जब शरद पवार ने संजय दत्त के बारे में रूखी टिप्पणी की- ‘कोई महात्मा गांधी नहीं रिहा हुए हैं’.
स्पष्टीकरण: यासिर उसमान संजय दत्त की बेस्टसेलिंग जीवनी संजय दत्त: बॉलीवुड का बिगड़ा शहजादा के लेखक हैं
संजय दत्त के जीवन पर बनी बायोपिक संजू बॉक्स ऑफिस पर सफलता के रिकॉर्ड तोड़ रही है. पहले ही हफ्ते में इस फिल्म की कमाई 100 करोड़ रुपए को पार कर गई है. लेकिन राजकुमार हिरानी निर्देशित इस फिल्म को लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, एक तरफ लोग रणबीर कपूर के शानदार प्रदर्शन के बारे में बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ लोग मानते हैं कि संजय दत्त की ज़िंदगी और अपराधों पर पर्दा डालने के लिए इस फिल्म का निर्माण किया गया है, जिसमें करोड़ों रुपए लगा कर सार्वजनिक छवि को सुधारने की कोशिश की जा रही है.
1993 के मुंबई बम विस्फोटों के मामले में संजय की भागीदारी का ठीकरा मीडिया के सिर पर फोड़ा गया है. मानो संजय सिर्फ इसलिए कठघरे में खड़े हुए क्योंकि मीडिया उनके पीछे पड़ा था, इसलिए नहीं कि अंडरवर्ल्ड के साथ उनके संदिग्ध रिश्ते थे और अपने घर में उन्होंने एके जैसी बंदूकें और हथगोले जमा करके रखे थे!
संजय दत्त पर शोध करके एक किताब का लेखक होने के नाते मैं कहना चाहूंगा कि मामले को इस कदर भटकाने और हल्का बनाने से अधिक निराशा मुझे यह देखकर हुई कि संजय की ज़िंदगी के कई महत्वपूर्ण पात्र और घटनाएं फिल्म से गायब कर दी गई हैं. यहां पर मैं ऐसी ही कई अहम बातों का ज़िक्र कर रहा हूं, जिनकी तरफ से यह फिल्म आंखें मूंद लेती है.
1: कानून के साथ संजय की पहली मुठभेड़
1993 के मुंबई विस्फोट मामले में संजय का कानून के साथ पहली बार सामना नहीं हुआ था. 1982 में वह पाली हिल पर अपने घर पर पहली बार गोलीबारी के मामले में फंसे थे.
किताब क्या कहती है?
22 मई, 1982 की गर्मियों की रात थी. संभ्रांत पाली हिल के ज़्यादातर बाशिंदे गहरी नींद में थे. सेंट ऐन चर्च के पास 58 नंबर बंगले में अंधेरा पसरा हुआ था. लेकिन ऊपर से दिखाई दे रही उस शांति के पीछे उथल-पुथल छिपा हुआ था. अचानक, इस मुहल्ले को गोली चलने और शीशे टूटने की आवाज़ों ने झकझोर कर जगा दिया.
संजय दत्त हवा में .22 बोर का अपना राइफल लहराते हुए अपने बंगले के परिसर में डगमगाते हुए चल रहे थे. कुछ मिनटों में चिंतित पड़ोसी और उत्सुक राहगीर बाहर आ जुटे और वे अंदर झांकने की कोशिश कर रहे थे. ऐसा लग रहा था कि वह नौजवान आपे में नहीं था, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह कुछ घबराया हुआ भी लग रहा था. उसके बाद वह रोने लगा. सुबकने के कारण हिलती हुई देह के साथ वह नंगे हाथों से कंटीले तारों की बाड़ पर चढ़ने लगा. अपने हाथ से बहते खून से बेपरवाह संजय की चीख हवा में गूंज रही थी: ‘आप सब लोग मुझसे डरते क्यों हैं? मैं ड्रग एडिक्ट नहीं हूं. मैंने ड्रग्स छोड़ दी है!’ ऐसा ज़ाहिर हो रहा था कि टीना मुनीम का इस तरह उसकी ज़िंदगी से चले जाना उसको अभी भी परेशान कर रहा था.
