झारखंड सरकार: ‘गांधी की हत्या गोडसे ने नहीं एक हृष्ट-पुष्ट युवक ने की’

झारखंड सरकार की बच्चों की पत्रिका ‘पंख’ के गांधी विशेषांक में बहुत सफाई से नाथूराम गोडसे का नाम गोलमोल कर दिया गया.

WrittenBy:एमएस आलम
Date:
Article image

30 जनवरी को ट्विटर पर #महात्मागांधी के साथ ही एक और हैशटैग समानांतर ट्रेंड कर रहा था. यह हैशटैग था #गोडसे. इससे ठीक चार दिन पहले का एक दृश्य देखिए. 26 जनवरी को राजपथ से निकली गणतंत्र दिवस की खूबसूरत झांकियों में एक की थीम थी लालकिला और उसके साथ बनी खूबसूरत बापू की प्रतिमा. मान लिया गया कि सरकार भी बापू की श्रद्धा में लीन है. यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 जनवरी यानि बापू की पुण्यतिथि के दिन ही ‘राष्ट्रीय नमक सत्याग्रह स्मारक’ राष्ट्र को समर्पित करने हेतु गुजरात के डांडी पहुंचे थे. यहां प्रधानमंत्री ने एक जनसभा को भी संबोधित किया.

पर क्या बात इतनी सीधी-सादी है? क्या लोगों को नहीं पता कि आईटी सेल के कारखानों में हर दिन पकने वाले अनगिनत झूठों को ट्विटर पर ट्रेंड कौन कराता है. वे कौन लोग हैं जो #गोडसे को ट्विटर पर ट्रेंड कराने के लिए 30 जनवरी की सुबह से ही सक्रिय हो गए थे? कोई सामान्य समझ वाला भी यह बात आसानी से बता देगा कि जो लोग #गोडसे चलाते हैं उनकी मेंटल वेवलेंथ एक स्तर पर इस देश की सत्ताधारी पार्टी, उसके मुखिया नरेंद्र मोदी से जुड़ती है. इनमें से तमाम ट्विटरवीर ऐसे किस्मतवाले भी हैं जिन्हें खुद नरेंद्र मोदी फॉलो करते हैं.

मेंटल वेवलेंथ की समानता 30 जनवरी की शाम होते-होते अपने सबसे वीभत्स रूप में सामने आ गई. अलीगढ़ में हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पांडेय के नेतृत्व में गांधी हत्या का पुनर्आयोजन का एक वीडियो वायरल हो गया. बापू की तस्वीर पर नकली गोलियां चलाई गईं, उनका नकली खून बहाया गया और फिर गोडसे की प्रशंसा वाले नारे लगाए गए.

घटना को दुखद, शर्मनाक कहकर इसकी आलोचना करने की औपचारिकता हम नहीं करेंगे क्योंकि इस तरह के उपक्रम छोटे-बड़े तमाम स्तरों पर जारी हैं और बाकायदा सरकारी संरक्षण में यह काम योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. झारखण्ड सरकार द्वारा प्रकाशित होने वाली बच्चों की पत्रिका ‘पंख’ इसका एक और उदाहरण है.

झारखण्ड सरकार के अधीन एक विभाग है ‘झारखण्ड शिक्षा परियोजना परिषद्’. यह संस्था बच्चों की मासिक पत्रिका ‘पंख’ का प्रकाशन करती है. इसके संपादक आईएएस अधिकारी उमाशंकर सिंह है. पत्रिका का अक्टूबर अंक गांधी विशेषांक है जिसमें उमाशंकर सिंह ने संपादकीय लेख भी लिखा है.

imageby :

पत्रिका के अक्टूबर अंक के पेज नम्बर 29 पर एक लेख प्रकाशित हुआ है ‘गांधीजी का अंतिम दिन’. यह लेख कहता है, “…उस समय मनु गांधीजी के दाईं ओर थी. अचानक एक ह्रष्ट पुष्ट व्यक्ति खाकी वस्त्र पहने और हाथ जोड़ते हुए लोगों की भीड़ को तेज़ी से चीरता हुआ मनु की ओर आया. यह देख कर मनु बोली, ‘भाई, बापू को वैसे ही दस मिनट की देर हो गई है, आप क्यों उन्हें सत्ता रहे हैं?’ उस युवक ने मनु की बात पर ध्यान न देते हुए उसे इतने ज़ोर से धक्का दिया कि उसके हाथ से नोट-बुक आदि नीचे गिर गईं. लेकिन, फिर भी वह उस युवक से जूझती रही. अचानक तभी उनकी माला नीचे गिर गई. मनु उसे उठाने के लिए झुकी तो एक के बाद एक तीन तड़ातड़ गोलियों की आवाज़ पुरे वातावरण में गूंजी और चहुं ओर अन्धकार व निस्तब्धता छा गई. गांधीजी हाथ जोड़े हुए ही ‘…हे राम …हे राम’ बोलते हुए ज़मीन पर गिर पड़े. उस समय कुछ समय तक सब लोग निःशब्द हो गए. ऐसा लगा जैसे समय ठहर गया हो…”

