'कर्णन' प्रतिष्ठा और समान अधिकार का युद्ध
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वीरा सेल्वाराज ने तमिलनाडु में लगभग 25 साल पहले हुई एक सामाजिक घटना के आधार पर फिल्म की पटकथा तैयार की है. कहते हैं कि निम्न जाति के गांव के एक विद्यार्थी और बस कंडक्टर के बीच हुए झगड़े से प्रशासन बौखला गया था. तब 600 पुलिसकर्मियों ने 6 घंटे तक गांव में उत्पात और मारपीट की थी. इस घटना ने तमिलनाडु की राजनीति को आलोड़ित कर दिया था. 25 सालों के बाद आज की फिल्म में वीरा सेल्वाराज बताना चाहते हैं कि यह अतीत और इतिहास की बात नहीं है. समाज में आज भी उच्च जातियों और निम्न जातियों का भेद बना हुआ है. दमन और शोषण का कुचक्र जारी है. निम्न जाति की चेतना, जागृति, मांग और लड़ाई से उच्च जातियों की प्रतिनिधि सत्ता कानून-व्यवस्था के प्रपंच से उनके उठे सिर को झुकाना और कुचलना चाहती है.

कर्ण, दुर्योधन, द्रौपदी आदि महाभारत के चरित्रों के नाम निम्न जाति के नागरिकों ने अपना लिए हैं. फिल्म का नायक कर्ण है. कृष्ण (पुलिस अधिकारी) सत्ता के प्रतीक हैं. महाभारत में अर्जुन ने तैरती मछली की आंख में तीर भेदकर द्रौपदी को जीता था. ‘कर्णन’ फिल्म का नायक कर्णन गांव के रिवाज के मुताबिक हवा में उछली मछली को तलवार के एक ही वार से दो टुकड़े कर गांव की द्रौपदी का दिल जीत लेता है. लेखक और निर्देशक वीरा सेल्वाराज महाभारत के चरित्रों का नया रूपक भिन्न दृष्टिकोण से रचते हैं, जिसमें कर्णन नायक है और कृष्ण खलनायक. वह अपने दलित समाज का नेतृत्व करता है और बलशाली सत्ता से टकराता है. यह नायक आम भारतीय फिल्मों के नायक की तरह अकेला ही नहीं निकलता. वह पूरे समाज को सावधान करता है. उन्हें अपने साथ लेकर चलता है. उसकी लड़ाई और जीत सामूहिक, वास्तविक और विश्वसनीय लगती है.

वीरा सेल्वाराज न सिर्फ गांव के विभिन्न स्वभाव के चरित्रों को जोड़ने और एकजुट करने... उन्हें उन्मत्त, उद्वेलित, जागृत और संगठित होने का क्रमिक बदलाव दिखाते हैं, बल्कि गांव के जीव-जंतुओं का भी सार्थक और प्रतीकात्मक इस्तेमाल करते हैं. शुरू में गधे के अगले दोनों पांव का बंधा होना.... पूरे गांव की घुटन और जकड़न का प्रतीक है. बंधन खुलने के बाद चौकड़ी भरते हुए गधे का खुले मैदान में भागना आज़ादी का सुंदर एहसास है. शुरू में घोड़ा केवल चलता है, उस पर कोई सवार नहीं होता. आखिरी दृश्य के पहले वह अपने सवार कर्णन को लेकर सरपट भागता है. थाने में फड़फड़ाती तितली और विवश बुजुर्ग ग्रामीणों की बेचारगी में साम्यता है. सूर्य, प्रकृति, मशाल, लाल रोशनी आदि का सायास-अनायास उपयोग लेखक-निर्देशक के अभिप्राय को व्यक्त करने के साथ दर्शक की समझ और व्याख्याओं के लिए भी कुछ छोड़ देता है.

फिल्म में नायक कर्णन की भूमिका में लोकप्रिय स्टार धनुष के आ जाने से उद्देश्यपूर्ण सामाजिक बदलाव की इस फिल्म को दर्शकों को बड़ी दुनिया मिल गयी है. वीरा सेल्वाराज के दर्शकों का विस्तार हुआ है. अपनी पिछली फिल्म से आगे बढ़कर उन्होंने लोकप्रिय सिनेमाई भाषा, युक्ति और शैली को अपनाया है. उन्होंने लोकप्रिय फिल्मों में प्रचलित और स्थापित नायक के शिल्प को अपनी जरूरतों के हिसाब से ढाला है. फिल्म में धनुष कर्णन की भूमिका में उसे आत्मसात करते हुए ढलते हैं, लेकिन वह नायक की अपनी इमेज को भी बरकरार रखते हैं. यह फिल्म का कमजोर पक्ष है. तमिल सिनेमा के अन्य पॉपुलर कलाकार लाल, योगी बाबू, रजिशा विजय, नटराज सुब्रमण्यम आदि की सशक्त मौजूदगी ने सभी चरित्रों को जीवंत कर दिया है. भारतीय सिनेमा की यह दलित कथा उल्लेखनीय है.

फिल्म का गीत-संगीत विषय के अनुरूप और सुसंगत है. उद्बोधन जीत के भाव हैं...

पापा-मम्मी हारना नहीं

बेटे-बेटियों डरना नहीं

दादा-दादी हार ना मानना

खाकी यूनिफॉर्म में आए हैं राक्षस

बैल पर सवार

नजर आ रहे सभी साथियों को मार रहे हैं

हमारे सपनों को राख करने आए हैं

उनके हुजूम को रोको

हमें शहर और दुनिया में जाना है

हमारे पंख कहां गए

उन्हें लौटाने को कहो...

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