जिएं तो बंधक, मरे तो मुक्ति

हरियाणा के कुरुक्षेत्र से मुक्त हुए 80 बंधुआ मजदूरों की दर्दनाक कहानी.

WrittenBy:बसंत कुमार
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दिल्ली के सराय काले खां में बने एक शेल्टर होम के खुले लॉन में बैठी पूनम देवी लगातार रोए जा रही अपनी दो साल की बेटी को चुप कराते हुए कहती हैं, “चुप हो जाओ नहीं तो ‘बाबू’ आ जाएगा.” बाबू यानी जिस ईंट भट्ठे पर पूनम अपने गांव के कई अन्य मज़दूरों के साथ काम करती थीं उसका मालिक. चार दिन पहले ही पूनम अपने साथी मज़दूरों को साथ मालिक के बंधन से मुक्त होकर दिल्ली आई हैं. अपने 40 से ज़्यादा मज़दूर साथियों को बंधुआ मज़दूरी से मुक्त कराने में पूनम की बड़ी भूमिका रही है.

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बिहार के बांका जिले के दोरिया थाने के चांदपुर गांव की रहने वाली 25 वर्षीय पूनम दो बेटियों की मां हैं. बंधक बनाकर लगातार हुए शोषण के चलते पूनम इतनी कमजोर हो गई थीं कि साफ़-साफ़ बोल भी नहीं पा रही थीं. ऐसी हालत में लगातार रो रही दुधमुंही बेटी को चुप कराने में उनकी सांस फूल जा रही थी. बेटी को चुप कराने के बाद पूनम बोलती हैं, ”बाबू (ईंट भट्ठे का मालिक) और उसके लोगों का डर हम मजदूरों और बच्चों के मन में समा गया है. आठ महीने तक हम सब वहां (हरियाणा के कुरुक्षेत्र में) मर-मर के काम किए. लेकिन ना भरपेट कायदे का खाना खाने को मिला, न इज्जत. काम के बदले मार खाते थे. मुझे रात में दिखना बंद हो गया है. बहुत मुश्किल से हम उस नरक से निकले हैं.”

उन्हीं के बीच मौजूद भूषण कुमार लैया जो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बंधुआ मज़दूर बनाए गए थे, कहते हैं, ”आदमी तो मरने के बाद नरक देखता है. हम लोग जिन्दा रहते ही नरक भोग आए. गांव से अखिलेश कुमार और युगल चौहान कहकर लाए थे कि यहां, गांव में भिखारियों की तरह जी रहे हो. बाहर चलो कमाओगे तो ज़िन्दगी बन जाएगी. बिना खाए सोना नहीं पड़ेगा. उघारे (बिना कपड़ों के) रहना नहीं पड़ेगा. लेकिन यहां तो अलग ही दुनिया मिली. खूब काम भी किया और बदले में भूखे पेट सोना पड़ा. ये मेरा बेटा है. इसे दूध ही नहीं मिला पीने के लिए. इसकी मां को भी दूध नहीं आता है. चार-पांच महीने के बाद ही हमने इसे चावल खिलाना शुरू कर दिया. देख रहे हैं कितना बीमार लग रहा है.”

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बिहार के बांका और शेखपुरा जिले के रहने वाले 22 परिवारों के 80 बंधुआ मज़दूरों को हाल ही में हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के कमला बीकेओ ईंट भट्ठे से मुक्त कराया गया है. कमला बीकेओ ईंट भट्टा कुरुक्षेत्र शहर से 30 किलोमीटर दूर पेहवा तहसील के दीवाना गांव में स्थित है. यहां से जिन मज़दूरों को छुड़ाया गया है उनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. मज़दूरों का आरोप है कि छोटे-छोटे बच्चों को भी काम नहीं करने पर बुरी तरह मारा-पीटा जाता था.

कुरुक्षेत्र के बीकेओ ईंट भट्ठे पर बंधक बनाकर रखे गए ये सभी मज़दूर महादलित समुदाय से हैं. बिहार में इनके पास रहने के लिए अपना मकान तक नहीं है. सरकारी जमीन पर झुग्गी-झोपड़ी बनाकर रहने को मज़बूर इन मज़दूरों की गरीबी का फायदा उठाकर इन्हें अच्छी मजदूरी का लालच दिया गया. बांका जिले के ही रहने वाले अखिलेश कुमार और युगल चौहान ने इन परिवारों से तमाम वादे कर कुरुक्षेत्र ले गए. वहां इन्हें बीकेओ ईंट भट्ठे पर ईंट पाथने का काम मिला. आरोप है कि वहां इन्हें बंधक बनाकर रखा गया, ना समय पर खाने को दिया जाता था और ना ही किसी को अकेले बाहर जाने की इजाजत थी. आठ महीने तक ये 80 लोग वहां बंधक बने रहे. 28 जून को बंधुआ मज़दूरों के लिए काम करने वाली संस्था नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ़ बोंडेड लेबर, बंधुआ मुक्ति मोर्चा और ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क ने मिलकर इन्हें आज़ाद कराया. कुरुक्षेत्र पुलिस का भी इसमें योगदान रहा.

