बिहार कर्मचारी चयन आयोग : फॉर्म भर, नतीजे की चिंता मत कर

बिहार कर्मचारी चयन आयोग ने साल 2014 में इंटरमीडिएट स्तर की वेकेंसी निकाली थी. पांच साल बीतने के बावजूद अभी तक इसके नतीजे नहीं आये है. छात्र परेशान हैं और सरकार से फॉर्म की फीस वापस करने की मांग कर रहे हैं.

WrittenBy:बसंत कुमार
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धीरे-धीरे चलने वालों की तुलना अक्सर कछुए से की जाती रही है. लेकिन कछुए की जगह अब धीमी चाल चलने वालों की तुलना बिहार कर्मचारी चयन आयोग से की जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. क्योंकि बिहार कर्मचारी चयन आयोग कछुए से भी धीमी रफ़्तार से चल रहा है.

साल 2014 में बिहार कर्मचारी चयन आयोग ने प्रथम इंटरमीडिएट स्तरीय यानी 12वीं पास लोगों के लिए संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा की घोषणा की थी. जिसके लिए लगभग 18.5 लाख युवाओं ने आवेदन किया था. पांच साल बीत जाने के बाद भी अभी तक इस परीक्षा के अंतिम नतीजे नहीं आये हैं.

बिहार के सिवान जिले के रहने वाले रोहित पीड़ित छात्रों में से एक हैं. 2013 में 12वीं करने के बाद रोहित कुमार ने साल 2014 में इस प्रतियोगी परीक्षा का फॉर्म भरा था. आज रोहित एमएम कर चुके हैं.

रोहित बिहार सरकार को छात्रों के प्रति लापरवाह बताते हुए कहते हैं, ”सरकार को छात्रों की परवाह ही नहीं है. बिहार में शिक्षा व्यवस्था तो चौपट है ही. सरकार इतनी लापरवाह है कि पांच साल में एक एग्ज़ाम नहीं करवा पा रही है. पांच साल पूरे होने के बाद सिर्फ प्री का एग्जाम हुआ है और मेंस होना बाकी है. इतनी तेज़ी से एग्ज़ाम कराने के लिए बिहार सरकार को शुक्रिया. हो सकता है बिहार सरकार ज्वाइनिंग और रिटायरमेंट, दोनों लेटर एक साथ ही दे.”

बिहार एसएससी की परीक्षा दो चरण में होती है. पहला चरण प्री और उसके बाद मेंस. लेकिन बिहार कर्मचारी चयन आयोग की लेटलतीफी के कारण पांच साल में केवल प्री एग्ज़ाम हुआ है और उसके भी नतीजे अभी तक नहीं आये हैं.

बिहार की राजधानी पटना में महेंद्रू कोचिंग संस्थान के ब्रांच प्रमुख रजनीश कुमार न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए बताते हैं, ”समय से एग्ज़ाम नहीं होने से छात्रों को परेशानी तो होती है. कुछ छात्र तो इंतज़ार करते हैं, लेकिन ज़्यादातर छात्र अलग-अलग जगहों पर फॉर्म भरते रहते हैं और जहां जिसको मौका मिलता है, निकल लेते हैं.”

वेकेंसी के साथ जुड़ गया विवाद

बिहार कर्मचारी चयन आयोग ने साल 2014 में लगभग 13 हज़ार पदों के लिए 12वीं पास स्तर पर वेकेंसी निकाली थी. वेकेंसी निकालने के लगभग दो साल बाद साल 2016 के दिसंबर महीने में आयोग ने प्रवेश-पत्र जारी किया. जिसके बाद 2017 के जनवरी और फरवरी महीने में सभी 38 जिलों में एग्ज़ाम कराया गया.

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लंबे इंतज़ार के बाद एग्ज़ाम हुआ, लेकिन पेपर लीक होने की ख़बरें आने लगीं. ख़बरों के अनुसार पेपर लीक होने के बाद उसे सोशल नेटवर्किंग साइट वाट्सएप के ज़रिये बेचा भी गया था. पत्रिका.कॉम की खबर के अनुसार पेपर लीक होने के बाद नीतीश सरकार ने एसआईटी का गठन किया. एसआईटी जांच के बाद परीक्षा को रद्द कर दिया. पेपर लीक मामले में जांच में एसआईटी ने बीएसएससी के सचिव परमेश्वर राम, अध्यक्ष सुधीर कुमार समेत आयोग के कई अधिकारियों को गिरफ़्तार किया है. फ़िलहाल सभी जेल में ही हैं.

