क्रिमिनल जस्टिस-2: चुप्पी की चीख़ों की दास्तान

इस दौर में आधुनिक हो चुकी उस महिला की कहानी है जिसे सांचे में ढलना भी मंजूर है और उस सांचे में ढालते समय महसूस होती तमाम यातनाओं को चुपचाप सह लेने की आदत भी, लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक ऐसा सिस्टम मौजूद है जो उसे यह बोध कराये रहता है कि वह सिस्टम की ज़िम्मेदारी है.

क्रिमिनल जस्टिस-2: चुप्पी की चीख़ों की दास्तान
Shambhavi
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दिलचस्प है, और यह इस सीरीज की सघनता, उसकी गहराई व तीव्रता से ही संभव है कि इस सफल, काबिल और नामी हस्ती के आंतरिक ‘विद्रूप’ को समझने में एक दर्शक को उतना भी उतना ही समय लगता है जितना इस सजीले काबिल और सफल इंसान को समझने में उसकी बेतहाशा अमानवीय हिंसा की शिकार पत्नी को. यह इस सीरीज का वह मजबूत पक्ष है जहां एक दर्शक के तौर पर आप उतना ही जान पाते हैं जितना आपको निर्देशक और इसके अभिनेता आपको बताना चाहते हैं. आप कुछ अटकलें लगा सकते हैं लेकिन उतनी ही जितने की इजाजत आपका सामाजिक अनुकूलन आपको देता है. गंदगी के ब्यौरों में जाने की शिक्षा आमतौर हमें मिली नहीं होती है और यह सीरीज हमें उस गंदगी के गटर में डूबती उतरती एक एक बदबूदार रेशे को छूकर, सूघकर, देखकर और सुनाकर और लगभग चखकर दिखालने की कोशिश करती है. यह अप्रत्याशित मोड़ पर ले जाती है जिसमें अनु के हाव-भाव से और व्यक्तित्व हीन क्लांत चेहरे को देखकर आपको कुछ कुछ अंदाज़ा हो सकता है लेकिन थ्रिल यह इसलिए ही है क्योंकि जो अंत में होता है वह आपकी तमाम कल्पनाओं के कुल गुणनफल से कुछ बेशी निकलता है.

एक ईमानदार वकील, संवेदनशील पुलिस अफसर, एक महिला न्यायधीश और एक उत्पीड़ित स्त्री का धीरे धीरे कम होता डर और उसके पीछे खड़ा एक न्याय तंत्र एक ऐसा अफसाना रचता है जिसमें न्याय की जीत पर भरोसा होता है और उत्पीड़न के सहयात्री बन चुके दर्शक के तौर पर आप एक चैन की सांस लेते हैं. गम की लंबी शाम के ढलने सा सब्र आपको न्याय के प्रति आश्वस्त करता है.

यह सीरीज दाम्पत्य जीवन के लगभग अनछुए पहलू जिस पर अभी नारीवादी आंदोलन में चर्चा होना शुरू हुई थी और हिंसा के सांस्थानिक स्वरूप के रूप में देखे जाने की पैरवी जन चेतना में आना शुरू हो रही उस ‘मेरिटल रेप’ की परतें उघाड़ने की कोशिश करती है.

यह एक ऐसा मामला है जो ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ के नारे का विस्तार करता है और पितृसत्ता की चारदीवारी में बंद हिंसा को बेपर्दा करता है. जिस शास्त्रानुमोदित व्यवस्था का पूरा वजूद ही परिवार नामक संस्था पर टिका है यह मामला उसमें सेंध लगाता है जिससे सदियों से संरक्षित इस पुरातात्विक लेकिन सनातनी इमारत भरभराकर ढह सकती है. इसलिए इसे बार- बार पुनर्जीवित करने की साजिशें रची जाती रही हैं. ‘लव जिहाद’ और प्रेम पर पहरों की राजनैतिक व सामाजिक कार्यवाहियाँ इसी परिप्रेक्ष्य में देखी जाना चाहिए.

वह स्याह तस्वीर हमारे सामने पेश करता है जिससे हम अपनी आंखों को बचाना चाहते हैं और भर नज़र उन बंद दरवाजों के भीतर झांकना नहीं चाहते भले ही सुबह की दूध रोशनी में बंद दरवाजों के पार की दास्तां चीख-चीख कर हमें बताना चाहती हो. सीरीज के नाम में ‘बिहाइंड द क्लोज्ड डोर्स’ शायद इसीलिए ही है.

