एफसीआरए: सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती संस्थाओं को घेरने का महज एक औज़ार है

आरएसएस की वेबसाइट पर जाने से पता चलता है कि इतने बड़े पैमाने पर चंदा इकट्ठा करने के बावजूद न तो उनके वेबसाइट पर किसी चंदा देने वाली संस्था या व्यक्ति का नाम है, न ही बैलेंस शीट के साथ वार्षिक रिपोर्ट जैसा कोई दस्तावेज़ उपलब्ध है.

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प्रसिद्ध उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल की एक उक्ति है– धोखाधड़ी और छल के दौर में सच कहना एक क्रांतिकारी कदम है. महामारी के दौर में ‘आपदा में अवसर’ तलाशती सरकार से प्रश्न करता नागरिक समाज आज अपने ऐसे ही सवालों के नाते सरकार के निशाने पर है. विगत कुछ वर्षों में नागरिक समाज पर जकड़न लगातार बढ़ी है. विदेशी अनुदान नियामक कानून (एफसीआरए) में हालिया संशोधन इसकी अगली कड़ी है. ऑरवेल के ही शब्दों में कुछ जानवर कुछ दूसरे जानवरों से ज्यादा समान होते हैं की तर्ज़ पर सरकार तयशुदा दिखती है कि लोकतंत्र में भागीदारी का अर्थ अब सत्ता या चुनावी लोकतंत्र की प्राथमिकताओं पर ही निर्भर होगा. शेष समाज के लिए लोकतान्त्रिक अधिकारों की व्याख्या सत्ता के इन ‘अधिक समान’ नियंत्रकों की सहूलियत अनुसार तय होगी.

ज़ाहिर ही है, लोकतंत्र पर नियंत्रण के इस समय में नागरिक समाज के सवाल संदेहयुक्त और गैर-जायज होंगे. नए संशोधन को लाने के पीछे के कारणों पर बात करते हुए सरकार ने जो दो प्रमुख कारक गिनाए, वे काबिलेगौर हैं– एफसीआरए फंड के प्रति अधिक जवाबदेही और इस फंड का का बड़े स्तर पर धर्मांतरण और ऐसे ही दूसरे कामों में दुरुपयोग. गौरतलब है कि विदेशी चन्दा या फंड को लेकर आम समाज में जिस तरह की धारणाएं बनाई गई हैं, वे सरकार के उन दो प्रमुख कारकों से बहुत अलग नहीं हैं. इन्ही कारकों के नाते पहले ही विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एफसीआरए कानून के अंतर्गत नागरिक समाज सघन निगरानी के दायरे में है, जिसके तहत किसी भी संस्था को संस्थानिक खर्चों- गतिविधियों का पूरा ब्यौरा अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना होता है और साथ ही गृह मंत्रालय के संबंधित विभाग को भी भेजना होता है. यहां ध्यान देने योग्य है कि देश में नागरिक समाज को मिलने वाले विदेशी फंड की तुलना में कॉर्पोरेट द्वारा विदेशी फंड के इस्तेमाल का अनुपात लगभग तीन और 97 प्रतिशत का है. कॉर्पोरेट की तुलना में नागरिक समाज को मिलने वाली इतनी कम विदेशी राशि की निगरानी का काम गृह मंत्रालय का है, जबकि कॉर्पोरेट को मिलने वाली विदेशी राशि का लेखा-जोखा वित्त मंत्रालय के अधीन है. यहां सवाल उठता है कि एक ही प्रकार की राशि के साथ दो अलग बर्ताव क्यूं? वैसे लोकतंत्र पर अंकुश के दौर में ‘कुछ दूसरे कम समान’ के साथ समानता के व्यवहार की अपेक्षा क्या अब प्रासंगिक रह भी गई है?

नए संशोधनों की तार्किकता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि भारत सरकार के एफसीआरए डैशबोर्ड के मुताबिक देश में सक्रिय संस्थानों की कुल संख्या 22,447 के करीब है, जिनमें से 21915 संस्थाओं ने वर्ष 2018-19 का वार्षिक रिटर्न भरा है. कॉर्पोरेट ऋण के एनपीए के बोझ से लगातार दबती रिज़र्व बैंक के आंकड़ों की तुलना में नागरिक समाज के वार्षिक रिटर्न की तुलना खुद-ब-खुद स्पष्ट कर देती है कि नए संशोधनों का आधार नियमों का अनुपालन न होना (नॉन कंप्लायंस) तो बिल्कुल भी नहीं है.

