रोटी इंटरनेट से, पानी शेयर बाज़ार से

यह इतिहास में पहली दफ़ा हो रहा है और इसी के साथ पानी भी सोने-चांदी, तेल, अनाज जैसी चीज़ों की क़तार में आ गया है, जिसकी क़ीमत अब वॉल स्ट्रीट पर तय होगी.

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इस सप्ताह अमेरिकी स्टॉक बाज़ार में पानी की संभावित क़ीमतों पर बोली लगने की शुरुआत हो गयी है. यह इतिहास में पहली दफ़ा हो रहा है और इसी के साथ पानी भी सोने-चांदी, तेल, अनाज जैसी चीज़ों की क़तार में आ गया है, जिसकी क़ीमत अब वॉल स्ट्रीट पर तय होगी. दो साल पहले कैलिफ़ोर्निया में बने पानी का दाम तय करने वाले एक सूचकांक- नैसडैक़ वेलेस कैलिफ़ोर्निया वाटर इंडेक्स- पर यह कारोबार आधारित होगा. इसे शुरू करने वाली कंपनी सीएमई ग्रुप ने दो माह पहले इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि 2025 तक दुनिया की क़रीब दो-तिहाई आबादी पानी की कमी की समस्या का सामना करेगी और दुनियाभर के व्यवसायों और समुदायों, ख़ासकर कैलिफ़ोर्निया के 1.1 अरब डॉलर के पानी बाज़ार, के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी. फ़िलहाल तो यह कैलिफ़ोर्निया के लिए होगा, लेकिन क्रमशः इससे और बाज़ार भी जुड़ेंगे. कैलिफ़ोर्निया आबादी के हिसाब से अमेरिका का सबसे बड़ा राज्य है और आकार में तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. यह अमेरिका और दुनिया के कई देशों में बरसों से हो रहे पानी के कॉर्पोरेटाइज़ेशन की दिशा में बड़ा क़दम है.

पिछले साल अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में वॉल स्ट्रीट की एक कंपनी द्वारा कोलंबिया नदी और बेसिन में पानी का ठेका लेने के बारे में एक रिपोर्ट में सिएटल टाइम्स के इवान बुश ने लिखा था कि आप पानी का पीछा कीजिए और आप धन तक पहुंच जायेंगे. यह बात उन्होंने वाशिंगटन राज्य के ग्रामीण इलाक़ों के संदर्भ में कही थी, जहां पानी का ठेका लेने के साथ कॉर्पोरेट खेती करने में भी भारी निवेश हो रहा है. वहां के किसान और स्थानीय समुदाय के लोग इस प्रकरण से बेहद चिंतित हैं. इसका एक पहलू यह है कि बड़े फ़ार्म पर खेती करने वाले लोगों की उम्र ढलान पर है, सो कंपनियों को पानी के साथ खेती पर भी दख़ल ज़माने का मौक़ा दिख रहा है. ज़मीन ख़रीदने का एक बड़ा कारण यह भी है कि कंपनियां उसके पास से बहते या ज़मीन के नीचे के पानी का व्यावसायिक दोहन करना चाहती हैं. वाशिंगटन में क़ानूनी तौर पर पानी एक सार्वजनिक संसाधन है, जिसका कोई मालिकाना नहीं हो सकता है, लेकिन इसके उपयोग का अधिकार विशिष्ट है और इसे एक तरह से संपत्ति के अधिकार के रूप में देखा जाता है. बहरहाल, यह कहानी अमेरिका के अनेक राज्यों और दुनिया के कई देशों के मामले में भी लागू होती है.

भारत में और वैश्विक स्तर पर पानी के कारोबार पर नज़र डालने से पहले अमेरिका और कैलिफ़ोर्निया से संबंधित अमेरिकी सरकार के कुछ आंकड़ों का उल्लेख प्रासंगिक होगा, जिसे सीएमई ने भी उद्धृत किया है. धरती पर 326 मिलियन ट्रिलियन गैलन पानी है, पर इसमें से 96.5 फ़ीसदी पानी समुद्र में है. सिर्फ़ 3.5 फ़ीसदी ही ताज़ा पानी है, लेकिन उसका भी 69 फ़ीसदी हिस्सा ग्लेशियरों और अन्य बर्फ़ीले इलाक़ों में हैं तथा 30 फ़ीसदी पानी ज़मीन के भीतर है, जिसे निकालने में बहुत ख़र्च है. सो, दुनिया की ज़रूरत के लिए एक फ़ीसदी पानी ही सीधे तौर पर उपलब्ध है. यह पानी 114 मिलियन बिलियन गैलन है.

