अटल बिहारी वाजपेयी: भारतीय राजनीतिक के कपाल पर खिंची एक अमिट लकीर

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब ‘हार नहीं मानूंगा’ में उकेरी गई अटल बिहारी वाजपेयी की अनगिनत छवियों में से एक अंश.

WrittenBy:विजय त्रिवेदी
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वाजपेयी ने संसदीय राजनीति की पहली सीढ़ी 1955 में लखनऊ से चढ़ने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हो पाये. कश्मीर आन्दोलन के वक्त 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जेल में मौत हो गयी. डॉ. मुखर्जी को बिना परमिट के कश्मीर में घुसते वक्त 11 मई को गिरफ़्तार किया गया था और 23 जून 1953 को जेल में ही उनकी मौत हो गयी.

उसी साल लखनऊ से सांसद श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित ने इस्तीफ़ा दे दिया था क्योंकि उन्हें संयुक्त राष्ट्र में भारत का राजदूत बनाया गया था. विजयलक्ष्मी जवाहर लाल नेहरू की बहन थीं. पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने वहॉं उपचुनाव में जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर नौजवान वाजपेयी को उतारा, लेकिन साधनों की कमी की वजह से वह जीत नहीं पाये. उस वक्त न तो जनसंघ की कोई राजनीतिक ज़मीन बन पायी थी और न ही उनके पास पैसा और दूसरी व्यवस्थाएँ थीं.

इस चुनाव में अठाईस साल के वाजपेयी तीसरे नम्बर पर रहे. वाजपेयी ने चुनाव में मेहनत बहुत की थी, लेकिन उन्हें सिर्फ़ चौंतीस हज़ार वोट मिले और उनतीस फ़ीसदी वोट हासिल किये. कांग्रेस के उम्मीदवार एस.आर. नेहरू उन्चास हज़ार वोटों से चुनाव जीत गये.

1957 की शुरुआत में यह आशंका राजनेताओं को थी कि चुनाव वक्त पर होंगे या नहीं क्योंकि एक साल पहले राज्यों का पुनर्गठन हुआ था, भाषावार राज्य बने थे. कई क्षेत्रों में अशान्ति का माहौल था. लेकिन चुनाव वक्त पर हुए. लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं के भी चुनाव हुए. बीस करोड़ मतदाताओं ने उन चुनावों में हिस्सा लिया.

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय उपचुनाव में हार के बावजूद वाजपेयी को संसद में भेजना चाहते थे, उन्हें लगता था कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जगह को भरने के लिए वाजपेयी ही सबसे योग्य नौजवान हैं. दूसरी लोकसभा के चुनाव में 1957 में वाजपेयी को तीन-तीन सीटों से चुनाव लड़ना पड़ा. उपचुनाव में वोट अच्छे मिले थे इसलिए लखनऊ से चुनाव लड़ाने का भी फ़ैसला किया गया.

मथुरा में पार्टी को कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा था जिन्हें तैयार कर मुश्किल लड़ाई के लिए तैयार किया जा सकता. वहाँ सभी विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे क्योंकि एक तो ख़र्चा कम था और दूसरा ज़मानत बचने की उम्मीद भी थी. बलरामपुर में पार्टी की स्थिति ठीक थी, लेकिन इससे पहले वाजपेयी बलरामपुर कभी गये नहीं थे. बलरामपुर में ही स्वामी करपात्रीजी ने 1948 में राम राज्य परिषद की स्थापना की थी.

वाजपेयी पहली बार बलरामपुर से ही जीत कर आये. उन्हें एक लाख बीस हज़ार वोट मिले, अपने प्रतिद्वन्दी हैदर हुसैन से दस हज़ार वोट ज़्यादा, जबकि हैदर हुसैन का उस इलाके में ख़ासा असर था. दूसरी लोकसभा में जनसंघ के चार सदस्य चुने गये. बलरामपुर से वाजपेयी के अलावा हरदोई सीट और महाराष्ट्र में दो सीटों—धूलिया और रत्नागिरी सीट पर पार्टी को जीत हासिल हुई. जनसंघ को 6 फ़ीसदी वोट मिले. वाजपेयी लखनऊ में चुनाव हार गये. उन्हें 33 फ़ीसदी वोट मिले. मथुरा में तो वाजपेयी की ज़मानत ज़ब्त हो गयी, उन्हें सिर्फ़ 24 हज़ार वोट ही मिल पाये और वे पाँच उम्मीदवारों में चौथे नम्बर पर रहे.