नए संशोधनों के मुताबिक एफसीआरए के तहत प्राप्त अनुदानों को कोई बाइलैटरल फंडिंग एजेंसी किसी अन्य पात्र संस्था को मुहैया नहीं कर सकेगी. यह संशोधन सीधे समुदायों के साथ क्षेत्रीय स्तर पर काम करने वाले कमोबेश छोटे संगठनों को बड़े स्तर पर प्रभावित करेगा क्यूंकि फंड जुटाने के लिए ज़रूरी संपर्क और तकनीकी दक्षता की जो मदद अब तक दूसरे बड़े संस्थान मुहैया करा पा रहे थे, वो नए संशोधनों के अनुसार अब मुमकिन नहीं. नए संशोधनों के मुताबिक एफसीआरए फंड के अंतर्गत प्रशासनिक खर्चों की सीमा को अब 50% से 20% तक सीमित कर दिया गया है. इन संशोधनों को देखकर कोई भी आसानी से बता सकता है कि इन संशोधनों का मतलब निगरानी मात्र नहीं है. क्या सरकार यह मानती है कि भोजन का अधिकार, रोजगार गारंटी, सूचना का अधिकार, न्यूनतम आय, शिक्षा का अधिकार, गवर्नन्स, लैंगिक उत्पीड़न, लेबर रिफॉर्म आदि जैसे मुद्दों पर जन संगठनों के साथ सफल काम करने वाली संस्थाओं द्वारा शोध, ऐडवोकेसी, समझ के निर्माण जैसे बृहत्तर कार्यों की तकनीकी दक्षता वाले लोगों के लिए खुद अपनी आय जरूरी नहीं? या फिर यह अपने शोध, समझ, चर्चा, नेटवर्किंग से बृहत्तर समझ का निर्माण और उसके फलस्वरूप सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती संस्थाओं को घेरने का महज एक औज़ार है.

नए संशोधनों के अनुसार किसी भी संस्था में बोर्ड के सभी सदस्यों के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य किया जाना सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में आदेश के अनुसार किस तरह से प्रासंगिक है? संशोधनों के मुताबिक अब देश भर की संस्थाओं के लिए विदेशी अनुदान प्राप्त करने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की दिल्ली की एक ही शाखा में प्राथमिक खाता खोलना अनिवार्य होगा. गौर करने योग्य है कि देश में काम करने वाले संस्थानों में 93% संस्थान दिल्ली के बाहर अवस्थित हैं.

ऐसी सूरत में डिजिटल इंडिया के भारी प्रचार-प्रसार के बाद संस्थानों के विवरण की मॉनिटरिंग के नाम पर इस तरह केन्द्रीयकरण का औचित्य अब तक सरकार भी नहीं समझा सकी है. बहरहाल! नए संशोधनों के तहत संस्थानों की जांच के नाम पर जांच अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों की शक्ति में बेतरतीब इज़ाफ़ा कर दिया गया है, जिसका इस्तेमाल आने वाले समय में अपनी राजनीतिक मंशाओं के अनुरूप राजनीतिक पार्टियां बड़ी आसानी से कर सकती हैं. वर्ष 2013 में इंडियन एक्शन फॉर सोशल फोरम (इंसाफ) पर गृह मंत्रालय द्वारा एफसीआरए पंजीकरण का निरस्तीकरण इसका उदाहरण है, जिसे बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में निरस्त कर दिया था. हालांकि वर्ष 2016 में वापस गृह मंत्रालय ने इंसाफ के एफसीआरए पंजीकरण को बिना कोई कारण दिए नवीनीकृत (रिन्यू) करने से मना कर दिया.

वर्ष 2013 में जिस ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ की परिभाषा के अंतर्गत इंसाफ के पंजीकरण को खारिज किया गया था, उस मुद्दे पर बाद में इंसाफ द्वारा उच्चतम न्यायालय में संवैधानिक चुनौती दिए जाने के बाद यह आदेश भी आया कि बंद, हड़ताल या प्रतिरोध के तमाम अन्य तरीकों के आधार पर किसी भी संस्था को उसके विदेशी अनुदान लेने के न्यायिक अधिकार से महफूज नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने कहा कि किसी संस्थान द्वारा संचालित कोई भी तरीका (एक्शन) जोकि बिना किसी राजनीतिक उद्देश्यों के नागरिक अधिकारों की मदद या सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा हो– उस संस्थान को दंडित करने का कारण नहीं बन सकता. गौरतलब है कि वर्ष 2013 में संस्थानों के लिए ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ की जो व्याख्या अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने करते हुए नागरिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया था, उस ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ की परिभाषा को वर्ष 2010 में एफसीआरए कानून में संशोधनों के साथ राजनीतिक मंशाओं की पूर्ति के लिए ही लाया गया था. 2010 के ही संशोधनों के अंतर्गत जारी नियमावली में ट्रेड यूनियन जैसी तमाम इकाइयों को भी एफसीआरए के तहत ला दिया गया था.

