बीते तीन सालों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में साल 2017 में कुल 3239 बच्चों की अकाल मृत्यु दर्ज की गई.
इस लेख का शीर्षक विषय की गंभीरता से भटकता हुआ दिख रहा है, यह शीर्षक किसी जश्न का आभास दे रहा है, लेकिन यह कुंठा की उपज है. जहां सरकारों का काम जनता के करोड़ों रुपए खर्च कर अयोध्या में त्रेतायुग उतारने का रह गया है, जहां सरकारें 38,000 रुपए प्रति कॉपी की दर से गीता की प्रतियां खरीद कर उसके प्रचार-प्रसार को विकास का पैमाना मान चुकी हैं, जहां प्रधानमंत्री दावोस जैसे विशुद्ध बाजारू आयोजन में अपनी बांहे लहराकर विश्वशक्ति बनने का गुमान भर रहें हों ऐसे जश्न भरे माहौल में 3239 बच्चों की मौत का ग़म किसे हो सकता है. इसलिए शीर्षक रिकॉर्डतोड़ है. और ये आंकड़ा देश के कुल 631 जिलों में से सिर्फ एक जिला गोरखपुर का है.
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में जिन 3239 बच्चों की मौत हुई है उनमें इंसेफेलाइटिस (जेई/एईइस) के मरीजों के अलावा दूसरी बीमारियों से पीड़ित बच्चे भी शामिल हैं. पिछले तीन वर्षों के मुकाबले वर्ष 2017 में बच्चों की मौत का आंकड़ा आसमान पर जा पहुंचा है. यह जानकारी बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सूत्रों ने दी है. हालांकि बीआरडी कॉलेज प्रशासन इसकी पुष्टि नहीं कर रहा है.

सूत्र से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2017 में बीआरडी मेडिकल कालेज के नेहरू अस्पताल के एनआईसीयू (नियोनेटल इंटेसिव केयर यूनिट) में 2032 शिशुओं की मौत हुई. एनआईसीयू में 28 दिन तक के बच्चे भर्ती होते हैं. अधिकतर बच्चों की मौत बेहद कम वजन, संक्रमण और सांस सम्बन्धी समस्या के कारण हुई.
इसी अवधि में नेहरू चिकत्सालय के पीआईसीयू (पीडियाट्रिक इंटेसिव केयर यूनिट) में 1207 बच्चों की मौत हुई. इसमें 510 इंसेफेलाइटिस रोगी थे. शेष अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे. वर्ष 2017 में जापानी इंसेफेलाइटिस के केस भी बढ़ गए हैं. रुटीन टीकाकारण के अलावा वर्ष 2017 में 92 लाख बच्चों को एक विशेष अभियान के तहत टीका लगाया था. इसके बावजूद जापानी इंसेफेलाइटिस के केस बढ़ने पर सवाल उठ रहे हैं. वर्ष 2017 में इंसेफेलाइटिस से मृत्यु दर में जरूर कमी आई है.

बीते साल अगस्त महीने में 48 घंटों के दौरान 54 बच्चों और वयस्कों की मौत होने के बाद भारी हंगामा हो गया था. उस समय जो बातें सामने आईं उसके मुताबिक बच्चों की मौतें ऑक्सिजन की सप्लाई रुकने के कारण हुई थीं. हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने 11 अगस्त की शाम मौतों की खबर आने के बाद आनन-फानन में ट्विटर के जरिए ऐलान किया था कि मौतें ऑक्सिजन की कमी से नहीं बल्कि दीगर वजहों से हुई.
बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने मैजिस्टीरियल जांच के आदेश दिए थे. इस जांच रिपोर्ट में ऑक्सिजन की कमी की बात को नकार दिया गया था.
हालांकि गोरखुपर के मीडिया और पत्रकारों की स्वतंत्र जांच में इस बात की पुष्टि हुई थी कि ऑक्सिजन की कमी ही इतनी बड़ी संख्या में मौतों के लिए जिम्मेदार थी. मेडिकल कॉलेज के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब 48 घंटे के भीतर 36 बच्चों और 18 वयस्कों यानि 54 लोगों की मौत हुई थी.
गोरखपुर न्यूज़ लाइन नामक एक स्थानीय समाचार पोर्टल ने ऑक्सिजन की सप्लाई रुकने संबंधी ख़बर एक दिन पहले यानि 10 अगस्त की शाम को दस्तावेजों के साथ प्रकाशित की थी.