कई सालों से विशेषज्ञ अपने अध्ययनों में इंगित करते रहे हैं कि वॉल स्ट्रीट ने खेती और उसके उत्पाद का दोहन कर अकूत कमाई की है. उन कारोबारियों के लिए भूख भी एक अवसर है. दुनियाभर तो खाद्यान्न का मौजूदा संकट पैदा हुआ है, उसके पीछे कॉर्पोरेट की अनाज पर गिद्ध नज़र ही है. इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए फ़्रेडरिक कॉफ़मैन के अध्ययन और फ़ूड एंड वॉटर वाच की रिपोर्ट देखी जा सकती है. इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वैश्विक स्तर पर अनाज के दामों और कारोबार के नियमन की बातें होती रहती हैं, किंतु कई समझौतों और अंतरराष्ट्रीय मंचों के होने के बावजूद ऐसा ठोस रूप से नहीं किया जा सका है. कल ऐसा ही पानी के साथ होना निश्चित है. पानी की लूट पर आठ साल पहले के एक लेख में कॉफ़मैन ने रेखांकित किया था कि वॉल स्ट्रीट के अनुमानों के कारोबार में पानी पहले से परोक्ष रूप से एक कारोबारी वस्तु बन चुका है. स्टॉक एक्सचेंजों में मौसम से संबंधित अग्रिम बोलियों में बर्फ़, हवा और बारिश पर दांव लगाया जाता है. पानी की क़ीमत की अग्रिम बोली लगने की शुरुआत का सीधा मतलब है कि पानी के दाम बढ़ेंगे और पानी पर सामुदायिक अधिकार का क्रमशः क्षरण होता जायेगा, जैसे कि अन्य चीज़ों के साथ हुआ है. नैसडाक़ की वेबसाइट पर निवेशकों को आमंत्रित करते हुए कहा गया है कि भविष्य में निवेश कीजिए. संकेत स्पष्ट है- मुनाफ़ा कमाइए.

साल 2005 में नेस्ले के तत्कालीन सीईओ और बाद में चेयरमैन एमेरिटस पीटर ब्राबेक लेटमाथे ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘वी फ़ीड द वर्ल्ड’ में साक्षात्कार देते हुए कहा था कि पानी को मानवाधिकार मानने का विचार एक अतिवाद है और किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका भी बाज़ार मूल्य होना चाहिए. इस बड़े कॉरपोरेट का यह बयान संयुक्त राष्ट्र और अन्य सामाजिक संगठनों की राय से उलटा था. पानी से जुड़े अधिकारों की वक़ालत करने वाली स्वयंसेवी संस्था डिगडीप के संस्थापक जॉर्ज मैक्ग्रा ने उस समय प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि लोग ब्राबेक के अमानवीय बयान से उचित ही चकित हैं और ऐसा लगता है कि यह बड़ा कॉरपोरेट समूह करीब 80 करोड़ लोगों के खिलाफ खड़ा है, जो ज़िंदा रहने भर के लिए थोड़े पानी के लिए भी परेशान रहते हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि यह बयान ऐसे समय में आया है, जब नेस्ले पर अनेक ग़रीब समुदायों को पानी से वंचित करने के आरोप लग रहे हैं और कंपनी उनका खंडन कर रही है.

इस चर्चा के एक दशक बाद यानी 2015 में बोतलबंद पानी का दुनियाभर में कारोबार 185 बिलियन डॉलर पहुंच गया था. जुलाई, 2018 में बाजार पर नज़र रखने वाली एक संस्था रिसर्च एंड मार्केट की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2023 तक यह आंकड़ा 334 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. इसमें सबसे अधिक कमाई और कुल उपभोग एशिया-प्रशांत में है, जो कि 33 फीसदी है. यूरोप का हिस्सा 28 फीसदी है. शेष खपत अन्य इलाकों में होती है. उत्तरी अमेरिका यानी संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में बाजार अपने चरम पर है तथा एशिया में बोतलबंद पानी की तेजी से बढ़ती मांग की अगुवाई चीन और भारत कर रहे हैं. साल 2018 के मार्च में जारी शोध संस्था मिंटेल की रिपोर्ट को मानें, तो भारत में 2016 और 2017 के बीच इस कारोबार में 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जो किसी भी अन्य बाज़ार से अधिक है. यूरोमॉनीटर का आकलन बताता है कि 2012 से 2017 के बीच देश में 1.38 बिलियन डॉलर का बोतलबंद पानी बेचा गया. इस अध्ययन का कहना है कि खपत में वृद्धि की यह दर 184 फ़ीसदी है. यूरोमॉनिटर का आकलन है कि सालाना 20 फ़ीसदी से ज़्यादा की बढ़त होती रहेगी.

