दिल्ली दंगा: आरिफ को सभी मामलों में मिली जमानत लेकिन गरीबी बनी रोड़ा

दिल्ली दंगे के दौरान तीन लोगों की हत्या के मामले में पुलिस ने मोहम्मद आरिफ को आरोपी बनाया था. आरिफ पर खुद को हिन्दू बताकर अपने ही मामा समेत तीन लोगों की हत्या का आरोप लगा था. घटना के एक साल बाद उन्हें निजी मुचलके पर जमानत तो मिल गई है, लेकिन पैसे की कमी के कारण वे बाहर नहीं आ पा रहे हैं.

मोहम्मद आरिफ की मां परवीन बृजपुरी में अपने घर पर.
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कोर्ट में क्या हुआ?

आरिफ के घर वालों के पास वकील करने के भी पैसे नहीं थे. ऐसे में उन्होंने सरकारी वकील लेने का फैसला किया था. इसी बीच वकील अब्दुल गफ्फार खान ने मुफ्त में केस लड़ने की बात कही. परवीन, अब्दुल गफ्फार खान को इसके लिए कई बार दुआ देती हैं. वो कहती हैं, ‘‘हम सुन रहे थे कि दंगे के मामले में वकील ज़्यादा पैसे मांग रहे हैं. जब हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं थे. जेल में अपने बेटे को पांच सौ से ज़्यादा रुपए कभी नहीं दे पाए. ऐसे में वो किसी फ़रिश्ते की तरह आए और केस लड़ा. एक रुपया भी नहीं लिया.’’

न्यूजलॉन्ड्री ने अब्दुल गफ्फार खान से इस मामले में बात की. वे कहते हैं, ‘‘पुलिस ने घटना वाले दिन आरिफ के मोबाइल का लोकेशन दिया था. 25 फरवरी को सिर्फ 3 बजे से 3:44 के बीच उसका लोकेशन बदलता है बाकी समय लोकेशन उसके घर का ही है. जो लोकेशन बदला है वो गुरुनानक नगर का दिखा रहा है. जो आरिफ के घर से डेढ़ किलोमीटर दूरी पर ओल्ड मुस्तफाबाद में है. हत्या का समय अलग-अलग है. ऐसे में फोन लोकेशन सबूत नहीं रह जाता है.’’

एडवोकेट अब्दुल गफ्फार

गफ्फार खान आगे कहते हैं, ‘‘दूसरा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान की बात है तो एक प्रत्यक्षदर्शी ने आरिफ समेत सात और लोगों का नाम लिया है. पुलिस ने सिर्फ पांच को गिरफ्तार किया और बाकियों को क्यों नहीं इसको लेकर भी वे साफ-साफ कुछ नहीं कहते हैं.’’

ज़ाकिर खान की हत्या के मामले में गफ्फार खान ने कोर्ट में जिरह करते हुए कहा कि घटना 25 फरवरी को हुई. इस मामले में एफआईआर 21 मार्च को दर्ज की गई. लगभग एक महीने बाद. 16 अप्रैल को आरिफ को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. एफआईआर दर्ज होने में इतनी देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. आरिफ के पास से पुलिस ने कुछ रिकवर नहीं किया.

अपनी बहस में गफ्फार खान इस मामले के चश्मदीदों गवाह शशिकांत कश्यप, अशोक सोलंकी और सुरेंद्र शर्मा को ‘प्लांटेड चश्मदीद’ कहते हुए बताते हैं, ‘‘चमश्दीद गवाहों ने भी बस यह कहा है कि आरिफ दंगाई भीड़ का हिस्सा था. उन्होंने नहीं कहा कि आरिफ किसी धारदार हथियार के साथ उस दिन दिखा और उसने हमला करके हत्या की. कबुलानामे के सिवाए पुलिस के पास कोई सबूत नहीं जिससे यह पता चले कि आरिफ ने हमला करके किसी की हत्या की.’’

