वालायार की बेटियों की मां न्याय ढूंढने निकली हैं, उनके निशाने पर सबसे पहले पिनराई विजयन हैं

वी भाग्यवती की नाबालिक बेटियों का बलात्कार और हत्या 2017 में हुई. वह यह चुनाव सीपीआईएम सरकार को एक संदेश देने के लिए लड़ रही हैं.

वालायार की बेटियों की मां न्याय ढूंढने निकली हैं, उनके निशाने पर सबसे पहले पिनराई विजयन हैं
Shambhavi Thakur
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सीपीआईएम और विजयन के खिलाफ गुस्सा

भाग्यवती यह दावा करती हैं कि उनकी बेटियों की मौतों के एक आरोपी सीपीएम के कार्यकर्ता हैं, जिसका सीपीआईएम ने खंडन किया है. वह इसलिए भी गुस्सा हैं क्योंकि अक्टूबर 2019 में जब विजयन उनसे मिलने आए और उन्हें न्याय का आश्वासन दिया, तो उन्होंने इस बात पर 'ऐसे ही भरोसा' कर लिया.

वे कहती हैं, "मुझे सोजन की तरक्की होने तक सरकार पर पूर्ण विश्वास था." वे एमजे सोजन की बात कर रही हैं जो पुलिस में डीएसपी रह चुके थे और इस मामले में जांच अधिकारी थे. जून 2020 में सोजन को क्राइम ब्रांच का एसपी बनाया गया. कई मीडिया रिपोर्टों में यह कहा गया था कि, उन्होंने दोनों नाबालिग लड़कियों के शारीरिक शोषण का "मज़ा" लिया.

भाग्यवती अपने मुंडे हुए सर की तरफ इशारा करती हैं. उनका कहना है, "जब मैंने अपना सर मुंडवाया, उस दिन मैंने प्रतिज्ञा की थी जब तक पुलिस की टोपी सोजन के सर पर है, मैं बाल नहीं बढ़ाऊंगी. यह उसी (विजयन) की सरकार है जिसने मुझे 4 साल से सड़क पर रहने और प्रदर्शन करने को मजबूर किया है."

भाग्यवती ने अपनी इस बात की पुष्टि के लिए यह भी बताया कि 2017 में, जब इस मामले की सुनवाई निचली अदालत में चल रही थी, तब एक वकील जो आरोपी प्रदीप कुमार के लिए अदालत में पेश हो रहे थे उन्हें राज्य सरकार ने प्रदेश की बाल कल्याण समिति का चेयरमैन बना दिया.

उपरोक्त अधिवक्ता, एन राजेश ने बाद में मामला दूसरे वकील को दे दिया. राजेश की नियुक्ति की सब तरफ आलोचना हुई. जिसमें विजयन सरकार की मंत्री केके शैलजा भी शामिल थीं और राजेश को अक्टूबर 2019 में अपने पद से हटा दिया गया.

भाग्यवती कहती हैं कि इन सब चीजों के मेल ने ही उन्हें विजयन सरकार में विश्वास खोने को मजबूर कर दिया. एक समय की सीपीआईएम समर्थक ने आज दृढ़ रहने का निश्चय कर लिया है.

लेकिन भाग्यवती इस वर्ष की योजना में चुनाव लड़ना नहीं था.

26 जनवरी को उन्होंने सोजन की तरक्की का विरोध करते हुए 1 महीने का सत्याग्रह शुरू किया. 26 फरवरी को उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपना सर मुंडवाया, और वामपंथी सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की जिसमें केरल के 140 विधानसभा क्षेत्रों में जाना भी शामिल था.

मार्च के शुरुआती दिनों में अपनी यात्रा के प्रारंभ में वह कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ धर्मदाम पहुंचीं. यहां पर उन्होंनेे कस्बे की सभी मांओं को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सबसे यह अपील की कि वह मुख्यमंत्री विजयन से पूछें कि उन्होंने वालायार की बेटियों को न्याय दिलाया कि नहीं.

भाग्यवती बताती हैं, "जब मांओं ने मेरी चिट्ठी पढ़ी, तो उन्हें सवाल पूछने के बजाय उन्होंने मुझसे ही कहा कि मुझे खुद चुनाव लड़कर उनसे सवाल पूछना चाहिए."

और भाग्यवती ने यही किया.

'हम दलित ही मर रहे हैं'

भाग्यवती का एकलौता जीवित बच्चा, उनका 12 साल का बेटा मां से अभियान के दौरान साथ ही चिपका रहता है. वे कहती हैं, "मुझे उसे अपनी आंखों से दूर भेजते हुए डर लगता है."

भाग्यवती और उनका बेटा

भाग्यवती और उनका बेटा

Credits: Aditya Varier

अपनी बहनों की मृत्यु के समय भाग्यवती का बेटा 8 साल का था. भाग्यवती के अनुसार उसकी हत्या के दो प्रयास हो चुके हैं. पहला प्रयास 2017 में उनकी छोटी बेटी की मृत्यु के कुछ ही दिन बाद किया गया. उस समय उनका बेटा पलक्कड़ में अपने स्कूल के हॉस्टल में घर पर मचे "बवंडर" से बचने के लिए रह रहा था. वह दावा करती हैं कि उस समय उनके बेटे पर एक आदमी ने हमला किया जो आरोपी एम मधु से मिलता जुलता दिखता था. भाग्यवती कहती हैं कि इस तथाकथित हमलावर ने एक बार और उनके बेटे पर हमला करने की कोशिश की.

वे बताती हैं, "अब हमने उसे हॉस्टल से निकाल लिया है. वह अब उसके लिए सुरक्षित नहीं रहा. मैं अपने दो बच्चों को खो चुकी हूं, और अब उसे भी नहीं खो सकती. लेकिन मुझे थोड़ी गिलानी भी महसूस होती है क्योंकि इस सब ने उसकी जीवन और पढ़ाई में बहुत खलल डाल दिया है.

इसके बावजूद वह यह लड़ाई खत्म करने के लिए मन बना चुकी हैं. वे कहती हैं, "अगर जरूरत पड़ी तो हम अपनी ज़मीन, अपना घर, अपनी सब संपत्ति बेच देंगे, लेकिन हमें न्याय चाहिए,"

भागवती कहती हैं कि वह चुनाव इसलिए भी लड़ रही हैं कि "वह दुनिया को दिखा सकें कि एक दलित महिला राजनीति में आ सकती है."

उनका कहना है, "हम दलित ही मर रहे हैं", वह यह भी बताती हैं कि उनके परिवार को अस्पृश्यता नहीं झेलनी पड़ती, लेकिन उन्हें गहरे भेदभाव को झेलना पड़ता है. "हमारे बच्चों का बलात्कार हो रहा है. हमारे ही समाज के लड़के हैं जो राजनीतिक हिंसा में मारे जाते हैं. लेकिन आमतौर पर ऊंची जातियों के आदमी ही बड़े राजनेता बनते हैं. क्यों?"

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