इस पूरे मामले में राजनीतिक पार्टियों द्वारा विदेशी चन्दा, पैसा लिए जाने संबंधित एक दूसरे केस का उल्लेख प्रासंगिक होगा. वर्ष 2013 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और भारत सरकार में पूर्व सेक्रेटरी रहे ईएएस शर्मा द्वारा भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस द्वारा एफसीआरए कानून, 1976 का उल्लंघन करते हुए विदेशी स्रोतों द्वारा पैसा लिए जाने के विरुद्ध दाखिल एक पिटीशन पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में अपना आदेश सुनाया.

आदेश के अनुसार दोनों पार्टियों को कानून का उल्लंघन का दोषी माना गया और छ: महीने के भीतर चुनाव आयोग द्वारा दोनों पार्टियों पर उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया. ज़ाहिर ही है कि उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ दोनों ही पार्टियां उच्चतम न्यायालय गईं. इसके बाद वर्ष 2016 में फाइनेंस बिल के तहत एफसीआरए कानून के अंतर्गत ‘विदेशी स्रोत’ की परिभाषा में संशोधन किया गया जिसके तहत दोनों पार्टियों को उच्च न्यायालय ने दोषी करार किया था. वर्ष 2016 में उच्चतम न्यायालय इस केस में हुई बहस के अनुसार जब इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया कि 'विदेशी स्रोत' की परिभाषा में संशोधन 2010 के एफसीआरए कानून में किये गए हैं, जबकि उच्च न्यायालय का आदेश 1976 के कानून के अंतर्गत है तो दोनों पार्टियों ने उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय से अपनी अपील वापस ले ली. वर्ष 2017 में एडीआर और ईएएस शर्मा ने दिल्ली उच्च न्यायालय में 2014 के आदेश पर कोई कार्रवाई न होने की सूरत में कन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट का पिटीशन दाखिल किया. बाद में वर्ष 2018 में लोकसभा में फाइनेंस बिल के तहत 1976 के कानून में संशोधन भी कर लिया गया और सरकार ने राजनीतिक पार्टियों को विदेशी पैसे ले सकने की सहूलियत दिला दी.

हालांकि यहां यह भी रेखांकित किया जाना महत्वपूर्ण होगा कि 1976 के कानून की धारा 26 और 28 में निहित दंड के प्रावधान समावेशित होने के कारण यह कानून आपराधिक विधियों की श्रेणी में आता है और इस नाते न्याय के मूलभूत सिद्धांतों (बेसिक थ्योरी ऑफ लॉ) के अनुसार, 1976 के कानून में पूर्व प्रभावी (रेट्रस्पेक्टिव) तिथि से बदलाव नहीं किया जा सकता. बहरहाल! राजनीतिक पार्टियों को विदेशी चंदे का मामला अब ‘कुछ अधिक समान लोगों’ की व्याख्या के अंतर्गत कानूनी दांवपेच के हवाले है.

लेकिन क्या नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाली नागरिक समाज की अपेक्षाकृत छोटी इकाइयां सरकारों के राजनीतिक हितों के अनुरूप काम नहीं करने की एवज में सत्ता के दुरुपयोग के उनके इस चरित्र का शिकार बनती रहेंगी? रघुवीर सहाय के शब्दों में– एक भयानक समझौता है राजनीति में, हर नेता को एक नया चेहरा देना है- की तर्ज़ पर एफसीआरए के तमाम संशोधनों में राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज को अलग-अलग देखने के नजरिए पर एक खामोश समझौता हो चुका है जहां सरकार की जवाबदेही तय करते नागरिक समाज को दबाने की सामूहिक प्रक्रिया अपनी परिणति पर है. नए संशोधनों के कारण गिनाते वक़्त धर्मांतरण और हिंसा के जिन कारकों का आधार लिया गया, वे भी गौर करने योग्य हैं.

विदेशी अनुदान से धर्मांतरण जैसे कारक (आरोप भी) गिनाते वक़्त सरकार ने अपनी ओर से कोई आंकड़ा पेश नहीं किया है जिसके तहत अनुमान भी लगाया जा सके कि इन आरोपों में दम है. इसके उलट तमाम चैरिटी संस्थानों द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे महत्वपूर्ण काम से जुड़ी उपलब्धियां ज़रूर आंकड़ों में मौजूद हैं जो इन तमाम कारकों को खोखला बताती हैं. जहां तक हिंसा जैसे कारक का सवाल है, तो अमरीका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के हमलों के बाद ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ के तहत गठित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा दी गई विशेष संस्तुति (आठ) के मुताबिक तमाम देशों को इन संस्तुतियों के अनुसार अपने यहां गैर-लाभकारी संस्थाओं (नॉन- प्रॉफ़िट संस्थाओं) के भीतर नियामक तंत्र बनाए जाने की आवश्यकता पड़ी. इसके अंतर्गत गैर-लाभकारी संस्थाओं के भीतर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 114 से भी अधिक देशों ने नए नियम लागू किये.