35 वर्षीय अष्टमा देवी अपने दो बच्चों और पति संजय लैया के साथ अक्टूबर 2018 में बांका जिले से कुरुक्षेत्र काम करने आई थी. अखिलेश कुमार और युगल चौहान ने इन्हें भी बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए थे. अष्टमा जब गांव से चली तो गर्भवती थीं. इन पर गांव के जमीदार का कर्ज था. युगल और अखिलेश ने इन्हें 15 हज़ार रुपए एडवांस दिए और कुरुक्षेत्र ले आए. अष्टमा देवी बताती हैं, ”मैं पेट से हूं, ये बात मैंने उन्हें गांव में ही बता दिया था. तब उन्होंने कहा था कि तुम कम काम करना. तुम पर काम का दबाव नहीं रहेगा, लेकिन यहां आकर दिनभर काम कराते थे. तीन चार महीने तो काम करती रही, लेकिन जब दर्द बढ़ने लगा और काम करना मुश्किल हो गया तो बीच-बीच में उठकर झोंपड़ी में चली जाती थी. तब वो लोग गाली देते थे. मैं और मेरे पति जिस दिन एक हज़ार ईंट नहीं बनाते थे उस दिन हमें देर रात तक रोके रखा जाता था. अक्सर इसे लेकर मजदूरों की भट्ठे के मैनेजर से कहासुनी होती थी. एक दिन भट्ठे का मैनेजर पिंटू मुझे गालियां दे रहा था. मेरे पति ने गाली देने से मना किया तो नाराज होकर पिंटू ने लाठी मारकर उनका हाथ तोड़ दिया.”

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अष्टमा देवी न्यूज़लॉन्ड्री को बताती हैं, ”जब मुझे बच्चा होने वाला था तो कोई इलाज का इंतज़ाम नहीं कराया गया. छुट्टी मांगने पर गाली देते थे. एक दिन आशा वर्कर भट्ठे पर आई तो उन्हें सारी बात बताई. उसके बाद उन्होंने मेरा ख्याल रखा. जिस रोज बच्चा होने वाला था उस दिन बहुत विनती करने पर उन्होंने कुछ पैसे दिए तो हम पेहवा सरकारी अस्पताल में पहुंचे. यहां मुझे बेटी हुई. एक दिन बाद अस्पताल से हम भट्ठे पर लौट आए. लौटने के पांच-छह दिन बाद से मैनेजर काम पर लौटने के लिए दबाव डालने लगा. मज़बूरन काम पर लौटना पड़ा. जिस कमरे में हम रहते थे उसमें गेट नहीं था तो बेटी को मैं काम पर साथ ले जाती थी. धूप और चिमनी की गर्मी से इसके देह में दाने निकल गए. दाने अब घांव बन गए हैं. दर्द से कराहती रहती है. अखिलेश और युगल ने तो कहा था कि वहां जाकर जिंदगी बदल जाएगी.”

केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2014 से 2016 तक 20,510 मामले बंधुआ मज़दूरी और मानव तस्करी के सामने आए हैं. हाल ही में लोकसभा में गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने लिखित रूप दिए जवाब में बताया था कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार साल 2014, 2015 और 2016 में क्रमशः 5,235, 7,143 और 8,132 मानव तस्करी और बंधुआ मज़दूरी के मामले सामने आए. बंधुआ मज़दूरी और मानव तस्करी के मामले एनसीआरबी एक में ही जोड़ता है. 2016 के बाद से एनसीआरबी की रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की गई है. गृह राज्यमंत्री द्वारा दिए गए आंकड़ों को देखे तो 2014 से 2016 तक बिहार में 180, गुजरात में 991, झारखंड में 485, महाराष्ट्र में 1,574, ओडिशा में 922, राजस्थान में 3,148, तमिलनाडु में 1,277, उत्तर प्रदेश में 126, पश्चिम बंगाल में 7,446, दिल्ली-एनसीआर में 443 बंधुआ मज़दूरी और मानव तस्करी के मामले सामने आए थे.

एनसीआरबी के आंकड़े पर बंधुआ मुक्ति मोर्चा के प्रमुख स्वामी अग्निवेश कहते हैं, ”सरकार भले ही इतने कम आंकड़े दे रही हो, लेकिन देश में अभी लाखों की संख्या में बंधुआ मज़दूर मौजूद हैं. सरकार आंकड़े कम बताती है. इस मामले (कुरुक्षेत्र वाले) में भी स्थानीय अधिकारियों ने कोशिश की थी कि इन मज़दूरों को बंधुआ मज़दूर मानने से इनकार कर दिया जाए. जब हमारे सहयोगी निर्मल गोहाना के नेतृत्व में टीम ने इन्हें ईंट भट्ठे से मुक्त कराया तो अधिकारियों ने भट्ठा मालिक से हज़ार-हज़ार रुपए दिलाकर मामले को ख़त्म कराने की कोशिश की. जब मज़दूर यहां आए और उन्होंने अपनी कहानी बताई तो हम हैरान रह गए. इन्हें काम के बदले सिर्फ राशन दिया जाता था. हाथ में एक रुपए नहीं दिए जाते थे. मारा जाता था. गाली दी जाती थी. हमने हरियाणा के सीनियर अधिकारियों से बात की. उन्हें पूरी कहानी बताई तब जाकर हरियाणा की मुख्य सचिव की आदेश पर इन्हें मुक्ति प्रमाण पत्र दिया गया. अभी भी मुक्ति प्रमाण पत्र के साथ मिलने वाला बेसिक मुआवजा (20 हज़ार रुपए) इन्हें नहीं मिला है. वो भी दिलाने की हम कोशिश कर रहे हैं. स्थानीय अधिकारियों की शह पर ही देश के तमाम हिस्सों में अभी तक बंधुआ मज़दूरी का सिलसिला जारी है.”