आखिरकार 10 अगस्त की रात 7.30 बजे लिक्विड ऑक्सिजन का प्रेशर लो हो गया. यह संकेत था कि अब ऑक्सिजन के दूसरे वैकल्पिक इंतजाम किए जाएं. खुद मेडिकल कालेज व स्वास्थ्य विभाग ने उच्चाधिकारियों को जो रिपोर्ट दी थी, उसमें कहा गया कि जब लिक्विड ऑक्सिजन का प्रेशर लो हो गया तो स्टाक में मौजूद 52 सिलेण्डर को जोड़ा गया. अगले दिन दोपहर 1.30 बजे ऑक्सिजन सिलेण्डर की दूसरी खेप मेडिकल कालेज पहुंची जो फैजाबाद से आई. इसके बाद गोरखपुर से दो खेप में 22 और 28 सिलेण्डर ऑक्सिजन आई जिससे शाम तक काम चलाया गया. शाम सात बजे तक 100 और सिलेण्डरों की आपूर्ति की राह देखी जा रही थी.
10 अगस्त की रात लिक्विड ऑक्सिजन की आपूर्ति रुकने और सिलेण्डर से ऑक्सिजन की आपूर्ति के दौरान ही सर्वाधिक मौतें हुईं थीं. एनआईसीयू, इंसेफेलाइटिस और पीडिया वार्ड में 10 अगस्त की सुबह से 11 अगस्त की शाम तक जिन 36 बच्चों की मौत हुई उसमें 30 मौतें इसी दौरान हुईं जब सिलेण्डर से ऑक्सिजन की आपूर्ति की जा रही थी.
यहां ध्यान देने की बात है कि एक जम्बो ऑक्सिजन सिलेण्डर में 150 केजी ही ऑक्सिजन होती है और इससे आपूर्ति करने में प्रत्येक सिलेण्डर से करीब 50 केजी गैस बर्बाद हो जाती है. लिक्विड ऑक्सिजन की तुलना में इसकी क्वालिटी खराब होती है और यह लिक्विड ऑक्सिजन से दोगुनी कीमत में मिलती है.
उस दौरान इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी चिकित्सक डा कफील खान अचानक से चर्चा में आ गए थे. उनकी कुछ तस्वीरें सामने आई जिसमें वे ऑक्सिजन सिलेंडर के लिए फोन करते देखे जा रहे थे. बाद में इस पूरे प्रकरण में कफील खान को भी आरोपी बनाकर गिरफ्तार किया गया.
उसी रात पौने आठ बजे गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला ने पत्रकारों से बातचीत की. उस समय न्यूज़लॉन्ड्री ने रिपोर्ट की थी जिसमें नियोनेटल वार्ड के एक कर्मचारी ने नाम न छापने के शर्त पर बताया था कि जिस समय डीएम साहब प्रेस ब्रीफिंग कर रहे थे, ठीक उसी दौरान तीन और बच्चों ने दम तोड़ दिया था लेकिन उनके शव को उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया क्योंकि वहां मीडिया के लोग थे और बात फैल सकती थी.
डीएम राजीव रौतेला ने अपनी प्रेस ब्रीफिंग में स्वीकार किया था कि नौ अगस्त को 12 बजे रात से 11 अगस्त की शाम सात बजे तक 30 बच्चों की मौत हुई थी. इसमें 17 नवजात, आठ जनरल पीडिया के मरीज और पांच इंफेलाइटिस से ग्रस्त मरीज थे. साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि ऑक्सिजन की कमी से एक भी मरीज की मौत नहीं हुई.
डीएम ने यह कहकर विषय को टालने की कोशिश की थी कि बीआरडी मेडिकल कालेज एक बड़ा अस्पताल है और यहां बड़ी संख्या में बच्चे भर्ती होते हैं. एईएस यानि कि एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से औसतन दस तथा नवजात शिशुओं की भी इतनी ही संख्या में मौत हो जाती है. लेकिन बीआरडी मेडिकल कालेज के इस वर्ष के आंकड़े डीएम के दावे को झुठलाते हैं. इंसेफेलाइटिस से इस वर्ष 24 घंटे में अधिकतम पांच मौतें दर्ज हुई थीं. इसी तरह नियोनेटल वार्ड में भी औसतन एक दिन में पांच मौतें ही दर्ज हुई थीं, जबकि 9 से 11 अगस्त के बीच 54 लोगों की मौत हुई, जाहिर है इसके पीछे कुछ असाधारण परिस्थितियां थी.
मौतें बढ़ीं तो ऑक्सिजन सप्लाई कम्पनी को किया 21 लाख का भुगतान
डीएम की सफाई यहां आकर भी झूठी साबित हुई कि, जब बच्चों के साथ-साथ दूसरे मरीजों की मौत की संख्या बढ़ने लगी तब मेडिकल कॉलेज ने आनन-फानन में लिक्विड ऑक्सिजन सप्लाई करने वाली कम्पनी पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड को 11 अगस्त की दोपहर में 21 लाख रुपए का भुगतान किया. भुगतान मिलते ही कम्पनी ने नागपुर से एक टैंकर लिक्विड ऑक्सिजन परचेज कर उसे गोरखपुर के के लिए रवाना कर दिया. पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड के एक अधिकारी ने इसकी पुष्टि की थी.