अर्णबकांड: क्या गोस्वामी को बालाकोट हमले के बारे में पहले से पता था? शायद नहीं

क्या हमें एक अतिशयोक्ति पूर्ण दावे पर भरोसा करना चाहिए जब एक आम स्पष्टीकरण मौजूद है?

अर्णबकांड: क्या गोस्वामी को बालाकोट हमले के बारे में पहले से पता था? शायद नहीं
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वह इंगित करते हैं कि, "बालाकोट हमले से पहले सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी, जिसे एक विवादित क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर में अंजाम दिया गया था. बालाकोट हमला पाकिस्तानी सीमा के अंदर था. और अर्णब का यह कहना कि यह हमला साधारण से कुछ ज्यादा होगा, यह इस बात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह एक काफी बड़ी बात है जो किसी के द्वारा बताई ही जा सकती है. भले ही उसके पास सटीक जानकारी न हो, लेकिन साफ तौर पर उसे नियंत्रण रेखा, पाक अधिकृत कश्मीर के पार जाने के नीतिगत निर्णय के बारे में पता था. असली बात यह है."

एनडीटीवी के पूर्व रक्षा संपादक और BharatShakti.in के संस्थापक नितिन गोखले इससे अलग मत रखते हैं. वे पूछते हैं, "क्या उसने यह कहा कि हमला बालाकोट में होगा, या वह इस समय पर किया जाएगा, या इतने हवाई जहाज नियंत्रण रेखा को पार करेंगे? अगर आप मुझे यह दिखा सकें, तब मैं कहूंगा कि हां उसके पास सेना की गुप्त जानकारी थी."

गोखले ने न्यूजलॉन्ड्री को बताया कि यह असंभव था कि मोदी सरकार ने सेना की गुप्त जानकारी गोस्वामी तक पहुंचाई हो.

वे तर्क रखते हैं कि, "इस तरह की योजना केवल उन लोगों को पता होती है जो उसको बनाने में और उसके क्रियान्वयन में भाग लेते हैं. यह प्रधानमंत्री कार्यालय या रक्षा मंत्री तक नहीं भेजे जाते. इसको 5 से 10 लोगों, इससे ज्यादा नहीं, के द्वारा बिल्कुल गुप्त रखा जाता है."

गोखले कहते हैं कि अर्णब और पार्थो की बातों को मीडिया कवरेज ने "चीटी का पहाड़ बना दिया है." वे कहते हैं, "कोई भी जिसे इन विषयों की थोड़ी भी जानकारी हो, बिना किसी के बताए यह अनुमान लगा सकता है. अगर आप ने नियंत्रण रेखा के पार, उरी जैसा जमीनी रेड की है, तो जब उरी से ज्यादा जाने गई हो तो आप उससे बड़ा क्या कर सकते हैं? कोई भी अनुभवी पत्रकार या विश्लेषक निष्कर्ष निकाल सकता था."

गोस्वामी से दासगुप्ता की बातों में मसाला, उनकी प्रधानमंत्री कार्यालय में किसी रहस्यमई "एएस" के साथ हुई बैठक के हवाले से लगाया जा रहा है. लेकिन उन्हें दासगुप्ता से उनके संबंधों के आइने में देखना चाहिए. हालांकि उन्होंने दासगुप्ता को हमले के बारे में बताया, पर वह नियमित तौर पर दासगुप्ता के सामने रिपब्लिक ने एक कार्यक्रम को कितने बढ़िया तरीके से कवर किया इसकी डींगें मार रहे थे- हमेशा किसी तुच्छ प्रतिद्वंदी से बेहतर. यहां तक कि गोस्वामी ने एक खबर को सबसे पहले चलाने की विस्तृत जानकारी दी और यह भी बताया कि आज तक को उसे उठाने में कितने मिनट लगे.

यह साफ हो जाता है कि गोस्वामी उस समय के बार्क के प्रमुख के सामने अपने चैनल को बढ़ा चढ़ा रहे थे, वह व्यक्ति जिसके हाथ में उनके चैनल की रेटिंग की चाबी थी, उसके आगे अपनी जान पहचान को दिखा रहे थे. इससे हमारे सामने यह संभावना भी आती है कि उनके अधिकतर दावे या तो बढ़ा चढ़ाकर बताए हुए या पूरी तौर पर असत्य थे.

