यह दलित राजनीति की त्रासदी का स्वर्णिम काल है या पतनकाल?

दलितों के अधिकतर नेता या तो सत्ताधारी पार्टी में चले गए हैं या उससे गठबंधन में हैं. जो बचे हैं वे या तो इतने कमजोर हो गए हैं कि किसी दलित मुद्दे पर बोलने से डरते हैं या दलित मुद्दे उनकी राजनीति का हिस्सा ही नहीं हैं.

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यह दलित राजनीति की त्रासदी का स्वर्णिम काल है या पतनकाल?
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उत्तर भारत में जो दलित राजनीति बहुजन के नाम पर शुरू हुई थी वह उसके संस्थापक कांशीराम के जीवनकाल में ही सर्वजन में बदल गई थी जो विशुद्ध सत्ता की राजनीति थी और उसका दलित मुद्दों से कुछ भी लेना देना नहीं था. इसके पूर्व की डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआइ) अवसरवादी एवं व्यक्तिवादी नेताओं के सत्ता लोभ का शिकार हो कर इतने टुकड़ों में बंट चुकी है कि उनका गिना जाना मुश्किल है. यह उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद यही आरपीआइ जब तक दलित मुद्दों को लेकर जन आन्दोलन आधारित राजनीति करती रही तब तक वह देश में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी, परंतु जैसे ही कांग्रेस ने इसके सबसे बड़े नेता दादासाहेब गायकवाड़ को बड़े पद का लालच देकर फोड़ लिया तब से यह पार्टी कुछ लोगों की जेबी पार्टी बन कर कई गुटों में बंट गई और बेअसर हो गई.

रामदास आठवले भी इसी के एक गुट के नेता हैं जो भाजपा के साथ गठजोड़ करके सत्ता सुख भोग रहे है. रामविलास पासवान हमेशा ही सत्ताधारी पार्टी के साथ गठजोड़ करके मंत्री पद प्राप्त करते रहे. कांशीराम की बसपा पार्टी ने तीन बार घोर दलित विरोधी पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन करके मायावती के लिए मुख्यमंत्री पद प्राप्त किया. चंद्रशेखर भी कांशीराम की इसी राजनीति को आगे बढ़ाने की बात कर रहा है.

शायद चंद्रशेखर इस समय जो राजनीति कर रहा है वह उसको ही दलित राजनीति का स्वर्णिम काल कह रहा है. उसके अनुसार वह कांशीराम के मिशन को ही आगे बढ़ाने की राजनीति कर रहा है. यह किसी से छुपा नहीं है कि कांशीराम की राजनीति विशुद्ध सत्ता की जातिवादी/सांप्रदायिक अवसरवादी राजनीति थी जिसका न तो कोई दलित एजंडा था और न ही कोई सिद्धांत. वह तो अवसरवादी एवं सिद्धांतहीन होने पर गर्व महसूस करते थे. उन्होंने शुरुआत तो व्यवस्था परिवर्तन के नारे के साथ की थी परंतु बाद में वे उसी व्यवस्था का एक हिस्सा बन कर रह गए.

मायावती के चार बार मुख्यमंत्री बनने से भी उत्तर प्रदेश के दलितों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ जबकि उनके नाम पर बहुत सारे दलित और गैर-दलित नेताओं ने सत्ता का इस्तेमाल अपने विकास के लिए बखूबी किया. चंद्रशेखर ने भी इस समय बिहार के चुनाव में पप्पू यादव के साथ जो गठजोड़ किया है क्या वह दलित हित में है? पप्पू यादव कितना दलित हितैषी है यह कौन नहीं जानता कि वह इस समय किसको लाभ पहुंचाने का काम कर रहा है.

यह विचारणीय है कि चंद्रशेखर बिहार में बेमेल गठजोड़ की जो राजनीति कर रहा है वह कितनी दलित हित में है. वर्तमान में दलित राजनीति को बदलाव का रेडिकल एजंडा लेकर चलने की जरूरत है न कि कांशीराम मार्का अवसरवादी एवं सिद्धांतहीन राजनीति की. क्या केवल कोई सेना खड़ी करके लड़ाकू तेवर दिखाने से दलित राजनीति को आगे बढ़ाया जा सकता है क्योंकि इस प्रकार की सेनाओं के बहुत से प्रयोग पहले हो चुके हैं. वास्तव में वर्तमान में दलितों सहित समाज के अन्य कमजोर वर्गों एवं अल्पसंख्यकों की नागरिकता एवं मौलिक अधिकारों को बचाने के लिए जनमुद्दा आधारित जनवादी राजनीति की जरूरत है ना कि वर्तमान अधिनायकवादी, शोषणकारी राजसत्ता में हिस्सेदारी की. अतः अधोपतन, बिखराव, अवसरवाद एवं सिद्धांतहीनता की शिकार वर्तमान दलित राजनीति की त्रासदी को इसका स्वर्णिम युग कहना एक मसखरापन ही कहा जा सकता है.

(साभार जनपथ)

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