वेब सीरीज़ पर आसन्न सेंसरशिप का खतरा

वेब सीरीज़ को लेकर सेंसरशिप की बहसों पर आधारित दूसरा और अंतिम भाग.

वेब सीरीज़ पर आसन्न सेंसरशिप का खतरा
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कमोबेश दो खेमे बन चुके हैं. फिलहाल दोनों बहुत एक्टिव नहीं हैं. फिर भी एक खेमा आक्रामक है और दूसरा बात चलते ही बचाव की मुद्रा में आ जाता है. वेब सीरीज़ में दिखाये जा रहे कंटेंट, उसके चित्रण और बेरोक प्रस्तुति से खिन्न पहले खेमे को लगता है कि वेब सीरीज़ में चल रहा बहुत कुछ भारतीय संस्कृति और समाज के अनुकूल नहीं है. वे परंपरा, भारतीय जीवन मूल्य, पारिवारिक संस्कार व संबंध और कभी-कभी धार्मिक आस्था का भी तर्क देते हैं और चाहते हैं कि इन पर पाबंदी लगायी जाये. पाबंदी लगाने का आसान तरीका सेंसरशिप जान पड़ता है. ओटीटी (ओवर द टॉप) प्लेटफार्म पर चल रहे वेब सीरीज़ को नाथने के लिए सेंसरशिप की नकेल लगा दो. दूसरा खेमा क्रिएटिव आज़ादी का पक्ष रखते हुए फिलहाल मिली स्वतंत्रता को बनाये रखने की दलील देता है. साथ में यह भी कहना नहीं भूलता कि इंटरनेट पर हर तरह का अश्लील और हिंसक कंटेंट मौजूद है, जिसे देखना हो वह आसानी से देख सकता है. बहस जारी है.

एनजीओ ‘जस्टिस फॉर राइट्स फाउंडेशन’ की याचिका पर गौर करते हुए दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने बीते महीने 10 मई सरकार को निर्देश दिया कि वह इस पर विचार करे और इसका नियमन करे. चुनाव के दौरान आये इस निर्देश पर नयी सरकार बनने के बाद विचार करने की पूरी संभावना है. मजबूती से आयी भाजपा की विचारधारा पहले खेमे की मांग से मेल खाती है.

मुद्दा इंटरनेट पर मौजूद सारे कंटेंट का नहीं है. इंटरनेट के ग्लोबल दौर में उस पर पाबंदी लगा पाना नामुमकिन है. अभी तक हम फिल्मों की पायरेसी तो रोक नहीं पाये. कुकुरमुत्ते की तरह तेजी से फैल रहे वीडियो कंटेंट को काबू कर पाना बड़ी मुश्किल चुनौती है. सेंसरशिप की वकालत कर रही संस्थाओं, समूह और व्यक्तियों की नज़र में इंटरनेट पर बढ़ रहे भारतीय कंटेंट में हिंसा, अश्लीलता और दूसरी आपत्तिजनक सामग्रियों को ठूंसने का ट्रेंड भी बढ़ रहा है. ‘गंदी बात’, ‘फोर मोर शॉट्स’, ‘सैक्रेड गेम्स’, ‘लस्ट स्टोरीज़’ और ‘मिर्जापुर’ जैसे वेब सीरीज़ का हवाला देकर सरकार और प्रशासन पर दबाव डाला जा रहा है कि इस मीडियम और प्लेटफॉर्म के अनियंत्रित होने व अधिक नुकसान पहुंचाने के पहले नियमों का अंकुश लगा दिया जाये.