अखिलेश कुमार और युगल चौहान के कहने पर 40 वर्षीय मनकी देवी अपने पति शमशेर लैया के साथ कुरुक्षेत्र काम करने आई. इनको भी दोनों ने 15 हज़ार रुपए एडवांस दिया था. यहां आने के बाद इनका शोषण शुरू हुआ. मनकी देवी के पति शमशेर को भट्ठे के मुनीम इंद्रपाल और मैनेजर पिंटू बुरी तरह से मारते थे. शमशेर की पिटाई भट्ठे के आस-पास मौजूद दुकानदारों ने भी देखा है. ईंट भट्ठे के मालिक रसूख वाले हैं. जिसके डर से लोग अपना नाम बताने से बचते हैं. भट्ठे से एक किलोमीटर दूर सड़क किनारे किराने की दुकान चलाने वाले जयदीप (बदला नाम) बताते हैं कि शमशेर को कई बार मार खाते हमने देखा है. एक बार तो मेन रोड से भट्ठे तक उसे मारते हुए ले गए. दौड़ा-दौड़ा कर मारते थे. वो शराब पीता था. ये नहीं चाहते थे कि कोई भी शराब पीये ताकि काम में रुकावट आए न आए. वो कभी-कभार दुकान पर आता था तो बताता भी था. हम भी क्या ही मदद करते उसकी. भट्ठे वाले बड़े लोग हैं.

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मनकी देवी बताती हैं, “जिस दिन हमें छुड़ाया गया उसके एक दिन पहले उन लोगों ने मेरे पति को बहुत मारा. खाने को नहीं मिलने के कारण शमशेर बेहद कमजोर हो गया था. उस शाम जब मुनीम मुझे गाली दे रहा था तो शमशेर भी नाराज़ हो गया. मर्द कैसे सहता अपने आंखों के सामने बीबी को गाली सुनते. शमशेर तो कमजोर हो गया था. उन लोगों ने लाठी डंडे से उसे बहुत मारा. डर के मारे वो रात में ही कही भाग गया. आज दस दिन हो, लेकिन वो लौट कर नहीं आया. ना जाने कहां है वो. मैं अकेले यहां चली आई. गांव में बच्चे हैं. मैं अकेले क्या करूंगी. उसे ढूढ़ने के लिए मेरे पास कोई जरिया नहीं है.’’

मनकी देवी बताती हैं, ”अखिलेश और युगल ने गांव में हमसे कहा था कि हज़ार ईंट पाथने के बदले 660 रुपए मिलेंगे. शुरुआत के चार-पांच महीने तक हाथ से ही मिट्टी तैयार करना पड़ता था. पानी भरकर लाते थे और मिटटी तैयार करते थे. जिस वजह से हम रोजाना हज़ार ईंट नहीं बना पाते थे. जब ईंट की मांग बढ़ने लगी तब जाकर मिट्टी बनाने की मशीन लाई गई. तय करके तो लाए तो कि हज़ार ईंट के बदले 660 रुपए मिलेंगे लेकिन दस महीने तक काम करने के बाद हमारे हाथ में एक रुपया नहीं दिया गया. महीने में दो बार मुनीम हम सभी मज़दूरों को ट्रैक्टर ट्रॉली में बैठाकर बाजार ले जाता था. वहां सबको 15 दिनों के लिए 1200 रुपए का आनाज दिलाया जाता था. परिवार में दो लोग हो या पांच हो सबको 1200 रुपए तक का ही आनाज दिलाया जाता था. अगर किसी को बिस्कुट लेना हो या दूध लेने हो तो वो 1200 में से ही ले सकता है. ये 1200 रुपए हमारे हाथ में नहीं मिलते थे. मुनीम सीधे दुकानदार को देता था. 1200 रुपए के राशन में चार लोगों का परिवार 15 दिनों तक खा-पी सकता है? हम लोग भी नहीं खा पाते थे. भूखे रहना पड़ता था. दो-तीन दिन तो भात-नमक खाकर रात गुजारते थे. जिनके बच्चे थे वो अपने बच्चों को दूध तक नहीं पिला पाते थे. अगर कोई कभी बीमार पड़ जाता था और इलाज के लिए एकाध सौ रुपए लेने पड़ते थे तो अगली बार राशन खरीदने जाने पर उतने पैसे काटकर राशन दिलाते थे.”

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पूनम बताती हैं, “ईंट भट्ठे के मालिक और उनके लोगों का अन्याय बढ़ता जा रहा था. मैं इससे पहले राजस्थान में भी भट्ठे पर काम कर चुकी हूं. वहां कई मज़दूर संगठन थे. संगठन वालों की वजह से मालिक या ठेकेदार कोई भी हमें परेशान नहीं करता था. मेरे पास मज़दूरों के संगठन से जुड़े मदन सर का नंबर था. यहां मुनीम और मैनेजर ने सबके फोन छीन लिए थे. सिर्फ मैं अपना फोन छुपाकर रखी थी. एक दिन मौका देखकर मदन सर को फोन किया और उन्हें एक-एक बात बताई.”

