किसान आंदोलन: दैनिक जागरण का यूपी सरकार के साथ ‘गठबंधन’

एक तरफ जहां बीते 50 दिनों से दिल्ली की सरहदों पर हज़ारों की संख्या में किसान अपनी मांगों के साथ बैठे हुए हैं. जहां कई किसानों की मौत भी हो चुकी हैं. इसी बीच दैनिक जागरण की चार गाड़ियां प्रदेश भर में घूमकर योगी सरकार की योजनाओं का प्रचार कर रही हैं.

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अख़बार में छपती 'सफल' किसानों की कहानी

डिजिटल माध्यमों से सरकार की तारीफ करने वाली खबरें जागरण प्रकाशित कर ही रहा है. इसके अलावा हर रोज दैनिक जागरण के लखनऊ एडिशन में कुछ किसानों की खबरें छपती है जिन्होंने खेती में बेहतर किया है. दैनिक जागरण के एक कर्मचारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि जहां-जहां प्रचार गाड़ी जा रही है वहां से खबरें की जाती हैं. इसमें अभी लखनऊ, माल और मलिहाबाद की खबरें प्रकाशित हो रही हैं.

किसान आंदोलन शुरू होने के साथ ही दैनिक जागरण इसके खिलाफ खबरें चलाने लगा. कई ऐसी खबरें हुई जो सत्य नहीं थी. किसान आंदोलन को खारिज करते विशेष संपादकीय लेख छपे. किसान नेताओं पर सवाल खड़े किए गए.

जहां यह आंदोलन में धीरे-धीरे देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है. ऐसे में जागरण 15 जनवरी को अपने संपादकीय में लिखता है, ‘‘यह एक तथ्य है कि किसान आंदोलन मुख्यत: पंजाब के किसानों का आंदोलन बनकर रह गया है. इस आंदोलन में पंजाब के किसानों की अधिकता की एक बड़ी वजह खुद वहां की सरकार की ओर से उन्हें उकसाया जाना है.’’

ऐसा ही संपादकीय 7 जनवरी को भी छपा जिसका शीर्षक ‘‘किसान नेताओं का रवैया’’ था. इसमें लेखक लिखते हैं, ‘‘इन नेताओं ने झूठ का सहारा लेकर कृषि कानूनों के खिलाफ जिस तरह से मोर्चा खोल दिया है, उससे लगता है कि हालात बेहतर थे, लेकिन यह सच नहीं है. और इसीलिए किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान आकर्षित किया जाता था. नए कृषि कानूनों के जरिए किसानों की समस्याओं को ही दूर करने का काम किया गया है.’’

इस संपादकीय में आगे लिखा गया है, ‘‘चूंकि किसान नेता किसानों को बरगलाने से बाज नहीं आ रहे हैं इसीलिए सरकार को उनके खिलाफ सख्ती बरतने के लिए तैयार रहना चाहिए.’’

13 जनवरी को जागरण में 'सुप्रीम कोर्ट की पहल' हेडिंग से संपादकीय छपा. इसमें किसान आंदोलन को कांग्रेस और वाम दलों के इशारे पर चलने वाला बताने की कोशिश की गई. जागरण लिखता है, ''किसान नेताओं के रवैये से यह साफ है कि वे किसानों की समस्याओं का हल चाहने के बजाय अपने संकीर्ण स्वार्थो को पूरा करना चाहते हैं. इसी के साथ यह भी स्पष्ट है कि उनकी आड़ लेकर कांग्रेस एवं वाम दल अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाह रहे हैं. इसकी पुष्टि इससे होती है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित समिति पर किसान नेताओं और कांग्रेसी नेताओं की आपत्ति के सुर एक जैसे हैं. यह समानता तो यही इंगित करती है कि किसानों को एक राजनीतिक एजेंडे के तहत उकसाया गया है. बात केवल इतनी ही नहीं कि किसान नेता किसी राजनीतिक उद्देश्य के तहत दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं. बात यह भी है कि उनके बीच अवांछित तत्व घुसपैठ करते हुए दिख रहे हैं.''

Credits: accou

जागरण अपने संपादकीय के जरिए यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि कृषि बिल किसानों के हित में हैं वहीं किसान नेता किसानों को बरगला रहे हैं. साथ ही सरकार को सलाह भी देता है कि किसानों पर सख्ती बरतें.

किसान नेताओं की मांग को भी जागरण एक तरह से गैर ज़रूरी बताने की कोशिश करता है. किसानों की मांगों में से एक है, एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाना. न्यूनतम समर्थन मूल्य वह राशि है जो सरकार किसी फसल को लेकर तय करती है और उसी पर खरीदारी भी करती है. किसानों को डर है कि इन तीनों क़ानूनों के लागू होने के बाद एमएसपी पर खरीद बंद हो जाएगी.

किसानों की इस मांग को गलत बताने की कोशिश करते हुए जागरण ने एक खबर प्रकशित की. जिसका शीर्षक है 'महंगाई भड़कायेगी, एमएसपी की गारंटी, खजाने पर बोझ के साथ आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा असर.