गोस्वामी ने सबसे बड़ी डींग अगस्त 2019 में हांकी. उन्होंने दासगुप्ता को बताया कि जिस दिन भारत सरकार ने कश्मीर में धारा 370 हटा दी थी, उस दिन न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों से मिले, बल्कि उन्हें डोभाल ने अलग से फोन भी किया.

वे दासगुप्ता को बताते हैं, "हर कोई राष्ट्रीय सुरक्षा में, प्रधानमंत्री कार्यालय में हर कोई भारत और रिपब्लिक ही देख रहा है."

इसके दो दिन बाद 7 अगस्त को वह दावा करते हैं की रिपब्लिक पाकिस्तान की तरफ से "बड़ी लड़ाई", एक बड़ी "साइबर लड़ाई" झेल रहा है.

इन संदेशों पर दासगुप्ता के जवाब कुछ खास नहीं थे: या तो "हां हूं", "हां कोई आश्चर्य नहीं" या कुछ इमोजी थीं.

17 जनवरी को, गोस्वामी के पास संवेदनशील जानकारी थी या वह केवल डींगे मार रहे थे, इस पर अपनी बात रखते हुए ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने तर्क दिया कि उनके पास "दोनों ही बातें मानने के कारण नहीं हैं, पर क्या इससे यह साफ हो जाता है कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई या उनके पास जो लोग इस मामले में शामिल नहीं हैं उन्हें जो जानकारी होनी चाहिए, उससे ज्यादा जानकारी थी?"

यह संभव है कि प्रतीक सेना के इस प्रश्न को गलत तरीके से पूछ रहे हैं. इसके बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि: गोस्वामी ने रेटिंग संस्था के अधिकारी को यह बताया कि "कुछ बड़ा" होने वाला है, "आम कार्यवाही से कुछ बड़ा." क्या इसका यह मतलब अपने आप निकलता है कि उन्हें सेना की कुछ गुप्त जानकारी दी गई थी?

इन दोनों संभावनाओं के बीच भी कोई समानता नहीं है. गोस्वामी के पास बालाकोट हवाई हमले की गुप्त जानकारी होना एक बहुत बड़ा दावा है, जिसके एक साधारण निष्कर्ष से कई बड़े मायने हैं. साधारण निष्कर्ष की वह जो उनको ही नहीं कई लोगों को पता था, उसे बढ़ा चढ़ा कर बता रहे थे. क्योंकि हमारे पास पहली संभावना को साबित करने का कोई पुख्ता सबूत नहीं है, इसीलिए दूसरी संभावना ही उनकी बातों को सही तौर पर चित्रित करती है.

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वह इंगित करते हैं कि, "बालाकोट हमले से पहले सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी, जिसे एक विवादित क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर में अंजाम दिया गया था. बालाकोट हमला पाकिस्तानी सीमा के अंदर था. और अर्णब का यह कहना कि यह हमला साधारण से कुछ ज्यादा होगा, यह इस बात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह एक काफी बड़ी बात है जो किसी के द्वारा बताई ही जा सकती है. भले ही उसके पास सटीक जानकारी न हो, लेकिन साफ तौर पर उसे नियंत्रण रेखा, पाक अधिकृत कश्मीर के पार जाने के नीतिगत निर्णय के बारे में पता था. असली बात यह है."

एनडीटीवी के पूर्व रक्षा संपादक और BharatShakti.in के संस्थापक नितिन गोखले इससे अलग मत रखते हैं. वे पूछते हैं, "क्या उसने यह कहा कि हमला बालाकोट में होगा, या वह इस समय पर किया जाएगा, या इतने हवाई जहाज नियंत्रण रेखा को पार करेंगे? अगर आप मुझे यह दिखा सकें, तब मैं कहूंगा कि हां उसके पास सेना की गुप्त जानकारी थी."

गोखले ने न्यूजलॉन्ड्री को बताया कि यह असंभव था कि मोदी सरकार ने सेना की गुप्त जानकारी गोस्वामी तक पहुंचाई हो.

वे तर्क रखते हैं कि, "इस तरह की योजना केवल उन लोगों को पता होती है जो उसको बनाने में और उसके क्रियान्वयन में भाग लेते हैं. यह प्रधानमंत्री कार्यालय या रक्षा मंत्री तक नहीं भेजे जाते. इसको 5 से 10 लोगों, इससे ज्यादा नहीं, के द्वारा बिल्कुल गुप्त रखा जाता है."