राजस्थान प्रदेश ईंट भट्टा यूनियन से जुड़े मदन वैष्णव ने न्यूज़लॉन्ड्री को फोन पर बताया, ”पूनम और उनके पिता भोलेनाथ भीलवाड़ा में काम करने आए थे. वहां ये हमारे यूनियन के सदस्य बन गए. पूनम ने उस रोज मुझे फोन किया और बताया की उनके साथ लगातार मार-पीट की घटनाएं हो रही है. उनसे ज़बरदस्ती देर रात तक काम कराया जा रहा है. कम ईंट बनाने पर मारकर हाथ तोड़ दे रहे हैं. मैं राजस्थान में काम करता हूं. कुछ व्यस्तता थी तो मैंने इसकी जानकारी बंधुआ मुक्ति मोर्चा के निर्मल गोहाना को दी. उनकी कोशिश की वजह से इन्हें वहां से मुक्त कराया गया है और मुक्ति प्रमाण पत्र दिलवाया गया है. अभी मैं बिहार में उन मज़दूरों से मिलने आया हूं. इनसे बात करके हालात मालूम हुए उसके बाद भट्टा मालिक पर बंधुआ मज़दूरी कराने के मामले के साथ-साथ मानव तस्करी का मामला भी बनता है.’’

पूनम देवी द्वारा भट्ठे पर हो रहे अमानवीय कृत्य की जानकारी मिलने के बाद बंधुआ मुक्ति मोर्चा के निर्मल गोहाना अपनी टीम के साथ कुरुक्षेत्र पहुंचे और स्थानीय प्रशासन की मदद से उन्होंने इन मजदूरों को मुक्त कराया. निर्मल गोहाना न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ”हमें इस घटना की जानकारी मिली तो हमने एक टीम का गठन किया. उसके बाद ईमेल के जरिए कुरुक्षेत्र के जिलाधिकारी, एसीपी और पेहवा के एसडीएम को कप्लेन भेजा. अधिकारियों से हमने फोन पर बात की और फिर 28 जून की सुबह हम कुरुक्षेत्र पहुंच गए. वहां एसडीएम के नेतृत्व में एक टीम का गठन हुआ. जिसमें तहसीलदार, लेबर अफसर और पेहवा पुलिस थाने के कुछ पुलिसकर्मी थे. वहां पहुंचकर छापा मारने की कार्रवाई हुई. मज़दूरों का बयान दर्ज हुआ. भट्ठे का मालिक तब वहां मौजूद नहीं था. उसके पिताजी वहां थे उनसे बातचीत की गई. मालिक से हर परिवार को एक-एक हज़ार रुपए दिलवाये गए.”

प्रशासन ने मज़दूरों को मुक्त करवाने के बाद बीकेयू ईंट भट्ठे पर आईपीसी की धारा 342 और बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 की धारा 16 के तहत मामला दर्ज किया है. निर्मल गोहाना कहते हैं, ”इस मामले में प्रशासन ने जानबूझकर आईपीसी की धारा 342 के तहत मामला दर्ज किया है जबकि मालिकों पर आईपीसी की धारा 370, जेजे एक्ट, एससी-एसटी एक्ट और वर्क प्लेस पर शोषण संबंधी धाराओं के तहत मामला दर्ज होना चाहिए था. मज़दूरों को छुड़ाए जाने के 17 दिन बाद भी इस मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है.”

न्यूज़लॉन्ड्री इस पूरे मामले की तह में जाने के लिए कुरुक्षेत्र के उस दिवाना गांव पहुंचा जहां बीकेओ ईंट भट्ठा मौजूद है. पंजाब और हरियाणा के सीमा वाले इस इलाके में काफी संख्या में ईंट भट्ठे मौजूद हैं. जहां काम करने के लिए ज़्यादातर मज़दूर बिहार और यूपी से आते है. हर साल ईंट भट्ठे में अक्टूबर से ईंट बनाने का काम शुरू होता है जो बरसात शुरू होने से पहले जून-जुलाई तक चलता है.

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देश के हर हिस्से में ईंट भट्ठे पर काम करने वाले मज़दूरों को मालिक महीने-महीने वेतन नहीं देते हैं. बल्कि मज़दूरों को काम पर आते वक़्त किसी को दस हज़ार तो किसी को पंद्रह हज़ार रुपए एकमुश्त एडवांस के तौर पर दिया जाता है. मज़दूर जब काम पर आते हैं तो काम खत्म होने के बाद यानी लगभग दस महीने बाद उनका हिसाब किया जाता है. इस बीच उन्हें कहीं राशन दिलाया जाता है तो कही महीने के हिसाब से राशन के लिए पैसे दिए जाते है. कुरुक्षेत्र के इस भट्ठे पर मज़दूरों को महीने में दो दफा 1200-1200 रुपए का राशन दिलाया जाता था.

जिस ईंट भट्ठे से मज़दूरों को मुक्त कराया गया है उसकी शुरुआत सुभाष गुप्ता ने 20 साल पहले किया था. इनका दो ईंट भट्टा दीवाना गांव में चल रहा है. अब इसे सुभाष गुप्ता के बेटे मिंकू और अजय गुप्ता चलाते हैं. जब ये रिपोर्टर कमला बीकेओ ईंट भट्ठे पर पहुंचा तो ईंट पाथने वाले ज़्यादातर मज़दूर अपने गांव लौट चुके थे. भट्ठे पर मौजूद कुछ मज़दूरों से हमने बात करने की कोशिश की तो वहां मौजूद मुनीम ने मिंकू से बात करने के बाद हमें मज़दूरों से बात करने से रोक दिया. कुछ मज़दूर हमसे अपनी परेशानियों का जिक्र करना चाहते थे लेकिन उन्हें जबरन धमका कर वहां से हटा दिया गया. थोड़ी देर बाद मिंकू और अजय गुप्ता गांव के प्रधान और कुछ लोगों के साथ भट्ठे पर पहुंचे.

