90 साल पहले लिया गया दादा साहब फाल्के का यह साक्षात्कार अपने विभिन्न आयामों में आज भी उतना ही प्रासंगिक है.
दादा साहब फाल्के का यह इंटरव्यू सन 1928 में प्रकाशित हुआ था. इंडियन सिनेमैटोग्राफ कमेटी उन दिनों देश के गणमान्य व्यक्तियों से मिलकर फिल्मों से संबंधित एक सर्वेक्षण कर रही थी. उसी सिलसिले में दादा साहब फाल्के से यह बातचीत दर्ज हुई. इस बातचीत को गौर से पढ़ें तो पाएंगे के प्रश्नकर्ता के प्रश्न जांच-पड़ताल करने के लहजे में हैं. तुर्की-ब-तुर्की… प्रश्नों में उस समय की स्थिति-परिस्थिति भी समझ में आती है. दादा साहब फालके ने कम शब्दों में अपनी बातें रखी हैं. लेकिन उनकी बातें बहुत ही महत्वपूर्ण और आज भी प्रासंगिक है. 90 साल पहले के इंटरव्यू की महत्ता का इससे अंदाजा लग सकता है कि कुछ सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिल सके हैं और कुछ जवाब अभी तक आकार नहीं ले सके हैं, वे प्रश्न जस का तस बने हुए हैं.
मेरी दृष्टि में आपने देश में फिल्म इंडस्ट्री शुरू की?
जी हां, मैंने 1912 में भारत में फिल्म इंडस्ट्री शुरू की.
किस कंपनी से आपने शुरुआत की?
मेरी कंपनी का नाम फाल्के फिल्म्स था.
आपने कितने साल वहां काम किया?
मैंने वहां 8 सालों तक काम किया और फिर हमने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई.
कितनी फिल्मों का निर्माण किया आपने?
मैंने 28 फिल्मों का निर्माण किया. उनमें से मुख्य हैं ‘लंका दहन’, ‘श्री कृष्ण जन्म’ और ‘कालिया मर्दन’ आदि.
“फिल्म निर्माण में कमियां”
वर्तमान में फिल्म निर्माण में कैसी कमियों पर आपका ध्यान गया?
भारत के सभी फिल्म निर्माण में तकनीकी और कलात्मक कमियां हैं. अभिनय अच्छा नहीं है और फोटोग्राफी तो बहुत बुरी है. कला के बारे में कोई कुछ नहीं जानता. कोई पढ़ना नहीं चाहता.
क्या आज भी यही स्थिति है?
हां अब भी यही हाल है. निस्संदेह थोड़ा सुधार हुआ है. आज भी कई लोग फिल्म इंडस्ट्री में निवेश कर रहे हैं, मगर .उन्हें नहीं मालूम कि कौन सा कैमरा खरीदना चाहिए. कोई भी पढ़ना नहीं चाहता.
यह मुख्य कठिनाई है?
जी.
“फिल्म इंस्टीट्यूट”
स्थिति में बदलाव के लिए आपके क्या सुझाव हैं?
मेरा सुझाव है कि भारत में कहीं एक फिल्म स्कूल खोला जाए, जहां सिनेमा इंडस्ट्री, फोटोग्राफी, अभिनय और पटकथा लेखन की पढ़ाई हो.
क्या एक स्कूल पूरे देश के लिए पर्याप्त होगा?
मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता. देश में फिल्म निर्माण पर कुछ पाबंदियां भी होनी चाहिए.
क्या स्कूल आत्मनिर्भर हो?
होना तो यही चाहिए, लेकिन सरकार को भी मदद करनी चाहिए.
“आरंभ”
देश में फिल्म इंडस्ट्री आरंभ करने के आपके अनुभव कैसे रहे?
मुझे सब कुछ खुद करना पड़ा. मुझे अभिनय सिखाना पड़ा. मुझे खुद ही सिनेरियो लिखना पड़ा. फोटोग्राफी करनी पड़ी और उसका प्रोजेक्शन भी करना पड़ा. 1911 में इंडस्ट्री के बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता था.
क्या आप पुणे में थे?
