सिंघु बॉर्डर से गाजीपुर बॉर्डर के बीच बदली किसान आंदोलन की मीडिया नीति

100 दिनो में मीडिया के धुर विरोध से मीडिया फ्रेंडली राकेश टिकैत तक का किसान आंदोलन का सफर, इसकी असहजताएं, अंदरूनी टकराव और असलियत.

सिंघु बॉर्डर से गाजीपुर बॉर्डर के बीच बदली किसान आंदोलन की मीडिया नीति
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कांग्रेस से मिले हुए हैं राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह चढूनी

भारतीय किसान यूनियन (भानू) ने 26 जनवरी को लाल किले पर हुई घटना के बाद से आंदोलन खत्म कर दिया है. वह कृषि कानूनों के विरोध में चिल्ला बॉर्डर पर बैठे थे.

इस संगठन के अध्यक्ष ठाकुर भानू प्रताप सिंह कहते हैं, "अब आंदोलन वह लोग चला रहे हैं जिन्होंने कांग्रेस से पैसा लिया है. यह सभी लोग राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं. राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी इसके अलावा जितने भी लोग किसान नेताओं से बात करते थे वह सभी लोग कांग्रेस से मिले हुए हैं."

गुरनाम सिंह चढूनी

गुरनाम सिंह चढूनी

वह कहते हैं, "राकेश टिकैत की संपत्तियों की जांच होनी चाहिए. पिछले 30 सालों में इन्होंने अपनी संपत्ति बहुत ज्यादा बढ़ा ली है. इन्होंने हर आंदोलन में पैसा लिया है. टिकैतजी पर संगठनों को बेचने का गुरुमंत्र है, कि कैसे संगठनों को बेचा जाता है और कैसे धन कमाया जाता है. यह इनसे अच्छा कोई नहीं जानता है."

"यह आंदोलन अब राजनीतिक दलों का रह गया है. इसमें किसान नहीं हैं. जैसे लोकदल और कांग्रेस का. लोकदल पहले कहीं नहीं थी लेकिन अब आंदोलन के बहाने वह सक्रिय हो गई है. ऐसा ही हाल कांग्रेस का है. अब तो भाजपा को हराने और कांग्रेस को जिताने के लिए यह आंदोलन चल रहा है," उन्होंने कहा.

वहीं इस पूरे मामले पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत कहते हैं, "क्या मीडिया को यह अधिकार है कि वह किसी के बारे में कुछ भी कहे. जी न्यूज़, रिपब्लिक भारत आज क्या कर रहे हैं यह सब जानते हैं. जो सच्चाई दिखा रहे हैं हम उन्हें कुछ नहीं कह रहे हैं. लेकिन जो किसानों का भद्दा मजाक बना रहे हैं, टुकड़े टुकड़े गैंग कह रहे हैं तो यह क्या है. अगर ये हमारी अच्छी बात नहीं दिखाते हैं तो कोई बात नहीं है लेकिन हमारे बारे में बुरा भी तो न कहें. जी हिंदुस्तान चैनल वाला बहुत गलत दिखाता है. अगर उसे सही नहीं दिखाना है तो कोई बात नहीं है लेकिन वह किसानों की बेइज्जती तो न करे."

हम सरकार, मीडिया और पुलिस सबसे दुश्मनी नहीं कर सकते

राकेश टिकैत चैनलों पर इंटरव्यू देते हैं मीडिया फ्रेंडली हो गए हैं? इस सवाल पर वह कहते हैं, "हम किसी के घर नहीं जा रहे हैं कि हमें बुलाओ, या हमारा इंटरव्यू लो. दूसरी बात हम किस-किस से बिगाड़ें, सरकार से, मीडिया से या पुलिस से. किस-किस से अपनी बात खराब करें. भाजपा ने गलत जगह पर पंगा ले लिया है. इनकी हालत खराब हो जाएगी. हम चुप नहीं बैठने वाले हैं. ये अन्नदाता की तौहीन कर रहे हैं."