पुलिस कोर्ट में मोबाइल लोकेशन और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के अलावा कोई भी सबूत पेश नहीं कर पाई. पुलिस ने कोर्ट में यह तो ज़रूर बताया कि आरिफ के साथ-साथ गिरफ्तार बाकी आरोपी अजय कुमार, अशोक कुमार और शुभम के हाथों में पट्टा, डंडा, तलवार, कैंची लिए हुए थे. पुलिस बकायदा कहती है कि अजय के हाथ में तलवार थी, अशोक ने अपने हाथ में कैंची बंधा डंडा लिया था. शुभम के हाथ में डंडा था, लेकिन पुलिस ने ये नहीं बताया कि आरिफ के हाथ में क्या था.

महताब और अशफ़ाक़ के मामले में भी गफ्फार खान इसी तरह पक्ष रखते हैं और पुलिस भी अपना पक्ष रखती है. पुलिस कोई और मज़बूत सबूत पेश नहीं करती जिससे यह लगे कि आरिफ इस हत्या में शामिल था.

11 दिसंबर को जज विनोद यादव ने जाकिर हुसैन के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपियों में जिसकी संख्या ज़्यादा होगी उसी ने गैरक़ानूनी भीड़ जमा की. इस मामले में ऐसा करने वाले हिन्दू हैं. वहीं आवेदक (आरिफ) मुस्लिम धर्म से हैं. आवेदक के खिलाफ आरोप है कि वह इस गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था. यह ‘भ्रामक’ है कि एक मुस्लिम लड़का ऐसे गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा बन गया जिसमें हिंदू धर्म के लोग ज़्यादा थे

जज विनोद यादव ने अपने फैसले में ये भी कहा कि चमश्दीद गवाह अशोक सोलंकी, शशिकांत कश्यप और सुरेंद्र शर्मा ने आवेदक (आरिफ) की भूमिका के बारे में साफ-साफ नहीं बताया है. उनका स्टेटमेंट समान्य लगता है. आवेदक (आरिफ) किसी भी सीसीटीवी फुटेज में नजर नहीं आता है. जहां तक सीडीआर लोकेशन की बात है तो आवेदक घटना स्थल के पास ही रहता है ऐसे में लोकेशन उसके आसपास पाया जाना बहुत मायने नहीं रखता.’’

तमाम तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने 20 हजार के निजी मुचलके पर आरिफ को जमानत दे दी.

11 दिसंबर को जाकिर और अशफ़ाक़ की हत्या के मामले में जज विनोद यादव ने आरिफ को जमानत दे दी. यानी दो मामलों में आरिफ को जमानत एक ही दिन दी गई. तीसरा मामला महताब की हत्या का था जिसमें 22 फरवरी को आरिफ को जज विनोद कुमार यादव ने लगभग इन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर आरिफ को जमानत दी.

‘आरिफ घर कम जेल में ज़्यादा रहता है’

साल 2004 से अब तक आरिफ पर पुलिस 27 केस दर्ज कर चुकी है. ज़्यादातर मामले में उसे कोई सजा नहीं मिली. आरिफ के परिवार की माने तो पुलिस न जाने क्यों उसे परेशान करती रहती है. जब मन होता है उठा ले जाती है.

आरिफ की मां परवीन कहती हैं, ‘‘न जाने पुलिस वालों को मेरे बेटे से क्या परेशानी है. आसपास में कोई भी मामला होता है उसे उठाकर लेकर चले जाते हैं. बाद में वो सबूत नहीं होने पर रिहा हो जाता है लेकिन हम तो परेशान होते हैं. दंगा होने से छह महीने पहले ही 3 साल से ज़्यादा समय तक जेल में रहकर वापस लौटा था. फिर उठाकर लेकर चले गए. मैं जिस गली में रहती हूं यहां मुसलमानों का एक-दो ही घर है. ज़्यादातर हिन्दू हैं. आप किसी से भी पूछ सकते हैं कि दंगे वाले दिन आरिफ क्या कर रहा था. वो कुछ देर गली के गेट पर बैठकर सुरक्षा करता था और कुछ देर छत पर रहता था. वो बाहर गया ही नहीं लेकिन उसे फंसा दिया गया.’’