मिंकू, जो अब ईंट भट्ठे का मालिकाना संभालते हैं, से हमने इस मामले में बातचीत की. मिंकू बातचीत के दौरान मज़दूरों द्वारा लगाए गए आरोपों का ठीक से जवाब नहीं दे पा रहे थे. हर सवाल के जवाब में वे कहते रहे कि हमें फंसाया जा रहा है. मिंकू से हो रही बातचीत को हम रिकॉर्ड कर रहे थे. इसी बीच मिंकू का भाई अजय गुप्ता एक व्यक्ति के साथ वहां पहुंचता है जो खुद को वकील बता रहा था. खुद को वकील बताने वाले शख्स ने वहां पहुंचते ही हमारा फोन अपने हाथ में ले लिया और जो कुछ हमने रिकॉर्ड हुआ था उसे डिलीट कर दिया. वकील ने मिंकू को बाहर ले जाकर समझाया और फिर वहां से अजय गुप्ता के साथ निकल गया. वकील के जाने के बाद हमने मिंकू से बातचीत की. पूरी बातचीत स्टोरी के अंत में पढ़ें.

मिंकू कहते हैं कि हमने मज़दूरों के सारे हिसाब कर दिए फिर भी हमें फंसाया जा रहा है. जब हमने मिंकू से मज़दूरों को किए गए भुगतान की कॉपी की मांग की तो उन्होंने कोई भी कागज होने से इंकार कर दिया. मिंकू हमसे दावा करते हैं कि उन्होंने मज़दूरों का हिसाब कर दिया है और उनके जो पैसे बनते थे उन्हें दे दिया है. लेकिन मज़दूरों की माने तो उनको एक रुपए भी नहीं मिला है. जिस रोज उन्हें मुक्त करवाया गया उसी दिन प्रशासन ने सुभाष गुप्ता से हर मज़दूर परिवार को एक-एक हज़ार रुपए दिलवाये थे. मज़दूरों के अनुसार मालिक पर उनके 7 लाख 50 हज़ार रुपए बनते हैं. वहीं मालिक के अनुसार 55 हज़ार का टूट मज़दूरों पर उनका है.

दूसरी बात मिंकू कहते हैं कि मज़दूरों को ठेकेदार अखिलेश कुमार और युगल चौहान लाये थे. मतलब इन दोनों से मिंकू की बातचीत होगी ही? मिंकू के अनुसार बीस दिन के अंतराल के बाद दोनों मज़दूरों से मिलने आते थे. तो क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि मिंकू के पास इन दोनों ठेकेदारों का नंबर नहीं होगा. जबकि अखिलेश खुद ही न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं कि जिस दिन मज़दूरों को रेस्क्यू किया गया उस दिन मिंकू ने उन्हें फोन किया था. तब मिंकू ने कहा था कि भट्ठे पर आ जाओ तुम्हारे मज़दूरों ने हंगामा किया हुआ है. मतलब मिंकू कुछ छुपा रहे हैं?

मज़दूरों का भट्ठे पर लाना एक ‘व्यवसाय ‘

ईंट भट्ठे पर काम के लिए मज़दूरों का लाना एक ‘व्यवसाय’ है. जिसमें ठेकेदार लाखों की कमाई करते हैं. ऊपर हमने मज़दूरों पर पैसों की टूट का जिक्र किया है. यही टूट इन मज़दूरों को बंधुआ मज़दूरी की दलदल में फंसाता है. दीवाना गांव में ही भट्टा चलाने वाले पंकज गुप्ता बताते हैं कि दरअसल बिहार-यूपी से मज़दूरों का लाने से पहले उन्हें मोटा एडवांस देना पड़ता है. जब मज़दूर यहां आते हैं तो हर महीने एडवांस लिए रुपए में से कुछ-कुछ करके चुकाते हैं. मज़दूरों को हम हर महीने खाने के पैसे देते हैं. कुछ लोग राशन भी देते हैं. साल के आखिरी में जब फाइनल हिसाब होता है तब देखा जाता है कि मज़दूरों ने जो एडवांस लिए थे वो चुकाए या नहीं. कई बार मज़दूरों का हम पर बनता है और कई बार हमारा उन पर गिरता है. उन पर जो हमारा बनता है वो ही टूट कहलाता है.

