कांग्रेस में जरूरत से कम लोकतंत्र पार्टी को लगातार बना रहा कमजोर

अगर संजय गांधी की हवाई जहाज की दुर्घटना में मौत न हुई होती तो नेहरू-परिवार का इतिहास व भूगोल दोनों आज से भिन्न होता.

कांग्रेस में जरूरत से कम लोकतंत्र पार्टी को लगातार बना रहा कमजोर
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राहुल गांधी को उनकी मां ने कांग्रेस-प्रमुख व देश के प्रधानमंत्री की भूमिका में तैयार किया. राहुल भी अपने पिता व मां की तरह ही राजनीति की तालाब के मछली नहीं थे लेकिन उन्हें मां ने चुनने का मौका नहीं दिया. राहुल तालाब में उतार तो दिए गए. जल्दी ही वे इसका विशाल व सर्वभक्षी रूप देख कर किनारे की तरफ भागने लगे, आज तक भागते रहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि राहुल को राजनीति नहीं करनी है या वे सत्ता की तरफ उन्मुख नहीं हैं. अब तो उनकी शुरुआती झिझक भी चली गई है लेकिन कांग्रेस का इंदिरा गांधी संस्करण उनको पचता नहीं है. वे इसे बदलना चाहते हैं लेकिन वह बदलाव क्या है और कैसे होगा, न इसका साफ नक्शा है उनके पास और न कांग्रेस के वरिष्ठ जन वैसा कोई बदलाव चाहते हैं. यहीं आकर कांग्रेस ठिठक-अंटक गई है.

मतदाता उसकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है. वह अपनी मुट्ठी कैसे बंद करे, यह बताने वाला उसके पास कोई नहीं है. क्या ऐसी कांग्रेस को राहुल अपनी कांग्रेस बना सकते हैं ? बना सकते हैं यदि वे यह समझ लें कि आगे का रास्ता बनाने और उस पर चलने के लिए नेतृत्व को एक बिंदु से आगे सफाई करनी ही पड़ती है. परदादा जवाहरलाल नेहरू हों कि दादी इंदिरा गांधी या पिता राजीव गांधी, सबने ऐसी सफाई की है, क्योंकि उन्हें कांग्रेस को अपनी पार्टी बनना था. राहुल यहीं आ कर चूक जाते हैं या पीछे हट जाते हैं. वे कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे और लगातार आधी से ज्यादा कांग्रेस उन्हें ही अपना अध्यक्ष मानती भी रही है लेकिन राहुल अब तक अपनी टीम नहीं बना पाए हैं. वे यह भी बता नहीं पाए हैं कि वे कांग्रेस का कैसा चेहरा गढ़ना चाहते हैं. कांग्रेस को ऐसे राहुल की जरूरत है जो उसे गढ़ सके और यहां से आगे ले जा सके. वह तथाकथित ‘वरिष्ठ कांग्रेसजनों’ से पूछ सके कि यदि मैं कांग्रेस की राजनीति को गंभीरता से नहीं ले रहा हूं तो आपको आगे बढ़ कर कांग्रेस को गंभीरता से लेने से किसने रोका है?

पिछले संसदीय चुनाव या उसके बाद के किसी भी राज्य के चुनाव में इन वरिष्ठ कांग्रेसियों में से एक भी जान लगा कर काम करता दिखाई नहीं दिया, दिखाई नहीं देता है तो क्यों? ऐसा क्यों हुआ कि जब राहुल “चौकीदार चोर है!” की हांक लगाते सारे देश में घूम रहे थे तब दूसरा कोई वरिष्ठ कांग्रेसी उसकी प्रतिध्वनि नहीं उठा रहा था? अगर ऐसे नारे से किसी को एतराज था तो किसी ने कोई नया नारा क्यों नहीं गुंजाया? ऐसा क्यों है कि राहुल ही हैं कि जो अपने बयानों-ट्विटों में सरकार को सीधे निशाने पर लेते हैं बाकी कौन, कब, क्या बोलता है, किसने सुना है? शुरू में राहुल कई बार कच्चेपन का परिचय दिया करते थे क्योंकि उनके पीछे संभालने वाला कोई राजनीतिक हाथ नहीं था. अब वक्त ने उन्हें संभाल दिया है.

इस राहुल को कांग्रेस अपनाने को तैयार हो तो कांग्रेस के लिए आज भी आशा है. राहुल को पार्टी के साथ काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए क्योंकि कांग्रेस में आज राजस्थान के मुख्यमंत्री के अलावा दूसरा कोई नहीं है कि जो पार्टी को नगरपालिका का चुनाव भी जिता सके. अशोक गहलोत कांग्रेस के एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने खुली चुनौती दे कर भाजपा को चुनाव में हराया और फिर चुनौती दे कर सरकार गिराने की रणनीति में उसे मात दी. यह राजनीति का राहुल-ढंग है. ऐसी कांग्रेस और ऐसे राहुल ही एक-दूसरे को बचा सकते हैं.