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि चूंकि पानी का धंधा बड़ा चोखा है, जिसमें मामूली निवेश से बड़ा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है, तो 60 फीसदी से ज्यादा का वैश्विक कारोबार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर की कंपनियों का है, बहुराष्ट्रीय कंपनियां बाक़ी में हिस्सेदार हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक बोतलों के निर्माण में भारी तेज़ी के कारण भी पानी के कारोबार को बढ़ने में बड़ी मदद मिल रही है. कुछ और संबद्ध पहलू- प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान, कानूनी कोशिशें, बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के कण होना आदि- भी बेहद अहम हैं.

हमारे देश में दुनिया का चार फ़ीसदी जल संसाधन है. मुख्य रूप से हम बारिश और नदियों के पानी पर निर्भर हैं. आद्री के मुताबिक, भूजल रिचार्ज का लगभग 58 फ़ीसदी बारिश से ही आता है, जबकि नदी-नालों और अन्य स्रोतों से इसमें क़रीब 32 फ़ीसदी का योगदान होता है. राष्ट्रीय जल मिशन के मुताबिक शहरों से बड़ी मात्रा में गंदा पानी निकलता है. आगे ताज़े पानी की मांग बेतहाशा बढ़ेगी और उपयोग हुए पानी की मात्रा में भी बड़ी बढ़ोतरी होगी. जनगणना के आंकड़े तो और भी चिंताजनक हैं. साल 1951 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5177 घन मीटर थी, जो 2011 में केवल 1545 घन मीटर रह गयी है. इसका मतलब यह हुआ कि 60 सालों में पानी की उपलब्धता में 70 फ़ीसदी की कमी आयी है. सत्रह सौ घन मीटर से कम पानी होने की स्थिति को अत्यधिक चिन्ता की स्थिति माना जाता है और यदि यह आंकड़ा हज़ार से नीचे आ जाता है, तो उसे संकट माना जाता है. यह स्थिति 2050 के दशक में आने की आशंका है.

पानी के भयावह दोहन, कुप्रबंधन और बारिश के पानी को नाममात्र बचाने के कारण भारत इस स्थिति में पहुंचा है. ऐसे में कंपनियां अपने लिए अवसर देख रही हैं. उद्योग द्वारा पानी जुगाड़ करने, बोतलबंद पानी और कोल्ड ड्रिंक के कारोबार, पानी साफ़ करने के उपकरणों के निर्बाध इस्तेमाल आदि में इसे देखा जा सकता है.

अगस्त, 2018 में जल संसाधन की संसदीय समिति ने एक रिपोर्ट में बताया था कि देश के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश- में भूजल के स्तर में गिरावट और उनके दोहन की समस्या के बावजूद बोतलबंद पानी के 7,426 संयंत्रों के लाइसेंस निर्गत किये गये हैं. इनमें सबसे ज्यादा लाइसेंस तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में जारी हुए हैं. नियम यह है कि उन क्षेत्रों में ऐसे लाइसेंस नहीं दिये जा सकते हैं, जहां भूजल का स्तर बहुत नीचे हो. अफसोस की बात यह भी है कि सरकारी या संसदीय रिपोर्टों को हमारे मीडिया में लंबे समय से कोई तरजीह नहीं दी जाती है और न ही इन पर कोई राजनीतिक बहस होती है. सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरन्मेंट की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि तमिलनाडु में जितना भूजल रिचार्ज किया जाता है, उससे 77 फ़ीसदी ज़्यादा निकाल लिया जाता है. उत्तर प्रदेश के लिए यह आंकड़ा 74 फ़ीसदी है. देश के ज़्यादातर राज्यों में भी कमोबेश यही हिसाब है.