पहले खेमे में इसकी सुगबुगाहट यूट्यूब पर जारी एआइबी और टीवीएफ जैसे वीडियो फीचर चैनलों के साथ हो गयी थी. उन पर कड़ी आपत्ति की गयी थी. आलोचना के शिकार हुए चैनलों ने कंटेंट को टोन डाउन भी किया. लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद विदेशों के शो और कंटेंट बेरोक-टोक आने लगे. शहरी शिक्षित दर्शक इन इंग्लिश वेब सीरीज़ की ओर आकर्षित हुआ. फिर भी भाषा और परिवेश की भिन्नता से इंग्लिश शो भारतीय बाज़ार में पैठ नहीं बना पाये. निश्चित अवधि में भारतीय बाज़ार में अपेक्षित प्रसार नहीं मिला, तो भारत के ओरिजिनल सीरीज़ के लिए अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी सरीखे निर्देशकों को अनुबंधित किया गया. उन दोनों के वेब सीरीज़ ‘सैक्रेड गेम्स’ के आने के आगे-पीछे अनेक भारतीय प्लेटफॉर्म शो लेकर आ गये. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के कंटेंट से उन्होंने इंटरनेट के दर्शकों को खींचा और लुभाया. नेटफ्लिक्स पर ‘सैक्रेड गेम्स’ की उपलब्धता और उसकी चर्चा, ख्याति और स्वीकृति के बाद तो बाढ़-सी आ गयी, अनेक निर्माता-निर्देशक के ज्ञान चक्षु खुले और उन्होंने दो कदम आगे बढ़कर स्थूल आनंद के लिए साफ तरीके से संवादों, दृश्यों और चरित्र संबंधों में सब दर्शाने लगे.

फिल्मों के स्क्रिप्ट राइटर राहिल काज़ी वेब सीरीज़ पर किसी प्रकार की सेंसरशिप का समर्थन नहीं करते हैं, लेकिन बताते हैं कि “कभी आप ‘गंदी बात’ के कुछ एपिसोड देख लें. उन्हें देखते हुए आपको लगेगा कि यह सब तो नहीं आना चाहिए.” वेब सीरीज़ के निर्माण, निर्देशन और अभिनय से जुड़े व्यक्तियों को अपनी जिम्मेदारी का एहसास है. ‘इनसाइड एज’, ‘मिर्जापुर’ और ‘मेड इन हेवन’ वेब सीरीज़ का निर्माण कर चुके रितेश सिधवानी ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा, “लोग कहते रहते हैं कि कोई पाबंदी या सेंसरशिप नहीं है. मुझे ‘स्पाइडर मैन’ का एक संवाद याद आता है, ‘बड़ी शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी आती है’. दर्शक स्मार्ट हैं और वे पूरी दुनिया के शो देख रहे हैं, इसलिए छूट मिलते ही अगर आपने इस प्लेटफार्म का दुरुपयोग किया तो वे नहीं रुकेंगे. यौनिकता, समानता या शादी में आप वास्तविकता दिखाते हैं तो दर्शक ज़रूर देखेंगे.”

इसके विपरीत वेब सीरीज़ के नियमित समीक्षक मानते हैं कि “वेब सीरीज़ की दुनिया में क्रांति हो रही है, लेकिन यह क्रांति कंटेंट की कम सेक्स की ज़्यादा हो रही है. दर्शकों को सॉफ्ट पोर्न दिखा कर उसका मानसिक स्खलन किया जा रहा है. ‘मिर्ज़ापुर’, ‘इनसाइड ऐज’, ‘गंदी बात’, ‘कौशिकी’ और ‘बारकोड’ जैसे वेब सीरीज़ ओटीटी प्लेटफार्म पर सेंसरशिप का नया कानून बनवा कर ही मानेंगे.”

इसके बावजूद एक्सेल के तीनों वेब सीरीज़ काफी चर्चित रहे और खूब देखे गये. इनमें फिल्मों के लोकप्रिय कलाकारों को देखना भी आकर्षण का कारण था. ‘इनसाइड ऐज’ में लीड रोल में रही रिचा चड्ढा सेंसरशिप का समर्थन नहीं करने के साथ ही चाहती हैं कि कोई एक सिस्टम अंदरूनी तौर पर विकसित हो जो वेब सीरीज़ पर नज़र रखे और आगाह करे. वह कहती हैं, ‘सेक्स और हिंसा दोनों ही सेंसिटिव शब्द हैं. अभी हम इंटरनेट के ऐसे फेज में हैं, जहां सेंसरशिप की अनुपस्थिति में काफी सारे लोग वेब सीरीज़ में बहुत कुछ ऐसा कर रहे हैं जो बहुत ही हिंसक है. फिलहाल ऐसा कोई तरीका नहीं है कि उन पर पाबंदी लगायी जा सके. वेब सीरीज़ पर उम्र की हिदायत रहती है, लेकिन सिनेमाघर की तरह अवयस्क दर्शकों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं लगाया जा सकता है. घरों में बैठे किसी भी उम्र के दर्शक को आप कैसे रोक सकते हैं? यह चिंतनीय और आपत्तिजनक स्थिति है. मैं सेंसरशिप की वकालत नहीं करना चाहूंगी, लेकिन कोई सिस्टम तो होना ही चाहिए.” रिचा व्यक्तिगत स्तर पर ध्यान रखती हैं कि कुछ भी अति उत्तेजक न हो. वह इस स्थिति में हैं कि आपत्ति कर सकें.