राहुल गांधी को उनकी मां ने कांग्रेस-प्रमुख व देश के प्रधानमंत्री की भूमिका में तैयार किया. राहुल भी अपने पिता व मां की तरह ही राजनीति की तालाब के मछली नहीं थे लेकिन उन्हें मां ने चुनने का मौका नहीं दिया. राहुल तालाब में उतार तो दिए गए. जल्दी ही वे इसका विशाल व सर्वभक्षी रूप देख कर किनारे की तरफ भागने लगे, आज तक भागते रहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि राहुल को राजनीति नहीं करनी है या वे सत्ता की तरफ उन्मुख नहीं हैं. अब तो उनकी शुरुआती झिझक भी चली गई है लेकिन कांग्रेस का इंदिरा गांधी संस्करण उनको पचता नहीं है. वे इसे बदलना चाहते हैं लेकिन वह बदलाव क्या है और कैसे होगा, न इसका साफ नक्शा है उनके पास और न कांग्रेस के वरिष्ठ जन वैसा कोई बदलाव चाहते हैं. यहीं आकर कांग्रेस ठिठक-अंटक गई है.

मतदाता उसकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है. वह अपनी मुट्ठी कैसे बंद करे, यह बताने वाला उसके पास कोई नहीं है. क्या ऐसी कांग्रेस को राहुल अपनी कांग्रेस बना सकते हैं ? बना सकते हैं यदि वे यह समझ लें कि आगे का रास्ता बनाने और उस पर चलने के लिए नेतृत्व को एक बिंदु से आगे सफाई करनी ही पड़ती है. परदादा जवाहरलाल नेहरू हों कि दादी इंदिरा गांधी या पिता राजीव गांधी, सबने ऐसी सफाई की है, क्योंकि उन्हें कांग्रेस को अपनी पार्टी बनना था. राहुल यहीं आ कर चूक जाते हैं या पीछे हट जाते हैं. वे कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे और लगातार आधी से ज्यादा कांग्रेस उन्हें ही अपना अध्यक्ष मानती भी रही है लेकिन राहुल अब तक अपनी टीम नहीं बना पाए हैं. वे यह भी बता नहीं पाए हैं कि वे कांग्रेस का कैसा चेहरा गढ़ना चाहते हैं. कांग्रेस को ऐसे राहुल की जरूरत है जो उसे गढ़ सके और यहां से आगे ले जा सके. वह तथाकथित ‘वरिष्ठ कांग्रेसजनों’ से पूछ सके कि यदि मैं कांग्रेस की राजनीति को गंभीरता से नहीं ले रहा हूं तो आपको आगे बढ़ कर कांग्रेस को गंभीरता से लेने से किसने रोका है?

पिछले संसदीय चुनाव या उसके बाद के किसी भी राज्य के चुनाव में इन वरिष्ठ कांग्रेसियों में से एक भी जान लगा कर काम करता दिखाई नहीं दिया, दिखाई नहीं देता है तो क्यों? ऐसा क्यों हुआ कि जब राहुल “चौकीदार चोर है!” की हांक लगाते सारे देश में घूम रहे थे तब दूसरा कोई वरिष्ठ कांग्रेसी उसकी प्रतिध्वनि नहीं उठा रहा था? अगर ऐसे नारे से किसी को एतराज था तो किसी ने कोई नया नारा क्यों नहीं गुंजाया? ऐसा क्यों है कि राहुल ही हैं कि जो अपने बयानों-ट्विटों में सरकार को सीधे निशाने पर लेते हैं बाकी कौन, कब, क्या बोलता है, किसने सुना है? शुरू में राहुल कई बार कच्चेपन का परिचय दिया करते थे क्योंकि उनके पीछे संभालने वाला कोई राजनीतिक हाथ नहीं था. अब वक्त ने उन्हें संभाल दिया है.

इस राहुल को कांग्रेस अपनाने को तैयार हो तो कांग्रेस के लिए आज भी आशा है. राहुल को पार्टी के साथ काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए क्योंकि कांग्रेस में आज राजस्थान के मुख्यमंत्री के अलावा दूसरा कोई नहीं है कि जो पार्टी को नगरपालिका का चुनाव भी जिता सके. अशोक गहलोत कांग्रेस के एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने खुली चुनौती दे कर भाजपा को चुनाव में हराया और फिर चुनौती दे कर सरकार गिराने की रणनीति में उसे मात दी. यह राजनीति का राहुल-ढंग है. ऐसी कांग्रेस और ऐसे राहुल ही एक-दूसरे को बचा सकते हैं.

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