1962 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी दीनदयाल उपाध्याय वाजपेयी का इस्तेमाल संसद में करना चाहते थे, इसलिए उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया. वाजपेयी 3 अप्रैल 1962 को राज्यसभा के लिए चुने गये. उन्हें वहाँ जनसंघ के संसदीय दल का नेता भी बना दिया गया. सांसद के तौर पर ही वाजपेयी 1965 में पहली बार अपनी विदेश यात्रा पर गये. इस पहली विदेश यात्रा में वह संसदीय प्रतिनिधिमण्डल के साथ पूर्वी-अफ्रीका के देशों के दौरे पर गये थे.

संसद के इतिहास में 6 मई, 1961 का दिन हमेशा याद रखा जायेगा. उस दिन पहली बार संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक हुई थी. हैरानी इस बात पर हो सकती है कि यह संयुक्त बैठक दहेज जैसी सामाजिक बुराई पर रखे गये बिल को लेकर बुलानी पड़ी. दोनों सदनों में इस बात पर मतभेद था कि कानून को कितना कड़ा बनाया जाये. राज्यसभा कड़े कानून के पक्ष में थी तो कई सदस्यों की राय थी कि लड़की के विवाह में यदि उसका पिता या रिश्तेदार स्वेच्छा से धन और आभूषण देना चाहते हैं तो उसे दहेज की परिधि से मुक्त रखा जाना चाहिए लेकिन बहुमत इसके ख़िलाफ़ था.

सरकार का कहना था कि कन्या के विवाह में यदि स्वेच्छा से धन और उपहार दिये जाते हैं तो उसे कैसे रोका जा सकता है. वाजपेयी ने बीच का रास्ता निकालते हुए प्रस्ताव रखा कि उपहारों को दो हज़ार रुपए के मूल्य तक सीमित रखा जाये. साठ के दशक में दो हज़ार भी बड़ी रकम होती थी, लेकिन उनका प्रस्ताव गिर गया. इसके पक्ष में 192 वोट आये तो विपक्ष में 230. विधेयक में दहेज लेने और देने के साथ-साथ माँगने को दण्डनीय अपराध माना गया था, जिसमें छह महीने तक की सज़ा रखी गयी थी.

इस विधेयक पर चर्चा करते हुए वाजपेयी ने कहा, “आवश्य‍‍कता इस बात की है कि देश की आर्थिक प्रगति की जाये, शिक्षा का प्रसार किया जाये, जात-पात के बन्धन तोड़े जायें और लड़के-लड़कियाँ उन्मुक्त भाव से विवाह करें. शादियाँ परमात्मा के यहाँ नहीं, आपस में तय हों, तभी दहेज ख़त्म हो सकता है.”

साठ के दशक में जनसंघ बहुत बड़ी पार्टी नहीं बन पायी थी और उसे पैसे की कमी से जूझना पड़ रहा था क्योंकि ज़्यादातर उद्योगपति सिर्फ़ सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को ही चन्दा देते थे. तब वाजपेयी अगस्त 1962 में एक प्राइवेट मेम्बर बिल लेकर आये. इस बिल में कम्पनीज़ एक्ट, 1956 के तहत बदलाव का सुझाव रखा गया था. बिल में कहा गया कि कम्पनियों को राजनीतिक दलों को चन्दा देने पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि कम्पनियों को अपने शेयरहोल्डर्स का पैसा राजनीति दलों को चन्दे के तौर पर देने का नैतिक अधिकार नहीं है.