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जिस दिन हम कुरुक्षेत्र पहुंचे उसी दिन कमला बीकेओ ईंट भट्ठे पर जलाने का काम करने वाले मज़दूरों का हिसाब हो रहा था. उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रहने वाले राजीव (बदला नाम) जो अपने यहां से दस से ज़्यादा संख्या में मज़दूर लेकर यहां आये थे न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि ‘’मैं सुपरवाइज़र हूं और मेरे साथ लगभग दस मज़दूर हैं. मेरी मज़दूरी महीने के 18 हज़ार और बाकी मज़दूरों की मज़दूरी 13 हज़ार रुपए तय किया गया था. जब मैं मज़दूरों को लेकर आया तब जलाने का काम शुरू नहीं हुआ था. तो बाबू ने कहा कि कुछ महीने तक पथाई का काम कर लो जब जलाने का काम शुरू हो जाए तो अपना काम कर लेना. हमने कोई एक से डेढ़ महीने तक पथाई का काम किया, लेकिन आज जब हिसाब हो रहा है तो ये तीन महीने तक की पथाई का हिसाब दे रहे हैं और बाकी महीनों के जलाई के. इस तरह इनका हमारे पर लाखों का टूट आ रहा है. जबकि हमारा इन पर बनता है. हम गरीब लोग है. क्या ही कर सकते है. घर जाने तक के पैसे नहीं बचे हैं.’’

इन मज़दूरों को बिहार से युगल चौहान और अखिलेश लेकर आए थे. इन्होंने ने ही मज़दूरों को एडवांस रुपए दिए थे. युगल और अखिलेश को मज़दूर लाने की ज़िम्मेदारी शिव कुमार ने दिया था. शिव कुमार बड़े ठेकेदार हैं. तीनों बिहार के ही रहने वाले हैं. अखिलेश, शिव कुमार का रिश्ते में भांजा लगता है. हरियाणा के कई जिलों में मज़दूरों को लाकर काम कराने का ठेका शिव कुमार सालों से कर रहे हैं. ईंट-भट्टा मालिक मज़दूरों के लिए सीधे शिव कुमार से सम्पर्क करते हैं. इसके बाद शिव कुमार युगल और अखिलेश जैसे कई लोगों को मज़दूर लाने की ज़िम्मेदारी देते हैं. भट्टा मालिक से मज़दूर लाने के एवज में एडवांस रुपए शिव कुमार लेता था. अपना कमीशन रखकर अखिलेश और युगल जैसे ठेकेदारों को कुछ रुपए दे देता था. युगल और अखिलेश इन रुपए में से अपना कमीशन रखकर मज़दूरों को एडवांस देते थे.

न्यूज़लॉन्ड्री ने शिव कुमार से बात करने की कोशिश की लेकिन शिव कुमार ने बात नहीं की. शिव कुमार का नंबर हमें उनके बेटे ललित ने ही दिया था. लेकिन शिव कुमार ने बार-बार अपना गलत नाम बताकर फोन काट दिया. इसके बाद हमने अखिलेश से बात की. अखिलेश ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, ”ये काम हम सालों से कर रहे है. आज तक किसी मज़दूर ने कोई शिकायत नहीं की. ऐसा पहली बार हुआ कि हमारे ऊपर मज़दूरों ने इस तरह के आरोप लगाए है. दरअसल ये लोग काम करते नहीं थे. बाबू कहता था कि जो पैसे लिए हो वो तो चुका दो, लेकिन ये कामचोर थे. जब साल के आखिर में मज़दूरों को लगा कि उन पर टूट गिरेगा तो इन्होने ये सब कर दिया. युगल तो मेरे साथ ही रहता था. इन मज़दूरों को वहीं लेकर आया था. जब जानकारी हुई कि मज़दूरों ने ऐसा किया तब से वो फरार है.”

मज़दूरों के साथ मार-पीट होती थी, इस पर अखिलेश कहते हैं, ”मारपीट का मामला तो था ही नहीं. किसी को एक-दो थप्पड़ मार दो तो ये बड़ी बात नहीं है. काम करते नहीं थे, लेकिन अब तो सब मज़दूरों की ही सुन रहे हैं. 15 दिन में 12 दिन काम होता हैं. ये मज़दूर कह रहे हैं कि रोजाना 1000 ईंट बनाते थे लेकिन ये लोग 500 से 600 ईंट ही बनाते थे. मालिक इनसे कहता था कि सब एडवांस लिए हो. हर महीने खर्चे के पैसे देता हूं. कम से कम मेरे पैसे तो चुका दो लेकिन ये लोग कम नहीं करते थे.”

बंधुआ मज़दूरी कानून के अनुसार मज़दूरों को एडवांस रुपए देकर उसके बदले काम कराना गुनाह है. लेकिन पुन्नू गुप्ता ईंट भट्ठे के मालिक पंकज गुप्ता कहते हैं, ”बिना एडवांस लिए कोई भी मज़दूर नहीं आता है. कोई दस हज़ार, कोई बीस हज़ार रुपए तो कोई तीस हज़ार रुपए तक एडवांस लेता है. कानूनन ये गलत है, लेकिन बिना एडवांस दिए मज़दूर आएंगे ही नहीं. हम एडवांस देते हुए कुछ लिखित रखते नहीं हैं जिस कारण हम कई दफा फंस जाते है. मज़दूर बिना एडवांस लिए आए तो हमें ज़्यादा फायदा होगा. हम मज़दूरों को जो एडवांस देते हैं. मज़दूर उन पैसों को ही चुकाते हैं. कई बार चुका भी नहीं पाते है. हमें हमारे पैसों का ब्याज तक नहीं मिलता है. अगर मज़दूर बिना एडवांस लिए आएं तो हमें काफी फायदा होगा और विवाद भी नहीं होगा.”