यह बात धीरे-धीरे साफ़ हुई कि हुआ क्या था: शराब के नशे में चूर और दिल टूटने के गम में डूबे संजय ने अपने बंगले में ही हवा में अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं. गोलियों से बंगले की कुछ खिड़कियां टूट गई थीं और उनकी कार का शीशा चकनाचूर हो गया था.
इस पूरी घटना के बाद शायद संजय को यह ध्यान आया कि उन्होंने कितना गैरज़िम्मेदारी भरा काम किया है, और बहुत सारे लोग उनको देख रहे हैं. वो भागकर अपने घर में वापस गए और उन्होंने खुद को कमरे में बंद कर लिया. जब पुलिस आई और उसने घर की तलाशी ली तो संजय कहीं नहीं मिले. बाद में उन्होंने माना कि एक दोस्त उनको चुपके से निकाल कर ले गया था.
गोलियां चलने की यह घटना जिस समय की है उस समय संजय घर पर अकेले थे. सुनील दत्त शूटिंग के सिलसिले में अमेरिका गए हुए थे और वे अपने साथ दोनों बेटियों को भी ले गए थे. कुमार गौरव भी अमेरिका जा रहे थे.
असल में, उसी शाम संजय दत्त, कुमार गौरव को छोड़ने के लिए एयरपोर्ट गए थे, तभी उनको यह ख़बर मिली थी कि टीना की फिल्म सौतन की शूटिंग पूरी हो गई थी. सिंगापुर में शूटिंग करके फिल्म की पूरी टीम वापस आ चुकी थी. लेकिन टीना ने संजय को फोन तक नहीं किया था. जब संजय घर पहुंचे और अपने लिए शराब निकाली, तो वे इस बात से भड़के हुए थे कि टीना ने उनको फोन नहीं किया.
उनके बीच ब्रेकअप हो चुका था लेकिन संजय इसको स्वीकार नहीं करना चाहते थे. उन्होंने कहा, “शूटिंग ख़त्म हो चुकी है और सभी लोग वापस आ चुके हैं. लेकिन वह है कहां? मैं उससे प्यार करता हूं. मैं उसके बिना कभी जी नहीं पाऊंगा.’
2: संजय की पहली पत्नी ऋचा शर्मा और पहला बच्चा त्रिशाला
फिल्म संजू संजय को एक बड़े दिल वाले पारिवारिक आदमी के रूप में दिखाने की कोशिश करती है लेकिन संजय हमेशा से ऐसे नहीं थे. फिल्म कहती है कि उनके 350 से ज़्यादा अफेयर रहे, लेकिन यह उनकी पहली पत्नी ऋचा शर्मा का ज़िक्र तक करना भूल जाती है. 1980 के दशक के उत्तरार्ध में और 1990 के दशक के पूर्वार्ध में जब ऋचा कैंसर से जूझ रही थीं, तब संजय का उस दौर की एक और बड़ी स्टार हिरोइन के साथ अफेयर चलने लगा था.
किताब क्या कहती है?
क्या संजय के विवाहित होने की बात माधुरी को परेशान कर रही थी? वह एक रूढ़िवादी परिवार से ताल्लुक रखती थीं और मीडिया में उनकी छवि बहुत साफ़ थी. जैसा कि स्टार एंड स्टाइल की स्टोरी ने इशारा किया था, उन्हें इस बात को लेकर जनता में विश्वास खोने का डर था कि वह एक ऐसे आदमी से विवाह करने वाली थीं जो एक ऐसी औरत का पति था जिसको कैंसर था और वह आदमी उनके कारण अपनी पत्नी को छोड़ रहा था.
लेकिन माधुरी के सेक्रेटरी राकेशनाथ की पत्नी और पटकथा लेखिका रीमा राकेशनाथ ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता है कि संजय के लिए माधुरी के निजी फैसले को उनके करियर के आड़े आना चाहिए. हेमा और धर्मेन्द्रजी को देखिए. हेमा मालिनी ने एक विवाहित आदमी से शादी करने के बावजूद अपनी गरिमा को बनाए रखा.’