गोखले कहते हैं कि अर्णब और पार्थो की बातों को मीडिया कवरेज ने "चीटी का पहाड़ बना दिया है." वे कहते हैं, "कोई भी जिसे इन विषयों की थोड़ी भी जानकारी हो, बिना किसी के बताए यह अनुमान लगा सकता है. अगर आप ने नियंत्रण रेखा के पार, उरी जैसा जमीनी रेड की है, तो जब उरी से ज्यादा जाने गई हो तो आप उससे बड़ा क्या कर सकते हैं? कोई भी अनुभवी पत्रकार या विश्लेषक निष्कर्ष निकाल सकता था."

गोस्वामी से दासगुप्ता की बातों में मसाला, उनकी प्रधानमंत्री कार्यालय में किसी रहस्यमई "एएस" के साथ हुई बैठक के हवाले से लगाया जा रहा है. लेकिन उन्हें दासगुप्ता से उनके संबंधों के आइने में देखना चाहिए. हालांकि उन्होंने दासगुप्ता को हमले के बारे में बताया, पर वह नियमित तौर पर दासगुप्ता के सामने रिपब्लिक ने एक कार्यक्रम को कितने बढ़िया तरीके से कवर किया इसकी डींगें मार रहे थे- हमेशा किसी तुच्छ प्रतिद्वंदी से बेहतर. यहां तक कि गोस्वामी ने एक खबर को सबसे पहले चलाने की विस्तृत जानकारी दी और यह भी बताया कि आज तक को उसे उठाने में कितने मिनट लगे.

यह साफ हो जाता है कि गोस्वामी उस समय के बार्क के प्रमुख के सामने अपने चैनल को बढ़ा चढ़ा रहे थे, वह व्यक्ति जिसके हाथ में उनके चैनल की रेटिंग की चाबी थी, उसके आगे अपनी जान पहचान को दिखा रहे थे. इससे हमारे सामने यह संभावना भी आती है कि उनके अधिकतर दावे या तो बढ़ा चढ़ाकर बताए हुए या पूरी तौर पर असत्य थे.

गोस्वामी ने सबसे बड़ी डींग अगस्त 2019 में हांकी. उन्होंने दासगुप्ता को बताया कि जिस दिन भारत सरकार ने कश्मीर में धारा 370 हटा दी थी, उस दिन न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों से मिले, बल्कि उन्हें डोभाल ने अलग से फोन भी किया.

वे दासगुप्ता को बताते हैं, "हर कोई राष्ट्रीय सुरक्षा में, प्रधानमंत्री कार्यालय में हर कोई भारत और रिपब्लिक ही देख रहा है."

इसके दो दिन बाद 7 अगस्त को वह दावा करते हैं की रिपब्लिक पाकिस्तान की तरफ से "बड़ी लड़ाई", एक बड़ी "साइबर लड़ाई" झेल रहा है.

इन संदेशों पर दासगुप्ता के जवाब कुछ खास नहीं थे: या तो "हां हूं", "हां कोई आश्चर्य नहीं" या कुछ इमोजी थीं.

17 जनवरी को, गोस्वामी के पास संवेदनशील जानकारी थी या वह केवल डींगे मार रहे थे, इस पर अपनी बात रखते हुए ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने तर्क दिया कि उनके पास "दोनों ही बातें मानने के कारण नहीं हैं, पर क्या इससे यह साफ हो जाता है कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई या उनके पास जो लोग इस मामले में शामिल नहीं हैं उन्हें जो जानकारी होनी चाहिए, उससे ज्यादा जानकारी थी?"

यह संभव है कि प्रतीक सेना के इस प्रश्न को गलत तरीके से पूछ रहे हैं. इसके बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि: गोस्वामी ने रेटिंग संस्था के अधिकारी को यह बताया कि "कुछ बड़ा" होने वाला है, "आम कार्यवाही से कुछ बड़ा." क्या इसका यह मतलब अपने आप निकलता है कि उन्हें सेना की कुछ गुप्त जानकारी दी गई थी?

इन दोनों संभावनाओं के बीच भी कोई समानता नहीं है. गोस्वामी के पास बालाकोट हवाई हमले की गुप्त जानकारी होना एक बहुत बड़ा दावा है, जिसके एक साधारण निष्कर्ष से कई बड़े मायने हैं. साधारण निष्कर्ष की वह जो उनको ही नहीं कई लोगों को पता था, उसे बढ़ा चढ़ा कर बता रहे थे. क्योंकि हमारे पास पहली संभावना को साबित करने का कोई पुख्ता सबूत नहीं है, इसीलिए दूसरी संभावना ही उनकी बातों को सही तौर पर चित्रित करती है.

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