एफएटीएफ ने वर्ष 2010 में भारतीय अधिकारियों से भी संपर्क किया जिसके बाद एफसीआरए कानून में नए संशोधन हुए. तो सरकार के हिंसा जैसे कारक का आधार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही यह प्रक्रिया भी है, जिसके तहत सरकार कह सकती है कि अंतर्राष्ट्रीय दवाबों के तहत वो ये कारक गिनने को विवश है. क्योंकि हिंदुस्तान में नागरिक समाज के आतंक के साथ जुड़ने का अब तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल सका है. इसके बजाय यदि वर्तमान एनडीए सरकार में मुख्य भारतीय जनता पार्टी की आनुषांगिक इकाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात की जाए तो मालेगांव ब्लास्ट से लेकर दूसरे मामलों में इसके सदस्यों के नाम आए हैं.

इसके बावजूद हैरानी की बात है कि विगत 5-6 वर्षों में 39 से भी ज्यादा देशों में अपनी शाखाएं खोलने और दिल्ली में 3.5 लाख वर्ग फुट के इलाके में संघ के नए ऑफिस के निर्माण कार्य के आरंभ के बाद भी इतनी बड़ी संस्था का पंजीकरण आज तक नहीं हुआ है. संघ की संरचना और कार्यप्रणाली पर अब तक तमाम सवाल किये जा चुके हैं. वर्ष 2018 में प्रकाश अंबेडकर ने भी संघ की कार्यप्रणाली पर सवाल करते हुए यह पूछा था कि इतनी बड़ी संस्था क्यूं इनकम टैक्स देने को बाध्य नहीं है. संघ की वेबसाइट पर जाने से स्पष्ट हो जाता है कि इतने बड़े पैमाने पर चंदा इकट्ठा करने के बावजूद न तो उनके वेबसाइट पर किसी चंदा देने वाली संस्था या व्यक्ति का नाम है, न ही बैलेंस शीट के साथ वार्षिक रिपोर्ट जैसा कोई दस्तावेज़ उपलब्ध है. नागरिक समाज से पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने को तत्पर सरकार ने क्यूं अब तक इन तमाम सवालों पर संघ की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की है, इसका अर्थ पुनः ‘कुछ अधिक समान लोगों’ वाले कथन से समझा जा सकता है.

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि नए संशोधनों का न्यायविदों के अंतर्राष्ट्रीय आयोग (इंटरनेशनल कमिशन ऑफ जयुरिस्ट्स) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समूह (यूएनएचआर) ने कड़ा विरोध किया है. यूएनएचआर ने नए संशोधनों को संघ की स्वतंत्रता के अधिकार (राइट तो फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन) और नागरिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के विरुद्ध इसे नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि (इंटरनेशनल कवनन्ट ऑन सिविल एंड पोलिटिकल राइट्स) के अंतर्राष्ट्रीय कानून, मानकों और सिद्धांतों का उल्लंघन माना है. यहां यह स्पष्ट ही है कि अंतर्राष्ट्रीय नियमावलियों/ संस्तुतियों में किसे मानना है और किसे नहीं, इसका चुनाव नए संशोधनों में अपनी सहूलियत से किया गया है.

इन सबके बीच सूचना के अधिकार के तहत गृह मंत्रालय से प्राप्त जवाब के अनुसार बड़े स्तर पर चंदा इकट्ठा करने के बावजूद पीएम केयर फंड भी एफसीआरए के अंतर्गत नहीं आता. गौर करने योग्य है कि पीएम केयर फंड की स्थापना महामारी के दौरान ही हुई थी. अब तक इस फंड में इकट्ठा की गई राशि या इसके अंतर्गत किये गए खर्चों का कोई विवरण नहीं मिल सका है. जबकि महामारी के ही दौरान राहत के सघन काम में अग्रणी भूमिका में रहने के लिए नागरिक समाज के कुल कार्यों को खुद प्रधानमंत्री और नीति आयोग ने सराहा है. नियमों के अनुसार नागरिक समाज के तहत सभी संस्थाओं को राहत के काम का पूरा ब्यौरा गृह मंत्रालय में जमा भी करना पड़ा है, जिसे इन सभी संस्थाओं ने पूरी जिम्मेदारी के साथ पूरा किया है.