ऐसे में जब अमेरिका में पानी की कमी इसे शेयर बाज़ार के अनुमानों के कारोबार में शामिल कर सकती है, तो देर-सेबर हमारे देश में भी होगा ही. नदियों व जलाशयों से पानी निकालने के ठेके बहुत पहले से दिये जा रहे हैं. बिजली आपूर्ति को कॉर्पोरेट के हाथों में देकर उपभोक्ताओं से मनमानी वसूली तो पुरानी बात हो चुकी है. कल यह पानी में क्योंकि नहीं हो सकता है! किसानों और उद्यमों को पानी की बड़ी क़ीमत चुकाने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. हमने यह भी पूछना बंद कर दिया है कि दिल्ली में बिजली बहुत सस्ती क्यों है, अन्य राज्यों, ख़ासकर ग़रीब राज्यों की तुलना में. ऐसे में हम क्या यह सवाल पूछ पायेंगे कि पानी की जब इतनी कमी है, तो पानी का कारोबार तेज़ी से बढ़ क्यों रहा है! इतना पानी कंपनियों को कैसे मिल जाता है, ईश्वर तो पानी बनाना कबका बंद कर चुका है!

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पिछले साल अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में वॉल स्ट्रीट की एक कंपनी द्वारा कोलंबिया नदी और बेसिन में पानी का ठेका लेने के बारे में एक रिपोर्ट में सिएटल टाइम्स के इवान बुश ने लिखा था कि आप पानी का पीछा कीजिए और आप धन तक पहुंच जायेंगे. यह बात उन्होंने वाशिंगटन राज्य के ग्रामीण इलाक़ों के संदर्भ में कही थी, जहां पानी का ठेका लेने के साथ कॉर्पोरेट खेती करने में भी भारी निवेश हो रहा है. वहां के किसान और स्थानीय समुदाय के लोग इस प्रकरण से बेहद चिंतित हैं. इसका एक पहलू यह है कि बड़े फ़ार्म पर खेती करने वाले लोगों की उम्र ढलान पर है, सो कंपनियों को पानी के साथ खेती पर भी दख़ल ज़माने का मौक़ा दिख रहा है. ज़मीन ख़रीदने का एक बड़ा कारण यह भी है कि कंपनियां उसके पास से बहते या ज़मीन के नीचे के पानी का व्यावसायिक दोहन करना चाहती हैं. वाशिंगटन में क़ानूनी तौर पर पानी एक सार्वजनिक संसाधन है, जिसका कोई मालिकाना नहीं हो सकता है, लेकिन इसके उपयोग का अधिकार विशिष्ट है और इसे एक तरह से संपत्ति के अधिकार के रूप में देखा जाता है. बहरहाल, यह कहानी अमेरिका के अनेक राज्यों और दुनिया के कई देशों के मामले में भी लागू होती है.

भारत में और वैश्विक स्तर पर पानी के कारोबार पर नज़र डालने से पहले अमेरिका और कैलिफ़ोर्निया से संबंधित अमेरिकी सरकार के कुछ आंकड़ों का उल्लेख प्रासंगिक होगा, जिसे सीएमई ने भी उद्धृत किया है. धरती पर 326 मिलियन ट्रिलियन गैलन पानी है, पर इसमें से 96.5 फ़ीसदी पानी समुद्र में है. सिर्फ़ 3.5 फ़ीसदी ही ताज़ा पानी है, लेकिन उसका भी 69 फ़ीसदी हिस्सा ग्लेशियरों और अन्य बर्फ़ीले इलाक़ों में हैं तथा 30 फ़ीसदी पानी ज़मीन के भीतर है, जिसे निकालने में बहुत ख़र्च है. सो, दुनिया की ज़रूरत के लिए एक फ़ीसदी पानी ही सीधे तौर पर उपलब्ध है. यह पानी 114 मिलियन बिलियन गैलन है.

