सौर ऊर्जा: लक्ष्य की ओर बढ़ने की बजाय पीछे चल रहा है भारत

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की नई फैक्टशीट से देश में सौर ऊर्जा की जमीनी हकीकत सामने आई.

सौर ऊर्जा: लक्ष्य की ओर बढ़ने की बजाय पीछे चल रहा है भारत
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सरकार का दावा है कि वो 2022 तक सोलर प्लांट से 100,000 मेगावाट बिजली पैदा करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगी. पर इस लक्ष्य का पूरा होना कितना मुश्किल है और इसके सामने क्या समस्याएं हैं, इसकी जमीनी हकीकत सीएसई की फैक्टशीट में सामने आई.

भारत ने 2022 तक अक्षय ऊर्जा की मदद से 175,000 मेगावाट बिजली के उत्पादन का लक्ष्य रखा था. जिसमें से 100,000 मेगावाट सौर ऊर्जा के जरिये हासिल की जाएगी. इसमें से 60,000 मेगावाट यूटिलिटी स्केल सोलर प्लांट और 40,000 मेगावाट रूफटॉप सोलर के जरिए प्राप्त की जाएगी. वहीं यदि लोकसभा की ऊर्जा पर बनाई गई स्थाई समिति द्वारा दिए आंकड़ों पर गौर करें तो उसके अनुसार मार्च 2020 तक देश में ग्रिड से जुड़े करीब 32,000 मेगावाट के सोलर प्लांट बनाए जा चुके हैं. जबकि जनवरी 2020 तक 87,380 मेगावाट के प्लांट विकास के विभिन्न चरणों में हैं. जिनके पूरा होने में वक्त है.

वहीं अगले 2 वर्षों में मंत्रालय 15,000 मेगावाट के लिए टेंडर जारी करने की योजना बना रहा है. हालांकि यह योजना पूरी होती हुई नहीं दिख रही है क्योंकि अगर पिछले 2 सालों में जारी किये गए टेंडरों पर नजर डालें तो उसमें से ज्यादातर नए टेंडर सफल नहीं हो सके हैं. और वो लगातार पिछड़ रहे हैं. ऊपर से कोविड-19 महामारी ने उसकी रफ्तार को और सुस्त बना दिया है. यह जानकारी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट द्वारा जारी फैक्टशीट में सामने आई है.

यदि पिछले पांच वर्षों अप्रैल 2014 से मार्च 2019 के बीच की प्रगति को देखें तो सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यह 2,600 मेगावाट से 28,000 मेगावाट पर पहुंच गया था. लेकिन पिछले दो वर्षों (2018-19 और 2019-20) से इसके विकास की गति में लगातार कमी आ रही है. जहां 2017-18 में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में 9,400 मेगावाट क्षमता की वृद्धि की गई थी. वो 2018-19 में घटकर 6500 मेगावाट और 2019-20 में 5700 मेगावाट रह गई थी.

वहीं 2019-20 के लिए एमएनआरई ने जो लक्ष्य निर्धारित किया था उसका सिर्फ तीन-चौथाई ही हासिल हो सका है. हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में यह लक्ष्य 23 फीसदी कम रखा गया था. इसके बावजूद वो हासिल नहीं हो सका है. जबकि जनवरी से मार्च 2020 के आंकड़ों को देखें तो क्षमता में केवल 730 मेगावाट की ही वृद्धि हुई है.

ऐसे में विकास की इस सुस्त रफ़्तार को देखकर यह कह पाना मुश्किल है, कि क्या सच में 2022 तक 60,000 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य भारत हासिल कर पाएगा. ऊपर से महामारी ने इस काम की रफ्तार को और कम कर दिया है. अनुमान है कि 2020 में केवल 5000 मेगावाट क्षमता का विकास किया जा सकेगा. जिसमें रूफटॉप सोलर भी शामिल है.

सीएसई द्वारा जारी फैक्टशीट में इसके लिए निम्न वजहों को जिम्मेवार माना है. पहला सोलर ऊर्जा की ज्यादा कीमत बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय समस्याओं को बढ़ा रही हैं. वितरण कंपनियां (डिस्कॉम), सौर ऊर्जा जनरेटर के लिए अपनी बकाया राशि का भी भुगतान करने में असमर्थ रही हैं. ऐसे में निवेश सम्बन्धी जोखिम बढ़ गया है. सीईए के अनुसार, नवंबर 2019 के अंत तक 342 आरई परियोजनाओं की बकाया राशि करीब 9,400 करोड़ रुपये थी. जिससे 14,560 मेगावाट क्षमता की बिजली परियोजनाओं पर असर पड़ा है.

यहां तक की सरकार द्वारा डिस्कॉम को दी गई सहायता के बावजूद भी ऐसे जोखिम के बने रहने की उम्मीद है. दूसरी मुख्य वजह टेंडरों का लगातार विफल होना है. नई परियोजनाओं के लिए किये जा रहे टेंडर लगातार विफल हो रहे हैं क्योंकि वो बिजली उत्पादन की लागत भी नहीं निकल पा रहे हैं.