ऐसी सूरत में अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ सच कहने का जोखिम उठाने वाले नागरिक समाज पर बढ़ती दबिश क्या नागरिक आवाजों को चुप कर सकेगी? रघुवीर सहाय के शब्दों में– वही लड़ेगा भाषा का युद्ध, जो सिर्फ अपनी भाषा बोलेगा. ‘आपदा में अवसर’ के अंतर्गत ‘कुछ अधिक समान लोगों’ के राजनीतिक हितों के लिए ‘कुछ कम समान लोगों’ को नियंत्रित करने की ये अनवरत अलोकतांत्रिक प्रक्रिया आगे किस ओर जाती है, यह अब समय के हवाले है.

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ज़ाहिर ही है, लोकतंत्र पर नियंत्रण के इस समय में नागरिक समाज के सवाल संदेहयुक्त और गैर-जायज होंगे. नए संशोधन को लाने के पीछे के कारणों पर बात करते हुए सरकार ने जो दो प्रमुख कारक गिनाए, वे काबिलेगौर हैं– एफसीआरए फंड के प्रति अधिक जवाबदेही और इस फंड का का बड़े स्तर पर धर्मांतरण और ऐसे ही दूसरे कामों में दुरुपयोग. गौरतलब है कि विदेशी चन्दा या फंड को लेकर आम समाज में जिस तरह की धारणाएं बनाई गई हैं, वे सरकार के उन दो प्रमुख कारकों से बहुत अलग नहीं हैं. इन्ही कारकों के नाते पहले ही विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एफसीआरए कानून के अंतर्गत नागरिक समाज सघन निगरानी के दायरे में है, जिसके तहत किसी भी संस्था को संस्थानिक खर्चों- गतिविधियों का पूरा ब्यौरा अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना होता है और साथ ही गृह मंत्रालय के संबंधित विभाग को भी भेजना होता है. यहां ध्यान देने योग्य है कि देश में नागरिक समाज को मिलने वाले विदेशी फंड की तुलना में कॉर्पोरेट द्वारा विदेशी फंड के इस्तेमाल का अनुपात लगभग तीन और 97 प्रतिशत का है. कॉर्पोरेट की तुलना में नागरिक समाज को मिलने वाली इतनी कम विदेशी राशि की निगरानी का काम गृह मंत्रालय का है, जबकि कॉर्पोरेट को मिलने वाली विदेशी राशि का लेखा-जोखा वित्त मंत्रालय के अधीन है. यहां सवाल उठता है कि एक ही प्रकार की राशि के साथ दो अलग बर्ताव क्यूं? वैसे लोकतंत्र पर अंकुश के दौर में ‘कुछ दूसरे कम समान’ के साथ समानता के व्यवहार की अपेक्षा क्या अब प्रासंगिक रह भी गई है?

नए संशोधनों की तार्किकता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि भारत सरकार के एफसीआरए डैशबोर्ड के मुताबिक देश में सक्रिय संस्थानों की कुल संख्या 22,447 के करीब है, जिनमें से 21915 संस्थाओं ने वर्ष 2018-19 का वार्षिक रिटर्न भरा है. कॉर्पोरेट ऋण के एनपीए के बोझ से लगातार दबती रिज़र्व बैंक के आंकड़ों की तुलना में नागरिक समाज के वार्षिक रिटर्न की तुलना खुद-ब-खुद स्पष्ट कर देती है कि नए संशोधनों का आधार नियमों का अनुपालन न होना (नॉन कंप्लायंस) तो बिल्कुल भी नहीं है.

नए संशोधनों के मुताबिक एफसीआरए के तहत प्राप्त अनुदानों को कोई बाइलैटरल फंडिंग एजेंसी किसी अन्य पात्र संस्था को मुहैया नहीं कर सकेगी. यह संशोधन सीधे समुदायों के साथ क्षेत्रीय स्तर पर काम करने वाले कमोबेश छोटे संगठनों को बड़े स्तर पर प्रभावित करेगा क्यूंकि फंड जुटाने के लिए ज़रूरी संपर्क और तकनीकी दक्षता की जो मदद अब तक दूसरे बड़े संस्थान मुहैया करा पा रहे थे, वो नए संशोधनों के अनुसार अब मुमकिन नहीं. नए संशोधनों के मुताबिक एफसीआरए फंड के अंतर्गत प्रशासनिक खर्चों की सीमा को अब 50% से 20% तक सीमित कर दिया गया है. इन संशोधनों को देखकर कोई भी आसानी से बता सकता है कि इन संशोधनों का मतलब निगरानी मात्र नहीं है. क्या सरकार यह मानती है कि भोजन का अधिकार, रोजगार गारंटी, सूचना का अधिकार, न्यूनतम आय, शिक्षा का अधिकार, गवर्नन्स, लैंगिक उत्पीड़न, लेबर रिफॉर्म आदि जैसे मुद्दों पर जन संगठनों के साथ सफल काम करने वाली संस्थाओं द्वारा शोध, ऐडवोकेसी, समझ के निर्माण जैसे बृहत्तर कार्यों की तकनीकी दक्षता वाले लोगों के लिए खुद अपनी आय जरूरी नहीं? या फिर यह अपने शोध, समझ, चर्चा, नेटवर्किंग से बृहत्तर समझ का निर्माण और उसके फलस्वरूप सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती संस्थाओं को घेरने का महज एक औज़ार है.