कई सालों से विशेषज्ञ अपने अध्ययनों में इंगित करते रहे हैं कि वॉल स्ट्रीट ने खेती और उसके उत्पाद का दोहन कर अकूत कमाई की है. उन कारोबारियों के लिए भूख भी एक अवसर है. दुनियाभर तो खाद्यान्न का मौजूदा संकट पैदा हुआ है, उसके पीछे कॉर्पोरेट की अनाज पर गिद्ध नज़र ही है. इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए फ़्रेडरिक कॉफ़मैन के अध्ययन और फ़ूड एंड वॉटर वाच की रिपोर्ट देखी जा सकती है. इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वैश्विक स्तर पर अनाज के दामों और कारोबार के नियमन की बातें होती रहती हैं, किंतु कई समझौतों और अंतरराष्ट्रीय मंचों के होने के बावजूद ऐसा ठोस रूप से नहीं किया जा सका है. कल ऐसा ही पानी के साथ होना निश्चित है. पानी की लूट पर आठ साल पहले के एक लेख में कॉफ़मैन ने रेखांकित किया था कि वॉल स्ट्रीट के अनुमानों के कारोबार में पानी पहले से परोक्ष रूप से एक कारोबारी वस्तु बन चुका है. स्टॉक एक्सचेंजों में मौसम से संबंधित अग्रिम बोलियों में बर्फ़, हवा और बारिश पर दांव लगाया जाता है. पानी की क़ीमत की अग्रिम बोली लगने की शुरुआत का सीधा मतलब है कि पानी के दाम बढ़ेंगे और पानी पर सामुदायिक अधिकार का क्रमशः क्षरण होता जायेगा, जैसे कि अन्य चीज़ों के साथ हुआ है. नैसडाक़ की वेबसाइट पर निवेशकों को आमंत्रित करते हुए कहा गया है कि भविष्य में निवेश कीजिए. संकेत स्पष्ट है- मुनाफ़ा कमाइए.

साल 2005 में नेस्ले के तत्कालीन सीईओ और बाद में चेयरमैन एमेरिटस पीटर ब्राबेक लेटमाथे ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘वी फ़ीड द वर्ल्ड’ में साक्षात्कार देते हुए कहा था कि पानी को मानवाधिकार मानने का विचार एक अतिवाद है और किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका भी बाज़ार मूल्य होना चाहिए. इस बड़े कॉरपोरेट का यह बयान संयुक्त राष्ट्र और अन्य सामाजिक संगठनों की राय से उलटा था. पानी से जुड़े अधिकारों की वक़ालत करने वाली स्वयंसेवी संस्था डिगडीप के संस्थापक जॉर्ज मैक्ग्रा ने उस समय प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि लोग ब्राबेक के अमानवीय बयान से उचित ही चकित हैं और ऐसा लगता है कि यह बड़ा कॉरपोरेट समूह करीब 80 करोड़ लोगों के खिलाफ खड़ा है, जो ज़िंदा रहने भर के लिए थोड़े पानी के लिए भी परेशान रहते हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि यह बयान ऐसे समय में आया है, जब नेस्ले पर अनेक ग़रीब समुदायों को पानी से वंचित करने के आरोप लग रहे हैं और कंपनी उनका खंडन कर रही है.

इस चर्चा के एक दशक बाद यानी 2015 में बोतलबंद पानी का दुनियाभर में कारोबार 185 बिलियन डॉलर पहुंच गया था. जुलाई, 2018 में बाजार पर नज़र रखने वाली एक संस्था रिसर्च एंड मार्केट की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2023 तक यह आंकड़ा 334 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. इसमें सबसे अधिक कमाई और कुल उपभोग एशिया-प्रशांत में है, जो कि 33 फीसदी है. यूरोप का हिस्सा 28 फीसदी है. शेष खपत अन्य इलाकों में होती है. उत्तरी अमेरिका यानी संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में बाजार अपने चरम पर है तथा एशिया में बोतलबंद पानी की तेजी से बढ़ती मांग की अगुवाई चीन और भारत कर रहे हैं. साल 2018 के मार्च में जारी शोध संस्था मिंटेल की रिपोर्ट को मानें, तो भारत में 2016 और 2017 के बीच इस कारोबार में 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जो किसी भी अन्य बाज़ार से अधिक है. यूरोमॉनीटर का आकलन बताता है कि 2012 से 2017 के बीच देश में 1.38 बिलियन डॉलर का बोतलबंद पानी बेचा गया. इस अध्ययन का कहना है कि खपत में वृद्धि की यह दर 184 फ़ीसदी है. यूरोमॉनिटर का आकलन है कि सालाना 20 फ़ीसदी से ज़्यादा की बढ़त होती रहेगी.

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि चूंकि पानी का धंधा बड़ा चोखा है, जिसमें मामूली निवेश से बड़ा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है, तो 60 फीसदी से ज्यादा का वैश्विक कारोबार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर की कंपनियों का है, बहुराष्ट्रीय कंपनियां बाक़ी में हिस्सेदार हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक बोतलों के निर्माण में भारी तेज़ी के कारण भी पानी के कारोबार को बढ़ने में बड़ी मदद मिल रही है. कुछ और संबद्ध पहलू- प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान, कानूनी कोशिशें, बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के कण होना आदि- भी बेहद अहम हैं.

