कोविड, लाचारी की मौत और बुलडोज़र

देश भर में कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण के दौरान अव्यवस्था और साधनों के चरमराने की आजकल हर रोज़ ऐसी कहानियां सुनने मिल रही हैं जो ना सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करने वाली होती हैं बल्कि हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर भी सवालिया निशान खड़ा करती हैं.

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कोविड, लाचारी की मौत और बुलडोज़र
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प्रदीप की मौसेरी बहन प्रतिभा कल्याणम जो कि प्रदीप के साथ लगातार फोन पर उस दिन बनी हुयी थीं कहती हैं, "गांधी अस्पताल हैदराबाद का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है जब वहां भी भर्ती करने से मना कर दिया तो प्रदीप का हौसला टूट गया था. वह लाचार हो चुका था जब कही भी इलाज नहीं हुआ तो उसने तय किया कि वो मां को घर ले जाएगा और खुद उनका इलाज करेग. वो जो पैसे लेकर आया था वो सब एंबुलेंस में खर्च हो गए थे, वापस लौटने के लिए भी जेब में पैसे नहीं थे."

वह कहती हैं, "4-5 किमी के फासले के लिए एंबुलेंस वाले ढाई से लेकर 4-5 हज़ार रूपये ले रहे थे. घर से लेकर गांधी अस्पताल तक उसके लगभग 14-15 हज़ार रूपये सिर्फ एंबुलेंस में खर्च हो गए थे. जब मां को वापस घर जाने के लिए उसने एंबुलेंस बुलाई तो एंबुलेंस वाला 20 हजार रुपए मांग रहा था. बड़ी मिन्नतें करने के बाद जैसे तैसे 13 हज़ार में वो एंबुलेंस ड्राइवर उन्हें घर ले जाने को तैयार हुआ, लेकिन लौटते वक़्त मेरी मौसी की एंबुलेंस में ही मौत हो गयी थी. घर पहुंचने पर प्रदीप के पास 13 हज़ार भी नहीं थे एंबुलेंस वाले को देने के लिए सिर्फ नौ हज़ार रुपए ही दे पाया.

गौरतलब है कि प्रदीप और उनकी मां गांव में एक किराने की दुकान चलाते थे जो पिछले एक हफ्ते से बंद थी. प्रदीप के पिता बालकृष्ण की सात महीने पहले दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गयी थी, वह उसके पिछले दो साल से लकवे से ग्रसित थे.

प्रतिभा बताती हैं, "वो जिस भी अस्पताल में गया वहां उसने अपनी मां के इलाज के लिए बहुत मिन्नतें की, जब अस्पताल वाले उसे मना कर देते थे तो वह लाचारी से रोने लगता था. मैं उसे लगातार समझा रही थी, लेकिन उसकी मां कि बिगड़ती हालत और उनके इलाज में किसी भी तरह कि कोई मदद ना मिलने से वो हताश हो गया था. गांधी अस्पताल से घर लौटते वक़्त अचानक से वो फिर से रोने लगा और कहने लगा था कि मां ने सांस लेना बंद कर दिया है.

जब प्रदीप अपनी मां को गांव लेकर पहुंचे तो गांव का सरपंच और अन्य लोग उनसे कहने लगे कि वो क्यों अपनी मां की लाश को घर लेकर आएं हैं. प्रदीप कहते हैं, "सब कह रहे थे कि कोविड के मरीज की लाश को क्यों लेकर आये हो गांव में, मुझे बहुत बुरा लग रहा था. मेरी मां की मौत हो गयी थी और सब उनके पार्थिव शरीर को भी हिकारत से देख रहे थे. बाद में गांव के सरपंच ने जेसीबी मशीन बुलवाई जिसमें मेरी मां की लाश को रखकर गांव से दूर ले जाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया."

वह आगे कहते हैं," मुझे बहुत भरोसा था डॉक्टरों और अस्पतालों पर इसलिए मैं अपनी मां को बेहिचक इलाज के लिए वहां ले गया था. लेकिन मुझे इन लोगों पर अब बिलकुल भी भरोसा नहीं है. मेरी मां की ज़िन्दगी बच सकती थी, इतने बुरे हाल में देखने के बावजूद भी उन पर किसी को दया नहीं आयी. मैं अब अकेला रह गया हूं घर पर, पता नहीं मां के बिना मैं कैसे जी पाउंगा. इस मौत की ज़िम्मेदारी सरकारी अव्यवस्था की है. पता नहीं देश भर में ऐसे कितने लोग इस अव्यवस्था के चलते मौत के घाट उतारे जा रहे हैं."

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