राजस्थान प्रदेश ईंट भट्टा यूनियन से जुड़े मदन वैष्वण न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं, ”एडवांस देने की साजिश ईंट भट्ठे मालिकों की ही है. जानबूझकर इन्होने एडवांस देने की परम्परा की शुरुआत की ताकि मज़दूरों पर इनका दबाव बना रहे. एडवांस देकर मालिक अपने मन से काम कराते हैं. मारपीट करते हैं. अगर मालिक मज़दूरों को महीने-महीने उनका मेहनताना देने लगे तो मज़दूरों को फायदा होगा. आठ-नौ महीने काम कराकर मालिक मज़दूरों को पैसे देते हैं. साल के आखिरी में हिसाब में हेरफेर करते हैं. एडवांस देकर ये मज़दूरों को एक तरह से अपने कब्जे में ले लेते हैं. इनका शोषण करते हैं. मालिक खुद नहीं चाहते कि बिना एडवांस दिए मज़दूर आए. एडवांस देकर उन्हें बंधुआ बना लेते हैं. साल भर उनसे जमकर काम कराते हैं. बेचारे कम पढ़े लिखे मज़दूरों को हिसाब की समझ कम होती है. साल के अंत में उन पर ही टूट गिरा देते हैं.”

कमला बीकेओ पर एफआईआर दर्ज हुए बीस दिन हो गए लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. कुरुक्षेत्र की एसपी आस्था मोदी न्यूज़लॉन्ड्री से बताती हैं, “डीएसपी पेहवा के नेतृत्व में जांच चल रही है. जांच में जो कुछ सामने आएगा उसके बाद गिरफ्तारी की जाएगी. अगर जांच में आता है कि मज़दूरों को तस्करी करके लाया गया है तो जिम्मेदार लोगों पर मानव तस्करी का भी मामला दर्ज होगा.”

बंधुआ मुक्ति मोर्चा से जुड़े निर्मल गोहाना कहते हैं, ”जब मज़दूरों को मुक्ति प्रमाण पत्र मिल गया तो इसका मतलब हुआ कि उनको बंधुआ बनाया गया था. प्रशासन को ईंट भट्टा मालिकों पर जल्द से जल्द कार्रवाई करनी चाहिए ताकि आगे कोई इस तरह से मज़दूरों को बंधकर न बनाए.”

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मज़दूरों को मुक्ति प्रमाण पत्र तो मिल गया है, लेकिन तत्काल मिलने वाली आर्थिक सहायता राशि अभी तक नहीं मिल पाई है. मुक्ति प्रमाण पत्र के साथ मज़दूरों को 20 हज़ार रुपए की राशि मिलती है. इसको लेकर कुरुक्षेत्र के जिलाधिकारी सत्यवीर सिंह फुलिया न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “मज़दूरों को जल्द से जल्द आर्थिक मदद की राशि दी जाएगी. उनका चेक बन रहा है.’’

कुरुक्षेत्र में इससे पहले भी बंधुआ मज़दूरी के मामले आते रहे हैं. ऐसा न हो इसके लिए प्रशासन ने क्या कदम उठाया है. इस सवाल के जवाब में एसीपी आस्था मोदी कहती हैं, ”पुलिस समय-समय पर ईंट भट्ठों का निरीक्षण करती रहती है. पुलिस को निर्देश है कि जब भी भट्ठे पर जाए मज़दूरों से बात करके उनकी परेशानी जानने की कोशिश करें. इसके अलावा भट्टा मालिकों को साफ़ निर्देश दिया गया है कि भट्ठे के पास सीसीटीवी कैमरे लगाए ताकि मज़दूरों साथ होने वाले बर्ताव को ज़रूरत पड़ने पर पुलिस जांच कर सके.”

न्यूज़लॉन्ड्री का ये रिपोर्टर अपनी रिपोर्टिंग के दौरान कई भट्ठों पर गया लेकिन कहीं भी सीसीटीवी कैमरा आदि लगा नहीं मिला. वहीं आसपास के लोगों ने बताया कि पुलिस वाले मज़दूरों को देखने नहीं आते बल्कि मालिकों के साथ बैठकर खाने-पीने आते हैं. निर्मल गोहाना बताते हैं, ”पुलिस जाकर मालिकों के सामने ही मज़दूरों से बात करेगी तो वे कुछ भी नहीं बताएंगे. बेहतर होता कि लेबर डिपार्टमेंट का कोई अधिकारी महीने में एकबार जाकर मज़दूरों को उनके अधिकार बताये. ज़्यादातर मज़दूर दलित, पिछड़े समुदाय से आते है. शिक्षित नहीं है. उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी ही नहीं है.”

हरियाणा में श्रम मंत्रालय का जिम्मा फिलहाल मुख्यमंत्री मनोहरलाल खटटर के पास है. लेकिन उनसे इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं मिल पाई. हमने हरियाणा के लेबर कमिश्नर नितिन कुमार यादव से बात किया. वो कहते हैं, “कुरुक्षेत्र में जो घटना हुई है उसमें मज़दूरों को जल्द से जल्द सहायता राशि मिले इसके लिए राज्य सरकार ने अपनी तरफ से पैसा जारी किया है. जबकि बंधुआ मज़दूरी के मामले में मुआवजे की राशि केंद्र सरकार सीधे जिलाधिकारी को भेजती हैं. जिलाधिकारी ने बताया कि केंद्र सरकार से पैसे आने में वक़्त लगेगा तो राज्य सरकार ने अपनी तरफ से पैसे रिलीज किया. जहां तक बात रही बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन की तो इसके लिए राज्य सरकार राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग (एनएचआरसी) के साथ मिलकर जागरुकता कार्यक्रम चलाता है.”