आरिफ की बहन फरहीन कहती हैं, ‘‘पुलिस ने मेरे भाई को बड़ा अपराधी समझ रखा है. जब वो 14 साल के थे तब से ही उनपर पुलिस एफआईआर दर्ज करती रहती है. वे बाहर कम जेल में ज़्यादा रहते हैं. तीन साल जेल में रहने के बाद छह महीने पहले ही बाहर आए थे कि दिल्ली दंगा हुआ और फिर वे जेल चले गए. अगर मेरे भाई अपराधी होते तो आज हम लोग ऐसे घर में रहते. आप देखिए टूटा हुआ है. जमानत कराने तक के पैसे नहीं हैं.’’

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न्यूजलॉन्ड्री ने अब्दुल गफ्फार खान से इस मामले में बात की. वे कहते हैं, ‘‘पुलिस ने घटना वाले दिन आरिफ के मोबाइल का लोकेशन दिया था. 25 फरवरी को सिर्फ 3 बजे से 3:44 के बीच उसका लोकेशन बदलता है बाकी समय लोकेशन उसके घर का ही है. जो लोकेशन बदला है वो गुरुनानक नगर का दिखा रहा है. जो आरिफ के घर से डेढ़ किलोमीटर दूरी पर ओल्ड मुस्तफाबाद में है. हत्या का समय अलग-अलग है. ऐसे में फोन लोकेशन सबूत नहीं रह जाता है.’’

एडवोकेट अब्दुल गफ्फार

गफ्फार खान आगे कहते हैं, ‘‘दूसरा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान की बात है तो एक प्रत्यक्षदर्शी ने आरिफ समेत सात और लोगों का नाम लिया है. पुलिस ने सिर्फ पांच को गिरफ्तार किया और बाकियों को क्यों नहीं इसको लेकर भी वे साफ-साफ कुछ नहीं कहते हैं.’’

ज़ाकिर खान की हत्या के मामले में गफ्फार खान ने कोर्ट में जिरह करते हुए कहा कि घटना 25 फरवरी को हुई. इस मामले में एफआईआर 21 मार्च को दर्ज की गई. लगभग एक महीने बाद. 16 अप्रैल को आरिफ को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. एफआईआर दर्ज होने में इतनी देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. आरिफ के पास से पुलिस ने कुछ रिकवर नहीं किया.

अपनी बहस में गफ्फार खान इस मामले के चश्मदीदों गवाह शशिकांत कश्यप, अशोक सोलंकी और सुरेंद्र शर्मा को ‘प्लांटेड चश्मदीद’ कहते हुए बताते हैं, ‘‘चमश्दीद गवाहों ने भी बस यह कहा है कि आरिफ दंगाई भीड़ का हिस्सा था. उन्होंने नहीं कहा कि आरिफ किसी धारदार हथियार के साथ उस दिन दिखा और उसने हमला करके हत्या की. कबुलानामे के सिवाए पुलिस के पास कोई सबूत नहीं जिससे यह पता चले कि आरिफ ने हमला करके किसी की हत्या की.’’

पुलिस कोर्ट में मोबाइल लोकेशन और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के अलावा कोई भी सबूत पेश नहीं कर पाई. पुलिस ने कोर्ट में यह तो ज़रूर बताया कि आरिफ के साथ-साथ गिरफ्तार बाकी आरोपी अजय कुमार, अशोक कुमार और शुभम के हाथों में पट्टा, डंडा, तलवार, कैंची लिए हुए थे. पुलिस बकायदा कहती है कि अजय के हाथ में तलवार थी, अशोक ने अपने हाथ में कैंची बंधा डंडा लिया था. शुभम के हाथ में डंडा था, लेकिन पुलिस ने ये नहीं बताया कि आरिफ के हाथ में क्या था.

