गांधी की दांडी यात्रा का लाइव कवरेज नहीं हुआ लेकिन मोदी की इस यात्रा को 24 घंटे चैनलों ने दिखाया

आने वाले 75 सप्ताहों तक ऐसा ही कुछ-कुछ होता रहेगा ताकि आज़ादी की हीरक यानी डायमंड जुबली मनाते समय आज़ादी के मूल आंदोलन में न सही, लेकिन उसके नाट्य रूपान्तरण में संघ की अत्यंत सक्रिय भूमिका का उल्लेख किया जा सके.

गांधी की दांडी यात्रा का लाइव कवरेज नहीं हुआ लेकिन मोदी की इस यात्रा को 24 घंटे चैनलों ने दिखाया
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गोदी मीडिया से सन्यास ले चुकीं लेकिन ‘हल्‍ला बोल’ की पुरानी स्मृतियों में जी रहीं एक ऐंकरा ने इस यात्रा के बारे में अपनी आत्मकथा में कुछ इस इस तरह लिखा-

जब मैं अहमदाबाद, साबरमती आश्रम पहुंची तो देखा कि वहां तिल रखने भर जगह नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि पूरे हिंदुस्तान की सुरक्षा व्यवस्था आज के कार्यक्रम में झोंक दी गयी हो. इसी दृश्य से अपना दिन बना दिया. मैंने तत्काल अपनी ओबी बैन को उस स्थल के एरियल शॉट लेने को बोला. हमारा कार्यक्रम लाइव जा रहा था. जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी इस ऐतिहासिक यात्रा का आगाज करने मंच पर पहुंचे तो देखा कि उनकी कलाई पर अक्सर बंधी रहने वाली घड़ी के बांधने का स्टाइल बदला हुआ था. मैंने अपने कैमरामैन को ज़ूम शॉट लेने को बोला ताकि इस बदले हुए स्टाइल को आज तक के दर्शकों को दिखला सकें. आज मोदी जी की कलाई घड़ी और उनके कलफ लगे लेकिन बेहद सौम्य तरीके से पहने गए आधी बांह के कुर्ते का जो प्रभाव जनता पर पड़ रहा था, मुझे अफसोस रह गया कि उसे ठीक से कवर न कर सकी. खैर, जब यात्रा शुरू हुई तो भारत माता की जय और जय श्री राम के उद्घोष के साथ मोदी-मोदी के गगनभेदी नारों ने इस यात्रा का महत्व बता दिया. हालांकि मैंने इतिहास नहीं पढ़ा लेकिन जितना गांधी की ऐसी ही एक यात्रा के बारे में सुनते रहे, मैं दावे से कह सकती हूं कि गांधी के कार्यक्रम में उन्हें जनता का ऐसा समर्थन न मिला होगा. इससे एक बात खुद मेरे लिए पुख्ता हुई कि कोई घटना ऐतिहासिक तब बनती है जब नेता डैशिंग होना चाहिए.

एक अन्‍य चैनल में इन्‍हीं की गोदीकालीन रहीं खातून ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए- जब उन्‍होंने बेसाख्‍ता पूछ लिया था कि आप ये सब करते कैसे हैं और मोदीजी निश्‍छल हंसी हंस दिए थे- एक साक्षात्कार में कहा, ‘’बेशक गांधी के बारे में लोगों ने पढ़ा होगा लेकिन मोदी जी को लोगों ने देखा है और यही इस पीढ़ी की सबसे बड़ी दौलत है कि मोदी जी के आज़ादी के कार्यक्रमों ने इस कदर लोगों के मन पर राज किया है.‘’

इतने महान पत्रकारों, विचारकों और इतिहासकारों का लिखा पढ़ने के बाद जब बच्चों की परीक्षा में दांडी मार्च पर सवाल आया तो उन्‍होंने जो उत्तर लिखा होगा, उसका सार नीचे प्रस्तुत है-

देश में एक जमात है जो नरेंद्र मोदी जी द्वारा किए गए आज़ादी के आंदोलन की तुलना किसी दौर में हुए गांधी के दांडी मार्च से भी करती है, लेकिन उस यात्रा के चूंकि बहुत से सबूत नहीं हैं बल्कि किंवदंतियों पर आधारित हैं इसलिए उन ब्यौरों को इतिहास में ज़रूरी प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतारने के कारण निर्विवाद रूप से मोदी जी के दांडी मार्च को ही देश के लिए महत्वपूर्ण माना गया है. यह भी उल्लेखनीय है कि जिस दौर में कोई गांधी इस यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे तब देश की परिस्थितियां इस तरह की यात्राओं के अनुकूल थीं. मुगलों और उनके वंशजों के कारण देश इस कदर आहत न हुआ था. वो अंग्रेजों के पीछे छिपे हुए थे मतलब मूल दुश्मन अंग्रेज़ ही मान लिए गए थे और यही गांधी के अनुकूल था क्योंकि अंग्रेजों को हिन्दी या गुजराती भाषा नहीं आती थी. इसलिए गांधी बहुत चालाकी से (बक़ौल अमित शाह वो एक चतुर बनिया थे) से अंग्रेजों से गुजराती या हिन्दी में कुछ बोलकर निकल जाते थे और वो उन्हें जाने भी देते थे, लेकिन मोदी जी के लिए विधि ने कुछ और ही लिखा था. इन बदली हुई परिस्थितियों में विपक्ष लगातार मोदी जी पर हमलावर रहा. उन्हें मार देने, उनके पीछे पड़े रहने, उन्हें काम न करने देने (स्रोत: नरेंद्र मोदी के भाषणों का संकलन, भाग 739) की परिस्थितियां पैदा करता रहा और चूंकि विपक्ष यहीं का था इसलिए वो हिन्दी, गुजराती जैसी भाषाएं भी जानता था और मोदी जी को कोई छूट नहीं मिल पाती थी. फिर भी ऐसी विकट परिस्थितियों में मोदी जी ने न केवल दांडी यात्रा की बल्कि 15 अगस्त 2022 तक लगातार कुछ न कुछ करते रहे और जोखिम उठाते रहे.

मोदीजी की दांडी यात्रा के दौरान तत्‍कालीन भाजपा आइटी सेल प्रमुख का भविष्य में एक ट्वीट- इतिहास के पुनर्लेखन के इस महती उद्यम में मोदी जी की सूझ-बूझ और उनका नेतृत्व कौशल हमारे लिए प्रेरणादायी है. तमाम विश्‍वविद्यालयों के माध्यम से इस पुनर्लेखन को ही वास्तविक इतिहास बनाकर ठेलना है ताकि देश में गांधी का नामलेवा कोई न बचे.

तो ये रहा एक मुख्‍तसर सा जायजा हाल ही में सम्पन्न हुए दांडी मार्च का और उसके दूरगामी असरात का. जाहिर है, अभी तक ऐसा लिखा नहीं गया लेकिन आज के शिक्षक, विचारक, इतिहासकार और पत्रकार कल को लिखेंगे तो इससे क्या अलग लिखेंगे. हालांकि उन्हें इससे क्लू मिल सकता है इसलिए अगर यह मजमून उनके किसी काम आता है तो वे धन्यवाद भी कह सकते हैं.

(साभार- जनपथ)

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