नहीं मेरा बिजनेस नासिक में था. मैंने मुंबई में इंडस्ट्री आरंभ की, लेकिन बाद में नासिक चला गया.
क्या आपकी कंपनी के पास पर्याप्त फंड था?
शुरू में सब कुछ खुद ही लगाना पड़ा.
क्या अभी हिंदुस्तान फिल्म कंपनी फायदे में है?
हां. फायदे में है.
साल में कितनी फिल्में पूरी होती हैं?
साल में 12 से अधिक, लगभग 12 से 14. संतोषजनक काम करने के लिए एक विषय के निर्माण में 3 से 4 महीने लगते हैं. इन दिनों कोई भी क्वालिटी पर ध्यान नहीं देता. हर कंपनी संख्या पर ध्यान देती है. अगर हम क्वालिटी पर ध्यान नहीं देंगे तो (फिल्म का) बिजनेस नहीं बढ़ेगा.
फिल्म इंडस्ट्री के वर्तमान कमियों के बावजूद क्या आपको लगता है कि भारतीय फिल्में लोकप्रिय हैं?
जी बिल्कुल हैं, लेकिन मेरी राय में उन्हें और बेहतर करने की ज्यादा कोशिश होनी चाहिए,
क्या आपको लगता है कि सरकार स्टूडियो स्थापित करें तो वह किसी प्रकार से उपयोगी होगा?
इस विषय के बारे में मैंने नहीं सोचा है.
“शिक्षाप्रद फिल्में”
क्या आपको लगता है कि सरकार अपनी जरूरतों के मुताबिक प्राइवेट कंपनी को शिक्षाप्रद फिल्मों के निर्माण की जिम्मेदारी दे?
हां. क्योंकि आरंभ में इन शिक्षाप्रद फिल्मों से शायद ही कमाई होती है.
निजी निर्माताओं की दिक्कतें,क्या इस संबंध में आप के कुछ सुझाव हैं?
भारतीय निर्माताओं के अनेक दिक्कतें हैं. मदान का एकाधिकार है. भारत और वर्मा के एक तिहाई या एक चौथाई सिनेमाघर उनके एकाधिकार में हैं. मुंबई की एक कंपनी भी इस दिशा में सोच रही है. और फिर पश्चिम की फिल्में हैं, जो 4 से 8 हफ्ते आराम से चलती हैं. निजी निर्माताओं को अपनी फिल्में प्रदर्शित करने में काफी दिक्कतें होती हैं.
क्या आपने या आपकी कंपनी ने कभी मदान से अपनी फिल्में लेने के लिए संपर्क किया?
वे खुद ही फिल्में बनाते हैं.
यह स्वाभाविक है. इस बात की आप शिकायत नहीं कर सकते.
मुझे नहीं लगता कि हमने कभी कोशिश की.
अपने व्यावहारिक अनुभव से आपको ऐसा नहीं लगता है कि वे आपके लिए या आपकी कंपनी के लिए दिक्कतें पैदा करते हैं?
नहीं उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया. कई बार उन्हें भी दिक्कतें होती हैं.
“और सिनेमाघर चाहिए”
क्या आपको लगता है कि देश में और सिनेमाघर होने चाहिए?
हां, बहुत संभावनाएं हैं, लेकिन फिल्में अच्छी बने यह जरूरी है.
वह तो निर्माताओं पर निर्भर करता है.
हां, सिनेमा की जबरदस्त मांग है और लोग फिल्में देखना खूब पसंद करते हैं.
और सिनेमा घर बनाने के लिए आपके क्या सुझाव हैं?
मैंने इस संबंध में नहीं सोचा है.
“जनता पर फिल्म का प्रभाव”
क्या आपको लगता है कि जनता पर फिल्म का प्रभाव पड़ता है?
नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता, फिर भी मेरा मानना है कि आज की तरह प्रेम कहानियों का व्यापक प्रदर्शन ना हो.
आपको लगता है कि कोई बुरा प्रभाव पड़ता है?
मुझे नहीं लगता कि कोई बुरा प्रभाव पड़ता है.
क्या आपको लगता है कि प्रेम दृश्य दिखाए जाएं?