महताब और अशफ़ाक़ के मामले में भी गफ्फार खान इसी तरह पक्ष रखते हैं और पुलिस भी अपना पक्ष रखती है. पुलिस कोई और मज़बूत सबूत पेश नहीं करती जिससे यह लगे कि आरिफ इस हत्या में शामिल था.

11 दिसंबर को जज विनोद यादव ने जाकिर हुसैन के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपियों में जिसकी संख्या ज़्यादा होगी उसी ने गैरक़ानूनी भीड़ जमा की. इस मामले में ऐसा करने वाले हिन्दू हैं. वहीं आवेदक (आरिफ) मुस्लिम धर्म से हैं. आवेदक के खिलाफ आरोप है कि वह इस गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था. यह ‘भ्रामक’ है कि एक मुस्लिम लड़का ऐसे गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा बन गया जिसमें हिंदू धर्म के लोग ज़्यादा थे

जज विनोद यादव ने अपने फैसले में ये भी कहा कि चमश्दीद गवाह अशोक सोलंकी, शशिकांत कश्यप और सुरेंद्र शर्मा ने आवेदक (आरिफ) की भूमिका के बारे में साफ-साफ नहीं बताया है. उनका स्टेटमेंट समान्य लगता है. आवेदक (आरिफ) किसी भी सीसीटीवी फुटेज में नजर नहीं आता है. जहां तक सीडीआर लोकेशन की बात है तो आवेदक घटना स्थल के पास ही रहता है ऐसे में लोकेशन उसके आसपास पाया जाना बहुत मायने नहीं रखता.’’

तमाम तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने 20 हजार के निजी मुचलके पर आरिफ को जमानत दे दी.

11 दिसंबर को जाकिर और अशफ़ाक़ की हत्या के मामले में जज विनोद यादव ने आरिफ को जमानत दे दी. यानी दो मामलों में आरिफ को जमानत एक ही दिन दी गई. तीसरा मामला महताब की हत्या का था जिसमें 22 फरवरी को आरिफ को जज विनोद कुमार यादव ने लगभग इन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर आरिफ को जमानत दी.

‘आरिफ घर कम जेल में ज़्यादा रहता है’

साल 2004 से अब तक आरिफ पर पुलिस 27 केस दर्ज कर चुकी है. ज़्यादातर मामले में उसे कोई सजा नहीं मिली. आरिफ के परिवार की माने तो पुलिस न जाने क्यों उसे परेशान करती रहती है. जब मन होता है उठा ले जाती है.

आरिफ की मां परवीन कहती हैं, ‘‘न जाने पुलिस वालों को मेरे बेटे से क्या परेशानी है. आसपास में कोई भी मामला होता है उसे उठाकर लेकर चले जाते हैं. बाद में वो सबूत नहीं होने पर रिहा हो जाता है लेकिन हम तो परेशान होते हैं. दंगा होने से छह महीने पहले ही 3 साल से ज़्यादा समय तक जेल में रहकर वापस लौटा था. फिर उठाकर लेकर चले गए. मैं जिस गली में रहती हूं यहां मुसलमानों का एक-दो ही घर है. ज़्यादातर हिन्दू हैं. आप किसी से भी पूछ सकते हैं कि दंगे वाले दिन आरिफ क्या कर रहा था. वो कुछ देर गली के गेट पर बैठकर सुरक्षा करता था और कुछ देर छत पर रहता था. वो बाहर गया ही नहीं लेकिन उसे फंसा दिया गया.’’

आरिफ की बहन फरहीन कहती हैं, ‘‘पुलिस ने मेरे भाई को बड़ा अपराधी समझ रखा है. जब वो 14 साल के थे तब से ही उनपर पुलिस एफआईआर दर्ज करती रहती है. वे बाहर कम जेल में ज़्यादा रहते हैं. तीन साल जेल में रहने के बाद छह महीने पहले ही बाहर आए थे कि दिल्ली दंगा हुआ और फिर वे जेल चले गए. अगर मेरे भाई अपराधी होते तो आज हम लोग ऐसे घर में रहते. आप देखिए टूटा हुआ है. जमानत कराने तक के पैसे नहीं हैं.’’

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