प्रत्याशित और अप्रत्याशित घटनाओं की तरतीब से आगे बढ़ती यह सीरीज अपने दर्शकों का साथ एक पल के लिए भी नहीं छोड़ती और आगे का रास्ता भी नहीं बतलाती. जिसे हिन्दी के कवि मुक्तिबोध ने कभी सृजन में लालटेन की रोशनी माना था यह सीरीज उस से भी मंथर गति से आगे का रास्ता सुझाती है. और खूबी यह है कि इस तेज़ रफ्तार दुनिया में हमें यह मंथर गति भाती है, उबाऊ नहीं लगती.

मंझे हुए अभिनय और कसे हुए निर्देशन में इस सीरीज में हल्कापन नहीं आने पाया. अनुराधा चन्द्र या अनु के रूप में कीर्ति कुल्हारी रियलिस्टिक अभिनय की एक और सीढ़ी चढ़ी है. मीता वशिष्ठ, दीप्ति नवल ऐसी भूमिकाओं में आकर पूरी सीरीज को विपथ नहीं होने देतीं. पंकज त्रिपाठी थोड़ा टाइयप्ड हुए जाते लगते हैं लेकिन उनका यही अंदाज़ है जिसे देखने की प्रतीक्षा भी इस गंभीर कहानी में बनी रहती है. विशेष रूप से इनका नया- नया दाम्पत्य जिसे ज़्यादा जीवंत बनाने का काम इनकी पत्नी बनी रत्ना फ्राम पटना उर्फ खुशबू आत्रे ने निभाया.

एक दाम्पत्य खाकी बर्दी में भी पूरी कहानी में हमारे साथ चलता है. जहां ड्यूटी के अलावे महिला-पुरुष होने के अलग अलग सरोकार गहराई से दर्ज़ किए गए हैं. अदालत की करवाही के साथ साथ इन दो पुलिस अफसरों के दाम्पत्य जीवन को भी पुनरपरिभाषित व व्याख्यायित किया गया है. गौरी और हर्ष प्रधान के रूप में क्रमश: कल्याणी मुले व अजीत सिंह पलवात ने बहुत शसक्त अभिनय किया है. इन्हें आने वाले लंबे समय तक देखा व सराहा जाएगा.

आशीष विद्यार्थी ने न्याय तंत्र में सदा वत्सले के सुनियोजित मिश्रण से युक्त एक प्रखर वकील की भूमिका का बढ़िया से निर्वहन किया है.

रोहन शिप्पी के निर्देशन में ठहराव है, समझ है और सलीका है जो कहानी को पूरे तनाव में साध पाया है.

डिज्नी हॉटस्टार पर उपलब्ध इस सीरीज को देखा जाना चाहिए ताकि हम सार्वजनिक जीवन में अनुपस्थित होते जा रहे सवालों को अपने ज़हन में ज़िंदा रख सकें और जब वक़्त बदले तो इन सवालों से जूझने के लिए तैयार हो सकें.

दिलचस्प है, और यह इस सीरीज की सघनता, उसकी गहराई व तीव्रता से ही संभव है कि इस सफल, काबिल और नामी हस्ती के आंतरिक ‘विद्रूप’ को समझने में एक दर्शक को उतना भी उतना ही समय लगता है जितना इस सजीले काबिल और सफल इंसान को समझने में उसकी बेतहाशा अमानवीय हिंसा की शिकार पत्नी को. यह इस सीरीज का वह मजबूत पक्ष है जहां एक दर्शक के तौर पर आप उतना ही जान पाते हैं जितना आपको निर्देशक और इसके अभिनेता आपको बताना चाहते हैं. आप कुछ अटकलें लगा सकते हैं लेकिन उतनी ही जितने की इजाजत आपका सामाजिक अनुकूलन आपको देता है. गंदगी के ब्यौरों में जाने की शिक्षा आमतौर हमें मिली नहीं होती है और यह सीरीज हमें उस गंदगी के गटर में डूबती उतरती एक एक बदबूदार रेशे को छूकर, सूघकर, देखकर और सुनाकर और लगभग चखकर दिखालने की कोशिश करती है. यह अप्रत्याशित मोड़ पर ले जाती है जिसमें अनु के हाव-भाव से और व्यक्तित्व हीन क्लांत चेहरे को देखकर आपको कुछ कुछ अंदाज़ा हो सकता है लेकिन थ्रिल यह इसलिए ही है क्योंकि जो अंत में होता है वह आपकी तमाम कल्पनाओं के कुल गुणनफल से कुछ बेशी निकलता है.

एक ईमानदार वकील, संवेदनशील पुलिस अफसर, एक महिला न्यायधीश और एक उत्पीड़ित स्त्री का धीरे धीरे कम होता डर और उसके पीछे खड़ा एक न्याय तंत्र एक ऐसा अफसाना रचता है जिसमें न्याय की जीत पर भरोसा होता है और उत्पीड़न के सहयात्री बन चुके दर्शक के तौर पर आप एक चैन की सांस लेते हैं. गम की लंबी शाम के ढलने सा सब्र आपको न्याय के प्रति आश्वस्त करता है.