सुरेंद्र प्रसाद सिंह के द्वारा लिखी इस खबर में यह बताने की कोशिश हो रही है कि अगर एमएसपी पर खरीदारी होगी तो सरकार को नुकसान होगा. कीमत बढ़ जाएगी. खबर में लिखा गया है, ‘‘किसानों के लिए कहने को तो यह न्यूनतम समर्थन मूल्य है लेकिन बाजार में यही अधिकतम मूल्य बनकर महंगाई का दंश देता है.’’

जागरण द्वारा सिर्फ संपादकीय और खबरों के जरिए ही किसान आंदोलन पर सवाल उठाया गया ऐसा नहीं है. जागरण ने कार्टून के जरिए भी कृषि कानूनों को बेहतर बताने की कोशिश की है. माधव जोशी नाम के कार्टूनिस्ट ने ये कार्टून बनाए हैं. 12 जनवरी को छपे कार्टून में,माथे पर हाथ रखे ट्रैक्टर पर बैठे एक सिख किसान कहते हैं, ‘‘पाजी! आप आंदोलन में जमे हो तब तक फसल मंडी के बाहर बेंच लूं? दाम अच्छे हैं?

एक ऐसा ही कार्टून माधव द्वारा बनाया गया है जिसमें लिखा गया, ‘‘किसान हल चलाते हैं लेकिन हल चाहते नहीं.’’

 12 जनवरी को जागरण में छपा कार्टून

12 जनवरी को जागरण में छपा कार्टून

Credits: accou
13 जनवरी को जागरण में छपा कार्टून

13 जनवरी को जागरण में छपा कार्टून

Credits: accou

मोदी सरकार के आने के बाद जागरण को मिला करोड़ों का विज्ञापन

दैनिक जागरण खुद को हिंदी का सबसे बड़ा अख़बार बताता हैं. मौके-मौके पर वह सरकार को बचाने की कोशिश करता नजर आता है. हाल ही में हाथरस में दलित लड़की के साथ हुए रेप और उसके बाद पुलिस की उपस्थिति में परिवार के इजाजत के बगैर और अनुस्थिति में अंतिम संस्कार का मामला आया तब भी जागरण ने लड़की के परिवार पर ही सवाल उठा दिया था. हालांकि बाद में सीबीआई ने माना कि लड़की के साथ बलात्कार हुआ था. ऐसा ही जागरण ने जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेप मामले में किया था. जिसके बाद उसे काफी आलोचना का समाना करना पड़ा था.

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के दौरान भी जागरण ने ऐसी स्टोरी की जिससे आंदोलन और उसके नेताओं पर ही सवाल खड़े हुए. जागरण ऐसा क्यों कर रहा है? इस सवाल का जवाब मोदी सरकार द्वारा बीते जागरण ग्रुप को दिए विज्ञापनों से पता चलता है.

ब्यूरो ऑफ़ आउटरेच एंड कम्युनिकेशन के आंकड़ों के मुताबिक दैनिक जागरण को साल 2015 से 2019 तक 85 करोड़ 78 लाख 31 हज़ार पांच सौ बहात्तर रुपए का विज्ञापन मिला. जागरण ग्रुप के अंग्रेजी अख़बार मीडे-डे को 2 करोड़ 41 लाख पांच हज़ार चार सौ पैंतालीस रुपए का विज्ञापन मिला. वहीं जागरण के उर्दू अख़बार इंक़लाब को 57 लाख, नौ हज़ार दो सौ उन्तालीस रुपए का विज्ञापन दिया गया. यानी जागरण ग्रुप के तीनों अख़बारों को मिलाकर सिर्फ पांच साल के भीतर कुल 88 करोड़, 77 लाख, 26 हज़ार दो सौ छप्पन हज़ार का विज्ञापन सिर्फ केंद्र सरकार द्वारा दिया गया है.

मोदी सरकार से पहले जागरण को मिले विज्ञापनों की बात करें तो यह कम है. कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए सरकार के दौरान जागरण को साल 2010-11 में 13 करोड़, 68 लाख, आठ हज़ार तीन सौ दो रुपए का, 2011-12 में 13 करोड़, 66 लाख 60 हज़ार दो सौ नब्बे रुपए का, 2012-13 में पांच करोड़, 90 लाख, 13 हज़ार सात सौ अठहत्तर रुपए का विज्ञापन मिला. इसी दौरान अगर जागरण समूह के अंग्रेजी अख़बार मिड-डे को मिले विज्ञापन की बात करें तो 2010-11 में उसे 35 लाख, 53 हज़ार छह सौ चौतीस, 2011-12 में 24 लाख, 78 हज़ार 76 रुपए और 2012-13 में सात लाख, 48 हज़ार आठ सौ पचहत्तर रुपए का विज्ञापन मिला.