भारत के कुछ शिष्टाचार, प्रथा और रीति-रिवाज हैं. मुझे मालूम है कि पश्चिमी प्रथा और रीति-रिवाज विदेशों से आए हैं.
आप कहते हैं कि भारतीय फिल्में बहुत लोकप्रिय हैं. उसके साथ ही उनमें तकनीक, फोटोग्राफी और कलात्मक मेधा की कमी है. क्या आपको लगता है कि सुधार होने पर भी उनकी लोकप्रियता रहेगी?
सुधार होने पर भी फ़िल्में लोकप्रिय रहेंगी.
पर क्या आपको लगता है कि अभी की जैसी फिल्में बनती रहें तो भी लोकप्रिय बनी रहेंगी?
तब उनकी लोकप्रियता कम होगी.
सिनेमा देखने वालों के बीच उनकी लोकप्रियता कम होगी?
हां, कुछ समय के बाद.
“निर्माता की लागत”
अभी हर फिल्म के निर्माण पर औसतन क्या लागत आती है?
10,000 रुपए मान लें.
और उस निवेश से आपको अच्छा फायदा होता है?
हां.
किसी फिल्म में निवेशित लागत कितने समय में निकल आती है?
उसके लिए फिल्म 4 महीने चलनी चाहिए, पर कभी-कभी सही ढंग से ना दिखाने या बुरी मशीन के प्रोजेक्शन से तीन-चार हफ्तों में फिल्म खराब हो जाती है.
फिर आपको ज्यादा कॉपी बनानी पड़ती है? है ना?
प्रोजेक्शन की स्पीड प्रति घंटे 3 से 4 हजार फीट होनी चाहिए, पर कभी-कभी 8 से 10 हजार फीट प्रति घंटे प्रोजेक्शन होता है. इसकी वजह से फिल्में खराब हो जाती हैं.
प्रति घंटे 4000 फीट तो ऑर्थोडॉक्स रेट है?
हां यह अच्छा औसत है. अगर डेढ़ घंटे में 6000 फीट प्रोजेक्शन हो तो फिर फिल्म लंबी चलेगी.
लेकिन ताजा पॉजीटिव बनाने का खर्च ज्यादा तो है नहीं?
ज्यादा नहीं है, लेकिन उसमें फायदा नहीं होता है.
क्या आप बताएंगे कि किसी भी फिल्म में लगाई पूंजी कितने समय में वापस आ जाती है? एक औसत समय 6 महीने मान लें.
हां लगभग 6 महीने तो लग ही जाएंगे.
इसके बाद की कमाई तो सिर्फ लाभ है?
जी.
“क्वालिटी का ध्यान नहीं और फिजूलखर्ची”
फिल्म की क्वालिटी सुधारनी हो तो ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे?
जी, लेकिन आजकल क्वालिटी का ध्यान रखे बगैर फिजूलखर्ची की जा रही है.
इसका मतलब कि वे नहीं जानते कि अधिकतम फायदे के लिए पैसे कैसे खर्च किए जाएंगे?
जी.
“1928 में 350 सिनेमाघर”
क्या आप बता सकते हैं कि देश में कितने सिनेमाघर हैं?
लगभग 350.
इंटरनेशनल बाजार को ध्यान में रखें तो फिल्म की लागत क्या हो जाएगी?
फिर तो 5,00,000 रुपए चाहिए.
“फिल्म प्रोडक्शन स्टाफ”
क्या नासिक में आपकी कंपनी में स्थाई स्टाफ और अभिनेता-अभिनेत्री हैं?
हां स्थाई स्टाफ हैं..
कितने?
लगभग 100 हैं. वास्तव में 95.
आप बाहर से शौकिया अभिनेता-अभिनेत्री नहीं लेते.
कभी नहीं.
आपकी कंपनी में कितने फोटोग्राफर और डायरेक्टर हैं?
3 फोटोग्राफर और 3 डायरेक्टर.
उन्होंने कहां से प्रशिक्षण लिया?
मैंने प्रशिक्षित किया है उन्हें.
मैंने कुछ लड़के और लड़कियों को देखा, लड़कियां भी है क्या?