वाजपेयी ने सवाल किया कि कम्पनियाँ मुनाफ़ा कमाने के लिए होती हैं तो वह अपना पैसा राजनीतिक दलों को क्यों दें? और फिर उससे राजनीति में भी गन्दगी आती है. वाजपेयी ने कहा, “राजनीतिक दलों को चन्दे के लिए जनता के पास जाना चाहिए, जनता उनकी मदद करे.” बिल पर संसद में ख़ासी बहस हुई लेकिन बिल पास नहीं हो पाया.

1962 में वाजपेयी संविधान की आठवीं सूची में सिन्धी भाषा को शामिल करने के लिए प्राइवेट मेम्बर बिल लेकर आये. सिन्धी भाषा बोलने वाले ज़्यादातर लोग जनसंघ का समर्थन करने वाले थे. के. आर. मलकानी और एल. के. आडवाणी जैसे नेता भी थे, लेकिन वाजपेयी को बिल वापस लेना पड़ा क्योंकि तब नेहरू इस बिल को पास कराने के समर्थन में नहीं थे. बाद में 1967 में जनसंघ के ही सांसद यू.एन. त्रिवेदी के प्राइवेट मेम्बर बिल को सरकार ने अपना बिल बना लिया और सिन्धी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने का प्रस्ताव रखा.

वाजपेयी के सबसे लम्बे समय तक मित्र रहे एन. एम. घटाटे अप्पा के मुताबिक अगस्त 1957 में लोकसभा अध्यक्ष अनन्त शयनम आयंगर दिल्ली विश्वविद्यालय आये तो अप्पा ने उनसे पूछा, “संसद में सबसे अच्छा वक्ता कौन है?” आयंगर ने कहा, “दो हैं! अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी में और हीरेन मुखर्जी अंग्रेज़ी में.”

नेहरू भी वाजपेयी की हिन्दी से प्रभावित थे. वह उनके सवालों का जवाब संसद में हिन्दी में ही देते थे. विदेश नीति हमेशा उनका प्रिय विषय रहा. एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा, “मैं जानता हूँ पण्डितजी रोज़ाना शीर्षासन करते हैं. वह शीर्षासन करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उलटी ना देखें.” इतना सुनना था कि नेहरू जी भी ठहाका मार कर हँस पड़े.

जनसंघ के भीतर भी लोग कहा करते थे कि वरिष्ठ नेता बलराज मधोक, सरदार वल्लभभाई पटेल की लाइन पर चलते हैं और वाजपेयी, जवाहर लाल नेहरू की लाइन पर. इसको लेकर भी संघ में नाराज़गी रहती थी, लेकिन वाजपेयी हमेशा नेहरू की रीति-नीति पर चलते रहे.

नेहरू की तरह ही विदेश नीति वाजपेयी का भी प्रिय विषय रहा. 1959 में लोकसभा में वाजपेयी ने चीन के तिब्बत पर रवैये को लेकर कड़ा भाषण दिया. 8 मई, 1959 को वाजपेयी ने भारत सरकार के चीन के प्रति रुख़ पर भी सवाल खड़े किये और फिर 21 अगस्त 1959 को लोकसभा में एक प्रस्ताव रखा कि सरकार को तिब्बत के मसले को संयुक्त राष्ट्र में उठाना चाहिए.

वाजपेयी ने कहा, “तिब्बत में जो कुछ हो रहा है वह सभी स्वतन्त्रता प्रेमियों और मानवीय गरिमा में विश्वास रखनेवाले व्यक्तियों के लिए बहुत पीड़ादायक है. वे तिब्बतियों की दशा को देखकर अवाक हैं. अब यह तिब्बत की स्वतन्त्रता या स्वायत्तता का का प्रश्न नहीं रह गया है बल्कि प्रश्न ये है कि क्या तिब्ब्त एक देश के रूप में बना रहेगा?”

वाजपेयी ने आगे कहा, “मान लीजिए संयुक्त राष्ट्र में भारत यह प्रश्न नहीं उठाता है तो कोई अन्य देश ऐसा कर देगा. मैं यह जानना चाहूँगा कि ऐसी दशा में हमारी नीति क्या होगी?”