यह सीरीज दाम्पत्य जीवन के लगभग अनछुए पहलू जिस पर अभी नारीवादी आंदोलन में चर्चा होना शुरू हुई थी और हिंसा के सांस्थानिक स्वरूप के रूप में देखे जाने की पैरवी जन चेतना में आना शुरू हो रही उस ‘मेरिटल रेप’ की परतें उघाड़ने की कोशिश करती है.

यह एक ऐसा मामला है जो ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ के नारे का विस्तार करता है और पितृसत्ता की चारदीवारी में बंद हिंसा को बेपर्दा करता है. जिस शास्त्रानुमोदित व्यवस्था का पूरा वजूद ही परिवार नामक संस्था पर टिका है यह मामला उसमें सेंध लगाता है जिससे सदियों से संरक्षित इस पुरातात्विक लेकिन सनातनी इमारत भरभराकर ढह सकती है. इसलिए इसे बार- बार पुनर्जीवित करने की साजिशें रची जाती रही हैं. ‘लव जिहाद’ और प्रेम पर पहरों की राजनैतिक व सामाजिक कार्यवाहियाँ इसी परिप्रेक्ष्य में देखी जाना चाहिए.

वह स्याह तस्वीर हमारे सामने पेश करता है जिससे हम अपनी आंखों को बचाना चाहते हैं और भर नज़र उन बंद दरवाजों के भीतर झांकना नहीं चाहते भले ही सुबह की दूध रोशनी में बंद दरवाजों के पार की दास्तां चीख-चीख कर हमें बताना चाहती हो. सीरीज के नाम में ‘बिहाइंड द क्लोज्ड डोर्स’ शायद इसीलिए ही है.

प्रत्याशित और अप्रत्याशित घटनाओं की तरतीब से आगे बढ़ती यह सीरीज अपने दर्शकों का साथ एक पल के लिए भी नहीं छोड़ती और आगे का रास्ता भी नहीं बतलाती. जिसे हिन्दी के कवि मुक्तिबोध ने कभी सृजन में लालटेन की रोशनी माना था यह सीरीज उस से भी मंथर गति से आगे का रास्ता सुझाती है. और खूबी यह है कि इस तेज़ रफ्तार दुनिया में हमें यह मंथर गति भाती है, उबाऊ नहीं लगती.

मंझे हुए अभिनय और कसे हुए निर्देशन में इस सीरीज में हल्कापन नहीं आने पाया. अनुराधा चन्द्र या अनु के रूप में कीर्ति कुल्हारी रियलिस्टिक अभिनय की एक और सीढ़ी चढ़ी है. मीता वशिष्ठ, दीप्ति नवल ऐसी भूमिकाओं में आकर पूरी सीरीज को विपथ नहीं होने देतीं. पंकज त्रिपाठी थोड़ा टाइयप्ड हुए जाते लगते हैं लेकिन उनका यही अंदाज़ है जिसे देखने की प्रतीक्षा भी इस गंभीर कहानी में बनी रहती है. विशेष रूप से इनका नया- नया दाम्पत्य जिसे ज़्यादा जीवंत बनाने का काम इनकी पत्नी बनी रत्ना फ्राम पटना उर्फ खुशबू आत्रे ने निभाया.

एक दाम्पत्य खाकी बर्दी में भी पूरी कहानी में हमारे साथ चलता है. जहां ड्यूटी के अलावे महिला-पुरुष होने के अलग अलग सरोकार गहराई से दर्ज़ किए गए हैं. अदालत की करवाही के साथ साथ इन दो पुलिस अफसरों के दाम्पत्य जीवन को भी पुनरपरिभाषित व व्याख्यायित किया गया है. गौरी और हर्ष प्रधान के रूप में क्रमश: कल्याणी मुले व अजीत सिंह पलवात ने बहुत शसक्त अभिनय किया है. इन्हें आने वाले लंबे समय तक देखा व सराहा जाएगा.

आशीष विद्यार्थी ने न्याय तंत्र में सदा वत्सले के सुनियोजित मिश्रण से युक्त एक प्रखर वकील की भूमिका का बढ़िया से निर्वहन किया है.

रोहन शिप्पी के निर्देशन में ठहराव है, समझ है और सलीका है जो कहानी को पूरे तनाव में साध पाया है.

डिज्नी हॉटस्टार पर उपलब्ध इस सीरीज को देखा जाना चाहिए ताकि हम सार्वजनिक जीवन में अनुपस्थित होते जा रहे सवालों को अपने ज़हन में ज़िंदा रख सकें और जब वक़्त बदले तो इन सवालों से जूझने के लिए तैयार हो सकें.

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