नए संशोधनों के अनुसार किसी भी संस्था में बोर्ड के सभी सदस्यों के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य किया जाना सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में आदेश के अनुसार किस तरह से प्रासंगिक है? संशोधनों के मुताबिक अब देश भर की संस्थाओं के लिए विदेशी अनुदान प्राप्त करने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की दिल्ली की एक ही शाखा में प्राथमिक खाता खोलना अनिवार्य होगा. गौर करने योग्य है कि देश में काम करने वाले संस्थानों में 93% संस्थान दिल्ली के बाहर अवस्थित हैं.

ऐसी सूरत में डिजिटल इंडिया के भारी प्रचार-प्रसार के बाद संस्थानों के विवरण की मॉनिटरिंग के नाम पर इस तरह केन्द्रीयकरण का औचित्य अब तक सरकार भी नहीं समझा सकी है. बहरहाल! नए संशोधनों के तहत संस्थानों की जांच के नाम पर जांच अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों की शक्ति में बेतरतीब इज़ाफ़ा कर दिया गया है, जिसका इस्तेमाल आने वाले समय में अपनी राजनीतिक मंशाओं के अनुरूप राजनीतिक पार्टियां बड़ी आसानी से कर सकती हैं. वर्ष 2013 में इंडियन एक्शन फॉर सोशल फोरम (इंसाफ) पर गृह मंत्रालय द्वारा एफसीआरए पंजीकरण का निरस्तीकरण इसका उदाहरण है, जिसे बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में निरस्त कर दिया था. हालांकि वर्ष 2016 में वापस गृह मंत्रालय ने इंसाफ के एफसीआरए पंजीकरण को बिना कोई कारण दिए नवीनीकृत (रिन्यू) करने से मना कर दिया.

वर्ष 2013 में जिस ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ की परिभाषा के अंतर्गत इंसाफ के पंजीकरण को खारिज किया गया था, उस मुद्दे पर बाद में इंसाफ द्वारा उच्चतम न्यायालय में संवैधानिक चुनौती दिए जाने के बाद यह आदेश भी आया कि बंद, हड़ताल या प्रतिरोध के तमाम अन्य तरीकों के आधार पर किसी भी संस्था को उसके विदेशी अनुदान लेने के न्यायिक अधिकार से महफूज नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने कहा कि किसी संस्थान द्वारा संचालित कोई भी तरीका (एक्शन) जोकि बिना किसी राजनीतिक उद्देश्यों के नागरिक अधिकारों की मदद या सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा हो– उस संस्थान को दंडित करने का कारण नहीं बन सकता. गौरतलब है कि वर्ष 2013 में संस्थानों के लिए ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ की जो व्याख्या अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने करते हुए नागरिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया था, उस ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ की परिभाषा को वर्ष 2010 में एफसीआरए कानून में संशोधनों के साथ राजनीतिक मंशाओं की पूर्ति के लिए ही लाया गया था. 2010 के ही संशोधनों के अंतर्गत जारी नियमावली में ट्रेड यूनियन जैसी तमाम इकाइयों को भी एफसीआरए के तहत ला दिया गया था.

इस पूरे मामले में राजनीतिक पार्टियों द्वारा विदेशी चन्दा, पैसा लिए जाने संबंधित एक दूसरे केस का उल्लेख प्रासंगिक होगा. वर्ष 2013 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और भारत सरकार में पूर्व सेक्रेटरी रहे ईएएस शर्मा द्वारा भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस द्वारा एफसीआरए कानून, 1976 का उल्लंघन करते हुए विदेशी स्रोतों द्वारा पैसा लिए जाने के विरुद्ध दाखिल एक पिटीशन पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में अपना आदेश सुनाया.