हां, कुछ लड़कियां तो है ही. फिलहाल 14 लड़कियां काम करती हैं.
क्या सभी के स्थाई नौकरी है?
जी.
हर साल आप कितनी फिल्में बना पाते हैं?
हर महीने एक कह सकते हैं. हमें हर महीने एक फिल्म बनानी ही होती है. साल में तीन चार हो तो भी मैं संतुष्ट रहूंगा.
“शिक्षाप्रद फिल्में”
क्या आपने कभी किसी सिनेमाघर के मैनेजर से संपर्क किया कि शिक्षाप्रद फ़िल्में प्रदर्शित हों?
वे मेरी फ़िल्में साइड फिल्मों के तौर पर लेने को तैयार हैं. सारे सिनेमाघर मेरी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए तैयार रहते हैं.
क्या आपने कभी शिक्षाप्रद फिल्में प्रदर्शित कीं?
हां, मैंने ‘टेलीग्राम’, ‘ग्लास फैक्ट्री’ और दूसरी इंडस्ट्रियल फिल्में 5-6 साल पहले बनाई थीं. वे पॉपुलर हुई थीं. सभी 7000 से 8000 फीट की फिल्में चाहते हैं. अब कोई भी छोटी फिल्में नहीं चाहता, जबकि छोटी फिल्मी उपयोगी और लाभप्रद हो सकती हैं. हालांकि उनके विषय खास नहीं होते हैं, पर लंबी फिल्मों के बाद उन्हें देखा जा सकता है. छोटी फिल्में लाभ देती हैं. बड़े शहरों से लेकर छोटे गांवों तक में उनसे लाभ होता है.
“15,000 से शुरुआत की”
क्या मैं जान सकता हूं कि कितनी पूंजी से आप ने आरंभ किया?
15,000 रुपए से.
वह पूंजी 3 लाख तक कैसे पहुंची?
मुझे दोस्तों से पूछना होगा.
“कंपनी जोड़ने या बढ़ाने की कोशिश”
फिल्म प्रोडक्शन कंपनी चलाने के साथ आपने किसी कंपनी को उससे जोड़ा?
नहीं.
क्या आपने कभी किसी और कंपनी को जोड़ने और अपनी कंपनी को बढ़ाने के बारे में सोचा?
किसी ने सुनी ही नहीं.
क्यों नहीं सुनी?
मालूम नहीं. मैंने मुंबई में काम कर रहे पाटणकर से पूछा. मैंने कोल्हापुर के बाबूराव से पूछा. पर उन्होनें कहा कि वे नहीं जुड़ सकते हैं.
क्या आपको लगता है कि सक्रिय फिल्म कंपनियों जुड़ कर निर्माण करें तो बेहतर स्थिति होगी?
हां.
अगर कंपनियां जुड़ जाएं तो क्या फायदे होंगे?
उनके उनके पास पर्याप्त पूंजी होगी. उसके बाद दूसरे जुड़ाव भी होंगे. कलाकार जुड़ेंगे. मेरे पास दो या तीन फर्स्ट क्लास एप्टर हो सकते हैं. दूसरों को भी यही लाभ होगा. सभी जुड़ जाएं तो दर्जन भर से ज्यादा फर्स्ट क्लास एक्टर हो जाएंगे. एक फिल्म पर कितना खर्च होना चाहिए.
किसी भी फिल्म पर कितना खर्च होना चाहिए कि एक मुनासिब फायदा भी हो जाए?
25,000 रुपए से ज्यादा नहीं करना चाहिए.
फर्स्ट क्लास अभिनेता-अभिनेत्री या बेहतरीन शूटिंग के लिए ज्यादा पैसे नहीं चाहिए क्या?
मुझे नहीं लगता 25,000 रुपए में मैं फर्स्ट क्लास फिल्म नहीं बना सकता हूं.
आपको फायदा भी हो जाएगा?
हां.
लेकिन अगर किसी फिल्म पर एक लाख खर्च हो तो फायदा नहीं होगा क्या?
नहीं.
ऐसा क्यों होता है?
क्योंकि हमारी फिल्मों के लिए केवल भारतीय बाजार हैं.