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2017 में हुए विवाद के बाद एक बार फिर चयन की प्रक्रिया रुक गयी. एक साल बाद फिर आयोग नींद से जागा और 2018 के दिसंबर महीने में प्री एग्ज़ाम हुआ. जिसका नतीजा अभी तक नहीं आया है.

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बक्सर जिले के रहने वाले छात्र राजू कुमार पटना में रहकर तैयारी करते हैं. राजू कुमार ने 2012 में बीटेक किया. बीटेक के बाद नौकरी लगी, लेकिन वहां वेतन ठीक नहीं था. दो साल तक काम करने के बाद राजू पटना वापस आ गये और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गये. इसी बीच राजू ने बिहार सरकार द्वारा निकाले गये 12वीं स्तर की प्रतियोगी परीक्षा का फॉर्म भरा. राजू न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, ”नीतीश कुमार खुद को सुशासन बाबू कहते हैं, लेकिन उनके शासन में एक एग्ज़ाम कराने में पांच साल से ज़्यादा का समय लग जाता है. ये कैसा सुशासन है. अगर एग्ज़ाम समय पर होता तो हर साल वेकेंसी निकलती. यहां हर सरकारी ऑफिस में कर्मचारियों की कमी है, लेकिन वेकेंसी निकल ही नहीं रही है. सुशासन बाबू ने बिहार में शिक्षा की ऐसी-तैसी कर दी है. यहां ग्रेजुएशन करने में पांच साल लग जाते हैं.”

राजू कुमार कहते हैं, ”फॉर्म भरने में हमारे लगभग छह सौ रुपये लग गये. तीन सौ रुपये फॉर्म के और बाकी साइबर कैफे वाले को देना पड़ा. बिहार में ज़्यादातर छात्र साइबर कैफे की मदद से ही फॉर्म भरते हैं. करीब 18 लाख छात्रों ने फॉर्म भरा था. फॉर्म के बदले सरकार के खाते में तो करोड़ों रुपये आ गये, लेकिन हमारा क्या हुआ. सरकार अगर एग्ज़ाम कराने में सफल नहीं हो रही तो कम-से-कम हम लोगों के पैसे ही वापस कर दें.”

स्थानीय पत्रकार शशि कुमार बताते हैं, “नीतीश सरकार बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है. पांच साल में बहुत कुछ बदल जायेगा. पेपर लीक होने के बाद जब आयोग के नये अध्यक्ष आये तो वे डर-डर के कदम उठा रहे थे. एग्ज़ाम का पूरा डाटा आईटी मैनेजर के पास था, जो अभी जेल में हैं. आईटी मैनेजर ने कहा कि डाटा मेरे पास नहीं है. फिर डाटा को समेटने में बहुत समय लग गया. जिस वजह से पेपर होने में लगातार देरी होती रही.”

क्या कहते हैं अधिकारी?

बिहार कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष रविंद कुमार न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, ”वेकेंसी 2013-14 में आयी थी, लेकिन इस पर काम 2016 से शुरू हुआ. 2017 में एग्ज़ाम कराया गया तो पेपर लीक के बाद विवाद हो गया. पेपर लीक मामले में जांच चली उसमें भी काफी वक़्त गया. एक दफ़ा विवाद होने के बाद अब जब हम एग्ज़ाम करा रहे हैं तो काफी एहतियात बरत रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में हमने प्री का एग्ज़ाम कराया है. उसके नतीजे जल्द ही हम जारी करेंगे. प्री के नतीजे आने के बाद हम जल्द से जल्द मेंस का एग्ज़ाम कराकर भर्ती शुरू करेंगे. हम कोशिश कर रहे हैं कि इसी साल फाइनल नतीजे जारी कर दें.”.

