पश्चिम बंगाल: एक बार फिर गलत हुए एग्जिट पोल्स

सवाल यह होना चाहिए कि ममता बनर्जी ने जो चोट बीजेपी को दी है उससे वह कैसे उबरेंगे.

पश्चिम बंगाल: एक बार फिर गलत हुए एग्जिट पोल्स
Kartik
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एक्सिस माय इंडिया

एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल को लेकर सबसे सफल एजेंसी की बात की जाए तो वह है एक्सिस माय इंडिया. इंडिया टूडे के साथ मिलकर पोल करने वाली प्रदीप गुप्ता की एजेंसी का सही अनुमान लगाने का ट्रैक रिकार्ड 91 प्रतिशत रहा है. लेकिन बंगाल में वो भी गच्चा खा गए. अव्वल तो इस एजेंसी ने बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी बताया था और उसे सबसे ज्यादा सीट दी थी.

एक्सिस माय इंडिया और इंडिया टूडे के मुताबिक बीजेपी 134-160 सीट और टीएमसी को 130-156 सीट मिलने का अनुमान लगाया था. इंडिया टूडे पर चुनाव परिणामों पर बात करने के दौरान इंडिया टूडे के एडिटोरियल डायरेक्टर राहुल कंवल ने प्रदीप गुप्ता से तीखा सवाल करते हुए कहा, “हमें यह मानना चाहिए कि हम पूरी तरह से बंगाल की जनता का नब्ज भांपने में असफल रहे. इसलिए हमें कहना चाहिए की हम पूरी तरह से गलत साबित हुए हैं.” इस पर प्रदीप ने कहा, “मैं आप से सहमत हूं कि हम टीएमसी की लहर को भांप नहीं पाए. लेकिन हमने असम, पुडुचेरी, केरल में सही अनुमान दिया है.”

इस पर एक बार फिर से राहुल कहते हैं, ना सिर्फ बंगाल बल्कि हम तमिलनाडु में भी गलत साबित हुए है. वहां हमने डीएमके लिए लैंडस्लाइड जीत का दावा किया था (175-195) लेकिन वह भी गलत रहा. इस पर राजदीप हस्तक्षेप करते हुए कहा, “मेरे सहयोगी राहुल थोड़ा गुस्सा हो रहे हैं लेकिन प्रदीप आप कोई गुनहगार नहीं है, आप ने पहले सही परिणाम भी दिए हैं.”

एग्जिट पोल्स पर विश्वास करें या नहीं

वैसे ओपिनियन और एग्जिट पोल को लेकर हमेशा से ही संदेह रहा है. इनके सही होने के प्रतिशत पर कोई पूर्वनुमान नहीं लगा सकता. एग्जिट पोल्स कई बार सही रहे हैं लेकिन कुछ समय यह गलत साबित हुए है. पेंगुइन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय और दोरॉब सोपारिवाला की किताब ‘द वर्डिक्ट’ में ओपिनियन और एग्जिट पोल्स को लेकर एक चैप्टर दिया गया है. इसमें बताया गया हैं कि 2019 तक देश के चुनावी इतिहास में हुए सभी एग्जिट पोल्स को मिला दिया जाए तो कुल 393 में से 323 ने सही अनुमान दिया था.

यानी की करीब 82 प्रतिशत सही अनुमान लगाया गया है. दैनिक भास्कर से बात करते हुए सीएसडीएस के संजय सिंह कहते हैं, “एजेंसियों की विश्वसनीयता के निष्पक्ष मूल्यांकन और एक्यूरेसी रेटिंग के आधार पर जवाबदेही तय होनी चाहिए.”

एग्जिट पोल्स के इतिहास में भारत में सबसे गलत अनुमान 2004 में दिया गया था. जहां एग्जिट और ओपिनियन पोल दोनों ही गलत साबित हुए थे. 2004 के लोकसभा चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के आगे यूपीए को सब कमजोर आंक रहे थे लेकिन उस चुनाव में दोनों ही पोल गलत साबित हुए थे. उन चुनावों में 61 ओपिनियन और 38 एग्जिट पोल में से कोई भी सही साबित नहीं हुआ.

कुछ ऐसा ही हाल बिहार के 2015 चुनावों में भी देखने को मिला था जहां सभी एग्जिट पोल गलत साबित हुए. वैसा ही कुछ दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी हुआ था. अब एक बार फिर से बंगाल के चुनावों में एग्जिट पोल्स गलत साबित हुए है.

सीपीआर के फेलो और भारतीय राजनीति में विशेष रूचि रखने वाले राहुल वर्मा कहते है, “यह बता पाना की पोलस्टर कैसे सही होते हैं और क्यों गलत यह बहुत मुश्किल है. इसका कारण है कि पोलस्टर अपने पोलिंग मैथड का डेटा पब्लिक में नहीं देते है, जिसका पॉलिटिकल साइंटिस्ट विश्लेषण कर सके, इसलिए हम यह भी नहीं कह सकते हैं कि जब वह सही होते हैं तो क्यों होते हैं.”

राहुल आगे बताते हैं, “भारत में ज्यादातर पोलिंग एजेंसी डायरेक्शन (यानी की दिशा) का सही अनुमान लगा लेते हैं जैसे की किस पार्टी की सरकार बन सकती है. लेकिन उसकी सटीकता कि वह कितना सीट पाएगी, उसमें वह गलत हो जाते है. बंगाल के मामले में एजेंसियां पार्टी भी नहीं बता पाई.”

एग्जिट पोल गलत होने का तीन मुख्य बिंदु बताते हुए राहुल कहते हैं, “पहला जो पोलिंग एजेंसी के कर्मचारी हैं वह प्रशिक्षित नहीं हैं, या सही से सवाल नहीं पूछ पाते. दूसरा, पोलिंग का जो सैंपल साइज है वह प्रदेश के भूगोल और राजनीति को ध्यान में रखकर नहीं किया गया हो और तीसरा, जनता कई बार डर के कारण सही बात पोलिंग एजेंसी को नहीं बताती.”

अंत में राहुल कहते हैं, “और भी कई कारण हो सकते है पोल्स गलत होने के लेकिन यह कारण हम तभी जान पाएंगे जब हमारे पास इन पोल्स के आंकड़े हों. अगर पोलिंग एजेंसियां अपने पोलिंग मैथड को पब्लिक कर देंगी तो यह सभी के लिए समझने में सहायक होगा.”

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