आपका मतलब कि भारतीय बाजार बहुत छोटा है.
जी.
“बाजार का सुधार”
भारतीय बाजार सुधारने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?
अगर हम कुछ ऐसी फिल्में बना सके जो विदेशों में सराही जाएं और अच्छा बाजार बनाएं तो फिर एक फिल्म से ज्यादा फायदा हो सकता है. मेरे ख्याल में नवीनता की वजह से हमारी फिल्में विदेशी पसंद करेंगे. यह भी हो सकता है कि भारतीय किरदारों और रोमांस के लिए भी वे हमारी फिल्में देखें.
15–20 हजार लोगों के लिए एक थिएटर
कितनी आबादी के शहर के लिए एक सिनेमाघर होना चाहिए?
15 से 20 हजार की आबादी के लिए एक सिनेमाघर होना चाहिए.
20,000 से आपको कितनी रकम मिल पाएगी?
किसी भी दर से नुकसान नहीं होगा.
क्या 20,000 की आबादी से हर महीने 1,500 रुपए का फायदा हो जाएगा?
मुझे नहीं लगता. उससे कुछ कम ही होगा.
इसका मतलब कि हर दिन 50 रुपए मिलें?
हां, लेकिन फिल्म के लिए रोजाना 40 रुपए देने पड़ेंगे. 40 रुपए तो मिनिमम शुल्क है.
मैं जानना चाहता हूं कि 20000 की आबादी से आपको कितनी रकम मिल पायेगी?
हमें हर महीने 1000 रुपए मिल सकते हैं और मुझे लगता है कि यही अधिकतम होगा. हमें 50% और चाहिए, अपने भुगतान की भरपाई के लिए.
“सेंसर बोर्ड”
बांबे सेंसर बोर्ड के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको लगता है कि उसे ठीक से गठित किया जाना चाहिए?
जी हां.
उसके लिए क्या सुझाव है आपका?
कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे सिनेमा इंडस्ट्री की अंदरूनी जानकारी हो.
“सरकार कर्ज दे”
क्या आपको लगता है कि सरकार इंडस्ट्री की मदद करे?
हां बिल्कुल करे.
किस रूप में?
यह कठिन सवाल है. मुझे लगता है कि कुछ शर्तों के साथ हमें कर्ज मिले.
क्या सरकार कुछ सुरक्षात्मक कदम भी उठाए?
हां, कर कम हो या रद्द हो.
अगर सरकार अग्रिम राशि देगी तो सरकार को वापसी की क्या गारंटी मिल सकती है?
मैं अभी कुछ नहीं बता सकता.
क्या आप दूसरे कर हटवाना या कम करवाना चाहते हैं?
केमिकल और रॉ फिल्म पर कर कम होना चाहिए.
क्या आपने पोस्टर विज्ञापन देखे हैं?
हां.
क्या आपको लगता है कि उनसे कुछ नुकसान होता है? क्या उनका सेंसर होना चाहिए?
आलिंगन, प्रेम और चुंबन के दृश्य सेंसर होने चाहिए.
“कहानी की सेंसरशिप”
क्या आप को लगता है कि कहानी और पटकथा सेंसर होनी चाहिए ताकि किसी फिल्म के प्रदर्शन पर दर्शकों की आपत्ति से बचा जा सके?
उसकी जरूरत नहीं है. बोर्ड परीक्षण कर ले. वह काफी है.
एक और सवाल,आपने चुंबन दृश्य काटने की सलाह दी. क्या ऐसे दृश्य काटने के बाद फिल्में लोकप्रिय रह पाएंगीं?
फिर दूसरे दृश्य लोकप्रिय होंगे.
फिल्म में अगर कुछ खास रखेंगे तो गली के दर्शक कहेंगे, ‘बकवास, हम ऐसा नहीं करते’.
ऐसे दृश्यों पर निजी तौर पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है. मैं विदेशियों से मिलता रहता हूं. उनके बात-व्यवहार जानता हूं. चुंबन दृश्यों से मुझे आपत्ति नहीं है, लेकिन बच्चे और किशोर चुम्बन दृश्य देखेंगे तो उन पर बुरा असर रहेगा.