अब आपको लग सकता है कि इसमें क्या गड़बड़ है. अगर आप गांधी और उनके करिश्माई क़द से वाकिफ हैं तो पूरे लेख में ‘हृष्ट पुष्ट व्यक्ति’, ‘एक युवक’, ‘उस युवक’ जैसे शब्द आपका ध्यान खींच सकते हैं. इस पूरे लेख में हृष्ट-पुष्ट युवक यानी बापू के हत्यारे का नाम बहुत सफाई से छुपा लिया गया है. क्या यह जानबूझकर किया गया, क्या यह किसी नीति के तहत किया गया, क्या यह संपादकीय गलती भर है?

imageby :

इन सवालों के जवाब जानने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री ने पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उमाशंकर सिंह से बात की. उनका जवाब किसी सवाल का जवाब होने की बजाय टालमटोल वाला रहा. उन्होंने कहा, “मुझे देखना होगा कि वह लेख क्या है और उसका कंटेंट एक संपादकीय टीम तय करती है. मुझे सबसे पहले अपनी संपादकीय टीम के पास इस मामले को ले जाना होगा.”

इसके बाद उमाशंकर सिंह जो बात कहते हैं वह महत्वपूर्ण है, “गांधीजी की अंतिम यात्रा या अंतिम दिन की बात की जाय तो इस पर एक मोटी किताब लिखी जा सकती है. पर जरूरी नहीं है कि इसके हर पन्ने पर गांधीजी के हत्यारे का नाम हो. यह देखना होगा कि जो लेख छपा है उसमें गांधीजी के हत्यारे के नाम की आवश्यकता है या नहीं. संदर्भ अगर कहता है कि नाम छपना चाहिए तो छापा जाना चाहिए, अगर संदर्भ नहीं है तो नहीं छापा जाना चाहिए.”

जाहिर है उमाशंकर सिंह इस मामले में एक नपा-तुला, रणनीतिक बयान दे रहे हैं. गांधी के अंतिम दिन का कोई लेख नाथूराम गोडसे के बिना पूरा हो सकता है क्या? यह सामान्य समझ का मसला है कि अगर मनु का जिक्र होता है तो नाथूराम गोडसे का जिक्र भी होना चहिए. नाथूराम गोडसे का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि गांधी की हत्या के बाद इस देश की न्यायपालिका ने उस व्यक्ति को सज़ा सुनाई और उसे गांधी हत्या के अपराध में फांसी हुई. यह तथ्य है जिससे किसी तरह की छेड़छाड़ असल में देश के इतिहास से छेड़छाड़ है, गांधी के साथ विश्वासघात है.

imageby :

उमाशंकर सिंह की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं. उनकी एक मजबूरी यह हो सकती है कि जिस झारखंड सरकार के अधीन वो काम करते हैं, उसकी वैचारिक गर्भनाल गोडसे जैसों से काफी हद तक जुड़ी हुई है. लिहाजा अपनी ही सरकार से वैचारिक भटकाव की बजाय नाथूराम गोडसे का नाम गोल कर जाना कहीं सस्ता और आसान विकल्प है.

अपने संपादकीय लेख में उमा शंकर सिंह लिखते हैं, “बच्चों अक्टूबर माह की ‘पंख’ पत्रिका बहुत ख़ास है. आप सभी जानते हैं कि 2 अक्टूबर का दिन भारत के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन भारत के दो महान व्यक्तित्वों ने भारत की धरा पर जन्म लिया था. ये दो महान व्यक्तित्व थे- राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी एवं सादगी की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री.” वो आगे लिखते हैं, “अतः इस उपलक्ष्य में ‘पंख’ पत्रिका भी ‘महात्मा गांधी विशेषांक’ प्रकाशित कर रही है.”

क्या आधी-अधूरी जानकारी देकर झारखंड सरकार की पत्रिका किसी भी तरह का न्याय कर पा रही है. जिन भावी पीढ़ियों के लिए यह पत्रिका छप रही है, उसे आधा-अधूरा ज्ञान देना उनके अज्ञान को ही बढ़ाना है.

क्या ये इत्तेफाकन हुआ? यदि यह इत्तेफ़ाक़ है तो झारखण्ड के बच्चों का भविष्य और शिक्षा की बागडोर लापरवाह हाथों में है? यदि जानबूझ कर हत्यारे का ज़िक्र नहीं किया गया तो यह मानने की पर्याप्त वजह है कि झारखंड सरकार नीतिगत तरीके से गोडसे का बचाव कर रही है.

Comments

We take comments from subscribers only!  Subscribe now to post comments! 
Already a subscriber?  Login


You may also like