वेब सीरीज़ के भी लोकप्रिय अभिनेता पंकज त्रिपाठी चल रही आपत्तियों से वाकिफ़ हैं और निजी स्तर पर ख़्याल भी रखते हैं. इस संबंध में वह कहते हैं, “अक्सर मुझे भी सुनने को मिलता है कि डिजिटल प्लेटफार्म पर सेंसर नहीं है. लोग कुछ भी दिखा रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है. एक जिम्मेदार नागरिक और अभिनेता होने के नाते मैं एहतियात बरतता हूं कि मेरा किरदार जब भी ऐसे दृश्यों का हिस्सा बने तो यह देख लेता हूं कि वह कंटेंट के लिए कितना ज़रूरी है. मैं तो यह भी कहूंगा कि डिजिटल माध्यमों पर सेक्स और हिंसा इतने रूपों में मौजूद है कि उसके लिए वेब सीरीज़ देखने की ज़रुरत ही नहीं है.” पंकज त्रिपाठी ने इधर लोकप्रिय हुए कुछ वेब सीरीज़ में खतरनाक किरदार निभाये हैं.

याद करें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म से मुंबई के कंटेंट निर्माताओं को आशंकाएं थीं. वे इसकी संभावनाओं को लेकर अनिश्चित थे. उन्होंने न खुले दिल से इसका स्वागत किया और न निर्माण के लिए तत्पर और लालायित हुए. शुरू में नयी उम्र और सोच के कुछ डिजिटल प्रेमी प्रयोगशील निर्देशक सामने आये. रातोंरात मिली उनकी प्रसिद्धि और कमाई ने फिल्म इंडस्ट्री के पुराने खिलाड़ियों को चौकन्ना कर दिया. वे आकृष्ट हुए. धीरे-धीरे अनेक विदेशी और भारतीय प्लेटफार्म आये और उन पर जल्दी से जल्दी पहुंचने की होड़ में निर्माता और कलाकार शामिल हो गये. अभी शायद ही कोई ऐसा बैनर और कलाकार हो, जो किसी न किसी वेब सीरीज़ से नहीं जुड़ा हो. इस बाढ़ में अनावश्यक कूड़ा-करकट आना लाजमी है, लेकिन इसने मनोरंजन की बंजर जमीन को उर्वर बना दिया है. वेब सीरीज़ लहलहा रहे हैं. निर्माताओं को इसमें असीमित संभावनाएं दिख रही हैं. लेखकों-निर्देशकों के लिए कल्पना का आकाश खुल गया है. वे किसी ऊंचाई और विस्तार तक जा सकते हैं. कंटेंट के नैरेटिव, डिजाइन और स्टाइल से लेकर उसकी पहुंच से सभी आह्लादित हैं. सबसे खास बात है कि इस फॉरमैट की सुविधा से मिली आज़ादी ने सारे बंधनों को तोड़ दिया है. वेब सीरीज़ में सक्रिय तिग्मांशु धूलिया कहते हैं, “मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी और संतुष्टि की बात है कि किसी दृश्य को लिखते या चित्रित करते समय मेरे ज़ेहन में कोई वैधानिक चेतावनी नहीं आती है. फिल्मों के अपने हिसाब-किताब की वजह से आप बहुत कुछ नहीं दिखा सकते. फिल्मों में सेंसरशिप की अति हो गयी है. इतनी सारी अनुमतियां लेनी पड़ती हैं. वेब सीरीज़ में भी सेंसरशिप आ गयी तो हर चीज़ सेंसर होती रहेगी. मेकर जूझते-लड़ते रहेंगे. प्रोसेसिंग लंबी हो जायेगी, क्योंकि कोई भी सीरीज़ फिल्म से लंबी होती है. मेकर शॉर्टकट अपनायेंगे और कदाचार बढ़ेगा. सेंसर की संस्था आ गयी तो उस पर दर्शक समूहों के दबाव अलग से बढ़ेंगे. मुझे तो लगता है कि मेकर के विवेक पर सब छोड़ देना चाहिए. सभी इतने जाहिल और लालची नहीं हैं कि कुछ भी दिखाते रहें. हां, इसका ख़्याल रखा जाये कि विविधता से भरे देश में कोई सांप्रदायिक तनाव या दंगा करने वाला कंटेट न बनाये. मैं खुश हूं. वेब सीरीज़ फिल्मों से अलग हैं. फिल्में शॉर्ट स्टोरी हैं, तो वेब सीरीज़ नावेल हैं”.