मगर ऋचा की बहन ऐना, माधुरी को यूं ही छोड़ देने का इरादा नहीं रखती थीं. सिने ब्लिट्ज़ के उसी इंटरव्यू में ऐना ने कहा, ‘क्या माधुरी इतनी अमानवीय हैं. मेरा मतलब है कि माधुरी को तो कोई भी आदमी मिल सकता है. वह ऐसे आदमी का भरोसा किस तरह कर सकती हैं जिसने अपनी पत्नी के साथ इस तरह का बर्ताव किया? …मुझे पता है कि वे अच्छे दोस्त हैं क्योंकि संजय ने हमारे घर से उनको फोन किया था. और वह उनकी बहन और भाई के बारे में भी यहां बात करता है. लेकिन हमने कभी ऐसा नहीं सोचा कि इस आदमी का अफेयर माधुरी के साथ है. हम लोग बहुत खुले विचारों के हैं. हमने संजय को हमेशा पूरी स्पेस दी है.’
ऋचा को उम्मीद थी कि उनके और संजय के बीच सब कुछ ठीक हो जाएगा, मगर ख़बर आई कि संजय ने 1993 की शुरुआत में तलाक की अर्जी दायर कर दिया. ऋचा आगबबूला हो गईं. ‘मैंने क्या गलती की है? मैं यह नहीं समझ पाती कि वह अपनी ज़िंदगी में चाहते क्या हैं. एक सुंदर लड़की जो छरहरी हो? मुझे लगता है कि इसी वजह से उनको माधुरी से प्यार हो गया… संजय बहुत अच्छे बॉयफ्रेंड थे. मगर एक पति के रूप में कहानी कुछ और ही थी.’
3: संजय की बहनें और मान्यता के साथ उनके कड़वे रिश्ते
इसमें कोई शक नहीं कि संजय की बहनों नम्रता और प्रिया ने नशे की लत और जेल में गुज़रे वक्त से ही संजय के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इतनी नज़दीकी के बावजूद जब वे मान्यता के करीब आए तो अपनी बहनों के साथ उनके रिश्ते खराब हुए. लेकिन फिल्म में उनके इस पहलू पर एक संवाद तक नहीं है.
किताब क्या कहती है?
सुनील दत्त को मुंबई में एक छोटे से क्लीनिक के बारे में पता चला और संजय को वहां भर्ती करवा दिया गया. वहां उनकी इलेक्ट्रॉड चिकित्सा हुई (मरीज़ के माथे में इलेक्ट्रॉड लगाकर बिजली के हलके झटके देना), जो बहुत तकलीफदेह थी, और उसका कोई असर भी नहीं हुआ.
जब इलाज बेअसर साबित हुआ तो संजय को वहां से ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाया गया. उन्होंने अस्पताल की एक घटना को याद किया जो ऊपर से तो मज़ेदार लगती हैं लेकिन इस बात का खुलासा भी करती है कि वो कितने असहाय हो गए थे. हर रात में उनकी एक बहन को अस्पताल में उनके पास रहना होता था ताकि जब संजय को नशे की तलब उठे तो उसकी पीड़ा को सहने में उनकी मदद कर सकें.
संजय कहते हैं- ‘प्रिया तब स्कूल में पढ़ती थी… मुझे मतिभ्रम होने लगा. मुझे लगा कि वह ‘गोरखा’ थी. मैंने कहा, “ऐ गोरखा! ऐ गोरखा!” प्रिया डर गई लेकिन वह किसी तरह की बकझक नहीं करना चाहती थी. वह ऐसे जताने लगी मानो वह सच में गोरखा हो. उसने कहा, “जी साब, बोलो! क्या करने का है साब?” मैंने कहा, “मेरे को चरस लेके आओ.” वह बोली, “चरस नहीं है, मेरे पास बीड़ी है. बीड़ी मांगता है क्या?”
उस घटना को याद करते हुए संजय ने बाद जो कहा वो सच था, ‘केवल मैं ही बीमार नहीं था, बल्कि मेरे साथ पूरा परिवार ही बीमार था.’
जब से मान्यता संजय के जीवन में आई थीं तब से वो दत्त परिवार में झगड़े का कारण बनी हुई थीं. लेकिन शायद संजय और उनकी बहनों के बीच सबसे बड़ा झगड़ा तब हुआ जब संजय ने 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने की कोशिश की (अंततः अपने कानूनी पचड़ों के कारण वे चुनाव में खड़े नहीं हो पाए). उसके बाद समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने संजय को समाजवादी पार्टी में शामिल करवा लिया.