मोदी सरकार के आते ही यही विज्ञापन साल दर साल डबल हो गया. साल 2015-16 की बात करे तो इस साल जागरण को 22 करोड़, 31 लाख, पांच हज़ार चार सौ चौवालीस रुपए, 2016-17 में 21 करोड़, 85 लाख, 44 हज़ार, 5 सौ 64 रुपए, 2017-18 में 36 करोड़ 40 लाख, 80 हज़ार 3, सौ 56 रुपए, 2018-19 में 5 करोड़, 21 लाख 01 हज़ार 2 सौ 08 रुपए का विज्ञापन दैनिक जागरण को मिला. यहीं स्थिति मिड-डे की भी रही. मिड-डे का विज्ञापन भी तेजी से बढ़ा.

ब्यूरो ऑफ़ आउटरेच एंड कम्युनिकेशन से प्राप्त आकड़ें

ब्यूरो ऑफ़ आउटरेच एंड कम्युनिकेशन से प्राप्त आकड़ें

ब्यूरो ऑफ़ आउटरेच एंड कम्युनिकेशन से प्राप्त आकड़ें

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इसके अलावा अगर भारत सरकार के डिजिटल विज्ञापन की बात करें तो साल 2015-19 के बीच जागरण समूह को 2 करोड़ 68 लाख, 38 हज़ार नौ सौ 77 रुपए का विज्ञापन दिया गया. वहीं मिड डे को 77 लाख 18 हज़ार पांच सौ 54 रुपए का विज्ञापन इस दौरान मिला.

ब्यूरो ऑफ़ आउटरेच एंड कम्युनिकेशन से प्राप्त आकड़ें

ब्यूरो ऑफ़ आउटरेच एंड कम्युनिकेशन से प्राप्त आकड़ें

यह तो सिर्फ केंद्र सरकार के आंकड़ें हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भी कम विज्ञापन नहीं देती है. उसके आंकड़ें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. उसे हम हासिल नहीं कर पाए.

क्या जागरण और यूपी सरकार के बीच कोई करार है?

माइक्रोसाइट पर उत्तर प्रदेश सरकार का लोगो तो मौजूद है. वहीं प्रिंट की खबरों में ऐसी कोई जानकारी नहीं दी गई. तो क्या योगी सरकार और दैनिक जागरण दोनों मिलकर इस कार्यक्रम को चला रहे हैं. इसकी जानकारी कहीं भी अख़बार द्वारा नहीं दिया जाता है.

इसको लेकर उत्तर प्रदेश दैनिक जागरण के संपादक आशुतोष शुक्ला से जब हमने फोन पर बात की तो उन्होंने हमारा सवाल सुनने के बाद बिना कोई जवाब दिए फोन काट दिया. शुक्ला ‘किसान कल्याण’ माइक्रोसाइट के उद्घाटन में अधिकारियों के साथ मौजूद रहे थे. हमने आशुतोष शुक्ला को व्हाट्सएप के जरिए भी सवाल भेजे हैं. लेकिन अभी तक उसका कोई जवाब नहीं आया. अगर कोई जवाब आता है तो उसे खबर में जोड़ दिया जाएगा.

इसको लेकर हमने उत्तर प्रदेश सूचना विभाग के प्रमुख एडिशनल चीफ सेक्रेटरी नवनीत सहगल से बात की. उन्होंने जागरण के साथ ‘किसान कल्याण मिशन’ के कार्यक्रम को लेकर किसी भी तरह के कोलेबरेशन से इंकार किया. जब हमने उनसे कहा कि जागरण अपने डिजिटल माध्यम पर उत्तर प्रदेश सरकार का लोगो इस्तेमाल कर रहा है. सरकार की योजनाओं का प्रचार कर रहा है. क्या यह ऐसे ही है. इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, ‘‘वे लोग अच्छे काम के लिए लोगो का इस्तेमाल कर रहे हैं, अगर किसी गलत काम में करते तो हम उनपर कार्रवाई करते.’’

जब हमने नवनीत सहगल से कुछ और सवाल पूछा तो उन्होंने हमने सवाल भेजने के लिए कहा. हमने उन्हें भी सवाल भेज दिया है लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया.

अगर सरकार और जागरण के बीच कोई कोलेबरेशन नहीं था तो 'किसान कल्याण' माइकोसाइट के उद्घाटन में यूपी सरकार के अधिकारी कैसे शामिल हुए? लोक भवन में यह कार्यक्रम कैसे किया गया? योगी सरकार और दैनिक जागरण का 'किसान कल्याण मिशन' का लोगो भी एक जैसा होना क्या ऐसे ही है? इसका जवाब नवनीत सहगल ही दे सकते हैं. हमें उनके जवाबों का इंतज़ार हैं.

ऐसे में यह भी उठता है कि क्या जागरण खुद ही सरकार के पक्ष में, सरकार की योजनाओं का प्रचार कर रहा है? इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब जागरण के संपादक और मैनेजमेंट के अधिकारी ही दे सकते हैं.

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