जब हम मीडिया का सम्मान कर रहे हैं तो मीडिया को भी तो हमारा सम्मान करना चाहिए. जी हिंदुस्तान चैनल 24 घंटे में 22 घंटे किसानों के विरोध में बोलता है. चैनल के एक एंकर का नाम लेते हुए कहते हैं, "वह हमें टक्कर देने की कोशिश कर रहा है. इस सरकार को अपना ज्यादा हितैषी समझ रहा है. इन्हें अपनी जुबान पर काबू रखना चाहिए. किसानों के सामने तो उनकी बोलने की हिम्मत नहीं है."

20 लाख किसानों पर होंगे मुकदमें

आगे यूपी में चुनाव हैं क्या आप यहां भी बीजेपी का विरोध करेंगे? इस सवाल पर वह कहते हैं, "यह तो हमारा अधिकार है. हमारा किसी के साथ मनमुटव नहीं है हम लोगों को जोड़ने का काम कर रहे हैं. अभी गन्ने और गेहूं की खेती के चलते किसान थोड़े व्यस्त हैं. गेहूं कटते ही देखना यह आंदोलन और बढ़ेगा. अभी करीब एक सवा महीने की बात और है. फिर किसान फ्री हो जाएगा. इसे कोई कम आंकने की गलती न करें. बीजेपी के नेताओं की गांवों में एंट्री बंद हो गई है. इन्हें आज किसान अपने गांवों में घुसने भी नहीं दे रहे हैं. हरियाणा में सरकार गिरती गिरती बच गई. इन्हें हम सबक सिखाकर ही मानेंगे. ये हमें बदनाम करने के तरीके ढूंढ़ रहे हैं. लेकिन इन्हें सोचना चाहिए कि इन्हें भी जनता के बीच जाना है. बॉर्डर पर बैठे किसान अगर उठ गए तो करीब 20 लाख लोगों पर मुकदमें होंगे."

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से क्या आपसे मुसलमान किसान नाराज हैं? इस पर वह कहते हैं, "वह दंगे भी भाजपा ने ही करवाए थे. तब हमारा इन्होंने दिमाग फेर दिया था और हमें मुसलमान दुश्मन दिखने लगे थे. हमें भी लगता था कि मुसलमान बहुत बेकार है, खराब है. तब हमने बीजेपी का साथ दिया था और खुलकर साथ दिया था. हम तो सीधे-साधे किसान हैं लेकिन तब हम इनकी चाल में फंस गए. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा."

नरेश आगे कहते हैं, "अब हम बंगाल जा रहे हैं. ममता बनर्जी पर शिकंजा कसा जा रहा है. इसलिए हमारा फर्ज है कि हम वहां की जनता को बताएं कि दिल्ली में एक आंदोलन चल रहा है. और यह सरकार हमारे साथ क्या कर रही है. हमारे कितने किसान शहीद हो गए हैं लेकिन मोदी ने उनके बारे में दो शब्द नहीं कहे हैं. हमने इनकी सरकार बनाई है, हमने वोट दिए हैं लेकिन ये आज हमें ही आंखें दिखा रहे हैं. यह किसानों के मान सम्मान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. सरकार ये बिल वापस क्यों नहीं ले रही है. अगर इनकी कोई मजबूरी है तो इन्हें हमसे बतानी चाहिए. किसान बर्बाद हो रहे हैं हम क्या करें."

किसान आंदोलन के बदले स्वरूप के बारे में हमने किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी और दर्शनपाल से भी बात करने की कोशिश की. लेकिन दोनों ही व्यस्तता के चलते हमसे बात नहीं कर सके. हालांकि द क्विंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक किसान नेता दर्शनपाल ने राकेश टिकैत को मीडिया द्वारा ज्यादा तवज्जो दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा, "मीडिया राकेश टिकैत को ज्यादा तवज्जो देता है. मीडिया उनके रोल से ज्यादा उनको दिखा रहा है. उनके हर स्टेटमेंट ज्यादा दिखाया जाता है.”

यही शायद बदले हुए हालात की असल तस्वीर है.

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