आदेश के अनुसार दोनों पार्टियों को कानून का उल्लंघन का दोषी माना गया और छ: महीने के भीतर चुनाव आयोग द्वारा दोनों पार्टियों पर उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया. ज़ाहिर ही है कि उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ दोनों ही पार्टियां उच्चतम न्यायालय गईं. इसके बाद वर्ष 2016 में फाइनेंस बिल के तहत एफसीआरए कानून के अंतर्गत ‘विदेशी स्रोत’ की परिभाषा में संशोधन किया गया जिसके तहत दोनों पार्टियों को उच्च न्यायालय ने दोषी करार किया था. वर्ष 2016 में उच्चतम न्यायालय इस केस में हुई बहस के अनुसार जब इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया कि 'विदेशी स्रोत' की परिभाषा में संशोधन 2010 के एफसीआरए कानून में किये गए हैं, जबकि उच्च न्यायालय का आदेश 1976 के कानून के अंतर्गत है तो दोनों पार्टियों ने उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय से अपनी अपील वापस ले ली. वर्ष 2017 में एडीआर और ईएएस शर्मा ने दिल्ली उच्च न्यायालय में 2014 के आदेश पर कोई कार्रवाई न होने की सूरत में कन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट का पिटीशन दाखिल किया. बाद में वर्ष 2018 में लोकसभा में फाइनेंस बिल के तहत 1976 के कानून में संशोधन भी कर लिया गया और सरकार ने राजनीतिक पार्टियों को विदेशी पैसे ले सकने की सहूलियत दिला दी.

हालांकि यहां यह भी रेखांकित किया जाना महत्वपूर्ण होगा कि 1976 के कानून की धारा 26 और 28 में निहित दंड के प्रावधान समावेशित होने के कारण यह कानून आपराधिक विधियों की श्रेणी में आता है और इस नाते न्याय के मूलभूत सिद्धांतों (बेसिक थ्योरी ऑफ लॉ) के अनुसार, 1976 के कानून में पूर्व प्रभावी (रेट्रस्पेक्टिव) तिथि से बदलाव नहीं किया जा सकता. बहरहाल! राजनीतिक पार्टियों को विदेशी चंदे का मामला अब ‘कुछ अधिक समान लोगों’ की व्याख्या के अंतर्गत कानूनी दांवपेच के हवाले है.

लेकिन क्या नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाली नागरिक समाज की अपेक्षाकृत छोटी इकाइयां सरकारों के राजनीतिक हितों के अनुरूप काम नहीं करने की एवज में सत्ता के दुरुपयोग के उनके इस चरित्र का शिकार बनती रहेंगी? रघुवीर सहाय के शब्दों में– एक भयानक समझौता है राजनीति में, हर नेता को एक नया चेहरा देना है- की तर्ज़ पर एफसीआरए के तमाम संशोधनों में राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज को अलग-अलग देखने के नजरिए पर एक खामोश समझौता हो चुका है जहां सरकार की जवाबदेही तय करते नागरिक समाज को दबाने की सामूहिक प्रक्रिया अपनी परिणति पर है. नए संशोधनों के कारण गिनाते वक़्त धर्मांतरण और हिंसा के जिन कारकों का आधार लिया गया, वे भी गौर करने योग्य हैं.

विदेशी अनुदान से धर्मांतरण जैसे कारक (आरोप भी) गिनाते वक़्त सरकार ने अपनी ओर से कोई आंकड़ा पेश नहीं किया है जिसके तहत अनुमान भी लगाया जा सके कि इन आरोपों में दम है. इसके उलट तमाम चैरिटी संस्थानों द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे महत्वपूर्ण काम से जुड़ी उपलब्धियां ज़रूर आंकड़ों में मौजूद हैं जो इन तमाम कारकों को खोखला बताती हैं. जहां तक हिंसा जैसे कारक का सवाल है, तो अमरीका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के हमलों के बाद ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ के तहत गठित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा दी गई विशेष संस्तुति (आठ) के मुताबिक तमाम देशों को इन संस्तुतियों के अनुसार अपने यहां गैर-लाभकारी संस्थाओं (नॉन- प्रॉफ़िट संस्थाओं) के भीतर नियामक तंत्र बनाए जाने की आवश्यकता पड़ी. इसके अंतर्गत गैर-लाभकारी संस्थाओं के भीतर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 114 से भी अधिक देशों ने नए नियम लागू किये.