हमारे देश में दुनिया का चार फ़ीसदी जल संसाधन है. मुख्य रूप से हम बारिश और नदियों के पानी पर निर्भर हैं. आद्री के मुताबिक, भूजल रिचार्ज का लगभग 58 फ़ीसदी बारिश से ही आता है, जबकि नदी-नालों और अन्य स्रोतों से इसमें क़रीब 32 फ़ीसदी का योगदान होता है. राष्ट्रीय जल मिशन के मुताबिक शहरों से बड़ी मात्रा में गंदा पानी निकलता है. आगे ताज़े पानी की मांग बेतहाशा बढ़ेगी और उपयोग हुए पानी की मात्रा में भी बड़ी बढ़ोतरी होगी. जनगणना के आंकड़े तो और भी चिंताजनक हैं. साल 1951 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5177 घन मीटर थी, जो 2011 में केवल 1545 घन मीटर रह गयी है. इसका मतलब यह हुआ कि 60 सालों में पानी की उपलब्धता में 70 फ़ीसदी की कमी आयी है. सत्रह सौ घन मीटर से कम पानी होने की स्थिति को अत्यधिक चिन्ता की स्थिति माना जाता है और यदि यह आंकड़ा हज़ार से नीचे आ जाता है, तो उसे संकट माना जाता है. यह स्थिति 2050 के दशक में आने की आशंका है.

पानी के भयावह दोहन, कुप्रबंधन और बारिश के पानी को नाममात्र बचाने के कारण भारत इस स्थिति में पहुंचा है. ऐसे में कंपनियां अपने लिए अवसर देख रही हैं. उद्योग द्वारा पानी जुगाड़ करने, बोतलबंद पानी और कोल्ड ड्रिंक के कारोबार, पानी साफ़ करने के उपकरणों के निर्बाध इस्तेमाल आदि में इसे देखा जा सकता है.

अगस्त, 2018 में जल संसाधन की संसदीय समिति ने एक रिपोर्ट में बताया था कि देश के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश- में भूजल के स्तर में गिरावट और उनके दोहन की समस्या के बावजूद बोतलबंद पानी के 7,426 संयंत्रों के लाइसेंस निर्गत किये गये हैं. इनमें सबसे ज्यादा लाइसेंस तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में जारी हुए हैं. नियम यह है कि उन क्षेत्रों में ऐसे लाइसेंस नहीं दिये जा सकते हैं, जहां भूजल का स्तर बहुत नीचे हो. अफसोस की बात यह भी है कि सरकारी या संसदीय रिपोर्टों को हमारे मीडिया में लंबे समय से कोई तरजीह नहीं दी जाती है और न ही इन पर कोई राजनीतिक बहस होती है. सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरन्मेंट की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि तमिलनाडु में जितना भूजल रिचार्ज किया जाता है, उससे 77 फ़ीसदी ज़्यादा निकाल लिया जाता है. उत्तर प्रदेश के लिए यह आंकड़ा 74 फ़ीसदी है. देश के ज़्यादातर राज्यों में भी कमोबेश यही हिसाब है.

ऐसे में जब अमेरिका में पानी की कमी इसे शेयर बाज़ार के अनुमानों के कारोबार में शामिल कर सकती है, तो देर-सेबर हमारे देश में भी होगा ही. नदियों व जलाशयों से पानी निकालने के ठेके बहुत पहले से दिये जा रहे हैं. बिजली आपूर्ति को कॉर्पोरेट के हाथों में देकर उपभोक्ताओं से मनमानी वसूली तो पुरानी बात हो चुकी है. कल यह पानी में क्योंकि नहीं हो सकता है! किसानों और उद्यमों को पानी की बड़ी क़ीमत चुकाने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. हमने यह भी पूछना बंद कर दिया है कि दिल्ली में बिजली बहुत सस्ती क्यों है, अन्य राज्यों, ख़ासकर ग़रीब राज्यों की तुलना में. ऐसे में हम क्या यह सवाल पूछ पायेंगे कि पानी की जब इतनी कमी है, तो पानी का कारोबार तेज़ी से बढ़ क्यों रहा है! इतना पानी कंपनियों को कैसे मिल जाता है, ईश्वर तो पानी बनाना कबका बंद कर चुका है!

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