मुख्यधारा का मीडिया जो नैरेटिव सेट करना चाह रहा है उसमें वह पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा

‘विफल स्टेट’ और ‘स्टेट की विफलता’- दोनों दो बातें हैं. उसी तरह, जैसे विफल सिस्टम और सिस्टम की विफलता अलग-अलग बातें हैं.

मुख्यधारा का मीडिया जो नैरेटिव सेट करना चाह रहा है उसमें वह पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा
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किसी परिचर्चा में एक विशेषज्ञ बता रहे थे कि देश के चिकित्सा तंत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी 74 प्रतिशत हो गयी है जबकि सरकारी तंत्र की भागीदारी उसी अनुपात में सिकुड़ती गयी है. जान-बूझ कर डॉक्टरों और सहयोगी स्टाफ की नियुक्तियों को वर्षों से हतोत्साहित किया गया. उनके हजारों पद खाली पड़े हैं. यह स्टेट की विफलता नहीं, शीर्ष पर बैठे लोगों की विफलता है.

स्टेट सिर्फ नेताओं से नहीं चलता. अधिकारी, कर्मचारी, डॉक्टर, पारा मेडिकल स्टाफ, शिक्षक, पुलिस के जवान आदि भी स्टेट के ही अंग हैं. उनकी बड़ी संख्या अपने प्राणों को हथेली पर लेकर इस महामारी से लोगों को बचाने के लिए जूझ रही है. इस आपदा में अगर कुछ भी सकारात्मक हो रहा है तो इसमें बड़ी भूमिका ऐसे ही लोगों की है. शीर्ष पर बैठे लोगों की अक्षमता तो उजागर हो चुकी.

विशेषज्ञ कह रहे कि ऑक्सीजन की उपलब्धता के अनुपात में उसका वितरण तंत्र अक्षम साबित हुआ. मतलब यह हुआ कि ऑक्सीजन रहते भी हजारों लोग सिर्फ इसलिए उसके बिना मर गए क्योंकि उन्हें यह ससमय उपलब्ध नहीं हुआ.

पीतल पर सोने का पानी चढ़ा देने से उसकी चमक भ्रम तो पैदा करती है, लेकिन जब कसौटी पर उसे कसा जाता है तो सारी कृत्रिमता सामने आ जाती है. मीडिया ने, कॉरपोरेट की शक्तियों ने, राजनीतिक वर्ग ने, पीतल के बर्तनों पर सोने की रंगत डाल कर उसकी ब्रांडिंग की. ब्रांडिंग के इस दौर में कुछ भी बेच लेना आसान है, तो पीतल भी सोने के भाव बिक गया. आज जब वक्त और हालात कसौटी बन कर सामने आ गए तो क्या ‘सुशासन’, क्या ‘अच्छे दिन’, सबकी असल रंगत सामने आ गयी.

जो कॉरपोरेट के हाथों विवश हैं, अपनी अक्षमताओं के कारण विफल हैं, ऐसे सत्ताधारियों की कलई उतर चुकी है. जो जांच एजेंसियों के डर से प्रतिरोध की आवाजें बुलन्द करने में और विसंगतियों को सामने लाने में अक्षम हैं, ऐसे विपक्ष की कलई उतर चुकी है. न हमें सत्ता बचा पा रही है, न कुछ अपवादों को छोड़ कर विपक्ष हमारे हितों की आवाज उठा पा रहा है. वे सब अपनी विफलताओं के कीचड़ से सने हैं. जो जरूरत से भी अधिक बोलते थे, बोलते ही रहते थे, उनकी बोलती बंद है.

हमें बचाने की अथक कोशिशों में वैज्ञानिक लगे हैं, सिस्टम की तमाम विपन्नताओं से जूझते डॉक्टर और सहयोगी कर्मी लगे हैं, अधिकारी और पुलिस के जवान लगे हैं. हमें बचाने के लिए अदालतें आवाज उठा रही हैं, अखबारों और चैनलों के रिपोर्टर्स दौड़-भाग करते हमें सच का अक्स दिखा रहे हैं. ये तमाम लोग भी स्टेट के अंग हैं. ये विफल नहीं हैं. बावजूद इनके जूझने के, मौत के आंकड़ों की भयावहता के पीछे सबसे बड़ी विफलता स्टेट के शीर्ष पर बैठे लोगों की है.

स्टेट की विफलताओं का रोना सत्ताधारियों के चेहरों को बचाने का शातिर उपक्रम है. ऐसे चेहरों को बचाने की कोशिश है जो सिस्टम को मनुष्य-विरोधी बनाने में अपनी राजनीतिक ऊर्जा का इस्तेमाल करते रहे.

आप स्टेट के तंत्र को मनुष्य विरोधी बनाने की राह पर धकेलते जाएं और जब मनुष्य मरने लगे तो स्टेट को ही विफल घोषित कर दें? यह नहीं चल सकता. विफलताओं के जिम्मेदार सिद्धांतों की और सिद्धांतकारों की जिम्मेदारियां तय करनी होंगी.

(साभार- जनपथ)

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