यह प्रिया दत्त के लिए बहुत बड़ा झटका रहा होगा जो अपने पक्के कांग्रेसी पिता के रस्ते पर चलते हुए मुंबई उत्तर-पश्चिम से कांग्रेस की सांसद हो गई थीं. गुस्से में तिलमिलाई प्रिया दत्त ने संजय के बारे में बोला: ‘उनके (सुनील दत्त) मरने के बाद पहली बार मैं इस बात के लिए राहत महसूस कर रही हूं कि इस कलंक को देखने के लिए वे जीवित नहीं हैं.’ लेकिन बात यहीं तक ख़त्म नहीं हुई. प्रिया ने कहा कि संजय के पारिवारिक राजनीतिक विरासत से अलग होने का कारण मान्यता थीं:
‘वह फिल्मों में इतना व्यस्त रहते हैं कि उनको राजनीति के लिए समय नहीं मिलता…उसने अपनी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए मेरे भाई को इसके लिए तैयार किया है.’ प्रिया ने अपने माता-पिता की विरासत से मान्यता को अलगाते हुए यह कहा, ‘वह सुनील और नरगिस दत्त की बहू नहीं है…वह एक ऐसी औरत है जिसने मेरे भाई को फंसा लिया है.’ बाद में संजय ने विरासत के ऊपर अपना दावा ठोकते हुए कहा, ‘पाली हिल में एक ही मिस्टर दत्त और मिसेज दत्त हैं, मैं और मान्यता.’
4: संजय की दूसरी पत्नी रिया पिल्लई
1990 के दशक में जब वह जेल में थे तब रिया संजय के लिए समर्थन में खड़ी थीं, और माधुरी ने उनसे सारे संपर्क तोड़ लिए थे. असल में, उन्होंने कहा था, ‘जब मैं जेल में था तब रिया ने प्यार सिखाया. भविष्य अंधकारमय था, कोई सुरक्षा या प्रतिबद्धता नहीं थी. लेकिन उसने रिश्ते को मरने नहीं दिया.’ रिया और संजय ने अंततः 1998 में शादी की. लेकिन वे लोग जल्द ही अलग हो गए.
किताब क्या कहती है?
2000 में जब रिया उनकी पत्नी थीं, तभी इस तरह की अफवाहें आने लगी कि संजय के जीवन में एक नई लड़की आ गई थी. वह औरत कौन थी? खबरें आने लगीं कि वह पाकिस्तान की एक बैले डांसर थी, जिसका नाम था नादिया दुर्रानी. आउटलुक पत्रिका में एक लेख छपा जिसका शीर्षक था ‘नादिया राइड्स अगेन’ (13 सितंबर 2004). उस लेख में लिखा था: ‘संजय दत्त की सबसे नई हिट है– नादिया दुर्रानी… 9 साल के बच्चे की मां, इस महिला ने संजय दत्त का ध्यान तीन साल पहले (हां, यह सही है) खींचा. दोनों को हाल में ही मुंबई में आयोजित पाकिस्तानी फ़ूड फेस्टिवल में काफी घुल-मिल कर खाना खाते हुए देखा गया.’ उन दोनों के बीच प्यार की कहानियां लोकप्रिय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही थीं और यहां तक कि एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें यह लिखा हुआ था कि मुंबई के एक सेवेन स्टार होटल में दोनों मिलते थे. होटल के कर्मचारी इस बात को लेकर पूरा चौकन्ना रहते थे कि संजय और नादिया की निजता बनी रहे. एक बार संजय और नादिया को होटल के चाइनीज़ रेस्तरां में लंच करते हुए देखा गया, और दोनों को अगले दिन भी वहीं देखा गया.