मैं नहीं कहूंगा कि भारतीय प्रेम दृश्य पश्चिमी तरीके से दिखाएं या भारतीय तरीके से ठीक रहेगा?
हम सार्वजनिक जीवन में नहीं चूमते. हम अकेले में चूमते हैं. फिल्म के दृश्य में चुंबन दिखाया जाएगा तो दर्शक पसंद नहीं करेंगे.
यही तो मेरा सवाल है, आप नहीं चाहते कि पर्दे पर चुंबन दिखाया जाए. हम जानते हैं कि लोग अकेले में क्या-क्या करते हैं? अगर वह सब पर्दे पर नहीं दिखाया जाए तो दर्शक क्या कहेंगे? वे पसंद नहीं करेंगे और कहेंगे कि फ़िल्में जिंदगी के करीब नहीं है.
नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता.
आप उनकी बात कैसे जानते हैं? क्या आप किताबें पढ़ते हैं या कुछ और…
मैं दो-तीन पत्रिकाएं (मूविंग पिक्चर्स, बायस्कोप आदि) पढ़ता हूं.
“बाल फिल्म”
क्या बच्चों के लिए अलग से फिल्में बननी चाहिए?
हां.
क्या आपको लगता है कि फिल्में बच्चों के लिए खतरनाक हैं?
केवल कुछ फिल्में हैं. सभी नहीं.
क्या 10 साल से कम उम्र के बच्चों को ऐसी फिल्में नहीं देखने दी जानी चाहिए?
हां, कुछ फिल्मों के मामले में.
“पानीपत की लड़ाई”
क्या पानीपत के युद्ध पर फिल्म लाने में कोई खतरा है ?
मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई नुकसान है.
उस युद्ध में मराठों की हार हुई थी.शायद यह बात दर्शकों को अच्छी न लगे?
हां, कभी मराठा जीतेंगे और कभी मुसलमान जीतेंगे. पानीपत के युद्ध के मामले में मराठों को यह बात पसंद नहीं आएगी.
तो क्या ऐसी फ़िल्में बनाना खतरनाक है?
मुझे नहीं लगता. व्यवहारिक तौर पर कोई खतरा नहीं है. मुमकिन है भावनात्मक विरोध हो.
क्या आपको लगता है कि दर्शक इस फिल्म का प्रदर्शन रोकेंगे?
नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता. वे फिल्म देखेंगे और निकलते वक्त बोलेंगे कि फिल्म अच्छी नहीं है.
आपकी कंपनी का मुख्य कार्यालय नासिक में है?
हमारा स्टूडियो नासिक में है और मुंबई में कार्यालय हैं.
नासिक में कितने निर्माता हैं?
केवल एक और वह मैं हूं.
आप नासिक क्यों गए?
क्योंकि वहां का मौसम फोटोग्राफी के लिए ठीक है. वहां जंगल, पहाड़, ऐतिहासिक स्थान और नदियां हैं.
“बिजली और आर्कलाइट”
आर्कलाइट के लिए पर्याप्त बिजली मिल जाती है?
मैं खुद बिजली तैयार करता हूं. मेरे पास दो इंजन और दो डायनेमो हैं.
क्या आप आर्क लाइट इस्तेमाल करते हैं?
हां.
कैमरे से फोटो लेने के लिए?
हां.
यही जानना चाहता था मैं. अगर आप चाहे तो पर्याप्त बिजली पैदा कर सकते हैं?
नहीं, हमारे पास 5 हॉर्स पावर की एक और 12 हॉर्स पावर की दूसरी मशीन है पर्याप्त बिजली के लिए हमें 40 हॉर्स पावर की मशीन चाहिए.
(अमरनाथ शर्मा के सौजन्य से उपलब्ध बीके आदर्श द्वारा सम्पादित ‘फिल्म इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ में दादा साहब फाल्के का यह इंटरव्यू संकलित है. भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के 50 वर्ष पूरे होने पर मई, 1963 में ‘ट्रेड गाइड’ ने इसका प्रकाशन किया था. अनुवाद और प्रस्तुति: अजय ब्रह्मात्मज)