नितिन कुमार यादव भी एडवांस देने की प्रथा को लेकर चिंता जाहिर करते हैं. वे कहते हैं, ”पंजाब और हरियाणा में मज़दूरों को एडवांस देकर काम पर लाने की पुरानी परम्परा रही है. बंधुआ मज़दूरी नियम के तहत भले आप मज़दूरों के साथ मारपीट ना करें, लेकिन एडवांस देकर काम करा रहे हैं तो यह अपराध है. पर दिक्क्त ये है कि मज़दूर भी बिना एडवांस लिए आते ही नहीं. हालांकि मज़दूरों का शोषण न हो इसके लिए भट्टों पर पुलिस विजिलेंस बढ़ाया गया है.”

देश में बंधुआ मज़दूरी के लिए सालों पहले बने एक मज़बूत कानून और सज़ा के प्रावधान के बावजूद देश के कई हिस्सों में आज भी बंधुआ मज़दूरी जड़ जमाये हुए है. कुछ पैसे एडवांस में देकर मज़दूरों के साथ बेरहमी की जा रही है. भट्ठा मालिकों, ठेकेदारों और प्रशासन के गठजोड़ से बंधुआ मज़दूरी कराने का सिलसिला जारी है.

बीकेओ ईंट भट्ठे के मालिक मिंकू से बातचीत

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न्यूज़लॉन्ड्री: मज़दूरों का आरोप है कि आप उन्हें महीने में दो बार 1200-1200 रुपए का राशन दिलाते थे. उनके हाथ में एक रुपए भी नहीं दिए जाते थे?

मिंकू: हम उनके हाथ में पैसे देते थे. अनाज वाला कोई सिस्टम नहीं था. सब्जी वाला भी भट्ठे पर आता था.

न्यूज़लॉन्ड्री: मज़दूरों को बीमार पड़ने पर भी काम कराया जाता था. उन्हें दवाई नहीं दिलाई जाती थी. गर्भवती महिलाओं के लिए भी इलाज का इंतज़ाम नहीं था.

मिंकू: नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं था. हमारे यहां सरकारी डॉक्टर भी आते थे. हम मज़दूरों को दफ्तर में बैठकर दवाई दिलवाते थे. आशाकर्मी भी आती थी.

न्यूज़लॉन्ड्री: मज़दूरों को आपने किस हिसाब से पैसे दिए हैं? क्या ठेकेदार अखिलेश और युगल उनसे मिलने आते थे?

मिंकू: देखिए मज़दूर तो अखिलेश और युगल ही लेकर आए थे. हमारी तो मज़दूरों से कोई बातचीत भी नहीं हुई थी. हम उनको जानते तक नहीं है. हर बीस दिन के अंतराल पर दोनों मज़दूरों से मिलने आते थे.

न्यूज़लॉन्ड्री: इस घटना के बाद अखिलेश और युगल से बातचीत हुई आपकी? आप उनका नंबर हमसे साझा कर सकते हैं?

मिंकू: मेरी अखिलेश या युगल से कोई बातचीत नहीं हुई है. मेरे पास उनका नंबर भी नहीं है. आप मेरा फोन देख सकते हैं. मेरी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई है.

न्यूज़लॉन्ड्री: अखिलेश और युगल आपके यहां मज़दूर लेकर आए लेकिन आपके पास उनका नंबर ही नहीं है. ऐसा कैसे?

मिंकू: जी नहीं है. आप मज़दूरों से उनका नंबर मांग लीजिए.

न्यूज़लॉन्ड्री: आप लोग मज़दूरों को मारते थे? बीमार होने पर भी काम लेते थे. जो एफआईआर हुआ है उसमें बंधुआ मज़दूर बनाने की भी धारा लगाई गई है.

मिंकू: जहां से मज़दूरों को निर्मल गोहाना उठाकर ले गए हैं. आप वहां चलिए. भट्टा चारों तरफ से खुला हुआ है. कोई बाउंड्री नहीं है. तीन तरफ से रास्ते हैं. जहां मज़दूर रहते थे वहां भी कोई बाउंड्री नहीं है. चारों तरफ खेत ही खेत है. मज़दूर जिस कमरे में रहते थे उसमें गेट भी नहीं था कि हम रात में उन्हें बांधकर रखते.

न्यूज़लॉन्ड्री: मज़दूर कह रहे हैं कि उन्हें बुरी तरह मारा जाता था. प्रशासन ने उन्हें मुक्ति प्रमाण पत्र देकर यह साबित कर दिया है कि उन्हें बंधुआ बनाया गया था.

मिंकू: हम कैसे उन्हें बंधुआ बना सकते है जबकि चारों तरफ से भट्टा खुला हुआ है. हमने कोई ग़लत नहीं किया है. हम आज भी हाथ जोड़ रहे है और कल भी हाथ जोड़ेंगे. हम कोई गलत काम करते ही नहीं है. हमें फंसाया जा रहा है. हमने मज़दूरों के सारे हिसाब कर दिए फिर भी हमें फंसाया जा रहा है.

न्यूज़लॉन्ड्री: आपको कौन फंसा रहा है?

मिंकू: हमने मज़दूरों के सारे हिसाब कर दिए फिर भी हमें फंसाया जा रहा है.

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