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पांच साल लग जाते हैं एक एग्जाम कराने में. क्या बिहार सरकार छात्रों का भविष्य बर्बाद नहीं कर रही है. इस सवाल के जवाब में रविंद कुमार कहते है, “पूर्व में जो भी हुआ हो उस पर तो मैं कोई कमेंट नहीं कर सकता, लेकिन मेरी कोशिश है कि हम तय समय में ही एग्ज़ाम करायें. इसके लिए हम हर तरह की कोशिश कर रहे हैं.”

बिहार कर्मचारी चयन आयोग के वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, “कर्मचारी चयन आयोग राज्य भर में भर्तियां करता है, लेकिन खुद इसके यहां कई पद खाली पड़े हुए हैं. कर्मचारियों की कमी की वजह से काम में देरी होती है. हमारे पास जितने लोग हैं, उनमें ही हम काम करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आयोग को भी कई कर्मचारियों की ज़रूरत है.”

सरकार की मंशा पर सवाल 

बिहार में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र इस पूरे विवाद पर कहते हैं कि “सरकार की मंशा सही नहीं है. अक्सर देखा जाता है कि चुनाव से ऐन पहले सरकार वेकेंसी निकालती है. ये वेकेंसी भी लोकसभा चुनाव के आसपास ही निकली है. दरअसल सरकार की कोशिश युवाओं को नौकरी देने की कम उनकी नाराज़गी कम करने और अपने तरफ खींचने की ज़्यादा होती है. एसएससी के एग्ज़ाम में लाखों युवा फॉर्म भरते हैं. इस तरह सरकार एक वेकेंसी निकालकर लाखों युवाओं को चुप करा देती है.”

पुष्यमित्र आगे जोड़ते हैं, ”बिहार के हर ऑफिस में जूनियर और सीनियर दोनों लेवल पर पद खाली हैं. एक सेकेट्री यहां चार-चार विभाग संभालते नज़र आते हैं. वे केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं. बिहार में कर्मचारियों की काफी कमी है, लेकिन सरकार उसे भरना नहीं चाहती है. सरकार अपने खजाने का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल ठेकेदारी वाले कामों में करती है, जहां उनके लोगों को फायदा मिलता है, पार्टी फंड में पैसे आते हैं. सरकार ईमानदारी से काम करने से बचती नज़र आती है.”

वाम छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के राष्ट्रीय सचिव सुशील कुमार पुष्यमित्र की बातों से सहमति जताते हुए कहते हैं, “बिहार की बीजेपी-जदयू सरकार प्रतियोगी परीक्षाएं कराने में पूरी तरफ विफल साबित हुई है. मुझे लगता है कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को उलझाये रखने के लिए ये सब साज़िशन किया जाता है. बिहार में अगर कोई परीक्षा समय पर हो भी जाती है, तो उसे कोर्ट द्वारा लटका दिया जाता है. चाहे दरोगा की परीक्षा हो, बीपीएसी की परीक्षा हो या सचिवालय सहायक की परीक्षा हो. मुझे लगता है कि ये सब कुछ साज़िशन होता है. इन परीक्षाओं में ग़लत सवाल भी पूछे जाते है. यहां चुनने के लिए परीक्षा नहीं ली जाती है.”

बिहार सरकार में मंत्री और पूर्व जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार इस मामले पर कहते हैं, ”इस मामले में बिहार सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता है. बिहार सरकार तो चाहती है कि जल्द से जल्द वेकेंसी की प्रक्रिया पूरी हो, लेकिन आयोग में हुए विवाद की वजह से देरी हुई है. दूसरी बात इंटरमीडिएट स्तरीय एसएससी प्रतियोगिता में लाखों छात्रों ने हिस्सा लिया था. उनकी कॉपी जांचने में वक़्त तो लगेगा ही.”

नीरज कुमार आगे कहते हैं, ”बिहार में समय पर वेकेंसी की प्रक्रिया खत्म हो, इसके लिए सरकार कई स्तर पर काम कर रही है. लेकिन जब कोई भी वेकेंसी निकलती है, उसके नतीजे आने के बाद कुछ लोग कोर्ट पहुंच जाते हैं. कोर्ट में मामला अटक जाता है. अब सरकार की भी अपनी सीमा है. सरकार कोर्ट के ऊपर तो है नहीं. कोर्ट के फैसले में देरी की वजह से तय समय में हम वेकेंसी की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते हैं.”

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