एफएटीएफ ने वर्ष 2010 में भारतीय अधिकारियों से भी संपर्क किया जिसके बाद एफसीआरए कानून में नए संशोधन हुए. तो सरकार के हिंसा जैसे कारक का आधार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही यह प्रक्रिया भी है, जिसके तहत सरकार कह सकती है कि अंतर्राष्ट्रीय दवाबों के तहत वो ये कारक गिनने को विवश है. क्योंकि हिंदुस्तान में नागरिक समाज के आतंक के साथ जुड़ने का अब तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल सका है. इसके बजाय यदि वर्तमान एनडीए सरकार में मुख्य भारतीय जनता पार्टी की आनुषांगिक इकाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात की जाए तो मालेगांव ब्लास्ट से लेकर दूसरे मामलों में इसके सदस्यों के नाम आए हैं.

इसके बावजूद हैरानी की बात है कि विगत 5-6 वर्षों में 39 से भी ज्यादा देशों में अपनी शाखाएं खोलने और दिल्ली में 3.5 लाख वर्ग फुट के इलाके में संघ के नए ऑफिस के निर्माण कार्य के आरंभ के बाद भी इतनी बड़ी संस्था का पंजीकरण आज तक नहीं हुआ है. संघ की संरचना और कार्यप्रणाली पर अब तक तमाम सवाल किये जा चुके हैं. वर्ष 2018 में प्रकाश अंबेडकर ने भी संघ की कार्यप्रणाली पर सवाल करते हुए यह पूछा था कि इतनी बड़ी संस्था क्यूं इनकम टैक्स देने को बाध्य नहीं है. संघ की वेबसाइट पर जाने से स्पष्ट हो जाता है कि इतने बड़े पैमाने पर चंदा इकट्ठा करने के बावजूद न तो उनके वेबसाइट पर किसी चंदा देने वाली संस्था या व्यक्ति का नाम है, न ही बैलेंस शीट के साथ वार्षिक रिपोर्ट जैसा कोई दस्तावेज़ उपलब्ध है. नागरिक समाज से पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने को तत्पर सरकार ने क्यूं अब तक इन तमाम सवालों पर संघ की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की है, इसका अर्थ पुनः ‘कुछ अधिक समान लोगों’ वाले कथन से समझा जा सकता है.

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि नए संशोधनों का न्यायविदों के अंतर्राष्ट्रीय आयोग (इंटरनेशनल कमिशन ऑफ जयुरिस्ट्स) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समूह (यूएनएचआर) ने कड़ा विरोध किया है. यूएनएचआर ने नए संशोधनों को संघ की स्वतंत्रता के अधिकार (राइट तो फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन) और नागरिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के विरुद्ध इसे नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि (इंटरनेशनल कवनन्ट ऑन सिविल एंड पोलिटिकल राइट्स) के अंतर्राष्ट्रीय कानून, मानकों और सिद्धांतों का उल्लंघन माना है. यहां यह स्पष्ट ही है कि अंतर्राष्ट्रीय नियमावलियों/ संस्तुतियों में किसे मानना है और किसे नहीं, इसका चुनाव नए संशोधनों में अपनी सहूलियत से किया गया है.

इन सबके बीच सूचना के अधिकार के तहत गृह मंत्रालय से प्राप्त जवाब के अनुसार बड़े स्तर पर चंदा इकट्ठा करने के बावजूद पीएम केयर फंड भी एफसीआरए के अंतर्गत नहीं आता. गौर करने योग्य है कि पीएम केयर फंड की स्थापना महामारी के दौरान ही हुई थी. अब तक इस फंड में इकट्ठा की गई राशि या इसके अंतर्गत किये गए खर्चों का कोई विवरण नहीं मिल सका है. जबकि महामारी के ही दौरान राहत के सघन काम में अग्रणी भूमिका में रहने के लिए नागरिक समाज के कुल कार्यों को खुद प्रधानमंत्री और नीति आयोग ने सराहा है. नियमों के अनुसार नागरिक समाज के तहत सभी संस्थाओं को राहत के काम का पूरा ब्यौरा गृह मंत्रालय में जमा भी करना पड़ा है, जिसे इन सभी संस्थाओं ने पूरी जिम्मेदारी के साथ पूरा किया है.

ऐसी सूरत में अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ सच कहने का जोखिम उठाने वाले नागरिक समाज पर बढ़ती दबिश क्या नागरिक आवाजों को चुप कर सकेगी? रघुवीर सहाय के शब्दों में– वही लड़ेगा भाषा का युद्ध, जो सिर्फ अपनी भाषा बोलेगा. ‘आपदा में अवसर’ के अंतर्गत ‘कुछ अधिक समान लोगों’ के राजनीतिक हितों के लिए ‘कुछ कम समान लोगों’ को नियंत्रित करने की ये अनवरत अलोकतांत्रिक प्रक्रिया आगे किस ओर जाती है, यह अब समय के हवाले है.

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