करण अंशुमान ने ‘इनसाइड ऐज’ और ‘मिर्जापुर’ वेब सीरीज का निर्देशन किया है. उनके शब्दों में, “आज की दुनिया में सेंसरशिप की प्रचलित धारणा का कोई स्थान नहीं है. किसी व्यक्ति की क्रिएटिव आजादी नहीं कतरी जा सकती. यह सीधी-सी बात है. वास्तव में सेंसरशिप की वकालत कर रहे लोग समाज के स्वयंभू नैतिक अभिभावक हैं. वे रेत में लकीर खींचते रहते हैं. बेहतर होगा कि वे शोध करें और कोई पद्धति विकसित करें, तो फिर क्रिएटिव लोग संतुलन खोज लेंगे.”

करण अंशुमान मानते हैं कि रेटिंग सिस्टम ज़रूर लागू हो. टीवी और स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर उसका पालन हो, तो यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि बच्चे गलत कंटेंट न देख पायें. सचमुच इसके लिए पारिवारिक निगरानी और शिक्षा ज़रूरी है. अभी खबरें आती रहती हैं कि बच्चे अश्लील और हिंसक कंटेंट में लिप्त हो रहे हैं. इससे उनका भारी नुकसान हो रहा है. विक्रम भट्ट ने एक बातचीत में कहा था कि फिल्में हम सिनेमाघर में कई लोगों के साथ देखते हैं. सामूहिक दर्शन में तमाम सावधानियां बरतनी चाहिए, लेकिन वेब सीरीज़ जैसे नये कंटेंट का फॉर्मेट अकेले व्यक्ति के देखने के लिए भी होता है. हर व्यक्ति को खुद तय करना होगा कि वह क्या देखे? और नासमझ बच्चों को बताना पड़ेगा कि वे क्या न देखें?

वेब सीरीज़ के निर्माता-निर्देशकों को असल चिंता संभावित पाबंदियों और सेंसरशिप की है. राष्ट्रवाद के उन्माद को राजनीतिक समर्थन मिल चुका है. इस सांस्कृतिक चक्रवात में बहुत कुछ तहस-नहस हो सकता है. अभी से अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को कब और कितना तवज्जो देती है. इतना तय है कि पाबंदी के पैरोकार सक्रिय होंगे. मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की राय में, “सुप्रीम कोर्ट का संज्ञान लेना और नियमन के लिए कहना दिलचस्प बात है. इस तरह के शो शुरू हुए साल भर से ज़्यादा हो गये. सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से कोई पहल नहीं की गयी है, तो इसका एक मतलब यह भी है इन्हें बहुत गभीरता से नहीं लिया गया है, या फिर इसमें वे राजस्व की बड़ी संभावना देख रहे हैं.”

सच तो यह भी है कि ओटीटी प्लेटफार्म के बढ़ते सब्सक्रिप्शन बता रहे हैं कि भारतीय दर्शक फिल्मों से उकता कर अकेले में वेब सीरीज़ देखना पसंद कर रहे हैं. उन्हें अनसेंसर्ड कंटेंट देखने को मिल रहा है.

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Complaining about the media is easy and often justified. But hey, it’s the model that’s flawed.

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