कहा जाता है कि नादिया संजय पर बहुत फिदा थीं और उनसे शादी करना चाहती थीं. अक्टूबर 2001 में संजय कांटे फिल्म की शूटिंग के लिए एक सप्ताह के लिए अमेरिका गए थे, और खबरों के मुताबिक संजय की दीवानी नादिया भी वहां पहुंच गई थीं. बताया जाता है कि रिया इससे बहुत दुखी थीं. इस घटना के बाद, संजय ने रिया से इस बात का वादा भी किया कि वह इस रिश्ते को ख़त्म कर देंगे. लेकिन संजय-नादिया की कहानियां ख़त्म नहीं हुईं. कहा जाता है कि संजय ने बांद्रा के नाईट क्लब पॉइज़न में पार्टी के दौरान नादिया को सार्वजनिक रूप से शादी का प्रस्ताव रखा था. ‘संजय क्लब में नादिया के साथ थे और उन दोनों को रात भर मीठी बातें करते देखा जा सकता था. अचानक संजय दत्त खड़े हुए और उन्होंने सभी लोगों से मुखातिब होते हुए कहा कि वे नादिया से प्यार करते हैं और जल्दी ही उससे शादी करना चाहते हैं.’ भीड़ खुश होकर चिल्ला रही थी और यहां तक कि वहां मौजूद लोगों ने उन दोनों के लिए टोस्ट भी किया.
5: संजय के उद्धारक बाल ठाकरे
यह सुनील दत्त के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बाल ठाकरे ही थे जिन्होंने 1995 में संजय को ज़मानत दिलाने के लिए पैरवी की थी, जब महाराष्ट्र के कांग्रेस के मुख्यमंत्री शरद पवार और कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सुनील दत्त के बेटे के मामले में मुंह मोड़ लिया था.
किताब क्या कहती है?
जब संजय आर्थर रोड जेल से बाहर निकले तो सैकड़ों लोग बॉलीवुड के उस सबसे मर्दाने शरीर वाले अभिनेता को देखने के लिए जुटे थे, जिसकी तरह अपनी बॉडी बनाने की आकांक्षा लाखों लोगों में थी. उन्होंने देखा कि एक दुबला-पतला आदमी बाहर आया जिसके बाल बढ़े हुए थे, जिसने सफ़ेद रंग का लंबा कुरता और जींस पहन रखी थी और उसके गले में एक माला थी. जेल में संजय का वज़न 18 किलो कम हो गया था. मीडिया की धक्का-मुक्की के बीच उनको तेज़ी से गाड़ियों के काफिले की तरफ ले जाया गया. वह सबसे पहले प्रभा देवी में सिद्धि विनायक मंदिर में रुके. संजय ने अपने पिता के साथ मंदिर की परिक्रमा की और भगवान का शुक्रिया अदा करने के लिए पूजा की. महेश भट्ट ने संजय की रिहाई से कुछ दिन पहले उनसे हुई मुलाकात को याद करते हुए कहा: ‘उसके बाल थोड़े लंबे थे, उन्होंने दाढ़ी नहीं बनाई थी. उसके गले में खूब सारी मालाएं थीं. मुझे यह बताया गया था कि वह बहुत धार्मिक हो गया था.’ तावीज़ के स्थान पर तिलक आ गया था, इसके बाद समय था संजय के सबसे बड़े संरक्षक को शुक्रिया अदा करने का. उनका काफिला मातोश्री की तरफ बढ़ गया.
चमकते कैमरों के बीच बाल ठाकरे अपने दरवाज़े के सामने आए और उन्होंने संजय को गले से लगा लिया. वे मुस्कुराए और उनके बीच थोड़ी बातचीत हुई. अगली सुबह वह प्रसिद्ध हो चुकी तस्वीर अखबारों में आई जिसमें संजय दत्त ने ठाकरे को ज़ोर से भींच रखा था जबकि सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार बगल में खड़े मुस्कुरा रहे थे.
कांग्रेस पार्टी के एक नेता ‘मुंबई के शेर’ के सामने सम्मान प्रदर्शित कर रहे थे, यह दृश्य शिव सेना के लिए बहुत बड़ा था. संजय दत्त की रिहाई के इस हो-हल्ले के बीच शरद पवार ने रुखाई के साथ यह टिप्पणी की, ‘कोई महात्मा गांधी रिहा नहीं हुए हैं.’
(यह लेख किताब के प्रकाशक जगरनॉट एवं लेखक की अनुमति से प्रकाशित)