राज्य सरकारों द्वारा 2.5 रुपये से 2.6 रुपये प्रति यूनिट की दर से शुल्क तय किया गया है. मई 2017 में भादला सोलर पार्क की नीलामी के लिए 2.44 रुपये प्रति यूनिट टैरिफ तय किया गया था. लेकिन यह शुल्क व्यवहार्य नहीं था. यही वजह थी कि 2018-19 में 8000 मेगावाट क्षमता के टेंडर रद्द कर दिए गए थे. जोकि उस वर्ष जोड़ी गई क्षमता से भी ज्यादा थे. यही वजह थी कि 2019-20 में एसइसीइ द्वारा की गई नीलामियों में प्रति यूनिट 2.55 से 2.71 रुपये का आकर्षक टैरिफ रखा गया था. जबकि उत्तर प्रदेश में प्रति यूनिट 3.02 से 3.38 रुपये शुल्क रखा गया था.

सुरक्षा शुल्क के कारण शुरुआती लागत में हो रही वृद्धि भी इसकी कमी की एक वजह है. घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने जुलाई 2018 में मॉड्यूल पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाया था. जिसको अगले छह महीने के लिए 20 फीसदी और बाद के छह महीने के लिए 15 फीसदी की दर तय की गई थी. लेकिन भारत की उत्पादन क्षमता सीमित है. अभी भारत में मौजूदा 10,000 मेगावाट मॉड्यूल और 3,000 मेगावाट सेल निर्माण की क्षमता है, जो लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है. ऊपर से जीएसटी प्रोजेक्ट की लागत को और बढ़ा रहा है.

ऐसे में देश में सौर ऊर्जा का भविष्य क्या होगा और इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है यह विचार करने का विषय है. जिससे नीतियों में बदलाव करके लक्ष्यों को हासिल किया जा सके.

लॉकडाउन की वजह से सोलर पैनल तक पहुंची ज्यादा धूप

इसी बीच दिल्ली में कोरोनावायरस के कारण जो लॉकडाउन किया गया था उससे न केवल हवा की गुणवत्ता में सुधार आया है, बल्कि इसके कारण सौर ऊर्जा के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है. यह जानकारी सेल प्रेस जर्नल जूल में छपे एक नए अध्ययन से मिली है.

शोधकर्ताओं के अनुसार लॉकडाउन की वजह से दिल्ली ही नहीं दुनिया के अन्य हिस्सों में भी हवा की गुणवत्ता में सुधार आया है. अनुमान है कि इसकी वजह से दिल्ली में सोलर पैनल तक करीब 8.3 फीसदी ज्यादा सूर्य की किरणें पहुंच पायी, जिसके कारण सौर ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि हुई है.

जर्मनी के हेल्महोल्त्ज़-इंस्टीट्यूट एर्लांगेन-नूर्नबर्ग से जुड़े शोधकर्ता और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक इयान मारियस पीटर्स ने बताया, “दिल्ली, दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है.जिस तरह से इस महामारी को रोकने के लिए अचानक से कठोर कदम उठाए गए और लॉकडाउन लागू किया गया. उससे वायु प्रदूषण में एकाएक कमी आ गई, जिसका आसानी से पता लगाया जा सकता है.”

पीटर्स और उनके सहयोगियों ने इससे पहले भी दिल्ली सहित अन्य शहरों में एक अध्ययन किया था, जिसमें उन्होंने यह समझने का प्रयास किया था कि धुंध और वायु प्रदूषण के कारण जमीन तक पहुंचने वाली धूप पर कितना असर पड़ता है. इसके साथ ही सोलर पैनल और सौर ऊर्जा के उत्पादन पर वायु प्रदूषण का कितना असर पड़ता है.

इस शोध से पता चला है कि मार्च 2020 में 2017 से 2019 की तुलना में 8 फीसदी से ज्यादा विकिरण जमीन तक पहुंचा था. शोधकर्ताओं के अनुसार इस बीच धरती तक पहुंचने वाला विकिरण दोपहर में 880 वाट प्रति स्क्वायर मीटर से 950 वाट प्रति स्क्वायर मीटर तक पहुंच गया था. जिसके पीछे की बड़ी वजह वायु प्रदूषण में आई गिरावट थी.

वैज्ञानिकों को पूरा विश्वास है कि इस शोध से मिले आंकड़ों और पहले के निष्कर्षों कि मदद से सौर ऊर्जा पर वायु प्रदूषण के असर को समझने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही शोधकर्ताओं को पूरी उम्मीद है कि केवल दिल्ली में ही नहीं जहां भी लॉकडाउन की वजह से हवा साफ हुई है, वहां सौर ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि हुई होगी.

पीटर्स के अनुसार यह महामारी कई मायनों में बहुत नाटकीय रही है. दुनिया पहले जैसी नहीं रही, जब तक यह महामारी खत्म होगी, बहुत कुछ बदल चुका होगा.इसने हमें एक मौका दिया है कि हम देख सकें की साफ हवा में दुनिया कैसी दिखती है.इसने हमें एक मौका दिया है कि हम तेजी से बढ़ते तापमान को रोक सकें और क्लाइमेट कर्व को फिर से समतल कर सके. इसमें सौर ऊर्जा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. जिसकी मदद से ने केवल तापमान में हो रही इस वृद्धि को रोका जा सकता है. बल्कि साथ ही इससे वायु प्रदूषण में भी कमी आ सकती है. जिसकी मदद से हम फिर से खुले नीले आसमान और साफ हवा में सांस ले सकते हैं.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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