ये वाजपेयी की युवा किन्तु परिपक्व कूटनीतिक समझ का ही नतीजा था कि नेहरू का भी वाजपेयी के प्रति रवैया हमेशा अच्छा रहा. 1961 में जब नेहरू ने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया तो उसमें वाजपेयी को शामिल किया जबकि उस परिषद में दिग्गज नेता और प्रतिष्ठित लोग शामिल थे और वाजपेयी उस वक्त विपक्षी पार्टी के नौजवान नेता थे, पहली बार लोकसभा में चुन कर आये थे. लेकिन जब तक परिषद की पहली बैठक होती वाजपेयी लोकसभा के सदस्य नहीं रह गये थे.

वह 1962 में बलरामपुर से तीसरी लोकसभा का चुनाव कांग्रेस की सुभद्रा जोशी से दो हज़ार वोट से हार गये जबकि वाजपेयी ने बलरामपुर के लिए बहुत काम किया था और वह लगातार वहाँ जाते रहे थे. कहा तो ये भी जाता था कि पण्डित नेहरू भले ही वाजपेयी को पसन्द करते रहे हों लेकिन उनकी कोशिश रही कि संसद से अच्छा बोलने वाले और प्रभावशाली नेताओं को बाहर कर दिया जाये. शायद इसलिए 1962 के चुनाव में वाजपेयी के ख़िलाफ़ नौजवान और सुन्दर सुभद्रा जोशी को उतारने का फ़ैसला किया गया. नेहरू ने उस वक्त के सुपरस्टार हीरो बलराज साहनी को जोशी के प्रचार के लिए आने का आग्रह किया. बलराज साहनी के प्रचार का असर पड़ा और सुभद्रा जोशी चुनाव जीत गयीं, हालाँकि नेहरू ख़ुद वाजपेयी के ख़िलाफ़ प्रचार करने के लिए बलरामपुर नहीं गये.

मई 1964 में नेहरू के निधन के बाद वाजपेयी ने जो श्रद्धांजलि नेहरू को दी, उसे भी अपने आप में एक यादगार भाषण कहा जा सकता है.
वाजपेयी ने जब नेहरू को श्रद्धांजलि दी तो पूरा सदन भावुक हो गया. वाजपेयी ने कहा, “एक सपना अधूरा रह गया, एक गीत मौन हो गया और एक लौ बुझ गयी. दुनिया भर को भूख और भय से मुक्त करने का सपना, गुलाब की ख़ुशबू और गीता के ज्ञान से भरा गीत, और रास्ता दिखाने वाली लौ. कुछ भी नहीं रहा.”

वाजपेयी ने आगे कहा, “यह एक परिवार, समाज या पार्टी का नुकसान भर नहीं है. भारत माता शोक में है क्योंकि उसका सबसे प्रिय राजकुमार सो गया. मानवता शोक में है क्योंकि उसे पूजने वाला चला गया. दुनिया के मंच का मुख्य कलाकार अपना आख़ि‍री एक्ट पूरा करके चला गया. उनकी जगह कोई नहीं ले सकता.”

वाजपेयी इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा, “लीडर चला गया है, लेकिन उसे मानने वाले अभी हैं. सूर्यास्त हो गया है, लेकिन तारों की छाया में हम रास्ता ढूँढ लेंगे. यह इम्तिहान की घड़ी है लेकिन उनको असली श्रद्धांजलि भारत को मजबूत बना कर ही दी जा सकती है.”

इससे पहले 1964 की मई के तीसरे हफ़्ते में वाजपेयी और नेहरू के बीच संसद में तीख़ा आमना-सामना हो गया था. प्रधानमन्त्री नेहरू ने तब शेख अब्दुल्ला को न केवल रिहा कर दिया था बल्कि पाकिस्तान में फील्ड मार्शल अयूब खान के साथ बातचीत के लिए भी भेज दिया था.

जनसंघ उनके इस फ़ैसले से नाराज़ था. वह कश्मीर की दो राष्ट्र नीति के पहले से ही ख़िलाफ़ था और अब इस मसले पर पाकिस्तान से बातचीत का मतलब तीन देश सिद्धान्त को मानने जैसा था.

(हार्पर कॉलिन्स और जगरनॉट की अनुमति से प्रकाशित)

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